Wednesday, July 3, 2013

भारत की पतली हालत देख जबर बन गया चीन


यह महज संयोग नहीं है। एक तरफ भारत में सत्ता पक्ष और प्रतिपक्ष कोयला घोटाले को लेकर आरोप-प्रत्यारोप में उलझे हुए हैं, वहीं दूसरी ओर चीन हमारी सीमाओं का अतिक्रमण कर रहा है। इन दोनों घटनाओं के बीच सीधा संबंध भी है।

कोयला घोटाला इस देश का कोई पहला घोटाला नहीं है। एक तरफ हमारे देश की सरकारें तरह -तरह के घोटालों में अपने संसाधनों को दोनों हाथों से लुटा रही हैं, वहीं दूसरी ओर हमारी सरकार के पास अपनी सेना और अर्थव्यवस्था को दुरुस्त करने के लिए पैसे की भारी कमी है। हमें कमजोर मान कर चीन ज्यादती कर रहा है।

  चीन में यह कहावत भी है कि भारत सरकार अपने बजट के पैसों को एक ऐसे लोटे में रखती है जिसकी पेंदी में अनेक छेद हैं। जाहिर है कि ये छेदें घोटालों की  ही हैं।

  विस्तारवादी चीन के अपने 14 पड़ोसी देशों से सीमा को लेकर विवाद हैं। चीन ने रुस के साथ अपना सीमा विवाद 2004 और 2008 की बातचीत के जरिए हल कर लिया।

पर, भारत के साथ वर्षों से जारी अनेक वार्ताओं के बावजूद विवाद हल नहीं हो पा रहा है।

इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि चीन हमें एक कमजोर देश मानता है। दूसरी तरफ रुस कमजोर देश नहीं है। रुस जैसे देश में अपनी सीमाओं की रक्षा और आतंकवाद से लड़ने को लेकर कोई आंतरिक मतभेद भी नहीं है। पर  भारत में यह भी एक बड़ी समस्या है। चीन यह अच्छी तरह जानता है।

   गांवों में कोई दबंग व्यक्ति अपने कमजोर पड़ोसी की जमीन में अतिक्रमण कर लेता है। पर उसी दबंग का किसी दूसरे दबंग से पाला पड़ता है तो वह बैठकर आपस में बातचीत के जरिए समझौता कर लेता है।

   सन् 1962 में चीन के हाथों शर्मनाक पराजय के बावजूद भारत की सरकारों ने खुद को आर्थिक व सैनिक दृष्टि से मजबूत नहीं बनाया। यदि बनाया होता तो जिस तरह चीन ने रुस के साथ अपने सीमा विवाद हल कर लिये, उसी तरह भारत के साथ भी उसे किसी न किसी तरह का समझौता करना पड़ता।

   रिटायर सेना प्रमुख वी.के. सिंह ने अपने कार्यकाल में सरकार को लिखा था कि हमारी सेना के पास हथियारों की भारी कमी है।

क्या इस पर सरकार ने कुछ किया ? शायद कुछ नहीं।

यदि तुलनात्मक ताकत का ध्यान रखें तो चीन की सीमा पर भारतीय सैनिक तैनाती की स्थिति और भी खराब रही है। इस कमी को देखते हुए कुछ महीने पहले सेना ने रक्षा मंत्रालय के जरिए वित्त मंत्रालय को एक विशेष प्रस्ताव भेजा था। प्रस्ताव चीन की सीमा पर  भारतीय सेना को मजबूत बनाने के लिए था।

उस इलाके में सेना को आधुनिक हथियारों तथा साजो सामान से सुसज्जित करने के लिए 50 हजार करोड़ रुपये की जरूरत है। इस प्रस्ताव को अस्वीकार करने के साथ ही वित्त मंत्रालय ने रक्षा मंत्रालय से एक अजीब सवाल भी पूछ दिया था। वह सवाल यह था कि क्या कुछ साल बाद तक भी सीमा पर चीन से खतरा आज की तरह ही बरकरार रहेगा?

 यह खबर अखबार में भी काफी प्रमुखता से छपी थी। हमारे देश के हुक्मरानों को उस खबर पर जरूर नजर गई होगी। इसके बावजूद उस पर क्या हुआ, यह अब तक पता नहीं चल सका है। चीन से खतरे की वास्तविकता की जानकारी वित्त मंत्रालय को किसी ने दी या नहीं, पता नहीं। पर, यह खबर इस बीच जरूर आ रही है कि चीन भारतीय सीमा का लगातार उल्लंघन कर रहा है।

इस पर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह कहते हैं कि यह तो स्थानीय मसला है। इसी तरह का जवाब तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने भी संसद में दिया था जब पहली बार भारतीय भूभाग में चीनी घुसपैठ की खबर आई थी।

नेहरू ने कहा था कि जिस भूभाग की चर्चा की जा रही है, वहां घासकी पत्ती भी नहीं उगती। इस पर कांग्रेस के ही महावीर त्यागी ने कहा था कि मेरे सिर में तो एक भी बाल नहीं है तो क्या इस कारण मेरा सिर काट लोगे ?
  इस तरह जानबूझ कर अपनी सीमाओं की रक्षा में विफल नेहरू सरकार को 1962 के युद्ध में पराजय का अपमान झेलना पड़ा। जब चीनी फौज भारतीय सीमा में घुसती जा रही थी और फौजी साजो-सामान के अभाव में हमारी सेना पीछे हटती जा रही थी तो नेहरू ने बचाव में आने के लिए अमेरिका को कई पत्र लिखे। एक बार तो उन्होंने एक ही दिन में दो -दो पत्र राष्ट्रपति जाॅन एफ.कैनेडी को लिखे।

इस अपमान के बावजूद भारत की विभिन्न परवर्ती सरकारों ने भी सेना को इतना मजबूत नहीं किया ताकि हम विस्तारवादी पड़ोसी को वाजिब जवाब दे सकें। नतीजतन आज भी जब सीमा में जबरन घुसपैठ और उस पर भारत सरकार की अकर्मण्यता की खबर आ रही है तो पूरे देश में एक उदासी छाई हुई है।

 यह सही है कि चीन के साथ हमारा सीमा विवाद पुराना है। पर सीमावर्ती भूभाग पर हमारा दावा भी ऐतिहासिक कारणों से कमजोर नहीं है।  

  यह बात साठ के दशक में भारतीय संसद की चर्चाओं से भी प्रकट होती है। समाजवादी नेता व स्वतंत्रता सेनानी डा. राम मनोहर लोहिया ने एक बार भारत सरकार से सवाल किया था कि दुनिया में कौन सी कौम है जो अपने सबसे बड़े देवी-देवताओं में से एक को परदेस में बसाया करती है ?

याद रहे कि कैलास मान सरोेवर तिब्बत में है।

लोहिया ने कहा था कि चीन, तिब्बत पर अपना आधिपत्य जताने और जमाने के लिए तो अंग्रेजों को गवाह बनाता है, पर उन्हीं अंग्रेजों द्वारा तैयार मैकमोहन रेखा को चीन नहीं मानता।

एक बार एक दिलचस्प प्रकरण लोहिया ने लोकसभा में उठाया था। उन्होंने कहा था कि तिब्बत स्थित मनसर नामक गांव के लोग भारत सरकार को सन 1962 तक राजस्व देते थे। मनसर भारत-तिब्बत सीमा से 200 मील अंदर तिब्बत में है। इस पर कांग्रेस के वामपंथी सदस्य शशि भूषण ने लोहिया का मजाक उड़ाते हुए कहा कि वह राजस्व लोहिया जी को ही मिलता होगा। लोहिया ने जांच की मांग की। सरकार ने जांच कराई। लोहिया की बात सही पाई गई।

लोहिया के अलावा कई अन्य दिग्गज सांसदों ने भी 1950 के बाद से ही चीनी सीमा पर अपनी सैनिक तैयारी मजबूत करने के लिए भारत सरकार को आगाह किया था। पर आज तक भारत सरकार सचेत नहीं हुई है। लगता है कि इतिहास से कुछ भी नहीं सीखने की हमारे हुक्मरानों ने कसम खा ली है।

(साभार जनसत्ता ः एक मई 2013)


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