Thursday, November 29, 2012

एक महाराजा लीक से हटकर


 जयपुर के आखिरी महाराजा सवाई मान सिंह की कई विशेषताएं थीं। वह एक साथ कुशल प्रशासक, देशभक्त, सैनिक और खिलाड़ी थे।

वह न सिर्फ पोलो के बहुत अच्छे खिलाड़ी थे, बल्कि दुनिया की दस सबसे सुंदर महिलाओं में से एक गायत्री देवी के पति भी थे। सन् 1958 में उनके नेतृत्व में भारत ने पोलो खेल में विश्व का स्वर्ण कप जीता था।
 पोलो खेलते समय हुई दुर्घटना में 24 जून 1970 को उनका निधन हो गया। निधन के समय उनकी आयु सिर्फ 58 साल थी।

  21 अगस्त 1912 को जन्मे मान सिंह जयपुर के महाराजा लेफ्टिनेंट .जनरल सवाई माधो सिंह के दत्तक पुत्र थे। सवाई मान सिंह पोलो मैच खेलते हुए अचानक अस्वस्थ हो गये। उन्हें तुरंत अस्पताल पहुंचाया गया। पर अस्पताल ने उन्हें मृत घोषित कर दिया।

इससे एक माह पहले भी एक पोलो मैच के दौरान वह गिर पड़े थे। तब उन्हें गहरी चोट लगी थी। पर एक माह के आराम के बाद वह फिर पोलो के खेल में जुट गये। राजपूत घरानों के इस नारे को कि ‘रण में लड़ते -लड़ते शहीद हो जाओ,’ उन्होंने पोलो के खेल में लागू कर दिया। पोलो का मैदान उनके लिए रणक्षेत्र था और उसी में वह शहीद हो गये। उनकी मौत महारानी गायत्री देवी के लिए एक बड़ा सदमा था।

 कूच बिहार के महाराजा जितेंद्र नारायण की पुत्री गायत्री देवी से मान सिंह ने 1940 में प्रेम विवाह किया था। यह अंतरजातीय विवाह था। यह उनकी तीसरी शादी थी। इससे पहले की दो शादियां उन्होंने जोधपुर राजघराने में की थीं। जोधपुर के महाराजा सुमेर सिंह की बहन से मान सिंह की पहली शादी हुई थी। दूसरी शादी उनकी बेटी से हुई। गायत्री देवी से उनका परिचय तब हुआ था जब मान सिंह पोलो खेलने कलकत्ता गये थे और वह कूच बिहार के महाराजा के अतिथि थे।

मानसिंह के निधन के बाद गायत्री देवी को इंदिरा सरकार से कठिन संघर्ष करना पड़ा। आपातकाल में गायत्री देवी को सरकार ने जेल में बंद कर दिया था। बड़े अमानवीय तरीके से उन्हें जेल में रखा गया था। हालांकि उससे पहले वह 1962, 1967 और 1971 में लोकसभा की सदस्या रह चुकी थीं। प्राप्त मतों की संख्या की दृष्टि से उन्होंने रिकार्ड कायम किया था। गायत्री देवी का निधन सन 2009 में 90 साल की उम्र में हुआ।

  मानसिंह को  7 सितंंबर 1922 को महाराजा सवाई माधो सिंह ने अपना उत्तराधिकारी बनाया था। पर जयपुर रियासत की सत्ता उन्होंने 1937 में संभाली। अपने शासन के दौरान उन्होंने लोगों की भलाई, सेवा और सहायता पर अधिक जोर दिया।

आजादी के बाद तत्कालीन गृहमंत्री सरदार बल्लभ भाई पटेल ने रियासत को भारत में मिलाने का प्रस्ताव जब जयपुर महाराज के सामने रखा तो उन्होंने उसे सहर्ष स्वीकार कर लिया। याद रहे कि तब 565 रियासतें थीं जिन्हें मिलाया गया था।

याद रहे कि तब सभी राजाओं का रुख ऐसा नहीं था। जयपुर रियासत देश की सबसे बड़ी कुछ रियासतों में एक थी। उन्हें 18 लाख रुपये सालाना प्रिवी पर्स मिलता था जिसे बाद में इंदिरा गांधी सरकार ने समाप्त कर दिया। इनके अलावा हैदराबाद, मैसूर, त्रावणकोर, बड़ौदा और पटियाला के पूर्व शासक ही दस लाख रुपये से अधिक प्रिवी पर्स पाते थे। हैदराबाद के पूर्व शासक को बीस लाख रुपये सालाना मिलता था। जयपुर महाराजा के विपरीत उन्हीं दिनों कुछ रियासतों ने भारत में विलयन में भारी हिचक दिखाई थी। हैदराबाद रियासत को तो पुलिस कार्रवाई के बाद हासिल किया गया था। संयोगवश उस पुलिस कार्रवाई का नाम दिया गया आपरेशन पोलो। पोलो जयपुर के पूर्व शासक का प्रिय खेल था।

जूनागढ़ के शासक भी विद्रोह की मुद्रा में थे। कश्मीर के महाराजा के तो आरंम्भिक इनकार के कारण पाकिस्तान को हमला करने का मौका मिल गया।

ऐसे में विलय के प्रस्ताव को जयपुर  महाराजा द्वारा तुरंत स्वीकारने के रुख की  सराहना हुई थी।

 जयपुर महाराज ने देश की नई परिस्थितियों के अनुसार खुद को ढाल लिया था। सवाई मान सिंह के बारे में प्रसिद्ध पत्रकार और लेखक जाॅन गुंटर ने लिखा था कि वह अपने आप को नई परिस्थितियों में ढालने में ऐसे अभ्यस्त हो चुके थे जिस तरह वह पोलो खेल के दौरान अपने घोड़े बदलते थे।

 पूर्व महाराजा के असामयिक निधन पर तत्कालीन राष्ट्रपति वी.वी. गिरि ने कहा था कि देश ने एक महान खिलाड़ी, एक योग्य प्रशासक और राजनीतिक खोया है। प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने गायत्री देवी के नाम शोक संदेश भेजा था। उसमें उन्होंने सवाई मान सिंह के विभिन्न पदों की सेवाओं का जिक्र करते हुए अपनी संवेदना व्यक्त की थी।

उनके निधन की खबर सुनकर राजस्थान के विभिन्न हिस्सों से भारी संख्या में लोग जयपुर में इकट्ठे हो गये थे। तब के एक अखबार की खबर के अनुसार निधन के समाचार से सारे राजस्थान में मुर्दनी छा गई। गांवों और शहरों से भीड़ एकत्र हो गई। लोगों की आंखें इस प्रकार सूजी हुई थीं, जैसे कि उन्होंने अपना कोई बहुत ही करीबी रिश्तेदार खोया है। जयपुर के महाराज सचमुच एक इनसान थे जिनसे सभी प्रेम करते थे और आदर देते थे।

(दैनिक प्रभात खबर में 23 नवंबर 2012 को प्रकाशित)


No comments: