सोमवार, 29 मई 2023

 बागेश्वर बाबा धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री की ‘कथा’ में 

देश भर में उमड़ती भीड़ का निहितार्थ समझिए

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सुरेंद्र किशोर

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सन 1990-91 में लालू प्रसाद की सभाओं में जुट रही भारी भीड़ का निहितार्थ जिसने नहीं समझा,उन्हें 15-20 साल तक ‘झेलना’ पड़ा।

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2013-14 में नरेंद्र मोदी की सभाओं की भारी भीड़ का निहितार्थ जिसने नहीं समझा,उन्हें अब तक मोदी को ‘झेलना’ पड़ रहा है।

आगे भी नहीं झेलना पड़ेगा,इसकी कोई गारंटी नहीं।

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अब आइए ‘बागेश्वर बाबा’ के लिए जुटती अभूतपूर्व भीड़ पर ।

इस भीड़ का निहितार्थ नहीं समझिएगा तो काफी लंबे समय तक उस स्थिति को ‘झेलना’ पड़ेगा जिसकी आपको कल्पना नहीं होगी।

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इसलिए बागेश्वर बाबा को हंसी में मत उड़ाइए।खुद में जल्द से जल्द सुधार की लीजिए।

देश की समाज-नीति -राज-नीति की जहां तक मेरी समझ है,उसके अनुसार मेरा यह मानना है कि बागेश्वर बाबा के लिए जुट रही भीड़ असामान्य है।मौजू है।कुछ खास संदेश दे रही है।

उससे काफी महत्व की बातें जुड़ी हुई हंै,सिर्फ चमत्कार नहीं।

किसी बड़े से बड़े बाबा के लिए ऐसी रिस्पोंसिव भीड़ यानी रूचि व उत्साहपूर्वक पक्ष में भावना व्यक्त करने वाली भीड़ पहले नहीं मिलती थी।

धीरेंद्र शास्त्री की हिन्दू राष्ट्र की बात को लेकर अधिक उत्साह है,यह जाहिर है।

हालांकि हिन्दू राष्ट्र बनाने का उनका वादा संविधान विरोधी है और गलत भी है।

पर,जब देश के कोई भी तथाकथित सेक्युलर राजनीतिक दल, जेहादी संगठन पी.एफ.आई. के सन 2047 वाले घोषित लक्ष्य पर बयान तक नहीं दे पा रहा है,उल्टे कांग्रेस हाल में उसी संगठन से जुड़े एस.डी.पी.आई. की मदद से कर्नाटका का चुनाव जीत जाती है तो बागेश्वर बाबा का जन समर्थन क्यों नहीं बढ़ेगा ?सब तरफ से निराश लोग बाबा के पास जा रहे हैं।

अनेक लोग जब यह देख रहे हैं कि बड़े- बड़े राजनीतिक दल जेहादियों से हमें व हमारे वंशज को नहीं बचाएंगे क्योंकि उन्हें तो सिर्फ वोट बैंक चाहिए,ऐसे में शायद ‘‘बागेश्वर सरकार’’ हमारे काम आ जाएं !!

मरता ,क्या न करता !! 

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इस तथ्य को कोई झुठला नहीं सकता कि ममता सरकार की मदद से सैकड़ों बंगलादेशी-रोहिंग्या घुसपैठिए इस देश में रोज प्रवेश कर रहे हैं।वे पूरे देश में फैलते जा रहे हैं।हाल के दशकों में इस देश के कई जिले हिन्दू बहुल से मुस्लिम बहुल हो गए और होते जा रहे हैं। जाकिर नाइक को यह बोलते हुए सुना-देखा जा रहा है कि भारत में मुस्लिमों की आबादी अब 40 प्रतिशत हो चुकी है।

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याद रहे कि पी.एफ.आई.ने यह लक्ष्य तय किया है कि वह हथियारों के बल पर भारत को 2047 तक इस्लामी राष्ट्र बना देगा।

इसके लिए वह हजारों हथियार बांट रहा है और लाखों लश्कर तैयार कर रहा है।केरल में तो उसके लश्कर यूनिफार्म में ‘सैन्य परेड’ भी कर रहे हंै।

पी.एफ.आई.कहता है कि यदि हमारे साथ इस देश के 10 प्रतिशत मुस्लिम भी आ जाएं तो हम अपना लक्ष्य पूरा कर लेंगे।

यह इस देश के लिए सौभाग्य की बात है कि पी.एफ.आई.के साथ 10 प्रतिशत भी मुसलमान नहीं है।उन मुसलमानों को सलाम जो पी.एफ.आई.का साथ नहीं दे रहे हैं।पर,उन दलों को शर्म आनी चाहिए जो वोट व सत्ता के लिए देश की सुरक्षा को खतरे में डाल रहे हैं।

