Thursday, September 15, 2011

दागी अफसरों को सजा दिलाने में केंद्र की दिलचस्पी नहीं

बिहार सरकार ने भ्रष्टाचार के मुकदमे का सामना कर रहे आई.ए.एस. अफसर एस.एस. वर्मा के आलिशान मकान को तो जब्त कर लिया, पर उस अफसर के खिलाफ मुकदमा चलाने की अनुमति केंद्र सरकार नहीं दे रही है। नतीजतन अभियोजन पक्ष शिव शंकर वर्मा के खिलाफ अदालत में आरोप पत्र नहीं दाखिल कर पा रहा है। वर्मा के अलावा भी बिहार के दो अन्य आई.ए.एस. अफसरों के खिलाफ भी मुकदमा चलाने की अनुमति केंद्र से बिहार को नहीं मिल पा रही है जबकि इसके लिए बिहार सरकार ने कई बार केंद्र को पत्र लिखे हैं। एक अन्य खबर के अनुसार केंद्रीय सेवाओं की प्रथम श्रेणी के अफसरों से संबंधित ऐसे करीब तीन सौ मामले प्रधानमंत्री सचिवालय में लंबे समय से लंबित है। ऐसा अन्ना आंदोलन के दौर में भी हो रहा है।

1981 बैच के आई.ए.एस. अफसर शिव शंकर वर्मा बिहार सरकार में लघु सिंचाई सचिव थे। उन पर अवैध संपत्ति बनाने का आरोप है। बिहार सरकार की विशेष निगरानी इकाई ने 6 जुलाई, 2007 को वर्मा के आवास पर छापा मार कर करीब एक करोड़ पचास लाख रुपये की अवैध संपत्ति के सबूत इकट्ठे किये थे। बिहार विशेष अदालत कानून, 2010 के तहत वर्मा के खिलाफ विशेष अदालत में मुकदमा चल रहा है। विशेष अदालत ने 17 मार्च 2011 को वर्मा की संपत्ति जब्त करने का आदेश दिया। वर्मा ने अदालत से गुजारिश की थी कि पटना स्थित उस मकान को उन्हें ही किराए पर दे दिया जाए जिसे अदालत ने नामंजूर कर दिया। जब्त मकान की बाजार कीमत करीब पांच करोड़ रुपये बताई जा रही है।
एक अफसर इतने आलीशन मकान को भी किराए पर लेने को तैयार है। यह भी आश्चर्य की बात है। इससे उसकी अमीरी का पता चलता है। याद रहे कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कहा है कि ऐसे जब्त मकानों में बच्चों के सरकारी स्कूल खाले जाएंगे।

पर ऐसे अफसरों को भी सजा दिलाने में केंद्र सरकार की अरूचि आश्चर्यजनक है। इतना ही नहीं, बिहार सरकार ने जब 2009 में बिहार विशेष अदालत अधिनियम, 2009 विधायिका से पास करवाकर केंद्र को भेजा तो उस पर भी राष्ट्रपति की मुहर दिलवाने में केंद्र सरकार ने एक साल लगा दिये। याद रहे कि उस कानून में मुकदमे की सुनवाई के दौरान भी आरोपित की अवैध संपत्ति को जब्त करने का आदश देने का कोर्ट को अधिकार मिल गया है। यह देश में अपने ढंग का नया व कारगर कानून है। हाल में केंद्र सरकार ने यह जरूर कहा है कि इस मामले में वह भी बिहार जैसा कानून बनवाना चाहती है। पर वर्मा पर मुकदमा चलाने की अनुमति नहीं देने के काम से लगता है कि केंद्र सरकार का वायदा खोखला है।

इस बीच बिहार सरकार ने प्रथम श्रेणी के कई अन्य अफसरों के खिलाफ भी ऐसे ही मुकदमे विशेष अदालतों में दायर कर रखे हैं। ऐसे छह स्पेशल कोर्ट में बिहार में काम कर रहे हैं। उनकी अवैध संपत्ति जब्त करने की कोर्ट से अभियोजन पक्ष ने गुजारिश भी की है। इस पर कोर्ट का फैसला आने ही वाला है। पर फिर सवाल उठेगा कि क्या केंद्र सरकार उनके खिलाफ आरोप पत्र दायर करने की अनुमति देगी ?

बिहार के पिछड़ेपन का एक बड़ा कारण यह रहा है कि यहां के सरकारी पैसों में से अधिकंाश बिचौलिये खा जाते हैं। भ्रष्टाचार के आरोप में यहां दो -दो पूर्व मुख्यमंत्री और आधा दर्जन आई.ए.एस. अफसर जेल की हवा खा चुके हैं। पिछले बीस साल में कई मंत्रियों व विधायकों को भी जेल जाना पड़ा। पर यह बात महसूस की गई कि जेल गये आरोपित अपनी अकूत संपत्ति त्त के जरिए मुकदमे की गर्मी भी कई बार सह जाते हैं। वे महंगे वकील रखकर तथ्यों को तोड़ मरोड़ करके और अदालत के सामने गलत तथ्य पेश करके केस में अपने पक्ष में कई बार जजमंेट दिलवा देते है।

इसलिए हाल में नीतीश सरकार ने यह महसूस किया कि मुकदमे की सुनवाई के दौरान ही उनकी अवैध संपत्ति जब्त कर ली जाए तो आरोपित गण कई मामलों में अपनी उस अपार संपत्ति का बेजा फायदा मुकदमा जीतने के लिए नहीं उठा पाएंगे। इसलिए बिहार विशेष अदालत कानून बना। केंद्र सरकार ऐसे मामलों में अभियोजन की समय पर अनुमति देकर ही गरीबों के धन को लूटने वालों को सजा दिलवा सकती है। क्या अन्ना आंदोलन के सघन होते जाने के बावजूद केंद्र सरकार एस.एस. वर्मा जैसे अफसरों का परोक्ष रूप से बचाव करती रहेगी? बिहार में कई लोग यह सवाल उठा रहे हैं।

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