आप एकतरफा लिखें (बोलें)या दोतरफा,कोई हर्ज
नहीं,पर जो कुछ लिखें (बोलें), सत्य हो,तथ्यपूर्ण हो !
तो साख नहीं घटेगी ।
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सुरेंद्र किशोर
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सत्तर के दशक में मैं बंबई से प्रकाशित दो साप्ताहिक पत्रिकाएं भी पढ़ता था--ब्लिट्ज और करंट।
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आर.के.करंजिया संपादित ब्लिट्ज वामपंथी पत्रिका थी ।
डी.एफ.कराका संपादित घोर दक्षिणपंथी पत्रिका ‘करंट’ थी।
दोनों को पढ़ने से संतुलित राय बनती थी।
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मीडिया हमेशा ही विभाजित रहा है।पहले भी और आज भी।भारत में भी और अन्य अधिकतर लोकतांत्रिक देशों में भी।
इस देश में गोदी मीडिया पहले भी था तो आज भी है।
‘‘कंधा मीडिया’’ पहले था तो आज भी है।
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अंग्रेजों के जमाने में मीडिया का बड़ा हिस्सा अंग्रेजों के पक्ष में था तो दूसरा हिस्सा स्वतंत्रता कामियों के पक्ष में।
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आजादी के बाद अधिकांश मीडिया सरकार के साथ था।
पर,मीडिया का एक हिस्सा सरकार से असहमत भी था।
राजेंद्र माथुर कहा करते थे कि ‘‘मालिक जितनी स्वतंत्रता अपने संपादक को देता है,उतनी ही स्वतंत्रता किसी संपादक के पास होती है।’’
माथुर साहब के अनुसार ‘‘किंतु उतनी स्वतंत्रता भी पर्याप्त है,यदि उसका सदुपयोग हो।’’
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माथुर साहब की अपनी राय क्या थी,उसे एक संस्मरण के जरिए आपके साथ साझा कर रहा हूं।पहले भी कह चुका हूं।
आज यह बात अधिक मौजूं है।
संस्मरण मुझसे संबंधित है,किंतु उसका व्यापक महत्व है।
1983 में प्रभाष जोशी मुझे जनसत्ता में रखना चाहते थे तो राजेंद्र माथुर नवभारत टाइम्स में।
अंततः मैंने जनसत्ता ज्वाइन किया।
ज्वाइन करने के तत्काल बाद मैं माथुर साहब से मिलने दिल्ली स्थित नभाटा आॅफिस में गया।
उनके कक्ष में प्रवेश करते ही माथुर साहब ने मुझसे पूछा--आपने नवभारत टाइम्स ज्वाइन क्यों नहीं किया ?
मैंने कहा--आपका अखबार दब्बू है।इंदिरा गांधी के खिलाफ नहीं लिख सकता।
राजेंद्र माथुर--‘‘नो सुरेंद्र जी, यू आर मिस्टेकेन।मेरा अखबार दब्बू नहीं है।
पर, मेरा अखबार अभियानी भी नहीं है।
आप इंदिरा जी के खिलाफ जितनी भी कड़ी खबर लाइए,उसे मैं छापूंगा।पर इंदिरा जी में गुण भी हैं,मैं उसे भी छापूंगा।चलिए, आपको जहां ठीक लगा,ज्वाइन किया।मेरी शुभ कामना।’’
(याद रहे कि प्रभाष जोशी ने मुझसे कहा था कि आपको
नभाटा अधिक पैसे जरूर देगा,पर मैं अपको पेशेवर संतुष्टि दूंगा।आपकी खबरें एक्सपे्रस में भी छपेगी।जोशी जी ने अपना वादा पूरा किया था।)
अब आप आज के मीडिया को माथुर साहब की कसौटी पर कस कर देखिए और मीडिया के बारे में अपनी राय बनाइए।
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नब्बे के दशक में बिहार के सबसे बड़े अंग्रेजी अखबार ‘‘द इंडियन नेशन’’ में सिंगापुर डेटलाइन से बी बी सी के एक बड़े पदाधिकारी का बयान छपा था।
न्यूज एजेंसी संवाददाता ने उनसे पूछा था कि ‘‘आपके संस्थान की साख का राज क्या है ?
बीबीसी पदाधिकारी ने कहा--‘‘यदि दुनिया के किसी देश से साम्यवाद समाप्त हो रहा है तो हम रिपोर्ट करते हैं कि समाप्त हो रहा है।हम उसे बचाने की कोशिश नहीं करते।किसी अन्य देश में साम्यवाद आ रहा है तो हम रिपोर्ट करते हैं कि आ रहा है,उसे रोकने की कोशिश नहीं करते।यही हमारी साख का राज है।’’
आज का बी बी सी अपने इस पुराने नियम का कितना पालन करता है या नहीं ,यह उसे सुनने-देखने वाले ही बता सकते हैं।
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फाॅकलैंड युद्ध प्रकरण को अपवाद मानें तो अस्सी-नब्बे के दशक के बीबीसी जैसा लगभग निष्पक्ष मीडिया आज के भारत में होना मुश्किल है।
इसलिए जिसे मन करे ,पक्षकार बने,उसकी मर्जी।
पर, जो भी कहे-लिखे , सच कहे-लिखे।अन्यथा,उसकी घटती साख और भी घटेगी।
भारतीय मीडिया का जो हिस्सा
पक्षकार भी है और झूठ भी परोस रहा है,उसके लिए
एक पुरानी उक्ति यहां पेश है--
‘‘मन मलिन तन सुन्दर कैसे ।
विष रस भरे कनक घट जैसे ।। ’’
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और अंत में
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बात तब की है ,जब मैं ‘‘जनसत्ता’’ का बिहार संवाददाता था।कांग्रेस के चंद्र शेखर सिंह मुख्य मंत्री थे।मुख्य मंत्री तो
खुद ईमानदार थे,पर उनकी सरकार भ्रष्ट थी।जिस तरह आज मोदी जी तो ईमानदार हैं,पर अपवादों को छोड़कर ब्यूरोक्रेसी वैसी नहीं है।
मुख्य मंत्री दिवंगत सिंह ने पहले अपने करीबियों के जरिए मुझे प्रभावित करने की कोशिश की।जब कोई असर नहीं पड़ा तो अपनी सरकार के जन संपर्क निदेशक को संपादक प्रभाष जोशी के मिलने नई दिल्ली भेजा,साथ में जनसत्ता के लिए एक पेज का विज्ञापन भी।
निदेशक महोदय ने मेरी शिकायत की--आपके संवाददाता हमारी सरकार के खिलाफ लिखते रहते हैं।
प्रभाष जी ने पूछा--क्या झूठ लिखते हैं ?
निदेशक-झूठ तो नहीं लिखते,पर पुरानी-पुरानी बातेें लिखते हैं।
जोशी जी ने कहा--जब झूठ नहीं लिखते तो मैं उन्हें कैसे रोक सकता हूं ?
जोशी जी ने एक बात और कही--आप एक ऐसी पार्टी की सरकार की पैरवी करने आए हैं जिस पार्टी की प्रधान मंत्री कहती हंै कि एन.टी.रामा राव मंत्रिमंडल की बर्खाश्तगी की खबर मैंने टेलिप्रिंटर पर देखी ??!!
बेचारे निदेशक महोदय अपना एक पेज का विज्ञापन समेटते हुए जोशी जी के कमरे से बाहर चले गये।
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7 नवंबर 26़
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