Sunday, May 17, 2009

आज के जार्ज को पुराना जार्ज कभी याद भी आता है ?




इतिहास की स्लेट पर लिखी अपनी गौरव-गाथा को कोई महान नेता खुद ही अपने हाथों से मिटाने या धुंधला करने लगे, तो उसे क्या कहा जाएगा ? ऐसे नेता का नाम आज बुझा- बुझा जार्ज फर्नांडीस है, जिसे कभी ‘अगिया बैताल’ का दर्जा हासिल था।

उनके नाम से पहले महान शब्द का इस्तेमाल अधिकतर लोगों को आज अटपटा लगेगा। पर आज राजनीति का गर्हित स्वरूप देख कर जाॅर्ज को महान कहना कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। ऐसे नेता बिरले होते हैं, जो समाज के लिए अपनी जान हथेली पर लेकर सत्ता से भिड़ जायें। आपातकाल में ंयही काम किया था जार्ज फर्नांडीस ने। यदि आपातकाल की समाप्ति नहीं हुई होती, तो जार्ज को उनके कई साथियों के साथ बड़ोदा डायनामाइट केस के सिलसिले में फांसी तक की सजा हो सकती थी। सी.बी.आई. ने उन पर देशद्रोह का केस तैयार किया था।

पहले की सहकर्मी और आज जार्ज की आलोचक पूर्व सांसद मृणाल गोरे ने गत साल दिसंबर में टाइम्स आॅफ इंडिया के साथ बातचीत में कहा था कि जार्ज फर्नांडीस के पास मुंबई में अपना कोई मकान नहीं है। वे मुंबई आने पर पार्टी आॅफिस के टेबुल पर सोते रहे हैं।

यानी एक ऐसा नेता, जो देश की खातिर और अपने विचारों के लिए अपनी जान हथेली पर लेकर काम करे और केंद्रीय मंत्री बनने के बाद भी अपने लिए कोई संपत्ति खड़ी नहीं करे, उसे आज के युग में महान नहीं कहेंगे, तो क्या कहेंगे, जबकि अधिकतर मामलों में राजनीति धन कमाने का इन दिनों आसान जरिया बन चुकी है ? सांसद-विधायक फंड ने राजनीति को गर्हित बना दिया है।

हां, जार्ज जैसा नेता अपने हाल के कुछ गलत राजनीतिक कदमों के चलते अपनी ही गौरव गाथा को धूमिल करता जरूर नजर आता है। जाॅर्ज फर्नांडीस के पुराने प्रशंसकों को यह सुनकर झटका लगा कि इस बार मुजफ्फरपुर में मतदान के एक दिन पहले ही वे दिल्ली चले गये और मतदान के दिन मतदान केंद्रों पर उनके पोलिंग एजेंट तक नहीं थे। चुनाव रिजल्ट क्या होगा, यह जग जाहिर है।

आखिर बुरी तरह अस्वस्थ जार्ज फर्नांडीस ने चुनाव लड़ने का फैसला ही क्यों किया, यह बात समझ में नहीं आई। लगता है कि आज का जाॅर्ज कभी पुराने जाॅर्ज को याद भी नहीं करता। यदि याद करता, तो अपने ही नये अवतार पर उसे शर्म आती। सन् 1977 में यदि आपातकाल नहीं हटता और वे केंद्रीय मंत्री नहीं बने होते, तो जार्ज का दर्जा इस देश में ‘मिनी भगत सिंह’ का होता। खैर सन् 1977 में उनका मंत्री बनना भी गनीमत थी। पर अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में मंत्री बन कर और तहलका का तोहमत पाकर तो उनकी छवि धूमिल ही होने लगी। हालांकि जाॅर्ज को करीब से जाननेवाले किसी व्यक्ति ने कभी यह विश्वास नहीं किया कि उन्होंने रक्षा सौदों में कभी कोई रिश्वत ली होगी। हां, अपनी एक सहयोगी की करतूत के बचाव को लेकर जरूर वे विवाद में पड़े। हालांकि बराक सौदे में उनसे हो रही पूठताछ से भी उनके पुराने प्रशंसकों को झटका लग रहा है।

हालांकि जाॅर्ज ने सबसे बड़ा झटका इस कारण दिया कि उन्होंने बुरी तरह अस्वस्थ होने के बावजूद अटल बिहारी वाजपेयी और ज्योति बसु की तरह शालीनता से सक्रिय राजनीति से रिटायर हो जाना मंजूर नहीं किया। मुजफ्फरपुर से इस बार जब चुनाव लड़ने पर जाॅर्ज अमादा हो गये, तो उनकी पत्नी लैला कबीर ने ठीक ही कहा था कि कोई बच्चा अपना हाथ जलाने पर अमादा हो, तो उसे जलाने नहीं दिया जाना चाहिए।

यानी वे यह कहना चाहती थीं कि जार्ज खुद नहीं जानते कि वे क्या कर रहे हैं। आश्चर्य है कि जाॅर्ज के साथ के लोगों ने उन्हंे मुजफ्फरपुर से उम्मीदवार बनने से क्यों नहीं रोका ? यह बात तो पिछले काफी समय से साफ हो चुकी थी कि जिस समता पार्टी और जदयू को बनाने में जार्ज की कभी महत्वपूर्ण भूमिका थी, उस पर उनका अब कोई व्यावहारिक अधिकार नहीं रह गया था। इसके कई कारण रहे हैं। उन कारणों के लिए कौन किना जिम्मेदार है, यह एक अलग चर्चा का विषय है। पर एक बात तो यह है कि जिस दल पर अधिकार ही नहीं है, उससे चुनावी टिकट की उम्मीद करना भी जाॅर्ज के लिए मुनासिब नहीं था। उन्होंने टिकट की उम्मीद करके अपनी स्थिति हास्यास्पद बनायी। यानी नये जाॅर्ज को पुराना जाॅर्ज याद नहीं रहा।

हालांकि जाॅर्ज फर्नांडीस ने खुद को कई लोगों की नजरों में तभी एक हद तक गिरा लिया था, जब उन्होंने तहलका मामले मंे उस मीडिया से मुंठभेड़ कर ली, जिसने रक्षा सौदों में दलाली की परंपरा का भंडाफोड़ किया था। बाद में उन्होंने गुजरात दंगे में गुजरात सरकार की सख्त आलोचना नहीं करके भी अपने ही धर्मनिरपेक्ष व्यक्तित्व को छोटा किया। ऐसे व्यक्ति जिसने सन् 1967 में डाॅ. राम मनोहर लोहिया और सन् 1977 में जयप्रकाश नारायण की राजनीतिक लाइन के खिलाफ खुल कर आवाज उठाई, उस जाॅर्ज को अटल सरकार में मंत्री बन जाने के बाद पता नहीं क्या हो गया था ? जाॅर्ज फर्नांडीस ़ने डाॅ. लोहिया की इस लाइन का खुला विरोध किया था कि सभी गैर कांग्रेसी दलों को मिलकर चुनाव में कांग्रेस के खिलाफ एक उम्मीदवार खड़ा करना चाहिए। सन् 1977 में जाॅर्ज जयप्रकाश नारायण की इस राय से असहमत थे कि जनता पार्टी को चुनाव में शामिल होना चाहिए। जाॅर्ज को यह आशंका थी कि इंदिरा गांधी चुनाव में धांधली करा कर जीत जायेंगीं और आपाकाल को उचित ठहरा देंगीं। हालांकि दोनों मामलों में जाॅर्ज गलत थे, पर अपने सर्वोच्च नेता के खिलाफ इस तरह खुलेआम आवाज उठाना हिम्मत की बात थी, जिसकी कभी कमी जाॅर्ज में नहीं रही। हालांकि अपने जीवन की संध्या बेला में उन्होंने अपनी हिम्मत का सदुपयोग नहीं किया, इसका गम उनके प्रशंसकांे को रहा। .

जार्ज फर्नांडीस ने कर्नाटका से आकर पचास के दशक में मुंबई में श्रमिक नेता के रूप में काम शुरू किया। सन् 1967 तक वे मुंबई में इतना जम गये थे कि उन्होंने मुंबई के सबसे बड़े कांग्रेसी नेता और केंद्रीय मंत्री एस.के. पाटील को दक्षिण मुंबई लोकसभा क्षेत्र में चुनाव में हरा दिया। इस कारण जाॅर्ज जाइंट कीलर कहलाये। बाद में सन् 1974 में रेलवे मेंस फेडरेशन के अध्यक्ष के रूप में ऐतिहासिक रेलवे हड़ताल का नेतृत्व करके जाॅर्ज हीरो बन गये। पर तहलका मामले में उनपर आरोप लगा, तो वे मीडिया पर ही उखड़ गये। जाॅर्ज ने कहा कि ‘मैंने भी कुछ पत्रिकाओं का संपादन किया है। मैं नहीं जानता कि पत्रकारिता ऐसी भी हो सकती है, जिसमें काॅल गर्ल का इस्तेमाल किया जाता हो।’

पत्रकारिता में खबरें निकालने के लिए भी काॅल गर्ल का इस्तेमाल हो, इस पर मीडिया जगत भी विभाजित रहा, पर खुद जार्ज यह बात किस मुंह से कह रहे थे, जिन्होंने अपनी साप्ताहिक पत्रिका ‘प्रतिपक्ष’ के आठ सितंबर, 1974 के अंक में कवर स्टोरी छापी थी, जिसका शीर्षक था, ‘संसद या चोरों और दलालों का अड्डा?’ तब ‘प्रतिपक्ष’ ने संसद की तुलना वेश्यालय से की थी। तब कौन सी पत्रकारिता हो रही थी?

दरअसल ‘तहलका प्रकरण’ आते- आते जाॅर्ज ने अपनी भूमिका बदल ली थी और इसी बदली हुई भूमिका के कारण यह कहा जा रहा है कि जाॅर्ज अपनी ही गौरव गाथा को अपने ही हाथों से मिटाने पर तुले हुए हैं, तो उनका कोई पुराना प्रशंसक भी भला क्या कर सकता है ! क्या आज के जाॅर्ज को कभी पुराना जाॅर्ज याद आता है ?



प्रभात खबर से साभार

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