मंगलवार, 28 अप्रैल 2026

    सुनील दत्त और नाना पाटेकर

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फिल्मी कलाकारों में कुल मिलाकर मुझे पहले सुनील दत्त श्रेष्ठ लगते थे।

     अब कुल मिलाकर नाना पाटेकर श्रेष्ठ लगते हैं।

ऐसा क्यों ?

मैं खुद इसका कारण नहीं बता सकता।

आप बता सकते हों तो मेरी जरा मदद कीजिए।

   ---सुरेंद्र किशोर

   23 अप्रैल 26

 


गुरुवार, 9 अप्रैल 2026

 संदर्भ --निशांत कुमार पर नई जिम्मेदारी

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सुरेंद्र किशोर

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कहावत  है --‘‘आॅनेस्टि इज द बेस्ट पाॅलिसी’’

यह नहीं कहा गया है कि ’’आॅनेस्टि इज द बेस्ट वच्र्यू (गुण)।’’

आॅनेस्टि अपने साथ व्यक्ति में स्वयंमेव बहुत से गुण ला देती है।

क्या हुआ जो निशांत कुमार को शासन का अनुभव नहीं है।

उनके पास कठोर ईमानदारी की विरल पूंजी जो है।

वही पूंजी उन्हें सफल बनाएगी।

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जनशक्ति जनता दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष तेज प्रताप यादव ने कहा है कि ‘‘निशांत कुमार को राजनीतिक अनुभव नहीं।उन्हें दांवपेच नहीं आता।’’

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इंदिरा गांधी सन 1966 में जब प्रधान मंत्री बनी थीं तो प्रतिपक्ष ने उन्हें

 ‘‘गूंगी गुड़िया’’ कहा था।

 उन्हंे तब इतना भी नहीं मालूम था कि यदि स्पीकर कुछ बोल रहे हों तो प्रधान मंत्री भी सदन नहीं छोड़ सकता।प्रधान मंत्री इंदिरा जी ने सदन छोड़ दिया था तो उन्हें स्पीकर से उन्हें माफी मांगनी पड़ी थी।यह 1966 की ही बात है। 

पर,बाद में इंदिरा जी ने अपने ढंग से राजपाट चलाया ही।यदि इंदिरा जी में  कठोर ईमानदारी होती तो वह और अधिक सफल होतीं।

किसी ने किसी संदर्भ में उनसे एक बार कहा था कि आपके पिता जी ईमानदार थे।

इंदिरा जी ने जवाब दिया--‘‘मेरे पिता जी संत थे।मैं पाॅलिटिशियन हूं।’’

दूसरी ओर, सब जानते हैं कि निशांत कुमार में यह खास व विरल गुण है --यानी  अपने पिता की तरह ही ईमानदारी और शालीनता।

   जिस व्यक्ति में इतनी ईमानदारी है कि पिता के दशकों तक शीर्ष सत्तासीन रहने के बावजूद इस पुत्र निशांत पर कोई छोटा दाग भी नहीं लगा,वह व्यक्ति जिस किसी पद पर कभी जाएगा,अपने आसपास ईमानदार लोगों को ही रखेगा।

उनकी और उन सबकी ईमानदारी ही निशांत को सफलता दिलाएगी।क्योंकि आॅनेस्टि इज द बेस्ट पाॅलिसी।

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मैं लंबे समय तक शीर्ष पर सत्तासीन रहे देश के किसी अन्य ऐसे नेता 

को नहीं जानता जिस मामले में 

‘‘सत्ताधारी  पिता’’ भी ईमानदार हो और ‘‘नेता पुत्र’’ भी ईमानदार हो।

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 8 अप्रैल 26


रविवार, 5 अप्रैल 2026

 प्रो.(डा.)एस.चद्रा --एक डाॅक्टर लीक से हटकर

एम.बी.बी.एस.करने के बाद होमियोपैथिक प्रैक्टिस

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सुरेन्द्र किशोर

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बहुत पहले की बात है।

मैंने पहली बार सुना कि सुमन चन्द्रा ने पहले एम.बी.बी.एस.पास किया।उसके बाद होमियोपैथ में उन्होंने उच्च शिक्षा ग्रहण की।

लंदन में भी पढ़े।

 लंबे समय से पटना में होमियोपैथ चिकित्सा की प्रैक्टिस करते हैं।

उनसे मिलने की इच्छा थी ही।

    मशहूर पत्रकार स्वयं प्रकाश जी ने मुझे डा.चंन्द्रा से मिलवाया।

चन्द्रा साहब की जीवन संगिनी डा.अंजू चन्द्रा भी उनके साथ ही प्रैक्टिस करती हैं।

  डा.एस.चन्द्रा साहब आज सफलत्तम चिकित्सकों में एक हैं।उनके यहां भारी भीड़ रहती है।रहे भी क्यों नहीं !

मैं भी जिस किसी मर्ज के इलाज के लिए जब कभी उनसे मिला,मुझे उनके इलाज से उम्मीद से बेहतर मुझे राहत मिली ।

  डाॅक्टर, धरती के भगवान कहे जाते रहे हैं।

इस मामले में इधर स्थिति थोड़ी बदली जरूर है।

फिर भी जिन अनेक डाॅक्टरों को अब भी आप धरती का भगवान कह सकते हैं,उनमें डा.चन्द्रा प्रमुख हैं।मेरे लिए तो डा.चन्द्रा धरती के भगवान साबित भी हुए हैं। 

   ऐसे ‘धरती के भगवान’ यानी चन्द्रा दंपति के साथ मेरी और मेरी पत्नी रीता का ग्रूप फोटो हमारे लिए सौभाग्य की बात है।

(चित्र में डा.एस.चन्द्रा,सुरेन्द्र किशोर,रीता सिंह और डा.अंजू चन्द्रा)

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अगली बार के लिए उम्मीदवार न बनाये जाने के 

बावजूद हरिवंश जी की जुबान पर नीतीश कुमार 

के लिए अब भी प्रशंसा के ही शब्द आपको मिलेंगे।

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मौजूदा राजनीति में यह विरल है।

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सुरेंद्र किशोर

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राज्य सभा या विधान परिषद के टिकट से वंचित हो जाने या अगली बार फिर से नामांकित न होने पर अधिकतर नेताओं को दलीय सुप्रीमो के खिलाफ कटु शब्दों का इस्तेमाल करते और दल से नाता तोड़ते हुए दशकों से मैंने अनेक उदाहरण देखे-सुने हंै।

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चूंकि हरिवंश जी का मित्र होने का मुझे गौरव हासिल है,इसलिए मैं कुछ वैसी बातें भी जानता हूं जो सार्वजनिक नहीं हैं।

हरिवंश जी इस बात से काफी एहसानमंद रहे हैं कि नीतीश जी ने उन्हें बिन मांगे दो -दो बार राज्य सभा का सदस्य बनवाया।

हां, सन 2022 में हरिवंश जी काफी धर्म संकट में थे जब नीतीश जी राजग छोड़कर कांग्रेसनीत गठबंधन मेें शामिल हो गये थे।धर्म संकट यह था कि खुद हरिवंश जी को राज्य सभा के उप सभापति पद को छोड़ देना चाहिए या नहीं।

संभवतः राजनीतिक दूर दृष्टि वाले उनके किसी मित्र ने हरिवंश जी को बताया होगा कि खुद नीतीश जी कांग्रेस गठबंधन में अधिक दिनों तक नहीं टिकेंगे।इसलिए आपको उप सभापति का पद छोड़ने की जरूरत नहीं है। 

वही हुआ भी।

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कुछ संस्कारी लोग किसी का उपकार कभी नहीं भूलते।किंतु आज का यह जमाना ऐसा है कि मत पूछिए।

एक नमूना पेश है--

बिहार के भोजपुर इलाके के एक पूर्व एम.पी.से पूछा गया कि आप इस बार चुनाव कैसे हार गये ?

उनका जवाब था--

एक बड़े गांव के प्रभावशाली परिवार के चार बेरोजगार लड़कों को मैंने बारी -बारी से नौकरी दिलवाई।जब पांचवंे को नहीं दिलवाई तो वह परिवार मेरे खिलाफ हो गया और पूरे गांव का वोट हमारे विरोधी को दिलवा दिया।

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3 अप्रैल 26