Friday, April 7, 2017

सक्रिय सरकारी सहयोग के बिना पटना का नियोजित विकास असंभव

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने शहरों के अनियोजित विकास पर नाराजगी जाहिर की है। पटना सहित राज्य के अनेक शहरों का अनियोजित विकास दरअसल नाराजगी के साथ -साथ चिंता का कारण भी बनता जा रहा है। आने वाले दिनों में इसके कई नुकसान सामने आएंगे।

शहरों को विकसित करने का काम सिर्फ निजी हाथों में छोडा़ नहीं जा सकता है। बड़े बिल्डर्स व डेवलपर्स तो अभी यहां आने से रहे। मझोले और छोटे बिल्डर्स की अपनी सीमाएं हैं। उनमें से कुछ में कमजोरियां भी हैं। शिकायतें भी आती रहती हैं।

ऐसे व्यापारियों से आम लोगों को राहत दिलाने की जिम्मेदारी सरकार पर है। पर बिहार सरकार ने दशकों से अपनी यह जिम्मेदारी छोड़ रखी है। राजेंद्र नगर और लोहिया नगर जैसे कई नियोजित मुहल्ले राज्य सरकार की एजेंसी ने ही बसाए थे। कुछ मकान बनाये गये तो कुछ भूखंड विकसित कर लोगों के बीच बांटे गए।

पर राज्य सरकार अपनी ही गलती से दीघा में जाकर फंस गयी। आवास बोर्ड ने व्यवस्थित ढंग से लोगों को बसाने के लिए सत्तर के दशक में पटना के दीघा में 1024 एकड़ जमीन का अधिग्रहण किया था। पर उच्च स्तरीय दबाव में आकर शासन ने उस में से एक पूर्व मुख्य सचिव की 4 एकड़ जमीन को अधिग्रहण से मुक्त कर दिया। इस पर दीघा के जमीन  मालिकों और अन्य लोगों ने मिलकर उस सरकारी योजना को लगभग विफल कर दिया। यानी करीब आधी जमीन पर अवैध कब्जा हो गया।

स्थानीय पुलिस की मदद से आज भी यह गलत काम हो रहा है।

अब जबकि पटना वास्तव में महानगर बनने की प्रक्रिया में है तो राज्य सरकार को चाहिए कि वह खुद भी जहां-तहां जमीन का अधिग्रहण  करे। उसे विकसित करे फिर भू खंडों को जरूररतमंद लोगों में वितरित करे।
कुछ अन्य राज्यों में ऐसा अब भी होता है।

निजी बिल्डर्स और डेवलपर्स तो आम तौर से अधिक से अधिक पांच-दस-बीस एकड़ जमीन का इंतजाम कर सकते हैं। पर सरकार चाहे तो मुख्य पटना के आसपास के इलाकों में सौ-पचास एकड़ जमीन के टुकड़ों का अधिग्रहण कर सकती है। इसके बिना पटना का सुव्यवस्थित विकास नहीं हो पाएगा। पर साथ ही ऐसे मामलों में सरकार को दीघा जैसी लापरवाही नहीं बरतनी होगी।

किसी भी जमीन के अधिग्रहण के व्यय के साथ-साथ उस जमीन पर चहारदीवारी बनाने का खर्च का भी पहले से ही इंतजाम कर लेना होगा।

 इस बीच यदि राज्य सरकार अपने प्रस्तावित रिंग रोड पर काम भी शुरू कर दे तो शहर को व्यवस्थित ढंग से बसाने में सुविधा होगी।

याद रहे कि नये मास्टर प्लान के तहत दीघा-शाहपुर -सरारी-भुसौला-नेवा-सरैया-फतेह पुर-सोनवां रिंग रोड का प्रस्ताव है।

इस प्रस्तावित रोड के आसपास भी बड़े पैमाने पर जमीन अधिग्रहण की गुंजाइश बनेगी। अन्य स्थानों में भी सरकार जमीन की तलाश कर सकती है।


अदालती फैसले को विफल करने की कोशिश

सुप्रीम कोर्ट ने इसी 31 मार्च को यह आदेश दिया कि नेशनल और स्टेट हाईवे पर 500 मीटर के दायरे में शराब की दुकानें नहीं होंगी। याद रहे कि खुद केंद्र सरकार दशकों से इस बात पर चिंता जाहिर करती रही है कि हाईवे पर शराब पीकर गाड़ियां चलाने से दुर्घटनाएं बढ़ रही हैं। और मौतों की संख्या भी।

पर जब सुप्रीम कोर्ट ने यह आदेश दिया तो देश की 11 राज्य सरकारें इस आदेश को विफल करने पर अड़ गयीं। राज्य सरकारों ने नेशनल हाईवे को स्टेट हाईवे और स्टेट हाईवे को जिला सड़क बनाने की प्रक्रिया शुरू कर दी है ताकि वे सुप्रीम कोर्ट के ताजा आदेश से बच सकें।

संभव है कि केंद्र सरकार भी राज्यों के दबाव में आ जाए। पर सवाल है कि क्या सुप्रीम कोर्ट अपने फैसले से पीछे हटेगा? या फिर कायम रहेगा? इस तरह के कई दूसरे मामलों में सुप्रीम कोर्ट अपने फैसलों पर कायम रहा है।

राज्य सरकारें शराब की बिक्री बंद होने से राजस्व घटने को लेकर चिंतित हैं। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जिंदगी शराब से अधिक कीमती है। सवाल है कि सरकारों की आबकारी कर पर इतनी अधिक निर्भरता क्यों है?  इस देश में आयकर, बिक्री कर, सेवाकर तथा इस तरह के दूसरे टैक्सों की वसूली की हालत लचर है।

बिहार में भी जितने व्यापारी बिक्री कर देते हैं, उनकी अपेक्षा कई गुणा अधिक व्यापारी टैक्स की खुलेआम चोरी करते हैं। यही हाल आयकर, सर्विस टैक्स तथा दूसरे करों की है।

केंद्र और राज्य सरकारों को चाहिए कि वे टैक्स के दायरे से बाहर वाले कर चोरों पर कार्रवाई करें और आमदनी बढ़ाएं न कि सुप्रीम कोर्ट के एक अच्छे फैसले को विफल करने की कोशिश करें।  

कसूर किसका और सजा किसे ? 

इस वैज्ञानिक युग में कन्या का जन्म देने के कारण कोई पत्नी को तलाक दे देता है तो कोई उसकी हत्या तक कर देता है। यह काम एक वैज्ञानिक सत्य को दरकिनार करके हो रहा है। डॉक्टर बताते हैं कि शिशु कन्या के लिए पत्नी नहीं बल्कि पति जिम्मेदार होता है। इस बात का वैज्ञानिक आधार है।

इस तथ्य का प्रचार सरकारी और गैर सरकार संचार माध्यमों के जरिए सरकारों को करना चाहिए। कम से कम इस तथ्य से अनजान लोग तो अपनी पत्नियों को इसके लिए जिम्मेदार नहीं ठहराएंगे !

लालू सही हकदार

राजद अध्यक्ष लालू प्रसाद 11 जून को दीघा-पहलेजा सड़क पुल का समारंभ करेंगे। इस काम के लिए लालू प्रसाद सही हकदार भी हैं। इस पुल को मौजूदा स्थल पर ही बनवाने में लालू प्रसाद की महत्वपूर्ण भूमिका थी। हालांकि प्रो. रामानुज प्रसाद के नेतृत्व में हुए आंदोलन का भी योगदान है।

उस समय आंदोलनकारियों पर पुलिस फायरिंग में अभिषेक नामक छात्र मारा गया था। यह घटना जुलाई 1996 की है। तत्कालीन प्रधानमंत्री एच.डी. देवगौड़ा ने सोनपुर में 22 दिसंबर 1996 को इस पुल के निर्माण के लिए सर्वेक्षण कार्य का शिलान्यास किया।

हालांकि इस पुल के निर्माण का वास्तविक कार्यारम्भ तीन फरवरी 2002 को तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने किया।

पर प्रारंभिक दिनों में तत्कालीन रेलमंत्री रामविलास पासवान गांधी सेतु से पूरब इस रेल पुल को बनवाना चाहते थे ताकि वैशाली जिला को इसका अधिक लाभ मिले।

पर तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद की जिद से मौजूदा स्थल पर उसका निर्माण हुआ। इसलिए यदि वह सड़क पुल का समारंभ करेंगे तो यह उनका स्वाभाविक हक बनता है।

अन्य दल लें नसीहत 

भाजपा ने महिला विधायक से अभद्र व्यवहार करने के आरोप में अपने विधान पार्षद लालबाबू प्रसाद को पार्टी के निलंबित कर दिया। हाल ही में  जब जदयू के पूर्व विधायक सूर्यदेव सिंह पर हत्या का आरोप लगा तो पार्टी ने उन्हें दल से बर्खास्त कर दिया है।

इससे पहले भी इस तरह के मामलों में राजनीतिक दलों में मतभेद रहा है। कुछ दल कहते हैं कि हम तभी कार्रवाई करेंगे जब हमारे किसी सदस्य को सुप्रीम कोर्ट से सजा हो जाए।

 काश ! अन्य दल भी भाजपा-जदयू की तरह अपने-अपने दलों के ऐसे ही नेताओं के खिलाफ ऐसी ही कार्रवाई करते।

और अंत में

दशकों के लगन, तपस्या और त्याग का जीवन अपनाने के बाद ही किसी नेता की छवि बनती है। पर उसे बिगड़ने में अधिक समय नहीं लगता।

दूसरी ओर बिगड़ी हुई छवि वाले नेता चाहते हुए भी अपनी छवि नहीं सुधार पाते। आधुनिक राजनीति में लुटेरा रत्नाकर से ऋषि वाल्मीकि बनते शायद ही किसी ने कहीं देखा हो।

अच्छी छवि वाले कुछ नेताओं को भी अधेड़पन में बिगड़ते हुए जरूर देखा जाता है। इसलिए लोगबाग यही उम्मीद रखते हैं कि जिन नेताओं के लिए उनके दिल में सम्मान है, वैसे नेता किसी भी कीमत पर अपनी अच्छी छवि को बनाये रखें।

( 7 अप्रैल 2017 के प्रभात खबर, बिहार में प्रकाशित)

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