हजार फूल खिलने दो
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इतिहास से सबक लो
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सुरेंद्र किशोर
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लोकतंत्र,राजनीतिक दल और देश को बचाना है तो विभिन्न
धर्मों और जातियों के बीच संतुलन बनाये रखिए।
न तो हिन्दू राष्ट्र के विचार को समर्थन मिले न ही इस्लामी राष्ट्र को।
न सवर्णों का वर्चस्व कायम हो न ही पिछड़ों का।
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हजार फूल खिलने दो
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आजादी के तत्काल बाद कौन किस पद पर था ?
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जवाहरलाल नेहरू के दौर का सामाजिक असंतुलन
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राष्ट्रपति --डा.राजंेद्र प्रसाद --कायस्थ
प्रधान मंत्री --जवाहरलाल नेहरू--ब्राह्मण
उप राष्ट्रपति--डा.एस.राधाकृष्णन--ब्राह्मण
लोक सभा के स्पीकर--जी.वी.मावलंकर--ब्राह्मण
सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश--एम.पी.शास्त्री--ब्राह्मण
आदि आदि .........
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जवहरलाल नेहरू राष्ट्रपति पद पर राजेंद्र बाबू के बदले सी.राजगोपालाचारी (ब्राह्मण )को बैठाना चाहते थे,पर सरदार पटेल की जिद्द के कारण राजेंद्र बाबू बने।
याद रहे कि राज गोपालाचारी ने सन 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन का विरेाध किया था।वे महात्मा गांधी के समधी थे।
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नरेंद्र मोदी के दौर का सामाजिक संतुलन
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राष्ट्रपति--द्रोपदी मुर्मू--अदिवासी
प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी --अति पिछड़ा
उप राष्ट्रपति -सह राज्य सभा के सभापति--
सी.पी राधाकृष्णन--ओबीसी
लोक सभा के स्पीकर --ओम बिड़ला-ब्राह्मण
राज्य सभा के उप सभापति--हरिवंश--राजपूत
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सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश--सूर्यकंात--ब्राह्मण
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आजादी के तत्काल बाद राज्यों के शासन तंत्र में भी भारी सामाजिक
असंतुलन था।बिहार में तो लगता था कि तब दो ही जातियों भूमिहार
और राजपूतों का शासन है।
सन 1967 तक कांग्रेस ने बिहार में किसी पिछड़ा को मुख्य मंत्री
नहीं बनने दिया।
अन्य राज्यों की स्थिति भी लगभग वही थी।
1990 में पिछड़ा आरक्षण का कांग्रेस ने विरोध किया।उसके बाद
कांग्रेस को लोक सभा में बहुमत मिलना बंद हो गया।
अब अंध मुस्लिम भक्ति के कारण कांग्रेस राष्ट्रीय दल से क्षेत्रीय
पार्टी बन गई।तकनीकी रूप से भले वह राष्ट्रीय दल है।
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इतने बड़े देश में सभी दलों का यह कत्र्तव्य है कि विभिन्न जातियों और धर्मों
के प्रति संतुलन कायम रखिए।
सब तरह के अतिवादियों का विरोध करिए।तभी दल भी बचेंगे,लोकतंत्र भी बचेगा और देश भी।
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17 जून 26
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