Sunday, March 9, 2014

लेकिन मंडल परिवार से कोई आईएएस क्यों नहीं बना !

मंडल- आरक्षण पर 1994 में जनसत्ता में छपे नेताओं के बयान 


पटना , 18 अगस्त। सामंती पृष्ठभूमि के दो नेता बिहार के मुख्यमंत्री बने। ये थे बिंदेश्वरी प्रसाद मंडल और सत्येंद्र नारायण सिंह। सवर्ण सत्येंद्र नारायण सिंह के परिवार और उनके रिश्तेदारों के घरों में अनेक आई.ए.एस. और आई.पी.एस. बने। लेकिन पिछड़ा वर्ग के बिंदेश्वरी प्रसाद मंडल का परिवार अब तक एक भी आई.ए. एस. या आई.पी.एस. पैदा नहीं कर सका।

  क्रीमी लेयर यानी मलाईदार परत की अवधारणा के विरोधी यह कह रहे हैं कि पहले तो सवर्ण लोगों ने जातीय आधार पर बेईमानी की। अब वे लोग क्रीमी लेयर का बंधन लगाकर बिंदेश्वरी प्रसाद मंडल और पूर्व मुख्यमंत्री दारोगा प्रसाद राय जैसे संपन्न पिछड़ों के परिजनों को आरक्षण के लाभ से वंचित करना चाहते हैं।
वे कहते हैं कि आरक्षण की लड़ाई सिर्फ नौकरियों के लिए नहीं, बल्कि सम्मान व राजपाट में हिस्सेदारी की लड़ाई का भी हिस्सा है।

  मलाईदार परत के विरोधी यह भी कहते हैं कि धन संपत्ति, लाठी और दूसरे मामलों में बिंदेश्वरी प्रसाद मंडल और सत्येंद्र नारायण सिंह और उनके रिश्तेदारों के परिवारों में कोई खास फर्क नहीं है। फर्क यही है कि श्री मंडल के परिवार में कोई आईएएस या आईपीएस नहीं है। इसलिए मंडल परिवार एक खास प्रकार की हीन भावना से भी ग्रस्त है। आरक्षण से संबंधित मंडल आयोग की रपट से इस भावना से मुक्ति मिलने वाली थी। पर, सुप्रीम कोर्ट ने क्रीमी लेयर का बंधन लगा कर धनी पिछड़ों के साथ अन्याय किया है।

 जनता दल ने क्रीमी लेयर की अवधारणा का प्रारंभ से ही विरोध किया है। इसीलिए जब बिहार सरकार को पिछड़ों की मलाईदार परत की पहचान करनी पड़ी तो उसने ऐसा मापदंड तय किया जिसके तहत आरक्षण के लाभ से राज्य का शायद ही कोई पिछड़ा वंचित हो।

लालू कहते हैं कि वे क्रीमी लेयर लगाकर पिछड़ों की एकता तोड़ना नहीं चाहते।

लालू सरकार ने रिटायर आई.ए.एस. यूएन सिन्हा की अध्यक्षता में क्रीमी लेयर की पहचान के लिए समिति बनाई थी। समिति ने जो रपट सरकार को दी, उसमें संशोधन के साथ राज्य सरकार ने उसे स्वीकार किया है।
 राज्य सरकार ने क्रीमी लेयर की छंटाई के लिए जो मापदंड तैयार किया है वह जाहिर है कि बिहार सरकार की नौकरियों पर लागू होगा। लेकिन लालू प्रसाद की जनता दल सरकार ने इस बात को ध्यान में रखकर यह मापदंड तय किया है कि ताकि उसे मौका मिलने पर केंद्र की नौकरियों के लिए भी लागू किया जा सके।

हालांकि जनता दल निकट भविष्य में केंद्र में सत्ता पा सकेगा, ऐसी उम्मीद बहुत थोड़े से लोग ही कर सकते हैं। केंद्र की नौकरियांे के लिए क्रीमी लेयर की छंटाई का काम आर.एन. प्रसाद की समिति ने किया है। आर.एन. प्रसाद की समिति की रपट के अनुसार केंद्र की नौकरियांे में आरक्षण का लाभ उन परिवारों को नहीं मिलेगा जिसकी साल में एक लाख रुपये से अधिक आमदनी है।

पर मुख्यमंत्री लालू प्रसाद ने कहा है कि बिहार में पिछड़ों में कोई क्रीमी लेयर यानी संपन्न तबका नहीं है। क्रीमी लेयर केंद्र सरकार का ब्रहमपाश है जिसके जरिए वह पिछड़ों को मारना चाहती है। क्रीमी लेयर को मैं बधिया आरक्षण मानता हूं। जनता दल के लोहियावादी विधायक राधाकांत यादव ने जनसत्ता को बताया कि पिछड़ों के जिस सपन्न तबकों में नौकरियों के लिए योग्य उम्मीदवार उपलब्ध है, उन्हें तो केंद्र सरकार क्रीमी लेयर के नाम पर छांटना चाहती है। लेकिन जिस कमजोर तबके मेें अभी योग्य उम्मीदवार नहीं हैं, उसे आरक्षण का लाभ देने का ढांेग कर रही है।

डा.राम मनोहर लोहिया ने भी कहा था कि पिछड़ों को जब कुछ मिलने लगेगा तो उसका लाभ पहले वहीं उठाएंगे जो अपेक्षाकृत खुशहाल और दबंग हैं। श्री यादव ने कहा कि हालांकि लोहिया की आरक्षण नीति और आज की आरक्षण नीति में फर्क आ चुका है। आज अरक्षण की लड़ाई में सुविधा और सत्ता में हिस्सेदारी की लड़ाई भी है।

  यू एन सिन्हा समिति के सदस्य डा. राम उदगार महतो ने बताया कि यहां दस लाख रुपये सालाना से अधिक आय और बीस लाख रुपये से अधिक की अचल संपत्ति वाले लोग मलाईदार परत में आएंगे। उन्हें आरक्षण का लाभ नहीं मिलेगा।

डा.महतो ने कहा कि यदि आर.एन. प्रसाद समिति का मापदंड यहां लागू किया जाए तो कोई पिछड़ा यहां किसी काॅलेज का प्रिंसिपल तक नहीं बन सकता।

उन्होंने यह भी कहा कि यदि आर.एन. प्रसाद समिति का मापदंड यहां लागू कर दिया जाए तो पिछड़ों के लिए आरक्षित सीटें खाली रह जाएंगी। जिस तरह अनुसूचित जाति  के लिए आरक्षित सीटें खाली रहती हैं। अभी पूरे बिहार में सिर्फ सात या आठ हरिजन ही विश्वविद्यालयों में टीचर हैं। प्रोफेसर तो शायद एक भी नहीं।

  दूसरी ओर, खुद यू.एन. सिन्हा समिति के एक बागी सदस्य प्रो.कमलेश्वरी साह ने यह सुझाव दिया था कि विधायक , सांसद या मंत्री जो दो बार चुनाव जीत चुके हैं, उनके परिवार के सदस्यों को आरक्षण का लाभ नहीं मिलना चाहिए।

  लालू सरकार ने इसे नहीं माना। क्रीमी लेयर से संबंधित लालू सरकार के मापदंड के खिलाफ डा.जगन्नाथ मिश्र ने राज्यसभा मे आवाज उठाई तो केंद्रीय कल्याण मंत्री सीताराम केसरी ने उसकी जांच कराने का आश्वासन दिया। जनसत्ता से बातचीत में डा.मिश्र ने कहा कि इस बारे में लालू सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के खिलाफ काम किया है। इससे साफ हो गया है कि लालू प्रसाद पिछड़ों के सुखी संपन्न व उच्च पदस्थ लोगों के पक्षधर हैं। अन्य पिछड़ों और गरीब पिछड़ों के प्रति उनकी निष्ठा नहीं है। सुप्रीम कोर्ट की मंशा है कि पिछड़ों का वास्तविक गरीब और कमजोंर तबका आरक्षण का लाभ उठाए। जो पिछड़े सामान्य लोगों के बराबर आ चुके हैं, उन्हें क्रीमी लेयर मान कर छांट दिया जाए।

समाजवादी पार्टी के लक्ष्मी साहु ने क्रीमी लेयर के संबंध में बिहार सरकार के रवैये के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिखा है और हस्तक्षेप की मांग की है।

भारतीय जनता पार्टी की बिहार शाखा के अध्यक्ष कैलाशपति मिश्र ने कहा कि हमारी पार्टी हमेशा 27 प्रतिशत आरक्षण के पक्ष में रही है। लेकिन हम यह भी चाहते हैं कि उसका लाभ पहले उन लोगों को मिले जो गरीबी रेखा से नीचे रह रहे हैं।

जनता दल (जार्ज) के सांसद सैयद शहाबुददीन ने कहा है कि क्रीमी लेयर के बारे में बिहार सरकार के फैसले से सुप्रीम कोर्ट की अवमानना होती है। क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने एक खास मकसद के तहत सरकार से कहा था कि वह क्रीमी लेयर की पहचान करे। लालू सरकार ने उस मकसद के खिलाफ काम किया हे।

सी.पी.आइ. (एम एल-लिबरेशन) की बिहार शाखा के प्रवक्ता राजाराम सिंह ने कहा है कि लालू सरकार ने पिछड़ों को धोखा दिया है।अब पिछड़ी जातियों का गरीब हिस्सा आरक्षण से वंचित होगा।लालू प्रसाद यह कहना चाहते हैं कि पिछड़ों में कोई कुलक या नव धनिक तबका नहीं है।यह गलत बात है।  
    
(यह लेख जनसत्ता के 19 अगस्त, 1994 के अंक में प्रकाशित)

No comments: