Friday, January 20, 2017

तीन बार से अधिक दलबदल पर कम्प्यूटर ही कर दे नामांकन रिजेक्ट

जब-जब चुनाव निकट आता है, तो कुछ बातें खुलकर सामने आने लगती हैं। यह कि हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था एक साथ कितने बड़े-बड़े खतरे झेल रही है। यह खतरा मुख्यतः चुनावी भ्रष्टाचार, परिवारवाद, दलबदल और घोर सांप्रदायिक तत्वों से है। कुछ खतरे और भी हैं।

पर चुनाव समाप्त होने के साथ ही लोगबाग इन खतरों को भूल जाते हैं।

नेता भला क्यों याद रखेंगे? उनका उनमें निहितस्वार्थ जो है। जो कुछ नेता याद रखते भी हैं, उन्हें राजनीति की मुख्य धारा कुछ सकारात्मक करने से रोक देती है। जबकि हर चुनाव के साथ यह खतरा बढ़ता ही जा रहा है। कुछ खतरे तो साफ दिखाई पड़ते हैं। पर कुछ अन्य भीतर-भीतर पल रहे हैं।

 अगले कुछ साल तक यदि ऐसा ही चलता रहा तो उस लोकतंत्र की छवि पूरी तरह धूमिल और अराजक हो जाएगी जिसकी शुरुआत 1952 में यहां हुई थी।

 अराजक स्थिति के बीच इस बात की भी आशंका है कि किसी दिन कोई तानाशाह बचे-खुचे लोकतंत्र को पूरी तरह नष्ट ही न कर दे! कुछ दूसरे देशों में ऐसा हो चुका है।

    उत्तर प्रदेश और पंजाब सहित पांच राज्य विधानसभाओं के चुनाव हो रहे हैं। इनमें से दो प्रमुख राज्यों के विभिन्न दलों के कुछ खास नेतागण कई मामलों में बेशर्मी की हद पार कर रहे हैं।  वे लोग संविधान निर्माताओं की आत्मा को चोट पहुंचा रहे हैं।
फिलहाल दलबदल के मामले को देखें। राजनीतिक इच्छाशक्ति हो तो इसका हल आसान है।
 वैसे भी चुनाव सुधार की दिशा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ताजा पहल सराहनीय है। पर यह अभी पहल विचार और बोली के स्तर पर ही अधिक है। सवाल है कि उनकी सरकार उसे कब कार्यरूप देगी?
  कल्पना कीजिए कि किसी दिन देश की सारी लोकसभा व विधानसभा सीटों पर वही लोग चुनाव लड़ें और जीतें जिनके पूर्वज जनप्रतिनिधि रहे हों ! जो आदतन दल बदलू हों, जिनका माफियाओं से संबंध हो। जिन्होंने  नाजायज तरीके से अकूत संपत्ति एकत्र कर ली हो। जो भ्रष्टाचार में आकंठ डूबे हुए हों और न्यायिक प्रक्रिया जिनके सामने फेल हो।
 इन समस्याओं से निपटने के लिए कहीं से शुरुआत तो करनी ही पड़ेगी। पहले कदम के तहत दल बदल कानून में ऐसा संशोधन होना चाहिए  ताकि कोई व्यक्ति तीसरी बार दल बदले तो वह चुनाव लड़ने से वंचित कर दिया जाए।
  सबसे बड़ी पार्टी भाजपा इसकी पहल करके कमाल कर सकती है।
पहली बार केंद्र में एक ऐसी सरकार बनी है जिसकी मंशा बेहतर लग रही है। उसके पास बहुमत भी पर्याप्त है।
राजनीतिक व प्रशसनिक दिशा भी कुल मिलाकर ठीकठाक ही है।
पर आश्चर्य है कि चुनाव सुधार करने और उच्चस्तरीय प्रशासनिक भ्रष्टाचार समाप्त करने की दिशा में ठोस पहल क्यों नहीं हो रही है ?
शायद मोदी जी खंूखार भ्रष्टों और ताकतवर निहितस्वार्थियों पर निर्णायक हमला करने से डर रहे हैं। सरकार गिरने का डर है क्या ?
डरते रहने वालों की सरकारें और पहले गिर जाती हैं। निडर होकर सर्जिकल स्ट्राइक करने पर सरकार की आयु लंबी हो जाती है। सन 1969 की इंदिरा गांधी इसका उदाहरण है। 1969 में उनके दल का लोकसभा में बहुमत नहीं रह गया था। पर बैंक राष्ट्रीयकरण और राजाओं के प्रिवी पर्स की समाप्ति के बाद हुए चुनाव में उन्हें लोस में बहुमत मिल गया।
कहावत है कि एक गलती भगवान भी माफ कर देता है। पर एक ही गलती। यानी एक से अधिक की माफी को भगवान भी गैर जरूरी मानता है। पर आज एक ही नेता को कितनी बार दल बदल की अनुमति दलीय सुप्रीमो देंगे ? याद रहे कि अपवादों को छोड़ दें तो दल बदल घटिया स्वार्थों की पूर्ति के लिए ही हो रहे हैं। ऐसे नेताओं की अब कमी नहीं है कि एक ही नेता अब तक पांच -छह बार दल बदल कर चुके हैं।
 चुनाव के लिए नामंाकन पत्र दाखिल करते के साथ ही कम्प्यूटर ऐसे उम्मीदवारों का नामांकन रिजेक्ट कर सकता है जो उससे पहले भी दो बार  अलग-अलग दलों के टिकट पर चुनाव लड़ चुके हंांे।
यदि ऐसा कानून बना और कम्प्यूटर में प्रोग्रामिंग हुई तो कोई नेता अपने पूरे जीवन काल में दो बार से अधिक दल बदल नहीं कर सकेगा।
यदि सरकार सुधार करना चाहे तो उपाय तो बहुत हंै। न करने के बहाने अनेक हैं। कानून में ऐसे संशोधन की पहल करते ही भाजपा व मोदी की लोकप्रिता का ग्राफ और ऊपर चला जाएगा।


बोल ही नहीं, दल बदल के भी घृणित उदाहरण

साक्षी महाराज अपने कु-बोल ही नहीं बल्कि दल बदल के भी निंदनीय  उदाहरण हैं। उनके बोल अक्सर संविधान के प्रावधानों और भावनाओं के खिलाफ होते हैं। हालांकि इस देश में साक्षी ऐसे  अकेले नेता नहीं हैं। हर रंग की साम्प्रदायिक राजनीति में एक ‘साक्षी’ मौजूद  हंै। वे एक दूसरे से राजनीतिक टाॅनिक पाते रहते हैं। दोनों पर समान प्रहार जरूरी है।

साक्षी महाराज पहले सपा से राज्यसभा सदस्य थे। संासद फंड में से घूस लेने के आरोप मंे कुछ साल पहले उनकी सदस्यता चली गयी थी।

अब साक्षी भाजपा से लोकसभा सांसद हैं। ऐसे नेताओं को नीति -सिद्धांत से कुछ लेना देना नहीं होता है।


चुनावी खर्च बढ़ाओगे तो बदनामी होगी ही 

 चुनाव में काले धन के इस्तेमाल को लेकर वैसे नेताओं की भी बदनामी होती रहती है जिन्होंने अपनी व्यक्तिगत संपत्ति बढ़ाने के लिए राजनीति या सत्ता का कभी इस्तेमाल नहीं किया।

आजकल नरेंद्र मोदी का नाम ‘सहारा’ वालों से पैसे लेने के आरोप के तहत आ रहा है।

 पूरी सच्चाई जांच के बाद ही आ पाएगी। पर अभी मान भी लें कि उन्हें पैसे दिए गए तो भी संकेत यही है कि उन पैसों का इस्तेमाल चुनावी खर्चे में ही किया गया होगा। निजी संपत्ति बढ़ाने के लिए नहीं। राजनीति से  बाहर का कोई निष्पक्ष व्यक्ति नरेंद्र मोदी की व्यक्तिगत ईमानदारी पर शक नहीं करता।

पर सवाल है कि गत लोकसभा चुनाव के समय मोदी जी अपने सभा मंचों पर ही लाखों-करोड़ों रुपए क्यों खर्च कर रहे थे ? उनके दल के अनेक छोटे- बड़े नेता भी चार्टर विमान से यात्रा क्यों कर रहे थे ?

क्या वी.पी.सिंह इसी तरह के अनाप शनाप खर्च करके प्रधानमंत्री बने थे ?

कर्पूरी ठाकुर ने तो कभी हेलीकाॅप्टर से चुनाव प्रचार नहीं किया। फिर भी वे दो बार मुख्यमंत्री और एक बार उप मुख्यमंत्री बने। जबकि उन दिनों बिहार का क्षेत्रफल आज से बड़ा था।


महाराष्ट्र के पूर्व मुख्य 

महाराष्ट्र के पूर्व उपमुख्यमंत्री छगन भुजबल की कहानी पूरे देश की कहानी है। आज तो नेता के गिरफ्तार होते ही उन्हें किसी अस्पताल में जगह दे दी जाती है। क्योंकि वे बीमार हो जाने का बहाना तुरंत बना लेेतेे हैं।
अपवाद की बात और है। इस मामले में फिल्म अभिनेता ऐसे नेताओं से अभिनय सीख सकते हैं।

  आम लोगों का इस सिस्टम पर गुस्सा बढ़ जाता है जब यह पता चलता है कि नेता जी को न तो उससे पहले कभी किसी अस्पताल में भर्ती होना पड़ा था और न ही जेल से वापस आने के बाद।

  पर ऐसे ही एक मामले में महाराष्ट्र के एक डाक्टर अदालत की नाराजगी का सामना कर रहे हैं। चर्चित नेता छगन भुजबल विचाराधीन कैदी के रूप में जेल में हैं। अदालत ने उन्हें कुछ घंटोें के लिए अस्पताल जाने की अनुमति दी थी।

पर कुछ घंटे उनके लिए महीना बन गये। ऐसा मुम्बई के एक अस्पताल के डीन और जेल अधिकारी की साठगांठ से हुआ। भुजबल के प्रभाव के कारण ऐसा हुआ।

कोर्ट के आदेश का उल्लंघन करते हुए ऐसा किया गया। डीन साहब अदालत की मर्जी के खिलाफ काम करने का मामला झेल रहे हैं।


और अंत में

  ईश्वर ने दो कान और दो आखें दी हैं। पर मुंह एक ही दिया है। यानी आदेश है कि जितना बोलिए, उसकी अपेक्षा पहले दुगुना सुनिए और देखिए। यानी चीजों को परखिए।पर हमारे अधिकतर नेता क्या करते हैं ? ईश्वर के अघोषित आदेश का रोज ही उलंघन करते हैं।
( प्रभात खबर के 20 जनवरी 2017 के अंक में प्रकाशित )

 
 

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