ताकतवर नेताओं की सुरक्षा
बनाम असुरक्षित आम जनता
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सुरेंद्र किशोर
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बात उस समय की है जब गांधीवादी देव नारायण यादव बिहार विधान सभा के अध्यक्ष (1995--2000) थे।
सदन की कार्यवाही चल रही थी।संवाददाता के रूप में मैं भी दर्शक दीर्घा में मौजूद था।
अचानक एक साथ कई विधायक खड़े हो गये।वे मांग करने लगे--‘‘अध्यक्ष महोदय, मेरी जान पर खतरा है।मेरी जान पर खतरा है।मेरी सुरक्षा का प्रबंध कराइए।मेरी सुरक्षा का प्रबंध कराइए।’’
कुछ देर तक हंगामा होता रहा।स्पीकर महोदय सुनते रहे।
अंत में गांधीवादी और शालीन स्पीकर यादव जी ने कहा--‘‘मेरी जान पर तो कोई खतरा नहीं।क्योंकि मैंने किसी की हत्या नहीं की है।’’
इस टिप्पणी के बाद सदन में शांति छा गई थी।
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दूसरा दृश्य
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एक अन्य अवसर पर माकपा के विधायक अजित सरकार अचानक सदन के बीच में जाकर चिल्लाने
लगे--कुछ लोग मेरी हत्या करना चाहते हैं।यह कहते हुए उन्होंने अपना कुर्ता खोलकर जमीन पर फेंक दिया।उन्होंने गंजी नहीं पहनी थी।
उसके बाद उनके हाथ पायजामे की डोरी की तरफ बढ़े ।
वे पूर्णतः नग्न होना चाहते थे।उससे पहले कि वे पायजामा खोल पाएं ,सुरक्षाकर्मियों व कुछ विधायकों ने उन्हें रोक दिया।
उस समय भी मैं संवाददाता के रूप में उस ऐतिहासिक दृश्य का चश्तदीद गवाह बना।
अजित सरकार को अपनी जान पर जिससे
खतरा था,उसनेे अंततः अजित सरकार की जान ले ही ली।हत्यारे को सजा नहीं हुई।
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जिस देश और राज्य में अपराधियों को तौल कर सजा नहीं मिलेगी,उस राज्य में कोई किसी को नहीं बचा सकता,चाहे आप कितनी भी सुरक्षा के बीच रहें।
इन दिनों के अखबारों को ध्यान से पढ़िए--कितनी हत्याएं होती रहती हैं ?
कितने हत्यारे को फांसी पर चढ़ाया जाता है ?
हमारी सबसे अदालत कहती हैं--बेल नियम और जेल अपवाद।
नतीजतन हत्या आम, और सजा विरल !
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मशहूर पुलिस अफसर प्रकाश सिंह ने एक अध्ययन को उधृत करते हुए कहा था कि एक हत्यारे को फांसी पर चढ़ा देने के बाद हत्या के लिए उठे 7 हाथ अपने आप रुक जाते हैं।
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सजा न होने के कारणों के बारे में यहां कुछ बताने की कोई जरूरत नहीं।कारण सब जानते हैं।
हां,एक बात कहना चाहता हूं।
यदि सुप्रीम कोर्ट नार्को टेस्ट, ब्रेन मैपिंग और डी.एन.ए.टेस्ट आदि की इजाजत जांच एजेंसियों को दे दे तो सजाओं का प्रतिशत बढ़ जाएगा।पर,इस देश का दुर्भाग्य यह है कि किसी की जान की अपेक्षा सुप्रीम कोर्ट के लिए हत्यारे के मानवाधिकार की अधिक ंिचता रहती है।
भारत में आपराधिक मामलों में सजा की दर औसतन 40 प्रतिशत है जबकि जापान में 98 प्रतिश्ता और अमेरिका में 93 प्रतिशत।
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निष्कर्ष
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जिस देश में हत्यारे को सजा दिलाने वाली शक्तियंा कमजोर और बचाने वाली शक्तियां मजबूत हैं,वहा उसी की जान बची हुई है जिसे मारने में किसी की कोई रूचि नहीं है।बाकी सब असुरक्षित हैं ,चाहे आप अपने आसपास सुरक्षा की जितनी भी मजबूत दीवाल क्यों न खड़ी कर लें।
इसलिए बड़े नेताओं का भी कल्याण इसी बात में है कि वे सुरक्षा के लिए आम माहौल बनाएं न कि खास -खास किले खड़ा कर लें अपने आसपास।
माहौल बनाने के लिए प्राथमिक शर्त यह है कि राजनीति में अपराधियों को आगे मत बढ़ाओ।उनका सशक्तीकरण मत करो।अच्छे लोग हर जाति में हैं।
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और अंत में
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कुछ दशक पहले की बात है,बिहार के एक बाहुबली जातीय नेता अपने दलीय सुप्रीमो के यहां गये।कहा--फलां को एम.एल.सी.बना दीजिए।
सुप्रीमो ने कहा कि आप अपनी ही जाति को बनवाना चाहते हैं तो इसके बदले उसी जाति के फलां को ले आइए, बनवा दूंगा।
चूंकि फलां अच्छा आदमी था,इसलिए बाहुबली ने उसके लिए पैरवी नहीं की भले वह उसी की जाति का था।
सुप्रीमो और बाहुबली के बीच का संवाद जो अफसर सुन रहा था,उसने यह संवाद ‘‘फलां’’ को उसके घर जाकर दूसरे दिन सुनाया था।
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7 जून 26
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