सोमवार, 29 जून 2026

 दो कविता संग्रह मिले

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1.-हटो व्योम के मेघ

   --कुमार अनुपम

2.-बोध-अबोध

  --सतीश कुमार

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कुमार अनुपम परिचय के मोहताज नहीं।

जेपी के सहयोगी रहे।

एक साथ कई क्षेत्रों में सक्रिय

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सतीश कुमार पेशे से इंजीनियर और कैलिफोर्निया(अमेरिका)में कार्यरत।

इसके बावजूद भारत स्थित परिवार और यहां की ‘जमीन’ से जीवंत सपर्क।

सतीश जी ने कुछ समय तक टाइम्स आॅफ इंडिया(पटना)के

 लिए खोजपूर्ण स्टोरी भी की थी जब वे भारत में थे।

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इसलिए मैं उनकी इस ताजा कविता को,जो इस संग्रह में शामिल है,

 गंभीरता से लेते हुए यहां उधृत कर रहा हूं।

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   पत्रकारिता

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आजकल बहुधा

पत्रकारिता धरती से छूटे हुए,

नीयत से टूटे हुए,

धंधे से लुटे हुए

बेचैन लोगों की ‘‘सभ्य’’ आत्म कथा है !

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कुमार अनुपम के कविता संग्रह की भूमिका 

डा.अनिल सुलभ ने ‘‘शुभाशंसा’’

के तौर पर लिखी है।

बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन के अध्यक्ष डा.सुलभ ने लिखा है कि

 ‘‘कुमार अनुपम एक ऐसे जाग्रत कवि हैं,जिनकी कविताएं लोक केंद्रित हैं।

इनकी कविताएं सामाजिक स्थितियों ,परिस्थितियों और उसकी दशा-दिशा का तात्विक 

चित्रण करती हैं और समाज को सचेत करती हैं।............’’

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--सुरेंद्र किशोर


 


बुधवार, 17 जून 2026

 हजार फूल खिलने दो

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इतिहास से सबक लो

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सुरेंद्र किशोर

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लोकतंत्र,राजनीतिक दल और देश को बचाना है तो विभिन्न 

धर्मों और जातियों के बीच संतुलन बनाये रखिए।

न तो हिन्दू राष्ट्र के विचार को समर्थन मिले न ही इस्लामी राष्ट्र को।

न सवर्णों का वर्चस्व कायम हो न ही पिछड़ों का।

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हजार फूल खिलने दो

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आजादी के तत्काल बाद कौन किस पद पर था ?

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जवाहरलाल नेहरू के दौर का सामाजिक असंतुलन

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राष्ट्रपति --डा.राजंेद्र प्रसाद --कायस्थ

प्रधान मंत्री --जवाहरलाल नेहरू--ब्राह्मण

उप राष्ट्रपति--डा.एस.राधाकृष्णन--ब्राह्मण

लोक सभा के स्पीकर--जी.वी.मावलंकर--ब्राह्मण

सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश--एम.पी.शास्त्री--ब्राह्मण

आदि आदि .........

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जवहरलाल नेहरू राष्ट्रपति पद पर राजेंद्र बाबू के बदले सी.राजगोपालाचारी (ब्राह्मण )को बैठाना चाहते थे,पर सरदार पटेल की जिद्द के कारण राजेंद्र बाबू बने।

याद रहे कि राज गोपालाचारी ने सन 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन का विरेाध किया था।वे महात्मा गांधी के समधी थे।

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नरेंद्र मोदी के दौर का सामाजिक संतुलन 

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राष्ट्रपति--द्रोपदी मुर्मू--अदिवासी 

प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी --अति पिछड़ा

उप राष्ट्रपति -सह राज्य सभा के सभापति--

सी.पी राधाकृष्णन--ओबीसी 

लोक सभा के स्पीकर --ओम बिड़ला-ब्राह्मण

राज्य सभा के उप सभापति--हरिवंश--राजपूत

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सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश--सूर्यकंात--ब्राह्मण

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आजादी के तत्काल बाद राज्यों के शासन तंत्र में भी भारी सामाजिक 

असंतुलन था।बिहार में तो लगता था कि तब दो ही जातियों भूमिहार 

और राजपूतों का शासन है।

सन 1967 तक कांग्रेस ने बिहार में किसी पिछड़ा को मुख्य मंत्री 

नहीं बनने दिया।

अन्य राज्यों की स्थिति भी लगभग वही थी।

1990 में पिछड़ा आरक्षण का कांग्रेस ने विरोध किया।उसके बाद 

कांग्रेस को लोक सभा में बहुमत मिलना बंद हो गया।

अब अंध मुस्लिम भक्ति के कारण कांग्रेस राष्ट्रीय दल से क्षेत्रीय 

पार्टी बन गई।तकनीकी रूप से भले वह राष्ट्रीय दल है।

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इतने बड़े देश में सभी दलों का यह कत्र्तव्य है कि विभिन्न जातियों और धर्मों

के प्रति संतुलन कायम रखिए।

सब तरह के अतिवादियों का विरोध करिए।तभी दल भी बचेंगे,लोकतंत्र भी बचेगा और देश भी।

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17 जून 26

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रविवार, 7 जून 2026

 ताकतवर नेताओं की सुरक्षा

बनाम असुरक्षित आम जनता 

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सुरेंद्र किशोर

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बात उस समय की है जब गांधीवादी देव नारायण यादव बिहार विधान सभा के अध्यक्ष (1995--2000) थे।

सदन की कार्यवाही चल रही थी।संवाददाता के रूप में मैं भी दर्शक दीर्घा में मौजूद था।

अचानक एक साथ कई विधायक खड़े हो गये।वे मांग करने लगे--‘‘अध्यक्ष महोदय, मेरी जान पर खतरा है।मेरी जान पर खतरा है।मेरी सुरक्षा का प्रबंध कराइए।मेरी सुरक्षा का प्रबंध कराइए।’’

कुछ देर तक हंगामा होता रहा।स्पीकर महोदय सुनते रहे।

 अंत में गांधीवादी और शालीन स्पीकर यादव जी ने कहा--‘‘मेरी जान पर तो कोई खतरा नहीं।क्योंकि मैंने किसी की हत्या नहीं की है।’’

इस टिप्पणी के बाद सदन में शांति छा गई थी।

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दूसरा दृश्य

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एक अन्य अवसर पर माकपा के विधायक अजित सरकार अचानक सदन के बीच में जाकर चिल्लाने

लगे--कुछ लोग मेरी हत्या करना चाहते हैं।यह कहते हुए उन्होंने अपना कुर्ता खोलकर जमीन पर फेंक दिया।उन्होंने गंजी नहीं पहनी थी।

उसके बाद उनके हाथ पायजामे की डोरी की तरफ बढ़े ।

वे पूर्णतः नग्न होना चाहते थे।उससे पहले कि वे पायजामा खोल पाएं ,सुरक्षाकर्मियों व कुछ विधायकों ने उन्हें रोक दिया।

   उस समय भी मैं संवाददाता के रूप में उस ऐतिहासिक दृश्य का चश्तदीद गवाह बना।

अजित सरकार को अपनी जान पर जिससे

खतरा था,उसनेे अंततः अजित सरकार की जान ले ही ली।हत्यारे को सजा नहीं हुई।

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जिस देश और राज्य में अपराधियों को तौल कर सजा नहीं मिलेगी,उस राज्य में कोई किसी को नहीं बचा सकता,चाहे आप कितनी भी सुरक्षा के बीच रहें।

इन दिनों के अखबारों को ध्यान से पढ़िए--कितनी हत्याएं होती रहती हैं ?

कितने हत्यारे को  फांसी पर चढ़ाया जाता है ?

