Sunday, March 1, 2009

एक सुदूर गांव में बिजली


मेरे गांव में इस महीने बिजली पहुंच गई। लोगबाग खुश हो रहे हैं। इलाके के एक प्रमुख व्यक्ति ने तो इसे जादू कहा। खुश होना स्वाभाविक ही है। गत दो साल के भीतर ही दिघवारा (सारण, बिहार) से उत्तर स्थित मेरे गांव तक जानेवाली ग्रामीण सड़क भी प्रधानमंत्री सड़क योजना के तहत बननी शुरू हो गई। मेरे गांव के पास बह रही मही नदी के किनारे के जमींदारी बांध के पुनर्निर्माण का काम भी साल के भीतर ही हो गया। उस बांध पर भी पक्की सड़क बनेगी।

इतने कम समय में एक साथ इतने अधिक काम ! गांव का दृश्य अब बदला- बदला नजर आ रहा है। इसके अलावा गांव के बाजार में अब पहले की अपेक्षा अधिक अमन-चैन है। उस बाजार और आसपास से निकलने वाली कई ग्रामीण सड़कें भी प्रधानमंत्री सड़क योजना के तहत निर्माणाधीन हैं, पर इन कई खुशियों में से सर्वाधिक खुशी बिजली पहुंचने की है। क्योंकि बिजली की नियमित आपूर्ति यदि आगे भी बनी रही, तो इससे और भी कई खुशियां निकलंेगीं। ये खुशियां इसलिए भी अधिक उजागर हुई हैं, क्योंकि आजादी की आधी सदी तक दिघवारा (सारण, बिहार) से तीन किलोमीटर दूर स्थित इस भरहापुर गांव में सरकार ने एक ईंट भी नहीं लगाई थी। जबकि हमारे सहपाठी विजय भाई को इस बात पर गर्व है कि उनके गांव आमी में सन् 1962 में ही बिजली भी पहुंचा दी गई थी। आमी मेरे गांव से करीब 6 किलोमीटर पर है। यानी बिजली ने 6 किलोमीटर की यात्रा 47 साल में पूरी की।

जब मैं गांव में रहता था, तो वहां टार्च की कई बैटरियों को एक साथ सटा कर और फिर उसे तार के जरिए टार्च के ही बल्ब से जोड़ कर गांव के अपने दालान के घोर अंधेरे में बिजली की रोशनी का आभास पैदा करता था। इससे बिजली बुलाने की उत्कंठा का पता चलता है, पर आज वहां बिजली एक हकीकत है। मनिआॅर्डरी अर्थव्यवस्था वाले सारण जिले के मेरे और आसपास के गावों के बेरोजगार नौजवानों के समक्ष इससे स्वरोजगार का एक नया रास्ता खुला है।

बिहार वाणिज्य मंडल के पूर्व अध्यक्ष युगेश्वर पांडेय का गांव सुलतानपुर मेरे गांव से तीन किलोमीटर दूर स्थित है। हाल में जब सुलतानपुर में बिजली पहुंची, तो पांडेय जी की प्रतिक्रिया थी कि ‘यह जादू हो गया।’ उन्होंने यह भी कहा कि ‘सरकार यदि तत्पर हो, तो कोई काम असंभव नहीं।’ मेरे गांव में बिजली पहुंचने से पहले मैं अपने बेरोजगार भतीजे को वर्षों से यह दिलासा देता रहा कि राज्य का जब सामान्य विकास होगा, तो तुम्हें भी कोई न कोई छोटा -मोटा स्वरोजगार करने की सुविधा हासिल हो जाएगी। अब यदि वह चाहे, तो दिघवारा - भेल्दी रोड पर स्थित खानपुर -भरहापुर विकासशील बाजार में स्थित अपनी खाली पड़ी कीमती जमीन में कोई स्वरोजगार का रास्ता निकाल सकता है। यह बात गांव तथा आसपास के अन्य बेरोजगार और अर्ध बेरोजगार युवकों पर भी लागू होती है, जिनके लिए बिजली और सड़क ने आधार तैयार कर दिया है।

वैसे मेरे गांव के कुछ बुजुर्ग लोग मेरे नकारापन की अक्सर चर्चा करते रहे हैं कि किस तरह मैं अपने भतीजे को कोई क्लास फोर की नौकरी भी नहीं दिलवा सका, जबकि इस राज्य के अनेक नेताओं से मेरा परिचय है। मैंने अपने गांव के अपने अनेक प्रिय जनों से कहा था कि व्यक्तिगत काम के मामले में तो मैं पूरी तरह निकम्मा हूं, यदि कोई सार्वजनिक काम हो, तो उसके लिए कोशिश करूंगा।