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कम संख्या में होने के बावजूद जब तब व जहां तहां हिंसा फैलाने के लिए जितने लोगों की जरूरत होती है,उतने लोग पी.एफ.आई.के साथ आज भी हैं।

देश की कई राज्य सरकारें वोट के लिए पी.एफ.आई.का समर्थन कर रही हैं।

भाजपा जब 2014 में केंद्र में सत्ता में आई थी,तब अनेक लोगों को यह उम्मीद थी कि वह इस मामले में कुछ खास करेगी।यानी जिस तरह चीन सरकार जेहादी उइगर मुसलमानों के खिलाफ कठोरत्तम कार्रवाई कर रही है,उसी तरह की कार्रवाई भाजपा सरकार  भारत में करेगी।

पर भाजपा सरकार से इस मामले में कई लोगों को निराशा ही मिल रही है।बी.एस.एफ.भी बंाग्ला देश की सीमा से घुसपैठियों को पश्चिम बंगाल में  आने से रोकने में विफल हैं।लोगबाग उसके कारण की चर्चा भी करते हैं।अमित शाह को उस चर्चा की नोटिस लेनी चाहिए।

ऐसे निराश लोग बाबा बागेश्वर की ओर उम्मीद भरी नजरों से देख रहे हैं।

आगे क्या -क्या होगा,यह देखना दिलचस्प होगा।

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किंतु तथाकथित सेक्युलर दल यदि चाहते हैं कि पी.एफ.आई. के प्रत्यक्ष-परोक्ष मदद से वे केंद्र की सत्ता हासिल कर लेंगे तो वह उनके लिए प्रति उत्पादक ही साबित होगा।

वैसी सत्ता अधिक दिनों नहीं चलेगी।

इसलिए कि पी.एफ.आई.किसी का नहीं है।

याद रहे कि कर्नाटका की नयी कांग्रेसी सरकार ने पी.एफ.आई. के कुछ एजेंडा पर काम करना शुरू भी कर दिया है।

केंद्र में कोई नयी सरकार बनेगी तो उसे भी वह सब एजेंडा लागू करना पड़ेगा।

फिर बाबा बागेश्वर का ‘जन समर्थन’ भाजपा के साथ जुड़ जाएगा।

अभी तो बागेश्वर बाबा कह रहे हैं कि हमारा किसी दल से कोई संबंध नहीं।दल हमसे अलग ही रहें।

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जेपी आंदोलन जब शुरू हुआ था तो छात्र-युवा बड़े -बड़े राजनीतिक नेताओं को अपने मंच से उतार दिया करते थे।

पर,जब प्रशासन का दमन शुरू हुआ तो बाद में प्रतिपक्षी नेताओं के मजबूत कंधे ही अंततः उनके काम आए।

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 29 मई 2023

 


 


  पैसों की मार बड़ी मार !!

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सुरेंद्र किशोर

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सेंट्रल विस्टा पुनर्विकास योजना में सिर्फ संसद भवन ही नहीं है बल्कि सरकारी दफ्तरों के लिए भवन भी बनाए गए हैं।

उन नये भवनों में वे सब कार्यालय अब स्थानांतरित किए जाएंगे जो अभी निजी मकानों में किराए पर है।

   वे निजी मकान राजनीतिक दलों के कुछ नेताओं के हैं।

 एक अनुमान के अनुसार 1000 करोड़ रुपए उनको हर साल किराया के रूप में केंद्र सरकार देती रही है।

जब वे कार्यालय सेंट्रल विस्टा में स्थानातरित हो जाएंगे तो केंद्र सरकार के उतने रुपए हर साल बचेंगे।

उधर वे नेतागण 1000 करोड़ रुपए सालाना से वंचित हो जाएंगे।हालांकि उनके मकान के नए किरायेदार मिल जाएंगे।पर क्या वे इतना अधिक किराया देंगे ?

पैसों की मार बहुत बड़ी मार होती है।

उससे बड़ी पीड़ा होती हैं।

 बौखलाहट होती है।मुंह से ‘गालियां’ निकलती हैं।

निकल भी रही हैं।

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यह तो दूसरी मार है।

करीब आधे दर्जन राजनीतिक दलों के तीन दर्जन छोटे-बड़े नेताओं के खिलाफ भीषण भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों के तहत पहले से ही मुकदमे चल रहे हैं।कई नेता जमानत पर हैं।

उनके बहुत सारे पैसे जब्त हो गए।

अदालतें भी उन्हें कोई राहत नहीं दे रही हैं। 

सत्ता पास में नहीं है तो कमाई के रास्ते भी अब कम हैं।

आगे सत्ता मिलेगी या नहीं,इस बात में भी कई लोगों के संदेह है।ऊपर-ऊपर वे जो कहें !

क्योंकि गठबंधन की स्थिति अभी साफ नहीं है।शायद बाद में गठबंधन हो जाए।उसके बाद भी क्या सफलता मिलेगी ?

ऐसे में पीड़ित नेताओं की मनःस्थिति का अनुमान लगाया जा सकता है।

उन ‘‘पीड़ित प्राणियों’’ पर गुस्सा नहीं बल्कि दया ही की जा सकती है।

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28 मई 23  


सोमवार, 22 मई 2023

        मेरा लैंडलाइन फोन नंबर

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मोबाइल फोन के रेडिएशन से अपने कान को यथासंभव 

बचाने के लिए मैंने लैंडलाइन फोन ले लिया है।

उसका नंबर है--0612-7180572

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मैं जहां रहता हूं,वहां बी.एस.एन.एल.की पहुंच नहीं है।

इसलिए मेरा लैंडलाइन फोन निजी कंपनी का है। 

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सुरेंद्र किशोर

21 मई 23


  भ्रष्टाचार का बचाव करने वालों की जीत मुश्किल 

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     सुरेंद्र किशोर

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इस देश में जब- जब चुनाव का मुख्य मुद्दा भ्रष्टाचार विरोधी अभियान रहा,तो भ्रष्टाचार का बचाव करने वालों की ही हार हुई।

अत्यंत थोड़े से अपवादों को छोड़कर आजादी के बाद का इतिहास इसी बात का गवाह है।

सन 2024 के लोक सभा चुनाव में इससे कुछ अलग रिजल्ट होगा,यह मान लेना मुश्किल है।

आजादी के तत्काल बाद से ही कांग्रेस सरकार पर भ्रष्टाचार के आरोप लगने शुरू हो गए थे।

पर,1962 तक लोगबाग ऐसे दल यानी कांग्रेस और उसके नेताओं के प्रति मोहित थे जिन्होंने आजादी की लड़ाई में मुख्य भूमिका निभाई थी।इसलिए बहुत बातें नजरअंदाज होती रहीं।

 दूसरी ओर, तब प्रतिपक्ष भी काफी बिखरा -बिखरा था।सब अपने आप में मगन थे।

फिर भी जब -जब कांग्रेस सत्ता में आई उसे 50 प्रतिशत से कम ही मत मिले।

1966-67 में जब गैर कांग्रेसी दलों में सीमित चुनावी एकता हुई तो देश के नौ प्रदेशों में कांग्रेस सत्ता से बाहर हो गई।यदि थोड़ी और अधिक दलीय एकता हुई होती तो केंद्र से भी सन 1967 में ही कांगेस सत्ता से बाहर हो गई होती।याद रहे कि 1967 के चुनाव का मुख्य मुद्दा भ्रष्टाचार था।

  याद रहे कि उससे पहले कांग्रेस आत्म मुग्धता की स्थिति में थी।

कोई घोटाला साबित हो जाने पर भी सत्ताधारी नेता प्रतिपक्ष से कहा करते थे कि आप में ताकत है तो अगले चुनाव में फरिया लीजिएगा।

जांच कमेटी ने जीप घोटाले में वी.के.कृष्ण मेनन को दोषी माना।फिर भी गृह मंत्री ने 30 सितंबर 1955 को संसद में कह दिया कि इस केस को बंद कर दिया गया है। जब प्रतिपक्ष ने दोषी को सजा देने की मांग पर जोर दिया तो गृह मंत्री ने कहा कि इसका फैसला अगले चुनाव में हो जाएगा।

 इसी तरह बारी बारी से मुंदरा कांड, धर्मतेजा ऋण घोटाला,प्रताप सिंह कैरो घोटाला, लोहा कांड,छोआ कांड और साठी कांड जैसे घोटाले होते रहे।

उस दौरान भी प्रतिपक्षी दल कांग्रेस सरकारों के भ्रष्टाचार के खिलाफ लगभग देश भर में अभियान चलाते रहे।

मतदाताओं पर उस अभियान का असर हुआ। वोटरों ने 1967 के आम चुनाव में कांग्रेस को काफी हद तक हद तक सबक सिखा दिया।

 क्योंकि खुद कांग्रेस सरकारों ने उस बीच कोई सबक नहीं सीखा था।जबकि, इन्दौर के अपने भाषण में कांग्रेस के अध्यक्ष डी. संजीवैया ने 1963 में ही कहा था कि 

‘‘वे कांग्रेसी जो 1947 में भिखारी थे, वे आज करोड़पति बन बैठे।झोपड़ियों का स्थान शाही महलों ने और कैदखानों का स्थान कारखानों ने ले लिया है।’’

सन 1971 के बाद तो लूट की गति तेज हो गई।

प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी ने भ्रष्टाचार का बचाव करते हुए कहा था कि भ्रष्टाचार तो सिर्फ भारत में नहीं है।यह तो विश्व व्यापी है।

उससे पहले 1967 में जिन नौ राज्यों में गैर कांग्रेसी सरकारें बनीं थीं,वे भी अपनी कमजोरियों और भ्रष्टाचार के छिटपुट आरोपों के कारण स्थायित्व नहीं पा सकीं।कांग्रेसी फिर सत्ता में आ गए।प्रतिपक्षी एकता के शिल्पकार डा.राम मनोहर लोहिया ने 1967 की गैर कांग्रेसी सरकारों से कहा था कि ‘‘बिजली की तरह कौंध जाओ और सूरज की तरह स्थायी हो जाओ।’’

पर वे यह काम नहीं करवा सके।लोहिया का बताया वह काम लोहिया का नाम लिए बिना आज मुख्य मंत्री योगी आदित्यनाथ बखूबी कर रहे हैं।

1969 में इंदिरा गांधी ने जब कांग्रेस पार्टी तोड़ी और गरीबी हटाओ का नारा दिया तो उसके पीछे भी उनका पूंजीवाद व प्रकारांतर से भ्रष्टाचार पर ही हमला था।उन्होंने पूंजीवाद और भ्रष्टाचार को समानार्थक शब्द बना कर पेश किया इसका उन्हेें चुनावी लाभ भी मिला।

बाद में यह माना गया कि जनता ने इंदिरा गांधी के झांसे में आकर सन 1971 के लोक सभा चुनाव में उन्हें लोक सभा में पूर्ण बहुमत दे दिया।

उसके बाद इंदिरा गांधी अपने असली स्वरूप में आ गईं।

उन्होंने आम लोगों की गरीबी हटाने की जगह अपने पुत्र संजय गांधी के लिए मारूति कार कारखाना स्थापित करवाया।मारूति घोटाला सामने आया।उसके अलावा भी घोटाले हुए।

उधर केंद्र सरकार व कांग्रेस की राज्य सरकारों में भी तब भ्रष्टाचार,संस्थागत रूप लेने, पनपने और बढ़ने लगा।

 इस पृष्ठभूमि में बिहार से जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में 1974 में जन आंदोलन शुरू हो गया।वह आंदोलन देशव्यापी हुआ।

उस आंदोलन के मुख्य मुद्दे थे-भ्रष्टाचार,महंगी,बेरोजगारी और कुशिक्षा।

उधर प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी  अपने चुनावी भ्रष्टाचरण के कारण जब 1975 में अपनी सांसदी गंवा बैठीं तो उसे फिर से पाने के लिए उन्होंने आपात्काल देश पर थोप दिया।

  इमर्जेंसी में उन्होंने उन चुनावी कानूनी को बदलवा कर उसे पिछली तारीख से लागू करवा दिया।

  इंमर्जेंसी के अत्याचार और भ्रष्टाचार के मिले-जुले कारणों से 1977 में इंदिरा गांधी की सरकार सत्ता से बाहर हो गई।

 मोरारजी देसाई के नेतृत्व में 1977 में केंद्र में गठित पहली गैर कांग्रेसी सरकार पर भ्रष्टाचार का तो कोई बड़ा आरोप नहीं लगा।किंतु जनता पार्टी की सरकार कलही सरकार साबित हुई ।उससे ऊबकर जनता ने सन 1980 में कांग्रेस को फिर सत्तासीन कर दिया।

 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद राजीव गांधी के नेतृत्व में जो सरकार बनी,वह अपने भ्रष्टाचारों के कारण ही 1989 में सत्ताच्युत हो गई।

आज देश के जितने बड़े -बड़े नेताओं के खिलाफ भ्रष्टाचार और बड़े -बड़े घोटाले के जो आरोप लगे हैं,इसके मुकाबले 1984-89 के दौर के आरोप अब हल्के लग रहे हैं।

   बोफोर्स घोटाले को नापसंद करके मतदाताओं ने कांग्रेस को 404 सीटों के हिमालय से उतार कर 197 सीटांे की सरजमीन पर उतार कर खड़ा कर दिया था।

उस चुनाव के बाद कांग्रेस को कभी लोक सभा में अपना बहुमत नहीं मिल सका।

अब आप आज के घोटालों और तब के घोटालों की मात्रा,प्रकार और गंभीरता पर गौर कीजिए।

भ्रष्टाचार को लेकर आम लोगों की वितृष्णा अब भी कम नहीं हुई है।

2014 के लोक सभा चुनाव में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में एन.डी.ए. की बड़ी जीत का काफी ‘श्रेय’ मन मोहन सिंह के दस साल के घोटाला राज को दिया जा सकता है।उन घोटालों ने कांग्रेस सरकार के प्रति लोगों में वितृष्णा पैदा कर दी।उसका लाभ आम आदमी पार्टी जैसी गैर जिम्मेदार पार्टी ने भी उठा लिा।

दूसरी ओर गुजरात के मुख्य मंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी की साफ-सुथरी छवि को लगभग देश भर के लोगों ने पसंद किया।

दूसरी बार 2019 में जब अधिक बहुमत से भाजपा ने लोस चुनाव में  विजय प्राप्त की तो उसका बड़ा कारण यह था कि 2014 और 2019 के बीच मोदी सरकार के खिलाफ घोटाला का कोई ठोस आरोप सामने नहीं आया।

दूसरी ओर 1991 से लेकर बाद के वर्षों तक भी केंद्र और राज्य सरकारों में बैठे नेताओं को उनके भ्रष्टाचार का चुनावी खामियाजा बारी बारी से भुगतना पड़ा।

देश में जब -जब भ्रष्टाचार मुद्दा बना,जिन पर भी ठोस आरोप लगा,जनता के एक हिस्से ने उन्हें वोट देना बंद कर दिया।

  क्षेत्रीय दलों को उसका नुकसान उठाना पड़ा।

पूरे दौर में अक्सर कांग्रेस ही भ्रष्टाचार को लेकर बचाव की मुद्रा में रही।आज भी है।

आज ऐसी स्थिति बन रही है कि अगला लोक सभा चुनाव भ्रष्टाचार पर हमला करने वालों और भ्रष्टाचार का बचाव करने वालों के बीच ही होगा।समकालीन इतिहास बताता है कि वैसे में भ्रष्टाचार का बचाव करने वालों की जीत तब मुश्किल होती है।

हालांकि आज के प्रतिपक्षी नेतागण भाजपा और नरेंद्र मोदी के खिलाफ मजबूत दलीय गठबंधन बनाने के लिए प्रश्त्नशील है।

साथ ही, वे उसके जरिए सामाजिक गठबंधन की मजबूती का हौसला भी बांध रहे हैं।

किंतु उत्तर प्रदेश के पिछले साल के दो लोक सभा

उप चुनावों और बिहार के विधान सभा उप चुनावों के नतीजे बता रहे हैं कि तथाकथित धर्म निरपेक्ष-सामाजिक न्याय के पैरोकार दलों का वोट बैंक दरक रहा है।

   लोगों का मूड यह बता रहा है कि सन 2024 के लोस चुनाव से पहले तक जितने अधिक भ्रष्टाचारियों के खिलाफ कार्रवाइयां होंगी,जनता से प्रतिपक्ष का दुराव बढ़ेगा।

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7 अप्रैल 23. 

 


शनिवार, 20 मई 2023

 वेबसाइट मनी कंट्रोल हिन्दी पर 15 मई 23 को प्रकाशित

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मोहम्मद अली जिन्ना ने संविधान सभाइयों से कहा 

था कि वे देश की कानून-व्यवस्था को प्राथमिकता दंे

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सुरेंद्र किशोर

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   नए देश पाकिस्तान की संविधान सभा के सदस्यों से  

पाकिस्तान के निर्माता मोहम्मद अली जिन्ना ने 

कहा था  कि ‘‘किसी भी सरकार का पहला कत्र्तव्य कानून-व्यवस्था बनाये रखना है।

क्योंकि राज्य के द्वारा रियाया के जीवन ,संपत्ति और धार्मिक आस्था को पूरी तरह संरक्षित किया जाना जरूरी है।’’

 उन्होंने यह भी कहा था कि भ्रष्टाचार व रिश्वतखोरी सबसे बड़े अभिशाप हंै जिन्हें अविभाजित भारत भुगतता रहा है।

दूसरे देशांे में भी ये बुराइयां हैं,पर हमारी हालत ज्यादा बदतर है।ये सचमुच जहर हैं। हमें इनसे कठोर हाथों से निपटना चाहिए।मैं यह उम्मीद करता हूं कि इस सभा के सदस्यों के लिए जितना जल्दी संभव हो सके,आप इस दिशा में समुचित कदम उठाएंगे।’’

   यदि जिन्ना परलोक से आज के अस्तव्यस्त पाकिस्तान को देख रहे होंगे तो क्या सोच रहे होंगे ?

यही कि ‘‘हमारे देश के हुक्मरानों ने हमारी कल्पना के देश को बर्बाद कर रखा है।’’

आज वास्तव में पाकिस्तान के हालात बेकाबू हो रहे हैं।

जैसा इससे पहले कभी नहीं हुआ,वह सब आज हो रहा है।

पड़ोसी देश होने के कारण भारत का भी चिंतित होना स्वाभाविक है।पर,आज पाकिस्तान में जिन्ना को कोई याद नहीं कर रहा है।वहां अतिवादी हावी हो रहे हैं।

ऐसे में जिन्ना को याद करना मौजू होगा। 

जिन्ना ने कालाबाजारियों के खिलाफ भी देशवासियों को चेताया था।

उन्होंने कहा था कि ‘‘यह दूसरा अभिशाप है।

मैं जानता हूं कि कालाबाजारिये बार -बार पकड़े जाते हैं। दंडित किए जाते हैं।न्यायिक सजाएं सुनाई जाती हैं।या कभी -कभी जुर्माने भी किए जाते हैं।इस राक्षस से अब आपको निबटना है।’’

मिस्टर जिन्ना ने भ्रष्टाचार के साथ -साथ भाई भतीजावाद से भी दूर रहने की सलाह दी थी।

इधर आजादी के तत्काल बाद भारत के प्रधान मंत्री जवाहरलाल नेहरू ने भी कहा था कि कालाबाजारियों को करीब के लैम्पपोस्ट से लटका दिया जाना चाहिए।

  यानी, आजादी के बाद दोनों देशों के नेताओं ने जिन समस्याओं पर चिंता प्रकट की थी,दुर्भाग्य है कि वे समस्याएं आज तक हल नहीं हुईं।कमोबेश मौजूद हैं।

    अफसोसनाक बात यह है कि आजादी के इतने साल बाद भी हिंदुस्तान व पाकिस्तान के काला बाजारिए व भ्रष्ट तत्व आज नेहरू और जिन्ना की इन बातों को मुंह चिढ़ा रहे हैं।

वैसे भारत की अपेक्षा पाकिस्तान के हालात बहुत अधिक खराब हो चुके हैं।खराब होते जा रहे हैं।

पाकिस्तान में तो राजनीतिक अनिश्चितता का दौर भी चल रहा है।उसे अराजकता भी कह सकते हैं।हालांकि भारत की हालत बेहतर है।हाल के वर्षों में तो भारत में हालात और अधिक बेहतर हो रहे हंै। 

   नेहरू के अलावा भी भारत के कई स्वतंत्रता सेनानियों की इस संबंध में चेतावनियांे व नसीहतों को तो हम कई बार पढ़ चुके हैं।पाकिस्तान की संविधान सभा में जिन्ना के भाषण को  उधृत करके भाजपा नेता एल.के.आडवाणी कभी राजनीतिक मुसीबत में फंस चुके थे।

  जसवंत सिंह ने अपनी चर्चित पुस्तक ‘जिन्ना भारत विभाजन के आईने में ’ में इसे प्रकाशित किया है।जिन्ना ने अपने देश के संविधान निर्माताओं से यह भी कहा था कि उन्हें संविधान बनाते समय किन -किन बातों का ध्यान रखना चाहिए। 11 अगस्त 1947 को मिस्टर जिन्ना ने कहा कि ‘आप आजाद हैं।आप पाकिस्तान देश में अपने मंदिरों में जाने के लिए आजाद हैं ।

आप अपनी मस्जिदों में या फिर अपने किसी अन्य धर्मस्थल में जाने के लिए आजाद हैं।आप किसी भी धर्म,जाति या नस्ल के हो सकते हैं ।उसका देश के काम काज से कोई लेना देना नहीं हैं।

   जिन्ना ने यह भी कहा कि ‘ मैं सोचता हूं कि हम इसे आदर्श की तरह सामने रखें और  आप पाएंगे कि कालांतर में हिंदू ,हिंदू नहीं रहेंगे और मुसलमान ,मुसलमान नहीं रहेंगे।यह बात मैं किसी धार्मिक बोध के संदर्भ में नहीं कह रहा हूं। क्योंकि वह हर आदमी की व्यक्तिगत आस्था है,बल्कि इस देश के नागरिकों के राजनीतिक बोध की दृष्टि से कह रहा हूं।’

आडवाणी ने अपनी पाकिस्तान यात्रा में संभवतः पाकिस्तानवासियों को यही याद दिलाई थी कि वे देखें कि कायदे आजम की इस इच्छा का कितना पालन हो रहा है !   

  वैसे कायदे आजम की यह इच्छा अत्यंत आदर्श भरी इच्छा ही थी।क्योंकि धर्म के आधार पर निर्मित किसी देश के हुक्मरानों से जिन्ना कुछ अधिक ही उम्मीद कर रहे

 थे।

 मोहम्मद अली जिन्ना का 11 सितंबर 1948 को निधन हो गया।इसलिए दुनिया यह नहीं देख सकी कि वे  अपने देश के हुक्मरानों से अपनी इन इच्छाओं को लागू करा पाते है या नहीं।इधर गांधी भी 1948 में नहीं रहे।जवाहर लाल नेहरू भी कालाबाजारियों को नजदीक के लैम्प पोस्ट से नहीं लटकवा सके।

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15 मई 23



 


    क्या उत्तराखंड अगले पांच साल में 

   एक नयी ‘कश्मीर घाटी’ बनने वाला है ?

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सुरेंद्र किशोर

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उस राज्य से लौट रहे लोग यह बता रहे हैं कि उत्तराखंड

जल्द ही एक और कश्मीर बनने जा रहा है।

वहां भारी संख्या में बंगलादेशी व रोहिंग्या घुसपैठिए बसते जा रहे हैं।

वे तीर्थ स्थलों को घेर कर बस रहे हैं।

इस खबर की केंद्रीय आई.बी.पुष्टि करता है या नहीं, मुझे नहीं मालूम।

किंतु जाकिर नाइक(दिग्विजय सिंह के शब्दों में शांतिदूत)ने 23 अगस्त 2020 को ही कह दिया कि भारत में हिन्दुओं की आबादी अब 60 प्रतिशत से कम हो चुकी है।(गुगल पर इस बयान को आप भी पढ़ सकते हैं।)

इस प्रतिशत पर किसी सांसद को संसद में सवाल करना चाहिए था।

असलियत जानना चाहिए था।

किंतु हमारे अनेक सांसदों को हंगामे से फुर्सत ही कहां मिलती है !

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हाल में पश्चिम बंगाल के लौटे मेरे एक गैर राजनीतिक करीबी ने बताया कि रोज ही सैकड़ों बंगला देशी और रोहिंग्या घुसपैठिए पश्चिम बंगाल की सीमा में प्रवेश कर रहे हैं और पूरे देश में फैल रहे हैं।

उन्होंने हावड़ा रेलवे स्टेशन पर उनकी बड़ी संख्या देखी थी।

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लगता है कि सीमा सुरक्षा बल को भी उन्हें रोकने में कोई रूचि नहीं है।

पश्चिम बंगाल की वाम व ममता सरकारों के लिए तो वे वोट बैंक रहे हैं।

यदि ऐसा है तब तो केंद्र की मोदी सरकार सन 2024 का चुनाव नहीं जीत पाएगी।

क्योंकि घुसपैठियों को तत्काल वोटर बना देने वाली आंतरिक शक्तियां काफी सक्रिय हैं।ममता बनर्जी कह चुकी है कि पश्चिम बंगाल में सी.ए.ए. और एन.आर.सी.लागू किया जाएगा तो खून की नदियां बह जाएंगी।

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गुगल पर ही ममता बनर्जी का एक भाषण सुन लीजिए जो उन्होंने 3 मई 2022 को ईद के अवसर पर दिया था।

उन्होंने कहा कि ‘‘हम काफिर नहीं हैं।हम लड़ना जानते हैं।’’

कल्पना कर लीजिए आने वाले दिनों में इस देश में क्या-क्या होने वाला है !

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पश्चिम बंगाल,केरल,यू.पी.और कर्नाटका विधान सभाओं के गत चुनावों में अल्पसंख्यक मतों की अभूतपूर्व एकजुटता की करामात आप देख चुके हैं।

उत्तरा खंड जैसे जिन राज्यों में अल्पसंख्यक वोट अभी तक चुनावों में निर्णायक नहीं रहे हैं,वहां घुसपैठ करवा कर जनसंख्या के अनुपात को तेजी से बदला जा रहा है।(क्या कर रही है केंद्र की देश भक्त सरकार ?)

इस्लामिक उपदेशक व भारत से भगोड़ा जाकिर नाइक ने भारत के अल्पसंख्यकों से अपील की है कि (यह बयान भी गुगल पर उपलब्ध है।)केरल के आसपास के राज्यों के अल्पसंख्यक केरल में जाकर बसना शुरू कर दें।वहां की आबादी बढ़ानी है।

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यह सब लिखने पर मेरे बारे में कुछ लोग जो भी अर्थ लगाएं,किंतु हम अपने मौजूदा व आने वाले वंशजों के जीवन को भारी संकट में नहीं डालना चाहते।इसलिए लोगों को चेता रहे हैं।

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तीर्थ स्थलों वाले राज्य उत्तराखंड को युद्ध स्थल बनने से बचाना हो तो केंद्र सरकार को चाहिए कि वह उत्तरा खंड को जल्द से जल्द यू.पी.में फिर से मिला दे।

योगी आदित्य नाथ उस राज्य को भी बचा लेंगे।बल्कि वही बचा सकते हैं।मोदी-अमित शाह ढीले पड़ रहे हैं। 

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उत्तराखंड को अब भी घुसपैठियों से बचा लेने के कुछ अन्य उपाय भी उपलब्ध हैं जिन्हें यहां नहीं बताया जा सकता हैै।

हालांकि वे उपाय यू ट्यूब पर बताए जा रहे हैं।

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   20 मई 23


बुधवार, 17 मई 2023

    याद कीजिए लोहिया-प्रायेजित रामायण मेला

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   सुरेंद्र किशोर

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जितने लोग ‘‘बागेश्वर बाबा’ को देखने-सुनने गए थे,जरूरी नहीं कि वे सब के सब भाजपा के ही वोटर हैं।

भक्त और वोटर में फर्क करना चाहिए।

किंतु यदि कुछ राजनीतिक दलों ने  धीरेंद्र शास्त्री को अपमानित करना जारी रखा,तो कुछ ‘भक्त’ प्रतिक्रियास्वरूप भाजपा के वोटर भी बन जा सकते हैं।

कर्नाटका चुनाव के लिए मतदान से पहले एक कांग्रेस नेता ने कहा था कि हम पी.एफ.आई.और बजरंग दल दोनों पर प्रतिबंध लगाएंगे।

हालांकि पी.एफ.आई.पर प्रतिबंध पहले ही लग चुका है।

यानी कांग्रेसी होशियार निकले।

उन्होंने एक तरह से संतुलन बनाया,नकली ही सही।

पर, बिहार के जो नेता कभी भूल कर भी पी.एफ.आई.शब्द का उच्चारण तक नहीं करते वे भी ‘बाबा’ पर अभूतपूर्व ढंग से आक्रामक हैं।इतने आक्रामक क्यों हैं,यह बात छिपी हुई नहीं है।

धीरेंद्र बाबा के लिए जुटी  भीड़ भी अभूतपूर्व रही है और किसी अन्य बाबा पर इतना अधिक आक्रमण इससे पहले कभी नहीं हुआ। 

अरे भाई, जिस उद्देश्य से आप आक्रामक हंै,उस उद्देश्य की पूत्र्ति स्वयंमेव होने ही वाली है।

कर्नाटका की तरह बिहार में भी अगले चुनाव में अल्पसंख्यक वोट एक ही दल यानी सिर्फ महा गठबंधन को ही मिलने की पूरी उम्मीद है।

फिर अकारण बागेश्वर बाबा के कुछ भक्तों को भाजपा खेमे में क्यों ढकेल रहे हो ?

क्योंकि लोगबाग देख रहे हैं कि आप सिर्फ बहुसंख्यक साप्रदायिकता के खिलाफ बोलते हैं,अल्पसंख्यक साम्प्रदायिकता के खिलाफ कततई नहीं।

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आजादी के बाद जब डा.राममनोहर लोहिया देश को गरमाने 

के लिए निकले तो उन्हें एक बात देखकर अजीब लगा।

वह यह कि रामलीला में तो बड़ी संख्या में लोग जुटते हैं किंतु हमारी सभाओं में कम ही लोग आते हैं।

संभवतः उसी के बाद उन्हंे ‘रामायण मेला’ लगवाने का आइडिया आया।लगवाया भी।

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सत्तर के दशक में बिहार माकपा के एक प्रमुख नेता तकी रहीम से मैं यदाकदा मिलता रहता था।

उन्होंने एक संस्मरण सुनाया।

उन्होंने कहा कि मैं पटना के पास के एक राजपूत बहुल गांव में पार्टी के प्रचार के लिए  गया था।

मैंने राजपूतों की बैठकी में कहा कि कम्युनिस्ट और क्षत्रिय एक ही समान हैं।

क्षत्रिय जो वचन देता है,उस पर कायम रहता है।

वचन को पूरा करने के लिए वह कभी -कभी बल प्रयोग भी करता है।

सोवियत संघ के कम्युनिस्टों ने वहां की जनता को वचन दिया कि हम साम्यवाद लाएंगे।

कम्युनिस्टों ने उसके लिए बल प्रयोग भी किया।’’

तकी साहब बोले कि अपनी शौर्य गाथा सुनकर उस गांव के कुछ राजपूत हमारे दल के प्रभाव में आ गए।

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 17 मई 23