Wednesday, August 17, 2011

मामला सिर्फ अन्ना हजारे और सरकार के ही बीच का नहीं




सरकारांे और सत्ताधारी नेताओं ने इस देश में जब -जब ज्वलंत मुददों को दरकिनार करके उसके बदले मुददा उठाने वालों को ही अपना निशाना बनाया है,तब -तब अंततः सरकारों और दलों की हार ही हुई है।जेपी और वी.पी.सिंह के अभियानों के उदाहरण सामने हैं।पिछली गलतियों व अनुभवों को दरकिनार करके अब भी केंद्र सरकार भ्रष्टाचार के मुददे को नजरअंदाज करके अन्ना हजारे को ही निशाना बना रही है।देखना है कि इस दफा इस द्वंद्व की तार्किक परिणति क्या होती है !



यदि थोड़ी देर के लिए मान भी लिया जाए कि अन्ना के खिलाफ भी कुछ आरोप हैं।तो भी देशव्यापी भ्रष्टाचार का मुददा आज सिर्फ अन्ना टीम बनाम केंद्र सरकार के बीच का ही मामला तो नहीं है ।जन -जन को पीड़ित करने वाले सरकारी-गैर सरकारी भ्रष्टाचार का मुददा क्या मात्र स्वामी राम देव बनाम कांग्रेस के बीच का मामला है ? क्या यह साबित हो जाए कि आरोप लगाने वालों पर भी भ्रष्टाचार के आरोप सही हैं तो देश में सर्व व्याप्त भ्रष्टाचार के विरोध का मुददा बेमतलब हो जाएगा ? कांग्रेस और केंद्र सरकार अन्ना-रामदेव को किसी तरह संतुष्ट कर भी दें तो भी एक कारगर लोकपाल की जरूरत समाप्त नहीं हो जाएगी ।



क्या कांग्रेस प्रवक्ता मनीष तिवारी के नुकीले सवालों का उनके अनुसार संतोषप्रद जवाब अन्ना हजारे नहीं दे सकें तो आंदोलन टांय-टांय फिस्स हो जाएगा ? ऐसा कुछ भी नहीं होने वाला है।ताजा इतिहास भी यही बताता है।देश के जन मानस को देख कर लगता है कि किसी कारणवश अन्ना-राम देव के भ्रष्टाचार विरोधी अभियान के दृश्य से अलग होने के बावजूद इस बार भी भ्रष्टाचार का मुददा शांत होने वाला नहीं है।यह मुददा किसी न किसी रूप में अपना रंग दिखा कर ही रहेगा।विभिन्न जनमत संग्रहों के नतीजे भी यही बताते हैं।



दरअसल इससे पहले भी कम से कम दो बार कांग्रेस पार्टी और सरकार ने भ्रष्टाचार केे मुददे को कुछ खास हस्तियों के बीच का ही मसला बनाने की विफल कोशिश की थी ।पर आम जनता ने इस मुददे को सही माना और बाद के आम चुनावों में कांग्रस को सबक सिखा ही दिया।ऐसा सन 1977 और सन 1989 में हो चुका है।पर लगता है कि कांग्रेस ने उन घटनाओं से कोई सबक नहीं सीखा और एक बार फिर वह मुददों के बदले व्यक्तिगत प्रहारों पर उतर आई है।शनिवार को आयोजित कांग्रेस प्रवक्ता मनीष तिवारी का हमलावर प्रेस कांफ्रंस इसका ताजा उदाहरण है।



एक तरफ अन्ना हजारे और स्वामी राम देव के भ्रष्टाचार विरोधी अभियान को देशव्यापी समर्थन मिल रहा है,दूसरी ओर केंद्र की कांग्रेस सरकार तथा पार्टी स्वामी राम देव और बाल कृष्ण को जेल भिजवाने और अन्ना को बदनाम करने का प्रयास कर रही है । सावंत आयोग की अन्ना विरोधी टिप्पणियां दिखाकर अन्ना से नैतिक सवाल कांग्रेस पूछ रही है।



दूसरी ओर आम जनता का एक बड़ा वर्ग यह चाहता है कि चाहे अन्ना हों या रामदेव ,जिस किसी पर भ्रष्टाचार के आरोप साबित हो जाएं ,उन्हें कानून की गिरफत में ले लिया जाए।पर यह कार्रवाई सिर्फ अन्ना-रामदेव तक ही सीमित नहीं रहे।यदि आज अन्ना-राम देव भ्रष्टाचार के आरोपमें जेल जाते भी हैं तो कोई अन्य नेता भ्रष्टाचार विरोधी अभियान का नेतृत्व संभाल लेगा।पर किसी भी स्थिति में यह आंदोलन रुकने वाला नहीं है।इसका असर उससे पहले न भी दिखाई दे तो भी सन 2014 के लेाक सभा चुनाव में तो दिखाई पड़ ही जाएगा।तब तक जनता को यह स्पष्ट हो जाएगा कि भ्रष्टाचार के पक्ष में आखिर कौन खड़ा है और कौन खिलाफ में है।



an 1974 में जब जेपी ने बिहार में आंदोलन शुरू किया था तो तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने भुवनेश्वर की एक जन सभा में कहा कि ‘जो लोग पैसे वाले से मदद लेते हैं और उनसे रिश्ता जोड़े रहते हैं ,वे कैसे भ्रष्टाचार के बारे में बोलने का दुस्साहस करते हैं ?’गुजरात और बिहार की कुछ हिंसक वारदातों की चर्चा करते हुए उसके लिए प्रकारांतर से जय प्रकाश नारायण को जिम्मेदार ठहराते हुए इंदिरा गांधी ने यह भी कहा था कि ये लोग अबोध युवकों को राष्ट्रीय संपत्ति के विनाशके लिए उकसा रहे हैं।



