बुधवार, 9 सितंबर 2026

 आरक्षण सुधार बनाम आरक्षण बढ़ाओ आंदोलन

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ऐसे संवदेनशील मामलों को लेकर सड़कों पर उतरने 

के बदले इन्हें दोनों पक्ष सुप्रीम कोर्ट को सौंप देें

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सुरंेद्र किशोर

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क्योंकि सड़कों पर उतरने से सामाजिक तनाव बढ़ेगा तो उसका नुकसान 

1990 की तरह आरक्षण विरोधियों को ही अधिक होगा।

क्योंकि आरक्षण सुधार को भी आरक्षण समाप्ति की मांग 

के रूप में ही कुछ लोग पेश करेंगे।

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राजनीतिक कार्यपालिका या संसद इन मामलों में कुछ नहीं कर सकती।

पर,सुप्रीम कोर्ट को संविधान निर्माताओं ने अनुच्छेद-142 के तहत अपार शक्ति जरूर प्रदान कर दी है।यदि सुप्रीम कोर्ट चाहे तो न्याय हित में वह कुछ भी निर्णय कर सकता है।

 (सुप्रीम कोर्ट ने राम मंदिर बनाने का आदेश इसी अनुच्छेद का प्रयोग करते हुए दिया था।)

यदि आरक्षण में सुधार करवाना चाहते हैं,उन्हें ऐसी सामाजिक बनावट वाली संसद का इंतजार करना पड़ेगा जो तत्संबंधी अनुच्छेद-340 में जरूरी संशोधन कर सके। 

देश की जो सामाजिक यानी जातीय बुनावट है,उसमें वैसी संसद बनना लगभग असंभव है।

  याद रहे कि अनुच्छेद-340 में सामाजिक और शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़े का प्रावधान है।आर्थिक दृष्टि से पिछड़ा वाक्यांश जोड़ने के लिए संविधान में संशोधन करना पड़ेगा।

 यह फिलहाल लगभग असंभव काम है।

आरक्षण विरोधी या सुधार पक्षी सड़कों पर आंदोलन जारी रखेंगे तो समाज में आपसी जातीय तनाव बढ़ेगा।उससे यह आशंका पैदा होगी कि अगली बार देश में एक ऐसी मिलीजुली सरकार बन जाएगी जिसमें सपा,राजद,तथा इस तरह के कट्टर आरक्षणपक्षियों व विवादास्पद दलों का दबदबा हो जाएगा।वे अपने साथ दूसरी ‘‘कमजोरियां’’ भी उस सरकार में लाएंगे जैसा कि उनका इतिहास रहा है।

फिर तो माना जाएगा कि सवर्णों ने 1990 के मंडल आरक्षण विरोधी अपने आंदोलन से कोई सबक नहीं सीखा।

 सन 1990 में यदि सवर्णों ने सड़कांे पर उतर कर मंडल आरक्षण का  विरोध नहीं किया होता तो लालू प्रसाद राजनीति में बलशाली नहीं बनते।लालू प्रसाद के मजबूत होने से सवर्णों को क्या लाभ मिला ?

कोई समझदार व्यक्ति नहीं चाहेगा राष्ट्रीय स्तर पर 1990 के बिहार की  पुनरावृति।

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दूसरी ओर, पिछड़ा वर्ग, आरक्षण की सीमा 50 प्रतिशत से बढ़ाकर 65 प्रतिशत करने की मांग कर रहा है।इस मांग को पूरा करना किसी सरकार के लिए संभव नहीं है।क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने इंदिरा साहनी केस में 50 प्रतिशत आरक्षण की अधिकत्तम सीमा तय कर दी है।

  हालांकि कुछ राज्य अपने जनसांख्यिकी आंकड़ों को आधार बना कर 50 प्रतिशत से अधिक आरक्षण दे रहे हैं।पर ऐसे कुछ अन्य राज्यों के ऐसे मामले अदालत मंे अब भी विचाराधीन हंै।

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इसलिए बेहतर यही होगा कि दोनों पक्ष- यानी आरक्षण सुधारपक्षी व आरक्षण बढ़ाओ पक्षी-व्यापक सामाजिक सद्भाव के हित में ऐसे मामलों को सुप्रीम कोर्ट पर छोड़ दें।

वहां से जो निर्णय हो उसे, सब मानें।उससे तनाव पैदा नहीं होगा।

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और अंत में

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सन 1990 में जब पिछड़ों के लिए ‘मंडल आरक्षण’ की घोषणा हुई तो सवर्णों के बड़े हिस्से ने खास कर बिहार में उसका जोरदार विरोध किया।उस विरोध का दोगुनी ताकत से प्रतिकार भी हुआ।

उन दिनों मैं सवर्णों से यह कहा करता था-‘‘गज नहीं फाड़ोगे तो थान हारना पड़ेगा।इसलिए आरक्षण का विरोध मत करो।’’

(पूर्व कांग्रेस विधायक हरखू झा मेरी उस बात के गवाह हैं-वे अब भी यदाकदा कहते हैं कि सुरेंद्र जी आरक्षण  विरोधियांे को चेतावनी दे रहे थे।पर कोई सुनने वाला नहीं था।कोई व्यक्ति अब भी हरखू झा को फोन करके इस बात की पुष्टि कर सकते हैं।)वैसे मेरे परिवार के सदस्य भी तब मुझे पागल कहते थे।मैं उनकी नादानी पर हंसता था।  

लोग नहीं माने।नतीजतन मुख्य मंत्री लालू प्रसाद ने संपूर्ण पिछड़ों को जगा कर एकजुट कर दिया।वे राजनीति के महा बलवान बन गये-भले कुछ दिनों के लिए ही सही।

लालू प्रसाद अपनी ही गलतियों के कारण मौजूदा स्थिति को प्राप्त हुए हैं।यदि गलती नहीं करते तो वे अंततः पिछड़ों के मसीहा कहलाते।मैं तब उन्हें लिखकर चेता रहा था।उससे नाराज होकर मुझे नौकरी से निकलवा दिया उन्होंने।पर अब मेरे बारे में लालू जी कहते हैं--‘‘सुरेंदर किशोर संत है,फकीर है, 24 कैरेट का सोना है।’’पर अब पछताए होत का...।

आरक्षण समर्थन से ताकत पाए लालू प्रसाद ने 15 साल तक जैसा शासन चलाया,उससे अधिक नुकसान सवर्णों को ही हुआ।

पर,कुछ लोगों की आदत है कि वे अपनी पिछली गलतियों को दोहराते रहते हैं।आरक्षण समाप्ति या सुधार का आंदोलन उसी गलती का दोहराव है।पर कोई बात नहीं।सुप्रीम कोर्ट का रास्ता उपलब्ध है सबके लिए।

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9 सितंबर 26   


       


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