हमारी सबसे अदालत कहती हैं--बेल नियम और जेल अपवाद।

नतीजतन हत्या आम, और सजा विरल !

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मशहूर पुलिस अफसर प्रकाश सिंह ने एक अध्ययन को उधृत करते हुए कहा था कि एक हत्यारे को फांसी पर चढ़ा देने के बाद हत्या के लिए उठे 7 हाथ अपने आप रुक जाते हैं।

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सजा न होने के कारणों के बारे में यहां कुछ बताने की कोई जरूरत नहीं।कारण सब जानते हैं।

हां,एक बात कहना चाहता हूं।

यदि सुप्रीम कोर्ट नार्को टेस्ट, ब्रेन मैपिंग और डी.एन.ए.टेस्ट आदि की इजाजत जांच एजेंसियों को दे दे तो सजाओं का प्रतिशत बढ़ जाएगा।पर,इस देश का दुर्भाग्य यह है कि किसी की जान की अपेक्षा सुप्रीम कोर्ट के लिए हत्यारे के मानवाधिकार की अधिक ंिचता रहती है।

भारत में आपराधिक मामलों में सजा की दर औसतन 40 प्रतिशत है जबकि जापान में 98 प्रतिश्ता और अमेरिका में 93 प्रतिशत।

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निष्कर्ष

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जिस देश में हत्यारे को सजा दिलाने वाली शक्तियंा कमजोर और बचाने वाली शक्तियां मजबूत हैं,वहा उसी की जान बची हुई है जिसे मारने में किसी की कोई रूचि नहीं है।बाकी सब असुरक्षित हैं ,चाहे आप अपने आसपास सुरक्षा की जितनी भी मजबूत दीवाल क्यों न खड़ी कर लें।

इसलिए बड़े नेताओं का भी कल्याण इसी बात में है कि वे सुरक्षा के लिए आम माहौल बनाएं न कि खास -खास किले खड़ा कर लें अपने आसपास।

माहौल बनाने के लिए प्राथमिक शर्त यह है कि राजनीति में अपराधियों को आगे मत बढ़ाओ।उनका सशक्तीकरण मत करो।अच्छे लोग हर जाति में हैं।

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और अंत में

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कुछ दशक पहले की बात है,बिहार के एक बाहुबली जातीय नेता अपने दलीय सुप्रीमो के यहां गये।कहा--फलां को एम.एल.सी.बना दीजिए।

सुप्रीमो ने कहा कि आप अपनी ही जाति को बनवाना चाहते हैं तो इसके बदले उसी जाति के फलां को ले आइए, बनवा दूंगा।

चूंकि फलां अच्छा आदमी था,इसलिए बाहुबली ने उसके लिए पैरवी नहीं की भले वह उसी की जाति का था।

सुप्रीमो और बाहुबली के बीच का संवाद जो अफसर सुन रहा था,उसने यह संवाद ‘‘फलां’’ को उसके घर जाकर दूसरे दिन सुनाया था।

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7 जून 26

  

 



मंगलवार, 2 जून 2026

 आजादी के तत्काल बाद की सरकार ने रासायनिक 

खाद के जरिए देश की मिट्टी को जहरीला बनाया,

मौजूदा सरकार के समक्ष ‘‘खेत बचाओ’’ की समस्या

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सुरेंद्र किशोर

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सन 1960--केंद्र सरकार ने किसानों से अपील की थी और उन्हें निदेश दिया था कि वे अधिक से अधिक रासायनिक खाद-

कीटनाशक का उपयोग अपने खेतों में करें।

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कुपरिणाम से अनजान किसानों ने अधिक पैदावार के लोभ में वैसा किया भी।

नतीजतन इस देश की मिट्टी बड़े पैमाने पर जहरीली हो गई।भूजल आर्सेनिकयुक्त हुआ।करोड़ों लोग कैंसर से ग्रस्त होने लगे 

तो ‘‘अब पछताए होत का.जब चिड़िया चुग गई खेत !!

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सन 2026--आज के अखबारों में सरकार ने एक बड़ा विज्ञापन छपवाया है।उसका शीर्षक है---

खेत बचाओ अभियान।प्राकतिक खेती,उर्वर मिट्टी,सुरक्षित भविष्य।

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यानी, मौजूदा सरकार मानने लगी है कि आज की पीढ़ी का भविष्य -स्वास्थ्य सुरक्षित नहीं है।ऐसा क्यों हुआ ?

क्योंकि 1960 के दशक में आयातित रासायनिक उर्वरकों का व्यापक उपयोग राष्ट्रीय प्राथमिकता बन गया।

वैसा कांग्रेस के अदूरदर्शी नेतृत्व के कारण हुआ।क्योंकि सर्वोच्च नेतृत्व जमीन से पूरी तरह कटा हुआ था।

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क्या इसलिए हुआ ताकि कुछ लोग आयात के जरिए से नाजायज कमाई करके अमीर बन सके !पता नहीं !

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साठ के दशक की तीन-चार बातें

1.-आजादी के समय हमारे देश के करीब मात्र 20 प्रतिशत खेतों के लिए सिंचाई जल उपलब्ध था।जैविक खाद यानी गोबर खाद का इस्तेमाल होता था।

डा.लोहिया ने नेहरू सरकार ने अपील की थी कि 700 करोड़ रुपए की फेज वाईज योजना बनाकर पूरे देश में सिंचाई का प्रबंध करिए।

उसके बदले केंद्र सरकार ने रासायनिक खाद और उन्नत बीज के नाम पर खेतों में जहर फैलाया और पुराने पौष्टिक अनाज को दरकिनार किया।हाईब्रिड के नाम पर पुराने पौष्टिक अन्न को समाप्त किया।उस जमाने के छोटे -छोटे दाने वाले गेहूं से बनी रोटी का बेहतरीन स्वाद मुझे याद है।वह आज उपलब्ध नहीं है।

2.-साठ के दशक में आचार्य रजनीश का पटना में भाषण मैं सुन रहा था।एक खास प्रसंग में उन्होंने कहा कि अमेरिका में

 दुकानों में अनाज के बोरे में ऊपर तख्ती लगी होती है जिस पर लिखा रहता है--यह अनाज जैविक खाद के जरिए उपजाया हुआ है।

 यानी, अमेरिका के लोग जब रासायनिक खाद की बुराइयांें को पहचान कर सावधान हो चुके थे ,उस समय हमारी सरकार ने मिट्टी को जहरीला बनाने का काम शुरू किया।आज स्थिति ऐसी है कि यह कहना कठिन है कि कहां की मिट्टी जहरीली है और कहां की नहीं है।

3.-मेरे पुश्तैनी गांव वाले चुनाव क्षेत्र गड़खा (सारण)से 1969 में कांग्रेस के जगलाल चैधरी विधायक थे।वे गांव -गांव जाकर किसानों से भोजपुरी में कहते थे--आप लोग रासायनिक खाद खेत में मत डालिए।इससे खेत खराब और फसल जहरीला हो जाएगा।मैंने उनको हमारे दरवाजे पर भी यही बात मेरे किसान पिता से कहते सुना था।चैधरी जी चैथे वर्ष तक एम.बी.बी.एस. की पढ़ाई कलकत्ता मेडिकल काॅलेज में पढ़ चुके थे।उसी बीच पढाई छोड़कर आजादी की लड़ाई में कूद पड़े थे।  

चैधरी जी ने जो कहा,वही दुष्परिणाम हमारे अदूरदर्शी नेताओं के कारण हमारा देश झेल रहा है।

कैंसर के मरीजों के संख्या तेजी से बढ़ रही है।

गैर सरकारी स्तर पर भी अनेक संगठन ,खासकर सद्गुरु जग्गी वासुदेव (इशा फाउंडेशन )मिट्टी बचाओ अभियान चला रहे हैं। 

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2 जून 26