कुछ साल पहले वह अवसर आ ही गया था। दिघवारा-भेल्दी रोड पर भरहापुर स्थित पुल ध्वस्त हो गया था। उसकी मरम्मत की सख्त जरूरत थी। सड़क ग्रामीण विकास विभाग की है। मैंने राज्य सरकार के तत्कालीन मंत्री उपेंद्र प्रसाद वर्मा से आग्रह किया। उन्होंने कुछ भी करने से साफ मना कर दिया, जबकि वे 1972 से ही मेरे परिचित थे, जब वे सोशलिस्ट पार्टी के नया टोला दफ्तर आते थे। भला हो बिहार विधान परिषद के तत्कालीन सभापति प्रो जाबिर हुसेन और भाकपा के विधान पार्षद केदारनाथ पांडेय का जिन्होंने विधान परिषद में दबाव डाल कर उन्हीं मंत्री जी से उस पुल की मरम्मत करवा दी। परिणामस्वरूप गांव से सब्जी लदा ट्रक एक बार फिर बाहर जाने लगा। गरीब किसानों को फिर कुछ आय होने लगी।

यह इलाका जातीय दृष्टि से मिलीजुली आबादी वाला क्षेत्र है। याद रहे कि वह पुल अंग्रेजों का ही बनाया हुआ था। हाल के महीनों में मेरे गांव और आसपास विकास की जो किरणें पहुंची हैं, उसमें मेरा कोई योगदान नहीं है। धुआंधार विकास के काम में लगी राज्य सरकार के छोटे या बड़े मंत्री या अधिकारी लोगों में से कोई यह भी नहीं जानता कि मेरा गांव कौन सा है। यह इसलिए यहां कहा जा रहा है कि मेरे गांव का विकास, बिहार में जारी सामान्य विकास कार्यों का ही एक छोटा हिस्सा है, जो मेरे गांव तक पहुंचा है। सामान्य विकास के कारण वैसे लोगांे पर छोटी-मोटी नौकरियां दिलवाने के लिए दबाव पड़ना कम हो जाता है, जो लोग नौकरियां देनेवालों को जानते हैं।

वैसे भी मेरे गांव के लोग मेहनती और उद्यमी हैं। खानपुर के शिवशंकर सिंह का नाम उदाहरणार्थ लिया जा सकता है, जिन्होंने किसी सरकारी मदद के बिना ही मेहनत और उद्यम के बल पर पिछले कुछ दशकों में अपनी आर्थिक परेशानियां दूर कर लीं। वैसे कुछ और लोग भी हैं। अब जब सरकार सुदूर इलाकों में भी साधन पहुंचा रही है, तो आर्थिक परेशानियों से अब भी जूझ रहे बचे-खुचे लोग भी देर सवेर उसकी बदौलत अपनी आर्थिक परेशानियां कम कर सकते हैं। इससे पहले भी सरकार ने सिंचाई के लिए जब मेरे इलाके में एक सरकारी नलकूप भी नहीं लगाया, तो लोगों ने अपने प्रयासों से सत्तर-अस्सी के दशक में अपने खेतों में बेचने के लिए तरह-तरह की हरी सब्जियां उगानी शुरू कीं। वहां से सब्जियां ट्रकांे में लद कर दूर -दूर तक जाने लगीं हैं। उससे पहले जो कई सीमांत किसान महाजनों और जमीन खरीदनेवालों पर निर्भर रहते थे, वे अब अपने लिए ईंट के मकान भी बनाने लगे।

पर इस खुशी के साथ दिघवारा के चिकित्सक डाॅ मदन राय को एक खुशी का लम्बे समय से इंतजार है। लोकप्रिय चिकित्सक डाॅ राय दिघवारा के साथ- साथ खानपुर - भरहापुर बाजार में भी प्रैक्टिस करते हैं और जदयू के नेता भी हैं। पर, दिघवारा में बिजली उपकेंद्र की स्थापना के उनके व दिघवारा की जनता के प्रयास को अब तक सफलता नहीं मिल पाई है, जबकि डाॅ राय कहते हैं कि वहां उपकेंद्र बनाने के लिए सरकारी जमीन उपलब्ध है और योजना को बिहार कैबिनेट की भी मंजूरी मिल चुकी है। दिघवारा की जनता इस संबंध में बिजली बोर्ड, बिजली मंत्री और मुख्यमंत्री को आवेदन पत्र दे चुकी है।

(27 फरवरी, 2009)

No comments: