Wednesday, May 17, 2017

गैर राजग दलों के पास भी चाहिए एक डाॅ. सुब्रह्मण्यम स्वामी

कुछ गैर राजग दल इन दिनों परेशान हैं। उनकी शिकायत है कि नरंेद मोदी सरकार लालू प्रसाद और पी.चिदम्बरम सहित कई प्रतिपक्षी नेताओं को खामख्वाह परेशान कर रही है। एकतरफा कार्रवाइयां हो रही हैं। ऐसी ही कार्रवाइयांं विवादास्पद राजग नेताओं के खिलाफ नहीं हो रही हंै। जबकि गंभीर आरोप उन पर भी हैं।

पर जब केंद्र में मनमोहन सिंह के नेतृत्व में यू.पी.ए. की सरकार थी तो प्रतिपक्षी नेता डाॅ. सुब्रह्मण्यम स्वामी ने ऐसी शिकायत करने की जगह लोकहित याचिकाओं का सहारा लिया। उन्होंने एक नागरिक के रूप में भी भ्रष्टाचार के किसी मामले में केस करने की अनुमति भी अदालत से ले रखी थी।

टू जी घोटाले से लेकर जयललिता तथा नेशनल हेराल्ड जैसे कई मामलों में अदालतों के जरिए अनेक नेताओं को डाॅ. स्वामी ने कठघरे में खड़ा कर दिया।

 लालू प्रसाद से जुड़े लोगों ंके खिलाफ आयकर महकमे की छापेमारियों के बाद राजद के कुछ नेताओं ने  एकतरफा कार्रवाइयों का आरोप लगाया। एक राजद प्रवक्ता ने तो भाजपा विधायक दल के नेता सुशील कुमार मोदी के खिलाफ व्यक्तिगत आरोप को लेकर सबूत भी मीडिया को दिखाए। पर सवाल है कि उन्हें अदालत जाने से कौन रोक रहा है ? क्या उनके अधकचरे सबूत उन्हें रोक रहे हैं ?

सरकारों द्वारा दरअसल एकतरफा कार्रवाइयों का आरोप कोई नया नहीं है। यह आरोप दशकों पुराना है। लगभग सभी दलों के नेतागण यह बात जानते हैं। इसलिए यदि आपके पास सी.बी.आई., आयकर, ईडी या फिर पुलिस नहीं है तो आप कोर्ट का सहारा तो ले ही सकते हैं।

पर इसके लिए दो बातें होनी होंगी। एक तो आप जिस पर आरोप लगा रहे हैं, उस पर ऐसे ठोस सबूत एकत्र करने होंगे जो अदालत में टिक सकें। दूसरी बात यह भी कि अपने बीच से एक ‘डाॅ. सुब्रह्मण्यम स्वामी’ खड़ा करना होगा।

देश के कानूनप्रिय लोग तो यही चाहते हैं कि राजग का स्वामी गैर राजग दलों के भ्रष्ट नेताओं को उनकी सही जगह पर पहुंचाए। उधर गैर राजग दलों का कोई स्वामी ऐसा ही सलूक राजग के भ्रष्ट नेताओं के साथ करे। तभी सभी दलों के सभी भ्रष्ट नेताओं के होश ठिकाने आ सकेंगे। इससे राजनीति की सफाई होगी। राजनीति की जब तक सफाई नहीं होगी, तब तक सरकारी अफसरों के बीच के भ्रष्ट तत्व सही रास्ते पर नहीं आएंगे। अन्य क्षेत्रों में व्याप्त भ्रष्टाचार पर भी तभी काबू पाया जा सकेगा।
यदि दोनों पक्षों के भ्रष्ट नेता राजनीति की मुख्य धारा से बाहर होंगे तो सरकारी साधनों की लूट बंद होगी। फिर लूट से बचे उन साधनों के जरिए इस देश की गरीबी कम करने में मदद मिलेगी। यदि दोनों पक्षों में ‘स्वामी’ सक्रिय नहीं होंगे तो पहले की ही तरह एकतरफा कार्रवाइयां होती रहेंगी।  
गैर राजग दलों के पास एक से एक बेहतरीन वकील हैं। राम जेठमलानी से लेकर कपिल सिब्बल तक। अभिषेक मनु सिंघवी से लेकर प्रशांत भूषण तक। पर वहां कोई ‘डा.स्वामी’ नजर नहीं आ रहा  है।

एक ‘स्वामी’ खड़ा कीजिए और फिर देखिए कमाल! पर असली कमाल तो आपके पास का सबूत दिखाएगा। यदि है तो। यदि आप कोई स्वामी खड़ा नहीं कर पा रहे हैं तो इससे यह नतीजा निकाला जा सकता है कि आपके पास राजग नेताओं के खिलाफ भ्रष्टाचार के कोई ठोस सबूत नहीं हैं। ठोस सबूत नहीं रहने पर अदालतें उन्हें भी दोष मुक्त कर देती हैं जिन्हें सरकार कोर्ट में खड़ा करवाती है।

ऐसे कई उदाहरण हैं। मोरारजी देसाई के प्रधान मंत्रित्वकाल में सी.बी.आई. ने 3 अक्तूबर 1977 को इंदिरा गांधी को गिरफ्तार करके दिल्ली के कोर्ट में पेश कर दिया था। पर जब आरोपों के मामले में सी.बी.आई.कोर्ट को संतुष्ट नहीं कर सकी तो ंअदालत ने इंदिरा गांधी को तुरंत रिहा कर देने का आदेश दे दिया।

 इसी तरह राजीव गांधी के शासनकाल में कांग्रेस के कुछ लोगों ने वी.पी. सिंह के पुत्र अजेय सिंह का सेंट किट्स के एक बैंक में जाली खाता खोलकर उसमें अपनी तरफ से काफी पैसा जमा करवा दिया। वी.पी. सिंह को बदनाम करने के लिए उस खाते का खूब प्रचार किया गया। पर अजेय सिंह का कुछ नहीं बिगड़ा। जबकि सरकार कांग्रेस की थी। खाता जाली निकला।
बिहार में भी कई बार विभिन्न दलों की सरकारों ने बारी -बारी से एकतरफा कार्रवाइयां कीं। पर अपवादों को छोड़ दें तो फंसने ही वाले ही फंसे, पर जिनके खिलाफ पुख्ता सबूत नहीं थे, वे साफ बच गये। चारा घोटाले की सी.बी.आई. जांच लोकहित याचिका के कारण ही हुई थी। उस समय लालू प्रसाद के दल की सरकार केंद्र और बिहार में थी।

दोतरफा प्रयासों के अभाव में निष्पक्ष कार्रवाइयों के साथ -साथ इस देश में राजनीतिक कारणों से एकतरफा कार्रवाइयां भी चलती रहेंगी और अदालतें अपना काम भी करती रहेंगी। अदालतों की सक्रियता का लाभ यदि एक डाॅ. स्वामी उठा सकते हैं तो कोई अन्य ‘स्वामी’ क्यों नही ? यदि कोई नहीं उठा रहा है तो इसका लोगबाग यही मतलब लगाते हैं कि उनके पास सबूत नहीं हैं।

लालू परिजन के यहां आयकर महकमे ने छापे मारे हैं। यह मामला अंततः कोर्ट में भी जा सकता है। कुछ ठोस मिलेगा तो कार्रवाई होगी। राजद भाजपा नेता सुशील कुमार मोदी के खिलाफ आरोप लगा रहा है। बेहतर तो यह होगा कि आरोप लगाने वाले अदालत की शरण लें। अदालत दूध का दूध और पानी का पानी कर देगी। निष्पक्ष मतदाता तो यही चाहता है कि चाहे जिस पक्ष के नेता पर आरोप लगे, उसकी सही जांच होनी चाहिए। बेहतर तो यह होगा कि अदालत की निगरानी में सी.बी.आई. जांच करे।
जाहिर है कि परंपरा के अनुसार सत्ताधारी दल प्रतिपक्षी नेताओं के खिलाफ जांच कराएगा। पर अदालत का फैसला आने पर तो किसी सरकार को सत्ताधारी दल के नेताओं पर भी जांच करानी ही पड़ती है।

(इस विश्लेषण का संक्षिप्त अंश 17 मई 2017 के प्रभात खबर में प्रकाशित)



   

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