आपातकाल के काले दिन
..................................
बिशन टंडन की डायरी से
........................
23 जुलाई 1975
.........................
...........प्रधान मंत्री का प्रजातंत्र बचाने का पाखंड झूठे प्रचार पर ही तो अधारित है।
शारदा (प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी के सूचना सलाहकार एच.वाई.शारदा प्रसाद)का अन्तर व्यथित है।
पर,झूठे तर्क को उसके विभिन्न रूपों में उसे लिखना पड़ रहा है।
......................
हर महत्वपूर्ण नियुक्ति के लिए प्रधान मंत्री, संजय गांधी की राय लेती हैं।
.......................
.....................
शारदा, जिस प्रकार संेसर का कार्य किया जा रहा है,उससे भी बहुत असंतुष्ट व खिन्न है।
उसका कहना है कि प्रधान मंत्री इस संबंध में कुछ उदारता दिखाने के पक्ष में हैं,पर संजय व अन्य लोग जो प्रधान मंत्री निवास से सब बातों पर नियंत्रण रख रहे हैं,कठोर संेसर के पक्ष में हैं।
पिछले रविवार को मंत्रि परिषद की बैठक में सेंसर आदि पर बातें हुईं।
उसमें प्रधान मंत्री ने कहा कि यदि प्रतिपक्ष संसद में वाक-आउट करे तो उसे समाचार पत्रों में छपने देना चाहिए।
प्रायः सभी मंत्रियों की यही राय थी।
पर बाद में महल के सिपहसालारों का निर्णय दूसरा हुआ।
(आज जो लोग अक्सर गोदी मीडिया की बातें करते हैं,उन्हें यह पढ़कर अपनी प्रतिक्रिया देनी चाहिए।साथ ही, यह भी बताना चाहिए के आज के गांधी परिवार की मानसिकता इमरजेंसी की इंदिरा गांधी की मानसिकता से कितनी भिन्न है ?)
आज लोक सभा में मीसा का संशोधन प्रस्तुत किया गया।
मावलंकर ने उसका विरोध किया।
पर,होता क्या है इस विरोध से ?
..... कल के जगजीवन राम के भाषण का आकाशवाणी ने पूरा प्रसारण किया।उसके विपक्ष में जो कुछ कहा गया,वह बिलकुल नहीं बताया गया।
...........................
...................
आज (मशहूर वकील )पालकीवाला प्रधान मंत्री से मिले।
प्रधान मंत्री से पहले वे शेषन से मिले।
आजकल जो कुछ हो रहा है,उससे उन्हें (पालकीवाला को )बहुत क्लेश पहुंचा है।
उनकी राय है कि हमारा संविधान नष्ट हो गया।
इस सबकी आवश्यकता नहीं थी।
बात करते- करते उनकी आंखें भर आईं।
भ्विष्य बड़ा अंधकारमय है।
पालकीवाला तो दो साल से यही कह रहे हैं कि हमारे संविधान को विकृत किया जा रहा है।
...................................
(आई.ए.एस.अफसर बिशन टंडन आपातकाल में प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी के संयुक्त सचिव थे।
रिटायर होने के बाद टंडन साहब बिड़ला फाउंडेशन के निदेशक बने।मैं कुछ साल तक उस फाउंडेशन की ज्यूरी का मेम्बर था।--सुरेंद्र किशोर)
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें