सोमवार, 30 जून 2025

 इसलिए विशेष गहन मतदाता पुनरीक्षण

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क्योंकि लाखों बांग्ला देशी-रोहिंग्या घुसपैठियों के 

बिहार में भी अवैध ढंग से मतदाता बन जाने की खबर

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सुरेंद्र किशोर

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 देशभक्त सरकार देश भर में फैले करोड़ों अवैध बांग्ला देशियों-रोंिहंग्याओं की पहचान करके उन्हें इस देश से निकाल बाहर करने का व्यापक अभियान चला रही है। 

 सुप्रीम कोर्ट के वरीय वकील अश्विनी उपाध्याय के अनुसार इस देश में करीब आठ करोड़ घुसपैठिए अवैध ढंग से रह रहे हैं।उनके लिए यहीं के भ्रष्ट सरकारी कर्मी जाली कागजात बनवा देते हैं।उन्हें घुसपैठ कराने के काम में देश-विदेश के जेहादी तत्व सक्रिय हैं।विदेशी फंड आ रहा है।

आरोप है कि उन्हें सर्वाधिक मदद पश्चिम बंगाल सरकार से मिलती है।

  ऐसा तो नहीं होगा कि घुसपैठिए अन्य राज्यों  में मौजूद हैं किंतु बिहार में नहीं हंै।यहां भी पैसे लेकर उनके लिए मतदाता पहचान पत्र तैयार कर देना कोई मुश्किल काम नहीं रहा है।खबर है कि यह बड़े पैमाने पर हुआ है यहां भी।

चूंकि बिहार में जल्द ही विधान सभा चुनाव होने वाला है,इसलिए चुनाव आयोग का यह कत्र्तव्य है कि वह यह सुनिश्चित करे कि घुसपैठ करके आए और गलत ढंग से मतदाता बने लोग चुनाव में किसी क्षेत्र में निर्णायक भूमिका न निभा पाएं।

 इसीलिए तो हो रहा है यह विशेष गहन मतदाता पुनरीक्षण।

 यदि इस पुनरीक्षण अभियान के तहत किसी वाजिब मतदाता का नाम सूची से हटाया जाता है तो पीड़ित व्यक्ति या उसका प्रतिनिधि कोर्ट में जा ही सकता है।

गलत ढंग से नाम काटने का जो दोषी हो उसे सख्त सजा मिले।

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पुरानी है घुसपैठ की समस्या  

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14 जुलाई, 2004 को गृह राज्य मंत्री श्रीप्रकाश जायसवाल ने संसद को बताया था कि पश्चिम बंगाल में घुसपैठियों की संख्या 57 लाख है।

अब एक अनुमान लगाइए।हाल के दशकों में पश्चिम बंगाल के कई जिले हिन्दू बहुल से मुस्लिम बहुल बन चुके हैं।वहां से हिन्दुओं को भगाया जा रहा है।मुर्शिदाबाद जिले से पलायन का उदाहरण ताजा है।बंगाल में समस्या बहुत गंभीर है।पर मीडिया डर के मारे वैसी खबरें नहीं दे रहा है।बिहार में भी घुसपैठ पर लिखने वालों  को नब्बे के दशक में एक मंत्री ने सरेआम धमकाया था। 

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नब्बे के दशक की बात है।

लोक सभा का चुनाव हो रहा था।

मैं पूर्वोत्तर बिहार के एक लोक सभा चुनाव क्षेत्र में वहां के  प्रभावशाली उम्मीदवार के साथ क्षेत्र-भ्रमण कर रहा था।

मैं प्रेस संवादाता था।

   पैदल चलते-चलते हम एक ऐसी जगह हम पहुंचे जहां दूर -दूर तक खेतों में बड़ी संख्या में झोपड़ियां थीं।

वे ताजी फूस की हाल में ही बनी थीं।

(बाद में पता चला कि उन झोपड़ियों में सैकड़ों बांग्ला देशी घुसपैठिए अवैध तरीके से बसाए गये थे।)

उस उम्मीदवार ने ही उन्हें वहां बसाने में मदद की थी।

उन्हें नाजायज तरीके से मतदाता भी बनवा दिया गया था।

उम्मीदवार के दल की ही तब केंद्र में सरकार थी।

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वह उम्मीदवार बारी -बारी से हर झोपड़ी के सामने जाता।नये बने मतदाता गण झोपड़ी से बाहर निकलते।उम्मीदवार जी उनसे सिर्फ एक ही बात कहते--

‘‘चिंता मत करना,यहां से तुम्हें कोई नहीं उजाड़ेगा।’’

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अब आप कल्पना कर लीजिए कि पूर्वोत्तर बिहार में अब तक कितनी बड़ी संख्या में बांग्ला देशी और रोहिंग्या घुसपैठिए अपनी जड़ें जमा चुके होंगे।

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 ममता बनर्जी ने 4 अगस्त, 2005 को लोक सभा में यह आरोप लगाया कि वाम मोर्चा सरकार ने 40 लाख बांग्ला देशी मुस्लिम घुसपैठियों को अवैध ढंग से पश्चिम बंगाल में मतदाता बना दिया है।वे बांग्ला देश में भी मतदाता हैं।

  ममता ने सदन में इस पर चर्चा की मांग की।बांग्ला देश और पश्चिम बंगाल की मतदाता सूचियां स्पीकर को सौंप दी।उनमें समान नाम दोनों सूचियों में थे।

जब अधिक बोलने की इजाजत नहीं मिली तो ममता ने लोक सभा की सदस्यता से सदन में ही इस्तीफा दे देने की घोषणा कर दी।

उससे पहले इस समस्या पर ममता सदन में ही रो पड़ी थीं।

पर ममता जब उन्हीं घुसपैठियों के बल पर सत्ता में हैं तो वह कहती हैं कि यदि उन्हें निकाला जाएगा तो खून की नदी बहेगी।गत 2022 में ममता बनर्जी ने घुसपैठियों से कहा कि जल्द मतदाता सूची में नाम दर्ज करा लो अन्यथा डिटंेशन सेंटर में जाना पड़ेगा।

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घुसपैठ की समस्या पर विचार करने के लिए संबंधित राज्यों के मुख्य मंत्रियों की नई दिल्ली में 28 सितंबर 1992 को उच्चस्तरीय बैठक हुई थी।

गृह मंत्री एस.बी.चव्हाण ने बैठक बुलाई थी।

उसमें पश्चिम बंगाल के मुख्य मंत्री ज्योति बसु ,असम के मुख्य मंत्री हितेश्वर सैकिया,बिहार के मुख्य मंत्री लालू प्रसाद,शामिल थे।अन्य दो राज्यों के भी मुख्य मंत्री थे।यह बैठक घुसपैठ से पीड़ित राज्यों की थी।

उस बैठक में यह निर्णय हुआ कि सीमावर्ती जिलों के निवासियों को परिचय पत्र सरकार देगी।घुसपैठ को बैठक में गंभीर समस्या माना गया।उसके हल के लिए ठोस कदम उठाने का निर्णय हुआ।लालू प्रसाद ने मांग की कि अवैध घुसपैठ रोकने के लिए कारगर उपाय किये जायें और घुसपैठियों को भारत में संपत्ति खरीदने  से रोका जाये।

 जाहिर है कि वोट बैंक के दबाव में इस बैठक के फैसले पर बाद में अमल नहीं हुआ।समस्या बढ़ती गई।

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और अंत में 

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अब आज की पीढ़ी को यह तय करना है कि घुसपैठ को जारी रखा जाए या बंद किया जाये ?

यदि घुसपैठ समर्थक राजनीतिक तत्व मजबूत होंगे तो भारत को भी मुस्लिम बहुल देश में बन जाने मंे अधिक समय अब नहीं लगेगा।आजादी के बाद दो सौ जिले मुस्लिम बहुल बन चुके हैं।मुस्लिम देश बन जाने पर उन लोगों को उनकी अगली पीढ़ियां माफ नहीं करेंगी जो आज वोट के लिए घुसपैठियों का बचाव कर रहे हैं।या जो वैसे राजनीतिक तत्वों को ताकत पहुंचा रहे हैं।

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28 जून 20 25

 


रविवार, 29 जून 2025

 बिहार पुलिस की सराहनीय पहल

अपराध और अपराधियों के बारे में 

लोगों से जानकारी मांगी

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सुरेंद्र किशोर

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बिहार पुलिस ने आम लोगों से अपील की है कि वे अपराध की रोकथाम एवं अपराधियों की गिरफ्तारी के लिए पुलिस को सहयोग दें।

इसके लिए आज के अखबारों में विज्ञापन छपा है।

 सूचना देने के लिए टाॅल फ्री नंबर (14432) दिया गया है।

बिहार पुलिस ने यह भी वादा किया है कि सूचना दाता का नाम गोपनीय रखा जाएगा।

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   हाल के महीनों मेें अपराधियों ने बिहार पुलिस पर हमले तेज कर दिए हैं।

क्योंकि उन्हें न तो शासन से कोई डर है, न ही कोर्ट कचहरियों से।

क्योंकि गवाहों की सुरक्षा का कोई प्रबंध सरकार की ओर से नहीं है।

लगातार हमलों में बुरी तरह मार खा रही बिहार पुलिस की साख व धमक लगभग शून्य है।

 इस देश के सुप्रीम कोर्ट ने कई बार सरकार को निदेश दिया है कि वह गवाहों की सुरक्षा का पक्का इंतजाम करे।अमेरिका में अपराध कम है क्योंकि वहां सरकार की ओर से गवाहों की सुरक्षा का भारी प्रबंध किया गया है।वहां सजा दर 93 प्रतिशत है।जापान में 98 प्रतिशत।

ंबिहार में सजा की दर करीब 60 प्रतिशत है।इस राज्य मेें पहले सजा दर बहुत ही कम थी।

  यदि सुप्रीम कोर्ट डी.एन.ए.,ब्रेन मैपिंग, पाॅलिग्राफिक आदि टेस्ट की खुली छूट  जांच एजेंसियों को दे दे तो देश में अपराध कम होगा।भारत को टुकड़े टुकड़े करने की कोशिश में लगे देश तोड़कों के देसी-विदेशी संरक्षकों -जेहादियों का शीघ्र पता चल जाएगा।

 पर पता नहीं सुप्रीम कोर्ट क्यों यह अधिकार अपने पास दबा रखा है !

मानवीय आधार पर ?

ब्रिटेन में वहां की सरकार ने मानवीय आधार पर ही शरणार्थी बनकर आए घुसपैठियों को शरण दे दी थी।अब वही घुसपैठिए आबादी बढ़ाकर ब्रिटेन

में इस्लामिक शासन कायम करने की ओर तेजी से आगे बढ़ रहे हैं।मुहल्ला दर मुहल्ला उनका कब्जा होता जा रहा है।वहां से गैर मुस्लिमों को भगाया जा रहा है।

भारत के कुछ नेता और बुद्धिजीवी जाने-अनजाने ब्रिटेन की पुनरावृति कर रहे हैं।

   भारत में सबसे शर्मनाक स्थिति यह है कि पक्ष-विपक्ष के अधिकतर नेता आए दिन जाति,धर्म, वोट या पैसे के आधार पर कानून तोड़कों को कानून की गिरफ्त से बचा लेने के लिए जी-जान लगा देते हैं। यदि जेहादी घुसपैठियों को भारतीय पुलिस पकड़ती भी है तो उसके पक्ष में ऐसे -ऐसे नामी-गिरामी वकील सुप्रीम कोर्ट में खड़े हो जाते हैं जिनकी प्रतिदिन की फीस 20 या 30 लाख रुपए है।इन्हें फीस कौन देता है ?कहते हंै कि विदेशी फंडिंग से इस देश में चलने वाली कुछ संस्थाएं देती हैं। 

ऐसी राष्ट्र विरोधी गतिविधि दुनिया के शायद ही किसी अन्य देश में संभव है !

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पहले जो भी हुआ हो,यदि अब बिहार पुलिस सूचना मांग रही है तो शांतिप्रिय लोग अपराधियों के बारे में सूचना देकर बिहार पुलिस की मंशा की अंतिम बार जांच कर लें कि वास्तव में सूचना देने पर इस बार कार्रवाई होती है या नहीं।हो सकता है इस बार पुलिस अपने काम में सचमुच गंभीर हो।

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29 जून 25

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पुनश्चः -बिहार पुलिस की डायल --112 सेवा सराहनीय काम कर रही है।पर उसमें बेहतरी की जरूरत है।उस सेवा में पुलिस बल बढ़ाने की जरूरत है ताकि वह कहीं से  पिट कर न लौटे।


शुक्रवार, 20 जून 2025

‘भारत बचाओ’ बनाम 

‘अल्पसंख्यक वोट बैंक बचाआ’े

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इस देश के राजनीतिक हलकों में 

यही द्वंद्व इन दिनों चल रहा है।

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सोमवार, 16 जून 2025

 मेरे बाबू जी

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सुरेंद्र किशोर

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जब कभी मैं लंबे अंतराल के बाद अपने माता-पिता के मिलने 

गांव जाता था तो 

बाबू जी मुझसे (भोजपुरी में )कहा करते थे--

‘‘मुझे देखने के लिए नहीं तो तुम खुद को मुझे एक झलक दिखाने 

के लिए तो आ जाया करो।’’

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मैंने और मेरी पत्नी ने एकाधिक बार उनसे कहा कि चलिए,हमारे साथ पटना में रहिए।

पर,वे तैयार नहीं होते थे।

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खैर,एक पिता के शब्दों पर एक बार फिर गौर कीजिए--

 ‘‘मुझे खुद को एक झलक दिखाने के लिए तो आ जाओ करो।’’

 संभवतः हर पिता अपने पुत्र के बारे में ऐसा ही सोचता है यदि उसका पुत्र कहीं दूर रहता है।

 हां,एक बात और ।

परिवार में पिता ही एक ऐसा व्यक्ति होता है जो दिल से यह चाहता है कि मेरा बेटा मुझसे भी अधिक तरक्की करे।

बाकियों में से तो अधिकतर दूसरों की तरक्की देखकर ईष्यालु हो जाते हैं।

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छात्र-जीवन में मिली सीख 

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 छात्र जीवन में मेरे पिता अक्सर मुझसे यह कहा करते थे कि 

‘‘छोटी-छोटी बातों पर, खास कर किसी तरह के विवाद या झगड़ा-झंझट से खुद को दूर ही रखना।

  उकसावे वाली बातों को नजरअंदाज करते जाना।

पता नहीं, कौन बात पर किसके अहंकार को ठेस पहुंच जाये और वह हिंसा पर उतारू हो जाये !

हां,इस कोशिश में जरूर रहो कि एक लकीर के बगल में अपनी बड़ी लकीर खींच देना,वह लकीर अपने-आप छोटी हो जाएगी।

किसी लकीर को काट-कूट कर छोटा करने की कभी

कोशिश मत करना।

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एक पिता का सबसे अच्छा वर्णन पंडित ओम व्यास 

ओम ने प्रस्तुत किया है-- 

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पिता  जीवन है, संबल है, शक्ति है।

पिता सृष्टि के निर्माण की अभिव्यक्ति है।

पिता अंगुली पकड़े बच्चे का सहारा है।

पिता कभी खारा तो कभी मीठा है।

पिता पालन पोषण है,परिवार का अनुशासन है।

पिता भय से चलने वाला प्रेम का प्रशासन है।

पिता रोटी है, कपड़ा है,मकान है।

पिता छोटे से परिंदे का बड़ा आसमान है।

पिता अप्रदर्शित अनंत प्यार है।

पिता है तो बच्चों को इंतजार है।

पिता से ही बच्चों के ढेर सारे सपने हैं।

पिता है तो बाजार के सब खिलौने अपने हैं।

पिता से प्रतिपल राग है।

पिता से ही मां की बिंदी और सुहाग है।

पिता परमात्मा की जगत के प्रति आसक्ति है।

पिता गृहस्थाश्रम में उच्च स्थिति की भक्ति है।

पिता अपनी इच्छाओं का हनन परिवार की पूत्र्ति है।

पिता रक्त में दिए हुए संस्कारों की मूत्र्ति है।

पिता एक जीवन को जीवन का दान है।

पिता दुनिया दिखाने का अहसास है।

पिता सुरक्षा है, अगर सिर पर हाथ है।

पिता नहीं तो बचपन अनाथ है।

पिता  से बड़ा अपना नाम करो।

पिता  का अपमान नहीं, अभिमान करो।

क्योंकि मां-बाप की कमी कोई पूरी नहीं कर सकता।

ईश्वर भी इनके आशीषों को काट नहीं सकता।

दुनिया में किसी भी देवता का स्थान दूजा है।

मां-बाप की सबसे बड़ी पूजा है।

वो खुशनसीब होते हैं, मां ं- बाप जिनके साथ होते हैं।

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रविवार, 15 जून 2025

  आर्थिक संकट से जूझ रहे पद्मश्री अवार्डी 

मोगलैया और सिमोन का ताजा हाल क्या है ?

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सुरेंद्र किशोर

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इसी साल रांची से यह खबर आई थी कि ‘‘90 साल के पद्मश्री

अवार्डी सिमोन पैरालिसिस अटैक के बाद 2 साल से बिस्तर पर हैं।’’

 उनका ताजा हाल क्या है ?

उन्हें इस बीच कहां -कहां से कैसी -कैसी मदद मिली ?

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गत साल मई में हैदराबाद से यह खबर आई थी कि गरीबी

की मार झेल रहे पद्मश्री अवार्डी मजदूर अब भी मजदूरी ही कर रहा है।

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हैदराबाद में बैठी राज्य सरकार ने उस मजदूर मोगलैया के लिए कुछ आर्थिक बंदोबस्त किया था।

पर, रांची वाले पद्म अवार्डी का क्या हुआ ?

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यह अच्छी बात है कि मोदी सरकार ने अपने कार्यकाल में उन लोगों को सम्मानित करना शुरू किया है,जो आम तौर पर लीक से हट कर सिर झुका कर किसी प्रचार के बिना अपना काम कर रहे हैं।इस चयन मेें किसी अन्य ‘‘गुणों’’ का ध्यान नहीं रखा जा रहा है।

  पर, मोदी सरकार को उन का  ध्यान तो रखना ही चाहिए जिस किसी पद्म अवार्डी के समक्ष ‘‘रोज कमाओ रोज खाओ’’ वाली समस्या है।(याद रहे कि इन पंक्तियों के लेखक के सामने वैसी समस्या नहीं है।) तो सवाल है कि जब किसी गरीब पद्म अवार्डी का शरीर थक जाएगा तो उसका पद्म अवार्ड कौन सा काम आएगा ?

वह समाज में मजाक का वस्तु नहीं बन जाएगा ?

उसकी हालत हैदराबाद के दैनिक मजदूर दर्शनम् मोगलैया

या रांची के सिमोन की तरह नहीं हो जाएगी ?

कुछ लोग सवाल कर सकते हैं कि जिसे आप सम्मान पूर्ण ढंग से दो जून की रोटी नहीं दे सकते,भुखमरी के हालात में उसके लिए सर्वोच्च नागरिक सम्मान का कितना महत्व है ?(जबकि हमारे देश के पक्ष -विपक्ष के अनेक बड़े -बड़े और मझोले नेता तथा समाज के प्रभु वर्ग तक करोड़ों-अरबों में खेल रहे हैं।)

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वैसे जो हो,पर मोदी सरकार ने सत्ता में आने के बाद वैसी बड़ी हस्तियों को भी याद किया जिन्हें उन दलों ने ऐसा सम्मान नहीं दिया या फिर देने-दिलाने की कोई गंभीर कोशिश भी नहीं की, जिन दलों में उन हस्तियों ने अपना जीवन खपा दिया था।

कर्पूरी ठाकुर ,पी.वी.नरसिंह राव और चैधरी चैधरी सिंह इसके

ताजा उदाहरण हैं।इन्हें मोदी सरकार ने भारत रत्न से सम्मानित किया गया।

सन 2019 में प्रणव मुखर्जी को भारत रत्न सम्मान मिल चुका है।

पद्म सम्मानों में भी ढूंढ़ने पर ऐसे उदाहरण आपको मिल जाएंगे जब मोदी काल में वैसे लोगों को भी ये सम्मान मिले हंै जो मोदी की पार्टी की नीतियों को मानने वाले नहीं थे।न ही किसी भाजपा नेता के लगुआ-भगुआ थे।

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14 जून 25



 


शनिवार, 14 जून 2025

 किसी ने ठीक ही कहा है--

‘‘दुश्मन बनाने के लिए जरूरी नहीं है कि किसी से लड़ाई 

या गाली-गलौज ही की जाए।

बस तरक्की करते जाओ, ईष्र्या,द्वेष ,दुश्मनी का उपहार 

मिलना शुरू हो जाएगा।’’ 


गुरुवार, 12 जून 2025

 अपनी दो पुस्तकों की पाण्डुलिपियां मैंने अलग -अलग प्रकाशकों को भेज दी हैं।एक- दो दिनों में तीसरी पुस्तक पर काम शुरू करूंगा।


बुधवार, 11 जून 2025

 भारत सहित हर देश को यह अधिकार है कि वह 

अपने यहां से अवैध घुसपैठयों को निकाल बाहर करे

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सुरेंद्र किशोर

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अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने अवैध घुसपैठियों को चतावनी दे दी है कि

प्रदर्शनकारी नहीं मानेंगे तो हम उन्हें बुरी तरह मारेंगे।

इस उद्देश्य से ट्रम्प ने लाॅस एंजिलिस में सबसे खतरनाक कमांडो उतार दिया है।

ऐसा इसलिए संभव हो रहा है क्योंकि अमेरिका न तो भारत है और न ही यूरोप।

यूरोप के कई देशों के शांतिपिंय लोग शरणार्थियों-घुसपैठियों के प्रति नरमी दिखा कर अब पछता रहे हैं।

खास कर जेहादी घुसपैठियों ने यूरोप के इलाका-दर इलाके पर कब्जा करना शुरू कर दिया है।

उधर अमेरिका को यह सब मंजूर नहीं है।वह यूरोप से सबक ले रहा है।

भारत तो मुस्लिम वोट लोलुप राजनीतिक दलों के कारण धर्मशाला बना हुआ है।

करीब 8 करोड़ अवैध घुसपैठिए भारत में हैं।उन्हें निकालने की मोदी सरकार कोशिश कर रही है।

 पर, यह कोशिश नाकाफी है।

पता नहीं, इस देश का क्या होगा ?

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पुनश्चः

भारत के जो लोग घुसपैठियों को निकाल बाहर करने के ट्रम्प के प्रयास का विरोध कर रहे हैं,वे दरअसल भारत को कचरा बना रहे 8 करोड़ घुसपैठियों को यहां बनाये रखना चाहते हैं।

सत्तर के दशक में पश्चिम बंगाल की वाम सरकार की पुलिस ने मरीचझांपी में शरण लिये बांग्ला देशी हिन्दुओं को तो गोलियों से मार डाला।पर मुस्लिम घुसपैठियों के नामों को बड़े पैमाने पर अपने यहां की मतदाता सूचियों में दर्ज करवा दिया ।

जब सांसद ममता बनर्जी अवैध घुसपैठियों की विरोधी थीं तो उन्होंने लोक सभा के स्पीकर को पश्चिम बंगाल की और बांग्ला देश की मतदाता सूचियां सौंपी थीं।कई मतदाताओं के नाम दोनों देशों की मतदाता सूचियों में थे।

पर,अब तो ममता बनर्जी अवैध मुस्लिम घुसपैठियों की सबसे बड़ी संरक्षक बन चुकी हैं।कहती हैं कि निकाला जाएगा तो खून की नदी बहेगी।

यही प्रवृति इस देश का दुर्भाग्य है।ऐसे ही दुर्भाग्य से ट्रम्प अमेरिका को बचाना चाहता है।यूरोप तो नहीं बच पा रहा है।आगे -आगे देखिए भारत का क्या होने वाला है !

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11 जून 25


मंगलवार, 10 जून 2025

    निर्माणाधीन गंगा पुल का नाम ‘लोहिया सेतु’ हो

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    सुरेंद्र किशोर

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गांधी सेतु (पटना) के समानांतर निर्माणाधीन गंगा पुल का नाम डा.राम मनोहर लोहिया के नाम पर रखा जाना चाहिए।

 इस तरह आसपास के तीन पुल के नाम हो जाएंगे --गांधी-लोहिया -जय प्रकाश।

 कुछ राजनीतिक कर्मियों का कभी यही नारा भी था।

बिहार की राजनीति, खास कर समाजवादियों की राजनीति में डा.लोहिया का बड़ा योगदान था।साठ के दशक में इन पंक्तियों के लेखक सहित अनेक युवजन लोहिया की वैचारिकी और सच्चरित्रता से प्रभावित होकर सक्रिय राजनीति में आये थे।

बिहार में उस योगदान के अनुपात में डा.लोहिया के नाम पर कोई बड़ा स्मारक नहीं है।

सन 1967 के स्वायत्त शासन मंत्री भोला प्रसाद सिंह ने दक्षिण पटना के 950 एकड़ जमीन में लोहिया नगर बसाया था।

अब भी उस नगर को लोगबाग कंकड़बाग ही कहते हैं -लिखते हैं।यानी, लोहिया नगर का नाम गोल हो गया।  

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एक पुरानी याद

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सन 1967 में बिहार में पहली गैर कांग्रेसी सरकार बन रही थी।

सी.पी.आई.और भारतीय जनसंघ साथ-साथ महामाया प्रसाद सिन्हा के मंत्रिमंडल में शामिल होने को तैयार नहीं हो रहे थे।

स्वाभाविक है ,कारण वैचारिक था।

तब डा.लोहिया पटना में थे। दैनिक सर्चलाइट के अनुसार ,लोहिया ने जनसंघ और सी.पी.आई.के चंद प्रमुख प्रादेशिक नेताओं के साथ बंद कमरे में गुप्त बैठक की।

दोनों दलों को राजी किया।

पहली बार जनसंघ और सी.पी.आई.के प्रतिनिधि संयुक्त मोर्चा सरकार के मंत्री साथ-साथ बने थे।वह राजनीतिक चमत्कार डा.लोहिया के कारण ही संभव हो सका था।वैसा चमत्कार न तो पहले हुआ और न बाद में।

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9 जून 25 


शनिवार, 7 जून 2025

 जैसे को तैसा !!

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सुरेंद्र किशोर

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अंग्रेज सन 1615 में याचक बन कर भारत आए थे।

तब भारत के बड़े हिस्से पर मुसलमानों का शासन था।

‘‘बांटो और राज करा’’े की रणनीति के तहत अंग्रेजों ने भारत पर कब्जा कर लिया था।

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कुछ समय पहले दुनिया के कई देशों से मुस्लिम शरणार्थी याचक बन कर ब्रिटेन गये थे।

  अब ब्रिटेन की स्थिति यह बन गई है कि इस बात का  अनुमान लगाया जा रहा है कि मुसलमानों का ब्रिटेन पर सन 2050 तक पूर्ण कब्जा हो जाएगा या उससे पहले ही !

ध्यान रहे कि मुसलमानों को ब्रिटेन के उस राजनीतिक दल का समर्थन हासिल है जो अभी सत्ता में है।

ब्रिटेन के मुसलमान सत्ताधारी दल को वोट देते हैं।प्रधान मंत्री स्टार्मर की पार्टी वहां बसे या अवैध ढंग से घुसे मुसलमानों को वही सब करने दे रही है जो काम खुद ब्रिटिशर्स ने कभी भारत में किया था। 

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भारत की भी आज वैसी ही स्थिति बनती जा रही है।भारत में कई राजनीतिक दल ऐसे हैं जो करोड़ों घुसपैठियों तथा जेहादी मानसिकता वाले मुसलमानों को पाल -पोस रहे हैं,वोट के लिए।भारत के कुछ राजनीतिक दल तो सिर्फ मुस्लिम वोट के बल पर ही ताकतवर हैं।

नब्बे प्रतिशत भारतीय मुसलमान भारत के उन्हीं दलों को वोट देते हैं जो उनके मुख्य एजेंडा का घोषित या अघोषित रूप से समर्थन करते हैं। 

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अब सवाल है कि भारत के उन राजनीतिक दलों को आप पहचानेंगे कैसे ?

मैं फार्मूला बताता हूं।

1.-भविष्य के खतरे से बचने के लिए उन राजनीतिक दलांे को

अभी से चिन्हित कर लीजिए जिन्होंने सन 2002 में हुए कार सेवक दहन कांड के खिलाफ एक शब्द भी नहीं बोला था।याद रहे कि जेहादियों ने 59 कार सेवाकों को टे्रन के डिब्बे में बाहर से पेट्रोल छिड़कर जिन्दा जला दिया था।

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2.-उन राजनीतिक दलों को पहचान लीजिए जो सांप्रदायिक दंगा होने पर हर बार एक ही पक्ष को दोषी ठहराते हंै।

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3.-जो राजनीतिक दल आपरेशन सिन्दूर के समय और 

बाद में भी वैसे ही बयान देते रहे हैं जो बयान पाकिस्तान व भारत के जेहादी प्रवृति के मुसलमानों को अच्छा लगता है।

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4.-भारत में आजकल एक काफी मजबूत जेहादी संगठन पी.एफ.आई.(प्रतिबंधित)है।उससे जुड़ा राजनीतिक दल है एस.डी.पी.आई.।(उसका केरल के वायनाड लोस क्षेत्र में निर्णायक  प्रभाव है।)

  पी.एफ.आई.सन 2047 तक भारत को इस्लामिक देश बना देने के लिए कातिलों के हथियारबंद दस्ते तैयार कर रहा है।खबर है कि पी.एफ.आई.के इशारे पर ही इस देश के नब्बे प्रतिशत मुस्लिम किसी न किसी दल को आज वोट देते हैं।

(भाजपा सरकार ने यू.पी.के चर्चित रामपुर के मुस्लिम बहुल इलाके में सैकड़ों सरकारी घर बना कर मुसलमानों को बांटे।पर उसके बाद के चुनाव में वहां से एक भी वोट भाजपा को नहीं मिला।)

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5.-जो राजनीतिक दल बांग्ला देशी-रोहिंग्या घुसपैठियों का कभी विरोध नहीं करता,उससे अभी से सावधान हो जाइए।उन दलों के हाथों आपके बाल-बच्चों-वंशजों का जान,माल,भविष्य सुरक्षित नहीं है।

वैसे भारतीय राजनीतिक दलों को भी चिन्हित कर लीजिए जो सी.ए.ए. के विरोध में है।

जो एन.आर.सी.के विरोध में है।

जो वक्फ संशोधन कानून के विरोध में है।

जो सामान्य नागरिक संहिता के विरोध में है।

जो धारा -370 की वापसी के पक्ष में है।

आदि आदि 

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और अंत में

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 ब्रिटिश इतिहासकार सर जे.आर.सिली (1834-1895)ने लिखा है कि ब्रिटिशर्स ने भारत को कैसे जीता।

मशहूर किताब ‘द एक्सपेंसन आॅफ इंगलैंड’ के लेखक सिली  की स्थापना थी कि 

‘‘हमने (यानी अंग्रेजों ने) नहीं जीता,बल्कि खुद भारतीयों ने ही भारत को जीत कर हमारे प्लेट पर रख दिया।’’

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यदि सर सिली जिंदा होते तो लिखते कि ब्रिटेन में शरणार्थी बन कर आए मुसलमान ब्रिटेन

के एक वोटलोलुप राजनीतिक दल के सत्ता लोभ का फायदा उठा कर ब्रिटेन पर धीरे -धीरे कब्जा करते जा रहे थे।

(पिछली खबर के अनुसार लंदन सहित ब्रिटेन के सात नगर निकायों के मेयर पद पर अब मुसलमान हैं।

ताजा खबर पता नहीं क्या है ?

मशहूर पत्रकार शिवकांत अपने अगले किसी लेख में 

बता सकते हैं।)

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भारत का हाल

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सुप्रीम कोर्ट के वरीय वकील अश्विनी उपाध्याय के अनुसार ‘‘भारत के 200 जिलों में अब हिन्दू अल्पसंख्यक हो चुके हैं।बांग्ला देशी-रोहिंग्या घुसपैठियों की संख्या अब यहां करीब 6 करोड़ है।’’

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मुर्शिदाबाद का पिछले दंगे में पी.एफ.आई.का हाथ बताया जा रहा है।कई राज्यों से दंगाई वहां पहुंचे थे।

डा.जाकिर नाइक को यह कहते हुए आप यूट्यूब पर सुन सकते हैं कि भारत में हिन्दुओं की आबादी अब सिर्फ 60 प्रतिशत रह गई है।

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7 जून 25



गुरुवार, 5 जून 2025

 


नेहरू भक्त इन दिनों लिख रहे हैं कि प्रधान मंत्री नेहरू ने 

1962 में हुए चीनी हमले को लेकर कोई बात नहीं छिपाई।

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क्या -क्या छिपाया,वह जान लीजिए

1.-हंडरसन -भगत रिपोर्ट नेहरू सरकार ने दबा दी।

2.-नेहरू ने अमरीकी राष्ट्रपति को 1962 में जो त्राहिमाम् संदेश भेजे,उसे भी उनकी सरकार ने दबा दिया।

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हंडरसन -भगत रिपोर्ट का भंडाफोड़ विदेशी पत्रकार नेविल मैक्सवेल ने कर दिया।

नेहरू की ओर से कैनेडी को भेजे गये तीन त्राहिमाम् संदेश को हाल के वर्षों में इंडियन एक्सप्रेस ने छाप दिया।

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थोड़ा विस्तार में जाएं

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सन 1962 के  चीन-भारत युद्ध में पराजय के कारणों की जांच का भार भारतीय सेना के दो अफसरों को  

सौंपा गया था।

उनके नाम हैं 

 लेफ्टिनेंट जनरल हंडरसन ब्रूक्स और 

ब्रिगेडियर पी.एस..भगत ।

 सन् 1963 में ब्रूक्स-भगत रपट आई ।

 उसे तत्कालीन सेना प्रमुख जनरल जे.एन.चैधरी ने अपने  कवर लेटर के साथ  रक्षा मंत्रालय को भेज दिया था।

केंद्र सरकार ने इसे वर्गीकृत यानी गुप्त सामग्री का दर्जा 

देकर दबा दिया।

 आखिर उसे क्यों दबा दिया गया ?

क्या उस रपट के प्रकाशन से तत्कालीन भारत सरकार और उसके नेतृत्व की छवि को नुकसान होने वाला था ?

 क्या यह बात सही है कि उस रपट के अब भी सार्वजनिक हो जाने पर आज के कुछ नेताओं की बोलती बंद हो जाएगी ?

   मोदी सरकार को चाहिए कि वह उस रपट को संसद के पटल पर रख दें।

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1962 में प्रधान मंत्री नेहरू ने अमरीकी राष्ट्रपति जाॅन एफ.कैनेडी को त्राहिमाम संदेश भेजे थे।वे संदेश इतना दयनीय और समर्पणकारी थे कि नेहरू के रिश्तेदार बी.के.नेहरू (अमरीका में भारत के राजदूत)कुछ क्षणों के लिए इस द्विविधा में पड़ गये थे कि इस पत्र को व्हाइट हाउस तक पहुंचाया जाए भी या नहीं।

पर, उन्होंने बेमन से पहुंचा दिया।क्योंकि वे नौकरी कर रहे थे।

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जब अमेरिका के समक्ष नेहरू गिड़गिड़ाए ! 

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 चीन के हाथों पराजय से हतप्रभ नेहरू ने मदद के लिए अमेरिका की ओर रुख किया।

   नेहरू ने राष्ट्रपति कैनेडी को जो त्राहिमाम संदेश भेजा था,वह इतना दयनीय और समर्पणकारी था।

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        कैनेडी के नाम नेहरू की चिट्ठी का एक अंश

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    जवाहरलाल नेहरू ने 19 नवंबर 1962 को .कैनेडी को लिखा था कि ‘‘न सिर्फ हम लोकतंत्र की रक्षा के लिए बल्कि इस देश के ही अस्तित्व की रक्षा के लिए भी चीन से हारता हुआ युद्ध लड़ रहे हैं जिसमें आपकी तत्काल सैन्य मदद की हमें सख्त जरूरत है।’’ 

 दूसरी ओर, अमेरिका के राष्ट्रपति कैनेडी से नेहरू की एक पिछली मुलाकात के बारे में खुद कैनेडी ने एक बार कहा था कि ‘‘नेहरू का व्यवहार काफी ठंडा रहा।’’

  पंचशील के प्रवत्र्तक नेहरू ने हालांकि खुद को गुट निरपेक्ष घोषित किया,पर उनका मन सोवियत संघ व उसकी कुछ नीतियों  में ही बसता था। 

 याद रहे कि 19 नवंबर 1962 को नेहरू ने भारी तनाव,चिंता और डरावनी स्थिति के बीच  कैनेडी को कुछ ही घंटे के बीच  दो -दो चिट्ठियां लिख दीं।इन चिट्ठियों को हाल तक गुप्त ही रखा गया था ताकि नेहरू की दयनीयता देश के सामने न आ पाये।

नेहरू भक्त मर्माहत न हों !!

आखिरकार उनकी फोटोकाॅपी ‘इंडियन एक्सप्रेस’ में छप ही गई।

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 5 जून 25  


सोमवार, 2 जून 2025

   घोषित इमरजेंसी बनाम ‘अघोषित इमरजेंसी’ !

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       सुरेंद्र किशोर

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प्रमुख कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने हाल ही में कहा है कि नरेंद्र मोदी सरकार ने पिछले 11 साल से देश में ‘अघोषित इमरजेंसी’ लगा रखी है।

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अब आपको सन 1975-77 की इंदिरा सरकार द्वारा घोषित इमरजेंसी 

की एक छोटी झलक यहां दिखा रहा हूं।

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अब आप ही फैसला कर लीजिए कि सन 2025 और 

सन 1975 में कितना फर्क रहा।

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आज विभिन्न क्षेत्रों के अनेक राजनीतिक रूप से बेईमान या बौद्धिक रूप से अनजान लोग आए दिन यह कहते रहते हैं कि आपातकाल में जो कुछ हुआ था,वही सब या उससे से भी बुरा आज देश में हो रहा है।

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  क्या यह बात सही है ?

इस संबंध में, मैं पक्की जानकारियों के आधार पर इमरजेंसी (1975-77)की कुछ अनर्थकारी बातें व घटनाएं बताता हूं।

फैसला आपको करना है।

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1.-इमरजेंसी में (भारत सरकार के वकील) एटार्नी जनरल नीरेन डे ने सुप्रीम कोर्ट को साफ-साफ यह कह दिया था कि देश में लोगों के  ंमौलिक अधिकारों को, जिनमें जीने का अधिकार भी शामिल है,स्थगित कर दिया गया है।

 डे ने कोर्ट से यह भी कहा कि यदि हमारी पुलिस किसी की जान भी ले ले तो भी उस हत्या के खिलाफ आज अदालत की शरण नहीं ली जा सकती।

नीरेड डे की बात को उचित मानकर ‘‘ केंद्र सरकार से आतंकित’’ तब के सुप्रीम कोर्ट ने उस पर अपनी मुहर लगा दी।

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1.-देश में इमरजेंसी से पहले या बाद में क्या ऐसा कुछ कभी हुआ या हो रहा है ?

क्या अंग्रेजों के राज में भी ऐसा हुआ था कि लोगों के जीने का अधिकार तक छीन लिया गया हो ?

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2.-इमरजेंसी (1975-77) में मीडिया पर पूर्ण सेंसरशिप लागू कर दिया गया था।

तब अखबारों के संपादकीय विभागों में जो खबर,लेख, रिपोर्ट आदि छपने के लिए तैयार होते थे,उन्हें लेकर कोई महत्वपूर्ण व्यक्ति पहले प्रेस इंफोरमेशन ब्यूरो (भारत सरकार)के स्थानीय आॅफिस में जाते थे।

पी.आई.बी.के अफसर को उसे दिखाकर प्रकाशनार्थ सामग्री की काॅपी पर उससे मुहर लगवाते थे,तभी अखबारों में वह सामग्री छप पाती थीं।

कई सामग्री पी.आई.बी.छपने लायक नहीं समझता था तो उस पर मुहर नहीं लगाता था।

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2.-क्या इमरजेंसी से पहले या बाद में ऐसा कुछ हुआ ?

या हो रहा है ?

प्रतिपक्षी नेताओं के बयान कौन कहे, 1975-77 की उस ‘काल’ अवधि में उनके नाम तक अखबारों में नहीं छपते थे।

बीमारी के कारण इमरजेंसी में ही जेपी जब जेेल छूट

कर आए तो केंद्र सरकार ने मीडिया को निदेश दिया कि जेपी की किसी गतिविधि की खबर न छपे।यानी, उनके कहीं आने-जाने की खबर भी न छपे। वैसा हुआ भी।कुछ नहीं छपा। 

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3.-जयप्रकाश नारायण सहित एक लाख से अधिक प्रतिपक्षी राजनीतिक नेताओं और कार्यकर्ताओं को अनिश्चित काल तक के लिए जेलों में ठूंस दिया गया था।देश के 250 पत्रकारों को भी जेलोें में बंद कर दिया गया।

(खुद इन पंक्तियों का लेखक मेघालय में जाकर भूमिगत हो गया था।मेघालय में उन दिनों कांग्रेस की सरकार नहीं थी ।इसलिए वहां ‘इमरजेंसी के अत्याचार’ नहीं थे।)

असली इमरजेंसी में जिन्हें गिरफ्तार किया गया था,उन्हें अपनी गिरफ्तारी के खिलाफ अदालत में अपील करने से भी रोक दिया गया था।

जब उन गिरफ्तारियों के खिलाफ देश भर में दायर बंदी प्रत्यक्षीकरण के कई मामले हाईकोटर््स होते हुए सुप्रीम कोर्ट गये तो सुप्रीम कोर्ट ने कह दिया था कि 

गिरफ्तारियों के खिलाफ अदालतें सुनवाई नहीं कर सकतीं।

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3.-क्या इमरजेंसी से पहले और बाद में ऐसा कोई आदेश सुप्रीम कोर्ट की तरफ से कभी आया ?(आज तो जेहादी आतंकी के लिए भी सुप्रीम कोर्ट आधी रात में भी खोल दी गयी थी।)

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 4.-1971 में रायबरेली लोक सभा क्षेत्र में प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी ने संसोपा के राजनारायण को हराया।

राजनारायण ने चुनाव में भ्रष्ट आचरण का आरोप लगाते हुए हाई कोर्ट में याचिका दायर की।

12 जून, 1975 को इलाहाबाद हाई कोर्ट ने आरोप सही पाते हुए प्रधान मंत्री की लोस की सदस्यता रद कर दी।

इंदिरा गांधी ने इमरजेंसी में चुनाव कानून की उन खास धाराओं को संसद से बदलवा दिया जिन धाराओं के तहत उन्हें अयोग्य करार दिया गया था।

इतना ही नहीं,उस संशोधन को पिछली तारीख से लागू करा दिया गया ताकि उसका लाभ इंदिरा गांधी को तुरंत मिल सके।

किसी कानून को पिछली तारीख से लागू करने की बात अजूबी थी।

आम तौर पर सुप्रीम कोर्ट पिछली तारीख वाली बात को स्वीकार नहीं करता।पर,चूंकि मामला इंदिरा गांधी से संबंधित था,इसलिए डरे हुए सुप्रीम कोर्ट ने इस पर कोई एतराज नहीं किया था।

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4.-क्या इमरजेंसी से पहले या बाद में वैसा कुछ हुआ था ?

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जो लोग अब भी कहना चाहते हैं कि जो कुछ 1975-77 की इमरजेंसी में हुआ था,वह सब आज भी हो रहा है तो वे आज के ऐसे कोई उदाहरण दें।

कुछ अशिष्ट टी.वी.डिबेटरों की तरह इधर-उधर की बातें न करें।

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2 जून 25