Friday, December 2, 2016

एनडीए में जाने की कयासबाजी !

हकीकत है या फसाना ? किसी को हकीकत लग रहा है तो किसी को फसाना। जो बिहार की राजनीति को जानते हैं ,वे इसे पूरी तरह फसाना ही मान  रहे हैं। नोटबंदी पर नीतीश  का समर्थन देखकर अकारण  तरह-तरह के कयास लगाए जा रहे हैं।

 इसमें  अचरज  भी नहीं।क्योंकि कई बार नेता पाला बदलने से पहले अपने बयानों का रुख भी उसी दिशा में कर लेते हैं।पर इस कसौटी पर नीतीश कुमार को कसने पर धोखा ही मिलेगा।

 नीतीश  की राजनीतिक शैली के जानकार लोग राजग में उनके जाने की  संभावना को  हकीकत से कोसों दूर बता रहे हैं।यदि बीच में कोई राजनीतिक पहाड़ न टूट पड़े  तो  अगले  लोस चुनाव तक तो इसकी कोई संभावना नहीं।

 नीतीश कह चुके हैं कि वह प्रधान मंत्री पद की तमन्ना नहीं पालते।पर  अक्तूबर में जब उन्होंने जदयू  अध्यक्ष पद का कार्यभार संभाला तो जदयू के कुछ नेताओं ने कहा कि नीतीश कुमार पी.एम.मेटेरियल हैं।

 पूर्व मुख्य मंत्री बाबूलाल मरांडी भी यही मानते हैं।

  गत अप्रैल में तो लालू प्रसाद ने कह दिया था कि मैं प्रधानमंत्री पद के लिए नीतीश का समर्थन करूंगा।
 वैसे भी खुद नीतीश देश के कुछ राजग विरोधी दलों को एकत्र करने की कोशिश करते रहे हैं। यदि राजनीतिक संभावना और अवसरवादिता की दृष्टि से भी देखें तो नीतीश के राजग में जाने की संभावना अभी कहां बनती है ?

 अगले लोकसभा चुनाव का क्या नतीजा होगा, यह अनिश्चित है। वैसे तो अभी नरेंद्र मोदी की बढ़त लग रही है। पर अगले ढाई साल में राजनीति कैसी करवट लेगी, यह भला कौन जानता है !

 यदि तब राजग विरोधी दलों के लिए कोई संभावना बनती है तो नीतीश भी प्रधानमंत्री पद के एक उम्मीदवार बन सकते हैं। 

अपनी विनम्रता के तहत भले नीतीश आज कहें कि वह प्रधान मंत्री पद के उम्मीदवार नहीं हैं,पर उस संभावना को वह अभी से क्यों समाप्त करना चाहेंगे ? देश के  कई नेता कभी उम्मीदवार नहीं थे, पर प्रधान मंत्री बने।गुजराल और देवगौड़ा इसके उदाहरण हैं। मुलायम और ज्योति बसु के नाम भी कभी गंभीरता लिये गये थे।

  क्या राजग में जाने के बाद नीतीश की वह संभावना समाप्त नहीं हो जाएगी ? और राजग में जाने पर अभी नीतीश को अतिरिक्त मिल क्या जाएगा ?     

  राजग में जाने की अफवाह उड़ने के पीछे नीतीश का नोटबंदी समर्थक बयान है।इस पृष्ठभूमि में अमित शाह से उनकी मुलाकात और प्रधान मंत्री से उनकी बातचीत की अफवाहें भी उड़ने लगीं।जबकि राजग या जदयू के किसी सूत्र ने इस खबर की पुष्टि नहीं की।इससे दुःखी होकर नीतीश कुमार ने कहा कि  ‘मेरे राजनीतिक जीवन को खत्म करने की साजिश चल रही है।देश के राजनीतिक सवालों पर अपना नजरिया रखने पर अनर्गल राजनीतिक व्याख्या की जाती है। यह साजिश है जिसकी मैं चिंता नहीं करता हूं।’

  दरअसल यह पीड़ा नीतीश की खास राजनीतिक शैली का परिणाम है। यह शैली अन्य  अधिकतर नेताओं  से उन्हें अलग करती है। पर अफवाहें फैलाने का मौका भी दे देती है।

