Tuesday, December 2, 2014

आशीष नंदी ने तो मांग ली, कांचा इलैया कब मांगेंगे माफी !

प्रसिद्ध सोशल साइंटिस्ट आशीष नंदी ने कमजोर वर्ग के लोगों  के खिलाफ अपनी आपत्तिजनक टिप्पणी के लिए 24 नवंबर 2014  को सुप्रीम कोर्ट में  माफी मांग ली। पर, पोलिटिकल साइंटिस्ट कांचा इलैया कर्पूरी ठाकुर के खिलाफ की गई अपनी आपत्तिजनक  टिप्पणी के लिए कब माफी मांगेंगे ?

  बिहार विधान परिषद के पूर्व सभापति प्रो.जाबिर हुसेन ने यह सवाल 
उठाया है।प्रो.हुसेन का सवाल जायज लगता है।याद रहे कि कर्पूरी ठाकुर भी कमजोर वर्ग से ही आते थे।

  15 फरवरी 2013 को एक अखबार के साथ बातचीत में कांचा 
इलैया ने कहा था कि ‘लगभग निरक्षर हज्जाम कर्पूरी ठाकुर बिहार के मुख्य मंत्री बन गए थे।’

दरअसल इलैया उस बातचीत में यह कह रहे थे कि पिछड़ों,दलितों और आदिवासियों में से दस प्रतिशत लोग भी अंग्रेजी शिक्षा ग्रहण कर  लें तो भारत बदल जाएगा।’ 

  इस सिलसिले में उन्होंने कर्पूरी ठाकुर को लगभग निरक्षर हज्जाम बता दिया।संभवतःउन्हें लगता था कि अंग्रेजी जाने बगैर कर्पूरी ठाकुर कैसे ऊंचे पद तक पहुंच गए !

इससे कर्पूूरी ठाकुर के प्रशंसकों और उन्हें नजदीक से जानने वालों को गहरा धक्का लगा था।पर किसी ने इलैया पर केस नहीं किया।

  याद रहे कि कर्पूरी ठाकुर अंग्रेजी पढ़े-लिखे थे।वे  न सिर्फ अंग्रेजी  समझ सकते थे बल्कि वे अच्छी अंग्रेजी लिखते भी थे।उन्होंने अंग्रेजी राज में इंटर पास किया था।वे बी.ए.में पढ़ते थे जब गांधी जी से प्रभावित होकर आजादी की लड़ाई में कूद पड़े।

  जानकार लोग बताते हैं कि तब के मैट्रिक पास लोग भी अंग्रेजी अच्छी तरह लिखते और पढ़ते थे।क्योंकि उन दिनों परीक्षा में कदाचार की छूट नहीं रहती थी।

अंग्रेजी अखबारों के लिए अपने  प्रेस बयान उन्हें खुद लिखते हुए समकालीन लोगों ने कर्पूरी ठाकुर को देखा था।साथ ही उन्होंने बहुत स्वाध्याय भी किया था।

   दरअसल अनेक लोगों के दिलो दिमाग में अंग्रेजी को लेकर कर्पूरी ठाकुर की गलत छवि अंकित कर दी गई है।संभवतः कांचा इलैया भी उसी के शिकार रहे हैं।

  कर्पूरी ठाकुर 1967 में बिहार के उप मुख्य मंत्री ,वित्त मंत्री और शिक्षा मंत्री थे।तब डा.राम मनोहर लोहिया के निदेश पर मैट्रिक स्तर पर दिवंगत ठाकुर ने  अपनी सरकार से अंग्रेजी की अनिवार्यता समाप्त करवा दी थी।
 इससे यह गलत संदेश गया कि ठाकुर ने अंग्रेजी की पढ़ाई ही खत्म करा दी।वे अंग्रेजी के खिलाफ थे।क्योंकि वे खुद अंग्रेजी नहीं जानते थे।

 हालांकि ऐसा नहीं था।सन 1967 की बिहार सरकार के उस निर्णय के अनुसार  सिर्फ हुआ यह था कि जो छात्र अंग्रेजी में फेल कर जाते थे,उन्हें भी मैट्रिक पास कर दिया जाता था,यदि वे अन्य विषयों में सफल हों।

डा.लोहिया का तर्क था कि अंग्रेजी की अनिवार्यता के कारण गरीब घरों और ग्रामीण पृष्ठभूमि के अनेक विद्यार्थी मैट्रिक पास नहीं कर पाते थे।तब पुलिस में भर्ती के लिए मैट्रिक पास होना जरुरी था।किसी पुलिस  कांस्टेबल को अपने काम के सिलसिले में बिहार में अंग्रेजी की कोई जरुरत नहीं पड़ती।साथ ही उन दिनों शादी के लिए अधिकतर लोग मैट्रिक पास दुल्हन ही खोजते थे।डा.लोहिया के जेहन में भी  ये बातें  थीं।वे सवाल करते थे कि  अंग्रेजी की अनिवार्यता के कारण  किसी कन्या की शादी अच्छे घर में होने से क्यों रोका जाए ?

साथ ही विदेशी भाषा के कारण किसी गरीब घर के नौजवान को सिपाही बनने से क्यों रोका जाना चाहिए ? 

  पर इस सबका  खामियाजा कर्पूरी ठाकुर को भुगतना पड़ा।अंग्रेजी को लेकर कर्पूरी ठाकुर की राज्य के भीतर और बाहर लगातार आलोचना होती रही।

कांचा इलैया कर्पूरी ठाकुर के खिलाफ जारी उसी दुष्प्रचार के शिकार हुए। उन्हें लगता था कि कोई निरक्षर नेता ही अंग्रेजी की अनिवार्यता को समाप्त कर सकता था।

    2013 में जयपुर  लिटरेचर फेस्टीवल में आशीष नंदी ने जब अपना विवादास्पद बयान दिया तो कांचा इलैया ने कहा  कि ‘उनका बयान खराब है।यह उनकी बौद्धिक गुंडागर्दी है।हालांकि उनकी मंशा सही थी।’

    आशीष नंदी ने जयपुर फेस्टिवल में कहा था कि सत्ता प्राप्त करने के बाद पिछड़े,दलित और आदिवासी अन्य लोगों की अपेक्षा अधिक भ्रष्ट हो जाते हैं।इस आपत्तिजनक टिप्पणी के बाद नंदी पर मानहानि के मुकदमे हुए।मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा।कपिल सिबल उनके वकील थे।

अंततः बचने का कोई रास्ता नहीं देख कर इसी सोमवार को आशीष नंदी ने बिना शर्त मांफी मांग ली।

 जिस आशीष नंदंी पर कांचा ने बौद्धिक गुंडागर्दी का आरोप लगाया, उन्हें तो माफी मांगनी पड़ी ,पर, कांचा इलैया कर्पूरी ठाकुर को ‘निरक्षर हज्जाम’ कह कर साफ बच निकले।

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