मंगलवार, 22 दिसंबर 2015

संसदीय सक्रियता बढ़ जाने से कम हो जाएगी अदालती अति सक्रियता

  सर्वव्यापी भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाइयों को लेकर दो बड़ी और महत्वपूर्ण खबरें आई हैं। एक उदासी की है तो दूसरी खुश करने वाली।

  सुप्रीम कोर्ट ने बिहार और ओडिसा के उस कानून को वैध करार दे दिया जिसमें आरोपित की संपत्ति जब्त करने की व्यवस्था की गई है। अदालत ने कहा कि ‘रिश्वतखोरी जैसी सामाजिक बुराई अब राष्ट्रीय आतंकवाद का रूप ले चुकी है।’

  याद रहे कि बिहार विशेष अदालत अधिनियम, 2009 के तहत कई बड़े अफसरों की संपत्ति जब्त की जा चुकी है।

 अदालत के ताजा निर्णय के बाद यह उम्मीद है कि भ्रष्टाचार के  मुकदमे झेल रहे लोगों की संपत्ति जब्त करने के काम में तेजी आएगी।

  याद रहे कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अक्सर कहते रहे हैं कि भ्रष्टाचार के प्रति हमारी शून्य सहनशीलता की नीति है। यह अच्छी बात है कि उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव ने भी मुख्यमंत्री की बात दुहरायी है।

    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2014 में लाल किले के भाषण में कहा था कि जब कोई व्यक्ति किसी काम से किसी अफसर के यहां जाता है तो अफसर पूछता है कि ‘इसमें मेरा क्या ?’ पर जब उसे पता चलता है कि उसमें उसे कुछ नहीं मिलने वाला है तो वह कहता है कि ‘तो फिर मुझे क्या ?’

यानी कुछ नहीं मिलेगा तो वह काम नहीं करेगा। प्रधानमंत्री ने यह कहकर इस बात की जरूरत बताई कि भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाइयां करने की कितनी अधिक जरुरत है।

  पिछले कुछ वर्षों में इस देश की विभिन्न अदालतों ने भ्रष्टाचार के आरोपों में प्रभावशाली लोगों के खिलाफ चल रही सी.बी.आई. जांच की निगरानी की है। जानकार लोग बताते हैं कि निगरानी के कारण ही कई मामलों में उन प्रभावशाली लोगों को जेल भिजवाया जा सका जिनके खिलाफ केस चल रहे थे।

  जिस देश की सर्वोच्च अदालत कह रही है कि भ्रष्टाचार राष्ट्रीय आतंकवाद बन चुका है, प्रधानमंत्री भ्रष्टाचार पर चिंता जता रहे हैं, उसी देश की एक संसदीय समिति की एक चैंकानेवाली सिफारिश हाल में सामने आई है।

समिति ने अदालतों की न्यायिक अति सक्रियता की आलोचना की है। उसने राज्यों के विभिन्न जिलों में विशेष सी.बी.आई. अदालतें गठित किये जाने पर भी आपत्ति जाहिर की है।

  कार्मिक, लोक शिकायत, विधि एवं न्याय मंत्रालय से जुड़ी संसद की स्थायी समिति ने कहा है कि ‘अदालतों की अति सक्रियता, शासन की पिरामिड व्यवस्था को और बढ़ाएगी।’

  यह बात सही है कि आज सभी तरह के अपराधों की जांच की मांग सी.बी.आई. से कराने की मांग की जाने लगी है। संसदीय समिति को इस बात पर पहले विचार कर लेना चाहिए था कि ऐसा क्यों हो रहा है ?

क्यों लोगों को राज्य पुलिस पर विश्वास नहीं रहा? क्या इसलिए कि अधिकतर राज्यों में पुलिस राजनीतिक कार्यपालिका के हाथों की कठपुतली बन चुकी है ?

पुलिस सुधार के संबंध में सुप्रीम कोर्ट के निदेशों का पालन करने में राज्य सरकारों को आखिर क्या दिक्कतें हैं ?

  क्यों सी.बी.आई. को यदाकदा पिजड़े का तोता बना दिया जाता है?

जब पुलिस लाचार और सी.बी.आई. तोता हो तो अदालती निगरानी के सिवा कौन सा रास्ता बचता है ?

 आंकड़े बताएंगे कि जिन हाई प्रोफाइल मामलों में अदालती निगरानी नहीं रही, उन मामलों का क्या हश्र हुआ और जिनमें निगरानी रही, उनका क्या हुआ?

 जहां संस्थाएं अपना काम नहीं कर रही हों, वहां उनका काम कोई और करेगा ही। शून्य तो कहीं नहीं रहेगा।

 संसदीय समिति को इस बात की भी जांच करनी चाहिए कि राज्य पुलिस कितने प्रतिशत मुकदमों में अदालतों से सजा दिलवा पाती है और सी.बी.आई. के मामलों में यह प्रतिशत कैसा है। याद रहे कि  सी.बी.आई. द्वारा तैयार मुकदमों में सजा का प्रतिशत काफी अधिक है। जिन मामलों में अदालतें निगरानी करती हैं, उनमें तो सजा का प्रतिशत और भी अधिक होता है।

  क्या सी.बी.आई. गलत लोगों को सजा दिलवाती है? यदि ऐसा नहीं है तो भ्रष्टाचार के आतंकवाद से लड़ने के लिए संसद का क्या और कितना योगदान है, जरा इस पर भी विचार होना चाहिए।

 चीन में एक कहावत है कि भारत अपने बजट का पैसा एक ऐसे लोटे में रखता है जिसमें अनेक छेद होते हैं। अस्सी के दशक मेंे तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने भी कहा था कि हम एक रुपए दिल्ली से भेजते हैं, उसमें से सिर्फ 15 पैसे ही गांवों तक पहुंचते हैं। जब सरकारी साधनों की इस तरह लूट जारी रहेगी तो गरीबी कम नहीं होगी। गरीबी कम नहीं होगी तो देश में व्यवस्था के प्रति आम लोगों का असंतोष बढ़ेगा। फिर क्या होगा ? 

 इन बातों से नरेंद्र मोदी के लाल किले के भाषण से जोड़कर देखें तो अदालतों की सक्रियता की और भी जरूरत महसूस होगी।

ऐसी जरूरत सांसदों को भी महसूस होनी चाहिए अन्यथा वे समय के साथ अपना महत्व खो देंगे। इस बीच कई सांसद भ्रष्टाचार के कैंसर के खात्मे की जरूरत अवश्य महसूस करते हैं। पर लगता है कि वे अल्पमत में हैं।

आज इस देश के अनेक बड़े नेताओं, अफसरों और अन्य प्रभावशाली लोगों में अपार धन खास कर रियल इस्टेट जुटाने की प्रवृत्ति बढ़ रही है। ऐसे में कई विवेकशील लोगों को अदालती अति सक्रियता और भी जरूरी लगती है। 

  इन समस्याओं को नजरअंदाज करके संसद के अनेक सदस्यगण आए दिन सदन में हंगामा करते रहते हैं। यह सब देख कर राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी को हाल में कहना पड़ा कि ‘संसद में बहस होनी चाहिए, हंगामा नहीं।’

 एक बात और। यदि संसद अपना काम करती होती तो अदालतों की सक्रियता नहीं बढ़ती।

  झारखंड मुक्ति मोर्चा सांसद रिश्वत कांड मुकदमे के सिलसिले में सुप्रीम कोर्ट ने नब्बे के दशक में कहा था कि हम जानते हैं कि सरकार को गिरने से बचाने के लिए रिश्वत ली गयी है, पर हम कुछ कर नहीं सकते। क्योंकि संविधान का अनुच्छेद -122 हमें कुछ करने से रोकता है। संसद को चाहिए था कि वह संबंधित अनुच्छेद में संशोधन कर देती ताकि कोई सांसद सदन में वोट देने के लिए घूस ले तो वह भी सजा से नहीं बच सके।

 हवाला घोटाले के बारे में उन्हीं दिनों सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि इस कांड की तो सी.बी.आई. ने ठीक से जांच ही नहीं की। संसद ने सी.बी.आई.को पिजड़े का तोता बन जाने से क्यों नहीं रोका ?

याद रहे कि हवाला घोटाला सर्वदलीय घोटाला था जिसमें अनेक दलों के अनेक प्रमुख नेता लिप्त पाये गये थे। उपर्युक्त संसदीय समिति के सदस्यों को इस बात की जांच कर लेनी चाहिए थी कि पिछले कुछ दशकों में  समय -समय पर विभिन्न घोटालों की जांच के लिए गठित संसदीय समिति किस नतीजे पर पहुंची और जब उन्हीं मामलों की जांच जब सी.बी.आई. ने की तो क्या नतीजा निकला। 


(15 दिसंबर 2015 के दैनिक भास्कर,पटना से साभार)     
   

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