  नीतीश ने नोटबंदी के मोदी सरकार के फैसले का समर्थन क्या किया कि राजग में उनके शामिल होने की भविष्यवाणियां की जाने लगीं। नीतीश कुमार इसका कई बार खंडन कर चुके हैं।

 आम राजनीतिक चलन तो यही है कि अपने राजनीतिक विरोधियों  के हर काम का विरोध करना चाहिए।आम नेतागण अपने विरोध के दल का समर्थन तभी करते हैं जब उन्हें उस दल से साठगांठ करनी होती है। हालांकि आए दिन बदलते राजनीतिक समीकरणों के इस दौर में  किसी दल के अगले कदम के  बारे में कुछ भी निश्चित तौर पर नहीं कहा जा सकता है। खुद जदयू भी अपना समीकरण बदलता रहा है।पर जदयू के बारे में फिलहाल यह कहा जा सकता है कि  कोई अत्यंत मजबूरी नहीं हो गयी तो वह दलीय  समीकरण सन 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले कत्तई नहीं बदलेगा। 

 अपने विरोधी के भी अच्छे कामों का देशहित में समर्थन की शैली नीतीश की पहले से भी रही है।वह कभी-कभी सहयोग भी करते रहे।

विरोध करने वाली बातों का विरोध तो करते ही हैं। हालांकि कुल मिलाकर नीतीश कुमार कम बोलने वाले नेता हैं। हाल में नोटबंदी के मोदी सरकार फैसले का समर्थन कर दिया तो अनेक लोगों, नेताओं और राजनीतिक प्रेक्षकों को मौका मिल गया। अनुमान लगाया जाने लगा है कि जदयू राजग में शामिल होने वाला है।

 एक जदयू नेता ने कहा कि ऐसा यह सोचे बिना हो रहा है कि   ऐसी अपुष्ट खबरों यानी अफवाहों का कैसा असर राजद और कांग्रेस पर पड़ेगा जिनके समर्थन से नीतीश कुमार आज मुख्यमंत्री हैं।

 याद रहे कि न तो जदयू और न ही भाजपा के किसी जिम्मेदार नेता ने इस खबर या इसकी संभावना की पुष्टि की है।

 जहां तक नीतीश की अलग तरह की राजनीतिक शैली का सवाल है,सन 2012 में जदयू  ने राष्ट्रपति पद के चुनाव में यू.पी.ए. के उम्मीदवार प्रणव मुखर्जी को वोट दिए थे।नीतीश तब राजग में थे । 

 उन्हीं दिनों राजग में रहते हुए नीतीश कुमार ने जी.एस.टी. विधेयक का समर्थन किया जबकि भाजपा ने मनमोहन सरकार के जी.एस.टी. विधेयक को पास नहीं होने दिया।

  भारतीय सेना के सर्जिकल स्ट्राइक का भी नीतीश कुमार ने समर्थन किया था। कुछ अन्य विरोधी दल सर्जिकल स्ट्राइक का सबूत मांगते रहे।

संकेत हैं कि नोटबंदी के मूल फैसले का अधिकतर आम लोगों ने विरोध नहीं किया है। यदि विरोध किया होता तो भाजपा हाल के लोकसभा -विधानसभा उपचुनावांें में अपनी सीटें गंवा बैठती।

  महाराष्ट्र और गुजरात में नोटबंदी के बाद हुए निकाय चुनावों में भी भाजपा ने बड़ी जीत हासिल की है। यानी शहरों में भी जीत और गांवों में भी। नीतीश कुमार की राजनीतिक घ्राणशक्ति कमजोर नहीं मानी जाती। वह जनता के खिलाफ क्यों जाते ?

   नीतीश नोटबंदी का विरोध करके देश के कुछ अन्य विवादास्पद नेताओं की कतार में खुद को क्यों शामिल कर लेते जिनके खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोप लगते रहते हैं ?

भाजपा का यह आरोप रहा है कि नोटबंदी पर जनता की पीड़ा के बहाने कई नेता अपनी पीड़ा का एजहार कर रहे हैं। यानी  नीतीश के बयान को राजग से दोस्ती की संभावना से भला कैसे जोड़ा जा सकता है ?  

 (2 दिसंबर 2016 के राष्ट्रीय सहारा में प्रकाशित)

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