दोहरा मापदंड
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‘गोदी मीडिया’ के मौजूदा शोर के बीच
नेहरू-इंदिरा दौर की कुछ भूली- बिसरी यादें
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सुरेंद्र किशोर
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प्रधान मंत्री जवाहर लाल नेहरू ने दिल्ली के एक बड़े अखबार के संपादक दुर्गा दास को उनके पद से हटवा दिया था। नेहरू के निजी सचिव ने अखबार के मालिक का फोन करके हटवा दिया।
दुर्गादास प्रधान मंत्री नेहरू की आलोचना लिख रहे थे।
(नेहरू के निजी सचिव एम.ओ.मथाई ने यह बात अपनी संस्मरणात्मक किताब में लिखी है।)
प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी ने उसी अखबार के संपादक पद से बी.जी.वर्गीज को हटवा दिया था।बाद में वर्गीज को रामनाथ गोयनका ने इंडियन एक्सपे्रस का संपादक बना दिया था।
साठ के दशक में तब के कांग्रेसी मुख्य मंत्री के.बी.सहाय ने पटना के दैनिक सर्चलाइट के संपादक टी.जे.एस. जार्ज को भारत
रक्षा कानून के तहत जेल भिजवा दिया था।नेहरू के साथ 13 साल तक उनके निजी सचिव रहे एम.ओ.मथाई के अनुसार ही टाइम्स आॅफ इंडिया और इलेस्टे्रटेड वीकली आॅफ इंडिया का तीन मूत्र्ति भवन यानी प्रधान मंत्री आवास में प्रवेश वर्जित था।
ऐसे में उन दिनों के मीडिया को गोदी मीडिया बना देने में तो कोई दिक्कत नहीं आने वाली थी।दिक्कत आई भी नहीं।
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अब कोई मुझे बताए कि मोरारजी देसाई,अटल बिहारी वाजपेयी और नरेंद्र मोदी ने अपने प्रधान मंत्रित्व काल में किन-किन संपादकों को उनके पदों से हटवाया ?
सबूत के साथ कोई उदाहरण मिलेगा तो मैं उस पर भी लिखूंगा।
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दूसरी ओर, जब मोरारजी देसाई से किसी ने पूछा कि आर.के करंजिया की अभियानी साप्ताहिक पत्रिका ‘ब्लिट्ज’ आपकी इतनी अधिक आलोचना करता रहता है,फिर भी आप उस पर कार्रवाई क्यों नहीं करते ?
देसाई ने कहा कि मैं तो उसे पढ़ता ही नहीं।
बिहार के मुख्य मंत्री डा.श्रीकृष्ण सिंह से जब किसी ने पूछा तो उन्होंने इसी तरह की बात कही थी--‘‘मैं तो सर्चलाइट पढ़ता ही नहीं।किसी अखबार के खिलाफ इससेे बड़ी कार्रवाई नहीं हो सकती।’’
याद रहे कि उसके संपादक एम.एस.एम.शर्मा अपने काॅलम में श्रीबाबू के खिलाफ किसी सबूत के बिना अत्यंत आपत्तिजनक बातें लिखा करते थे।
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दूसरी ओर, आज नरेंद्र मोदी के खिलाफ कुछ भी छपता रहता है।टी.वी.चैनलों पर बैठकर कोई कुछ भी बोलता रहता है।
आजादी के तत्काल बाद के वर्षों की बात है।
बिहार विधान सभा में साठी लैंड रिस्टोरेशन विधेयक पर व्यापक चर्चा हुई थी।
(दरअसल आजादी के तत्काल बाद बेतिया राज की जमीन की बड़े- बड़े सत्ताधारियों ने आपस में बंदरबांट कर ली।केंद्र सरकार को शिकायत गई तो गृह मंत्री सरदार पटेल ने बिहार सरकार को निदेश दिया कि जमीन वापस करो।उस वापसी के लिए साठी लैंड रिस्टोरेशन विधेयक बिहार विधान सभा से पारित हुआ।
पर चर्चा के दौरान लाभान्वितों व उनके समर्थकों ने अपने लोभ के स्वर बहस में भी मुखरित कर ही दिये।)
उस चर्चा के दौरान कांग्रेस के एक प्रमुख नेता ने,जो बाद में बिहार के मुख्य मंत्री बने थे,कहा था कि ‘‘सन 1857 के विद्रोह को दबाने में जिन भारतीयों ने अंग्रेजों का साथ दिया था,अंग्रेजों ने उन्हें जमीन जायदाद ,जमीन्दारी ,राय बहादुर -खान बहादुर की पदवी आदि देकर सम्मानित किया था।हमने और हमारे परिजन ने भी आजादी लड़ाई में बहुत कुछ खोया,उसकी क्षतिपूत्र्ति के रूप में यदि हमने साठी की जमीन(बेतिया महाराज की जमीन)की बंदोबस्ती ली तो कौन सा अन्याय किया।’’
मैंने उस रिपोर्ट के लिए पहले स्थानीय अखबारों की फाइलें देखीं।मुझे वह खबर नहीं मिली।फिर मैं विधान सभा लाइब्रेरी में जाकर तब की विधान सभा की कार्यवाही पर तैयार किताब देखी।उसमें यह विवरण मिला।
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नेहरू के शासन काल के सबसे बड़े घोटाले 80 लाख रुपए के जीप घोटाले,(यानी इस देश के बीज घोटाले )की कोई खोजपूर्ण रिपोर्टिंग नहीं हुई थी जबकि उस घोटाले में शीर्ष सत्ताधारी का सीधा हाथ था।इसीलिए कृष्ण मेनन को सजा देने के बदले उनको प्रमोशन मिला था।यानी हाई कमिश्नर के बाद केंद्रीय मंत्री बने थे।
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1962 में चीन के हाथों भारत की शर्मनाक पराजय के कारणों की जांच के लिए हैंडरसन -बु्रक्स-भगत समिति बनी।उसकी रिपोर्ट आई जिसके जरिए भारत सरकार की आपराधिक विफलताएं सामर्ने आइं।
पर उस समिति की रिपोर्ट भारत के तत्कालीन गोदी मीडिया में नहीं छपी।
बल्कि विदेशी पत्रकार नेविल मैक्सवेल ने प्रकाशित की।
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सन 1967 के चुनाव के लिए एक दल को छोड़ कर इस देश के सभी प्रमुख दलों ने विदेशों से नाजायज तौर पर पैसे लिये थे।उस शर्मनाक रिश्वतखोरी की रिपोर्ट भारतीय मीडिया में नहीं बल्कि न्यूयार्क टाइम्स में छपी।पूंजीवादी देश ने कम्युनिज्म के विरोध के लिए भारतीय दलों व नेताओं को पैसे दिए और कम्युनिस्ट देशों ने कम्युनिज्म के प्रचार-प्रसार के लिए।
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इमर्जेंसी में इंदिरा सरकार ने मीडिया का क्या हाल किया था,उसकी पराकाष्ठा का एक नमूना देखिए।
अस्वस्थता के कारण आपातकाल के बीच में ही जेपी रिहा कर दिए गए थे।
जब जेल से बाहर आए तो सरकार ने मीडिया को निदेश दिया--जेपी कहां जाते हैं,किससे मिलते हैं,इसकी खबर नहीं छपेगी।नहीं छपी।गोदी मीडिया का इससे बड़ा उदाहरण और क्या हो सकता है ?
(ये तो नमूने के तौर पर थोड़े से उदाहरण हैं।ऐसी सारी कहानियों को एकत्र करेंगे तो मोटी किताब बन जाएगी।)
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2 सितंबर 26
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