जेपी एक तरफ राजनीति में एकाधिकारवाद और सरकार में ंभ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठा रहे थे और दूसरी ओर इंदिरा जी जेपी पर उसी तरह के आरेाप लगा रही थीं जिस तरह कांग्रेस की तरफ से आज मनीष तिवारी और सरकार की तरफ से कपिल सिब्बल अन्ना-रामदेव पर प्रति - आरोप लगा रहे हैं।क्या प्रति-आरोप से इंदिरा गांधी सन 1977 के चुनाव में पराजय से अपनी पार्टी को बचा पाईं ? क्या प्रति-आरोप में ं जनताने कोई दम पाया था ?



इसी तरह का प्रति -आरोप कांग्रेस के कुछ लेागों ने अस्सी के दशक में वी.पी.सिंह के पुत्र अजेय सिंह के नाम सेंट कींटस में फर्जी बैंक खाता खोल कर लगाया था। पर बोफर्स तोप सौदे के आरोप की पृष्ठभूमि में 1989 के लोक सभा चुनाव में राजीव गांधी की सरकार सत्ता से बाहर हो गई। तब भी अधिकतर जनता ने यह माना कि बोफर्स घोटाले पर राजीव गांधी की सफाई सही नहीं थी।भले शंकरानंद के नेतृत्व वाली जेपीसी और सी.बी.आई.ने बोफर्स के दलालों को साफ बचा लिया हो,पर केंद्रीय आयकर न्यायाधिकरण ने हाल में यानी इसी साल यह कह ही दिया कि क्वोत्रोची और एक अन्य व्यापारी ने बोफर्स दलाली के पैसों को स्विस बैंक की लंदन स्थित शाखा के अपने खातों में जमा किया था।



लगता है कि हाल के इतिहास से भी कुछ नहीं सीखने की कांग्रेस पार्टी और उसकी सरकार ने कसम खा ली है। अन्ना हजारे और स्वामी राम देव के आंदोलन में लग रहे पैसों पर सवाल उठाते हुए मनीष तिवारी कहते हैं कि ये पैसे कहां से आ रहे हैं,यह किसी को मालूम नहीं है।खोजी पत्रकारिता की इसमंे ंजरूरत है।



सन 1974 में ऐसे सवालों का जवाब जय प्रकाश ने इंदिरा गांधी को दिया था।जेपी ने तब एक प्रेस बयान में कहा था कि यदि इंदिरा जी के मापदंड को मापा जाए तो महात्मा गांधी ही सबसे भ्रष्ट व्यक्ति माने जाएंगे।क्योंकि गांधी के सभी सहयोगियों का पोषण उनके धनी प्रशंसकों द्वारा किया जाता था।जेपी ने इस पर यह भी कहा था कि मुझे आश्चर्य है कि कब तक इस देश के लोग अपने उच्चपदस्थ और शक्तिशाली व्यक्तियों के ऐसे उटपटांग बकवासों को सहन करते रहेंगे ?



याद रहे कि 1977 के चुनाव नतीजों ने बता दिया था कि जनता ऐसे उटपटांग बयानों को अंततः मौका मिलने पर सहन नहीं किया करती जिस तरह की बातें कपिल सिब्बल और मनीष तिवारी आज कर रहे हैं। केंद्र सरकार और कांग्रेस को भ्रष्टाचार के आरोप के सबूत मिलते ही अन्ना और स्वामी को जेल भिजवाना चाहिए ।पर लगता है कि कांग्रेस और उनकी सरकार अन्ना -स्वामी राम देव से यह उम्मीद करती है कि तुम हमारे भ्रष्टाचार को सहन करो और हम तुम्हारे भ्रष्टाचार को नजरअंदाज कर रहे हैं।अन्यथा हम तुम्हंे नैतिक रूपसे कमजोर करके तुम्हारे भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन की हवा निकाल देंगे।यदि ऐसा ही संभव होता तो जेपी से जुड़े संगठनों के खिलाफ भ्रष्टाचार के कथित आरोपों की कुदाल आयोग से जांच करवा कर सन 1977 में चुनावी पराजय से इंदिरा सरकार बच जाती।दरअसल सबसे बड़ी बात यह है कि भ्रष्टाचार का सवाल आज सिर्फ नैतिकता का सवाल ही नहीं है,बल्कि रोजी-रोटी और राष्ट्र की सुरक्षा का भी सवाल है। यह सिर्फ कुछ परस्पर विरोधी हस्तियों के बीच का ही मामला कत्तई नहीं है। जो ऐसा मानेगा ,वह सन 2014 में सन 1977 और सन 1989 दोहराने को तैयार रहे।




साभार जनसत्ता)

















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