Tuesday, May 19, 2009

बिहार में एक भिन्न व नई राजनीतिक संस्कृति की जीत

बिहार में लोकसभा का चुनाव दो दलों या दो नेताओं के बीच का चुनाव नहीं, बल्कि दो परस्परविरोधी राजनीतिक संस्कृतियों के बीच का चुनाव था। बिहार के मतदाताओं ने नीतीश कुमार की राजनीतिक संस्कृति पर मुहर लगायी है और लालू-रामविलास की पुरानी संस्कृति को बुरी तरह नकार दिया है।

इस चुनाव नतीजे का यह साफ संदेश है कि यदि लालू प्रसाद -रामविलास पासवान ने अपनी ‘राजनीतिक संस्कृति’ को जल्द-से-जल्द नहीं बदला, तो वे यहां की राजनीति में अप्रासंगिक हो जायेंगे। क्योंकि देर करने पर तो नीतीश कुमार उन लोगों से और भी आगे निकल चुके होंगे।

मात्र 40 महीनों में कोई नेता एक जर्जर प्रदेश की पूरी राजनीतिक संस्कृति ही बदल दे, इस बात की कल्पना करना कठिन है। पर, यह कठिन काम नीतीश कुमार ने एक कठिन और विपरीत परिस्थिति में भी कर दिया। लालू प्रसाद और रामविलास पासवान को इस बात का बड़ा गुमान था कि यदि वे मिलकर चुनाव लड़ेंगे, तो बिहार में राजग हवा हो जाएगा, पर उन्हें इस बात का अनुमान ही नहीं रहा कि अपने छोटे से कार्यकाल में नीतीश कुमार ने राजनीति का एजेंडा ही पूरी रह बदल दिया है। अब पुराने फाॅर्मूले से नीतीश कुमार को पराजित नहीं किया जा सकता।

नीतीश कुमार ने आखिर कौन सा जादू कर दिया, जो राजग को इतनी अधिक सीटें मिल गईं ? नीतीश सरकार ने पहले जातीय वोट बैंक के शिलाखंड को तोड़ा। इसी जातीय वोट बैंक के बल पर लालू प्रसाद और रामविलास पासवान निश्चिंत रहा करते थे। कोई खुद को बिहार का पर्यायवाची बता रहा था, तो कोई सत्ता की चाभी लेकर घूम रहा था।पर जातीय वोट बैंक की अपनी एक सीमा है। इसे नीतीश कुमार ने पहचाना।आजादी के बाद कांग्रेस ने भी वर्षों तक समाज के सभी हिस्सों के वोट लिये, पर सत्ता का लाभ कुछ खास सवर्ण जातियों को ही पहुंचाया। नतीजतन मंडल आरक्षण आया। उसने लालू प्रसाद को बिहार में महाबली बना दिया। लालू प्रसाद ने सभी पिछड़ी जातियों के वोट लिये, पर लाभ दिये सिर्फ कुछ खास लोगों को ही। दूसरी ओर, नीतीश कुमार ने समावेशी सामाजिक न्याय की अपनी नीति के तहत अति पिछड़ों के लिए पंचायतों और नगर निगमों में बीस प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था करायी। इस पर लालू प्रसाद ने कहा कि नीतीश पिछड़ों को बांट रहे हैं। इसी तरह का आरोप सवर्णों ने सन् 1990 में वी.पी. सिंह-लालू प्रसाद-रामविलास पासवान पर लगाया था, जो मंडल आरक्षण के झंडावरदार थे। सवर्णों ने आरोप लगाया था कि मंडलवादी लोग समाज को बांट रहे हैं।

नीतीश सरकार ने जब महादलित आयोग बनाया और पसमांदा मुसलमानों के हित में कुछ कदम उठाये, तो दलितों व मुसलमानों के वोट बैंक के मैनेजर बिफर उठे। यानी इतिहास ने खुद को दोहराया।

दरअसल जातीय वोट बैंक के मैनेजर बने नेतागण यह समझ बैठते हैं कि आम गरीब लोगों के आम कल्याण के लिए कुछ भी नहीं करेंगे, तो भी वे चुनाव नहीं हारेंगे। कभी कांग्रेस ने भी महिला, ब्राह्मण, मुसलमान और दलित वोट बैंक बनाकर वर्षों तक देश पर राज किया, पर अटल बिहारी वाजपेयी के कारण ब्राह्मण वोट जब कांग्रेस से खिसका, तो केंद्र से कांग्रेस की सता चली गयी। अब जब अटल बिहारी वाजपेयी नहीं हैं, तो एक बार फिर कांग्रेस को इस चुनाव में देश में बढ़त मिल गयी है, पर यह ‘समावेशी विकास’ का फल नहीं है। इसलिए कांग्रेस की यह उपलब्धि शायद स्थायी साबित नहीं होगी।

इसके विपरीत बिहार में नीतीश कुमार की सरकार की उपलब्धि अधिक टिकाउ लगती है। यहां बिहार में न सिर्फ जातीय वोट बैंकों के अभिशाप की समाप्ति की दिशा में ठोस कदम डठाया गया है, बल्कि त्वरित अदालतों के जरिए राजनीति व समाज के दूसरे क्षेत्रों के अपराधीकरण पर भी अंकुश लगाने की कोशिश की गई है। इतना ही नहीं नीतीश शासन में विकास को राजनीति का केंद्र बिंदु बनाया गया है। पुराने जातीय वोट बैंक को तोड़ कर नया वोट बैंक बनाने का आरोप नीतीश कुमार पर जरूर लग रहा है। पर, इस समावेशी कदम को अधिकतर जनता ने पसंद किया है। क्योंकि दलित, मुस्लिम और पिछड़ों में जो अंतिम कतार में खड़े हैं, उनके लिए नीतीश सरकार ने काम किया है। महात्मा गांधी ने भी तो समाज के सबसे कमजोर कमजोर व्यक्ति की चिंता की थी।

बिहार के आम मतदाता नीतीश सरकार के जिस काम से सबसे अधिक खुश नजर आते हैं, वह काम कानून -व्यवस्था की स्थिति में सुधार का काम है। सन् 2005 के बिहार विधानसभा चुनाव के समय पुलिस मुख्यालय के हवाले से यह खबर आई थी कि तब राज्य में 40 हजार फरार वारंटी थे। यानी इतने आरोपितों के खिलाफ राज्य की विभिन्न अदालतों ने गिरफ्तारी के वारंट जारी कर रखे थे, पर उनकी गिरफ्तारी नहीं हो रही थी। गिरफ्तारी क्यों नहीं हो रही थी, यह सब जानते हैं।

पर नीतीश कुमार के बिहार में सत्ता संभालने के बाद त्वरित अदालतों ने काम शुरू किया। तीन साल में छोटे- बड़े 32 हजार आरोपितों को अदालतों ने सजाएं सुना दीं। नतीजतन राज्य में शांति का माहौल बन गया। इस लोकसभा चुनाव में कोई बाहुबली एक भी हत्या करने की हिम्मत नहीं जुटा सका, तो यह अकारण नहीं है। यही नई राजनीतिक संस्कृति है, जिसे जनता ने पसंद किया और राजग को भारी संख्या में जिताया। इस चुनाव नतीजे ने यह भी बताया कि बाहुबलियों और उनके रिश्तेदारों के लिए उनके पास अब वोट नहीं हैं। यदि कानून व्यवस्था कायम हो जाती है, तो बाहुबलियों की किसी को जरूरत ही कहां है ? बिहार में एक जाति के बाहुबली के मुकाबले के लिए दूसरी जाति के बाहुबली पैदा होते रहे थे। सत्ता और प्रतिपक्ष में बैठे कई नेतागण उन्हें संरक्षण देकर लोकसभा व विधानसभा में पहुंचाते थे। अब वह संस्कृति समाप्त हो रही है। अभी पूरी तरह तो समाप्त नहीं हुई है, पर जितनी भी समाप्त हुई है, उसका श्रेय नीतीश कुमार को जाता है। यदि लालू प्रसाद और रामविलास पासवान जैसे नेता भी इसी नई संस्कृति को आगे बढ़ाने के लिए भविष्य में काम करेंगे, तो वे बिहार की राजनीति में फिर से प्रासंगिक हो सकते हैं। यदि देर करेंगे, तो तब तक तो नीतीश कुमार अपने कामों के जरिए इन नेताओं को काफी पीछे छोड़ देंगे।

जातीय वोट बैंक -विनाश और कानून व्यवस्था की वापसी के साथ- साथ नीतीश सरकार ने विपरीत परिस्थितियों में भी विकास के जितने ठोस काम गत 40 महीनों में किये हैं, उत्तर प्रदेश जैसे अराजक राज्य के लिए भी अनुकरणीय हैं। यदि नीतीश कुमार के नेतृत्ववाले गठबंधन बिहार राजग के अधिकतर नेता व कार्यकर्ता ईमानदार व जनसेवी होते तथा सरकारी दफ्तरों में भ्रष्टाचार व काहिली की मात्रा कम होती, तो राज्य के विकास की गति और तेज होती। एक जर्जर एंबेसेडर गाड़ी को अस्सी क्या साठ किलोमीटर प्रति घंटा की दर से भी नहीं चलाया जा सकता है। यहां की राजनीतिक और प्रशासनिक कार्यपालिका की हालत जर्जर एम्बेसेडर कार की ही है। साथ ही अफसरों, कर्मियों तथा अन्य आधारभूत संरचना की भी भारी कमी है।

जो हो, राज्य सरकार की तमाम कमियों को मतदाताओं ने नजरअंदाज किया है, क्योंकि उसे लग गया है कि नीतीश कुमार की मंशा ठीक है, तो देर-सवेर वे उन कर्मियों को ठीक कर ही लेंगे।

नीतीश सरकार के सत्ता में आने के बाद बिहार के विकास बजट में अचानक भारी वृद्धि और आंतरिक कर संग्रह में महत्वपूर्ण इजाफे ने भी लोगों में राज्य सरकार के प्रति विश्वास बढ़ा दिया। सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि राज्यहित में काम कर रहे मुख्यमंत्री से भाजपा ने ईष्र्या नहीं की, उनका सहयोग किया जिसका नतीजा सामने है। भाजपा और व्यवसायी समुदाय से आने के बावजूद वित्त मंत्री सुशील कुमार मोदी ने वाणिज्य कर की वसूली की मात्रा तीन साल में दुगुनी करवा दी।

जिस राज्य में कुछ ही साल पहले तक साल में दो-तीन हजार करोड़ रुपये भी विकास पर खर्च नहीं हो पा रहे थे, वहां दस-बारह हजार करोड़ हर साल खर्च होने लगे हैं। राज्य के कोन-कोने में किसी-न-किसी तरह के सरकारी विकास कार्य नजर आने लगे हैं। सवाल विकास के विस्तार से अधिक राज्य सरकार की मंशा का है, जिसके प्रति आम लोगों को भारी विश्वास है। यही नई कार्य संस्कृति और राजनीतिक संस्कृति है, जिसे अब लालू -रामविलास पासवान को भी विकसित करना पड़ेगा। यदि नहीं करेगे, तो वे समय के साथ और भी अकेला पड़ जायंेगे।

पर इस चुनाव में भारी सफलता के बाद नीतीश कुमार को सरकारी दफ्तरों में व्याप्त भारी भ्रष्टाचार के खिलाफ बेरहम अभियान चलाना पड़ेगा। अन्यथा विकास का लाभ आम लोगों को नहीं मिलेगा। राजनीति में बचे -खुचे अपराधियों को निकाल बाहर करना पड़ेगा। ऐसी सफलता के बाद बड़े -बड़े नेताओं के मन डोलने लगते हैं। उनमें एकाधिकारवादी प्रवृत्ति पैदा होने लगती है। किसी नेता के मन में ऐसी प्रवृत्ति पैदा कराने में कुछ करीबी लोग महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। नीतीश कुमार के स्वभाव को देखते हुए तो लगता है कि वे ऐसी प्रवृति खुद में पनपने नहीं देंगे। पर पता नहीं कल क्या होगा ? एक बात तय है कि नीतीश कुमार से इस राज्य की जनता को भारी उम्मीदें हैं। उम्मीद है कि वे एक ऐसे विनम्र, किंतु दृढ़ नेता के रूप में इतिहास में याद किया जाना पसंद करेंगे, जिसने एक बिगड़ी शासन व्यवस्था को थोड़े ही समय में पटरी पर ला दिया। गत 40 महीने के उनके शासन काल से यह साफ है कि ऐसा वे कर सकते हैं। उनका यह फैसला सही है कि वे राजग में ही रहेंगे और साथ ही यह बात भी है कि बिहार में राजग की घटक भाजपा जैसी शांत सहयोगी शायद ही कहीं किसी और को मिले !

प्रभात खबर से साभार (17 मई, 2009)

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