अगले कुछ महीनों में शिवानन्द तिवारी और
अमृतलाल मीणा के संस्मरण आपको पढ़ने को
मिल सकते हैं।
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सुरेंद्र किशोर
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शिवानन्द तिवारी बिहार की राजनीति का एक बड़ा नाम है।पता चला है कि वे अपने संस्मरण लिख रहे हैं।साठ के दशक से ही वे राजनीति में अत्यंत सक्रिय रहे हैं।
मैंने देखा है कि उनकी स्पष्टवादिता से भले कोई नाराज हो जाए,पर वे किसी को सिर्फ खुश करने के लिए कोई बात नहीं करते चाहे सामने वाला कितना भी बड़ा आदमी क्यों न हो !उम्मीद है उनके संस्मरणों पर भी उनकी इस बात की छाप रहेगी।फिर तो किताब काफी पठनीय होगी।
अमृत लाल मीणा ने भी ,जो राज्य के मुख्य सचिव पद से रिटायर हुए हैं,कहा है कि वे अपने संस्मरण लिखेंगे।
इन दोनों हस्तियों की पुस्तकें आ गईं तो पाठकों को बहुत सारी ऐसी बातें पढ़ने को मिलेंगी जिनसे लोग अब तक अनजान रहे हंैं।
एक अफसर चाहे वे सेवारत हो,या रिटायर, उनकी तो अपनी सीमाएं होती हैं।
पर,शिवानन्द तिवारी पर कोई सीमा नहीं लग सकती।
साठ के दशक से मैं भी समाजवादी आन्दोलंन की कुछ अच्छी-बुरी घटनाओं का गवाह रहा हूं।पर उसका बयान करने की जो हिम्मत तिवारी जी में है,वह हिम्मत मेरे जैसे दुबले-पतले आदमी में कत्तई नहीं है।इस कारण शिवानन्द भाई के संस्मरणों की मुझे भी प्रतीक्षा रहेगी।वे लंबे समय तक इनसाइडर भी रहे हैं जो सौभाग्य मुझे नहीं मिला।
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सेवारत मुख्य सचिव मीणा जी और बिहार सरकार के पूर्व कैबिनेट मंत्री और पूर्व राज्य सभा सदस्य तिवारी जी के संस्मरणों से नई पीढ़ी को सीखने का अवसर मिलेगा,यदि वह सीखना चाहे।
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राजनीतिक क्षेत्रों के अधिकतर जानकार लोग अपने संस्मरण अपने ही साथ लेते चले गये।उन लोगों ने मेरी समझ से अच्छा नहीं किया।वैसे अपने देश में आत्म कथा या संस्मरण का अधिक चलन नहीं है।
बी.बी.सी.के लिए काम कर चुके डा.विजय राणा ने एक बार मुझे बताया था कि ब्रिटेन के लोग तो अपने मुहल्ले पर भी किताब लिख देते हैं।
(दूसरी ओर भारत और बिहार के अधिकतर जानकार लोग देश या प्रदेश के बारे में भी शायद ही कुछ लिखते हैं।)
बहुत पहले राज्य सभा के पूर्व सदस्य बाबू गंगाशरण सिंह के पास उनके राजेंद्र नगर स्थित आवास पर उनसे लंबी बातें करने का मुझे अवसर मिला था।उनके संस्मरण सुनकर मुझे लगा कि वह सब बातें किताब के रूप में आनी चाहिए थीं।उनकी कई बातें अचरज से भरी हुई थीं।
मैं पटना के पूर्व सांसद ,पटना विश्व विद्यालय के पूर्व वाइस चांसलर सारंगधर सिंह के पास भी उनके एक्जीविशन रोड स्थित बंगले पर अक्सर बैठता था।उनके पास जो संस्मरण थे,वे कहीं नहीं छपे हैं।शीर्ष नेताओं के बारे में उनके पास संस्मरणों का खजाना था।
स्वतंत्रता सेनानियों की पहली पीढ़ी के लोगों के बारे में संस्मरण।सारंगधर बाबू संविधान सभा के भी सदस्य थे।
सारंगधर बाबू के बाकरगंज, पटना स्थित षड्ग विलास प्रेस में भारतंेदु हरिश्चंद्र की सारी रचनाएं छपी थीं।देश के अन्य छापाखानोें ने छापने से मना कर दिया था।
उनके परिजन से एक बार मैंने पूछा- सारंगधर बाबू कुछ लिखते भी
हैं या नहीं ?
उनके नाती ने बताया कि कुछ -कुछ लिखते रहते हैं।कोई उनके परिवार का निकटवर्ती हो तो अब भी पता लगा सकता है कि उनके लिखे हुए की किताब बन सकती है क्या ?
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एक समकक्ष ने एक बार गंगाशरण सिंह से पूछा--आप अपने संस्मरण क्यों नहीं लिखते ?
उन्होंने कहा कि यदि मैं सच- सच लिख दूं तो जिन नेताओं को आप स्वर्गीय कहते हैं,उन्हें आप ‘‘नारकीय’’कहने लगेंगे।
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1 सितंबर 25
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