सोमवार, 28 अप्रैल 2025

 भारत अब अपना भविष्य चुन ले !

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इतिहास से सीखना है या मध्य 

युग का इतिहास दोहराना है ?

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सुरेंद्र किशोर

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1-श्रीराम ने आड़ में छिपकर बालि को मारा था।

यदि वे वैसा नहीं करते तो नतीजा क्या होता ?!

2.-कर्ण के रथ का पहिया जब जमीन में धंस गया था 

तो श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा था कि यही मौका है ,अभी इसे मार दो।

यदि अर्जुन ने श्रीकृष्ण के आदेश का पालन नहीं किया होता तो क्या होता ?

3.- भीष्म और द्रोणाचार्य को कैसे मारा गया ?

यदि इन्हें नहीं मारा जाता तो क्या होता ?

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(लगता है कि मोसाद ने राम-कृष्ण की कहानियां पढ़ी होगी।इसीलिए अनेक दुर्दांत दुश्मनों के बावजूद इजरायल अब भी जिंदा है।लेकिन हम ही अपना इतिहास भूल गये। 

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नतीजतन

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गजनवी ने भारत पर जब आक्रमण किया तो उसने अपनी सेना के आगे गायों का झुंड तैनात कर दिया था।

हिन्दू सेना गोवध से मुकर गई।

फिर उसका नतीजा क्या हुआ ?

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पृथ्वीराज चैहान ने पहली बार जब गोरी को हराया तो गोरी माफी मांग कर छूट गया।

गोरी ने बाद मंे हमला कर के चैहान का सफाया कर दिया।उसकी सेना ने जयचंद और संयोगिता को भी नहीं बख्शा।

गोरी के यहां काफिरों के लिए माफी का कोई प्रावधान ही नहीं था।वैसे चैहान ने माफी मांगी भी नहीं थी।

यानी,पहली बार माफ कर देने का नतीजा क्या हुआ ?

सब जानते हंै।

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अब आज क्या होने वाला है--देखते जाइए-

हमारे हुक्मरान राम-कृष्ण की राह पर चलते हैं या

  गोरी-गजनी काल वाली ऐतिहासिक गलतियांें को दोहराते   हैं !

अमरीकी राजनीतिक वैज्ञानिक सैम्युअल पी. हंटिग्टन

(1927-2008) ने कहा था कि ‘‘शीत युद्धोत्तर संसार में लोगों की सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान, संघर्षों का मुख्य कारण बनेगी।’’आज भारत ही नहीं बल्कि

दुनिया के बड़े हिस्से में हंटिंगटन की भविष्यवाणी चरितार्थ हो रही है।पर भारत के ‘‘हिन्दू नामधारी अर्ध जेहादी तत्व’’ यह प्रचार कर रहे हैं कि हिन्दुओं के अत्याचार के कारण ही यहां मुस्लिम आक्रामकता बढ़ी है।

 वे इस बात का जवाब नहीं देते थे कि चीन जैसे सेक्युलर देश में 2 करोड़ मुसलमान क्यों जेहाद पर उतारू हैं ?

मध्य युग में विदेशी मुस्लिम हमलवार कहां के हिन्दुओं के अत्याचार से पीड़ित होकर भारत आकर युद्ध करने लगे थे ?

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पुनश्चः

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फ्रांसिसी इतिहासकार बर्नियर ने लिखा है कि महाराजा जसवंत सिंह जब युद्ध में हार कर अपने किले के गेट पर वापस पहुंचे तो उनकी पत्नी ने किले का दरवाजा बंद करवा दिया।

उसने पति की हार से खुद को अपमानित महसूस किया था।

अपने राज घराने की परंपरा को ध्यान में रखते हुए वह चाहती थी कि पति या तो जीत कर आएं या युद्ध भूमि में ही शहीद हो जाएं।जसवंत सिंह लौटे और शहीद हो गये।संभवतः महारानी, मशहूर चित्तौड़ परिवार की बेटी थी। 

याद रहे कि चितौड़ राज घरानों की महिलाओं ने पराजय के बाद खुद को जला लिया था।

 क्योंकि उन्हें आशंका रहती थी कि वैसे आक्रांता मृत शरीर के साथ भी कुकृत्य कर सकते थे।ऐसा ही उनका इतिहास था।

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आज भारत सहित दुनिया के अनेक देशों में जेहादी चरम  सक्रिय हैं।

सिर्फ इजरायल और चीन उन्हें माकूल जवाब दे रहे हंै।

आज भारत के सामने बहुत बड़ी समस्या है।वह यह कि भारत के भीतर धीरे-धीरे बाहरी-भीतरी जेहादियों के हाथों यह देश अपनी जमीन और आबादी खोता जाएं (मुर्शिदाबाद इसका ताजा उदाहरण है।)या ‘‘अब नहीं तो कभी नहीं’’ की रणनीति के तहत नौ-या छह कर लिया जाये।

  (मुख्य मंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य ने अपने शासनकाल में कहा था कि राज्य के सात जिलों में सामान्य प्रशासन चलाना हमारे लिए मुश्किल हो गया है।ताजा खबर है कि अब उन जिलों की संख्या बढ़कर नौ हो गयी है।मुर्शिदाबाद वैसा ही एक जिला है।)

चीन के श्ंिागजियांग प्रांत के जेहादी उइगर मुसलमानों को सुधारने के लिए वहां की सरकार उन्हें अभूतपूर्व पीड़ा दे रही है।फिर भी उस पर कोई नहीं कह रहा है कि उइगर मुसलमान किसी अन्याय-अत्याचार से ऊब कर वहां विद्रोह पर उतारू हैं।सच तो यह है कि उन्हें भी पूरी दुनिया में इस्लाम का शासन चाहिए,इसीलिए वे वहां भी सक्रिय हैं।

पर,भारत मंे एक बहुत बड़ी गैर मुस्लिम जमात है जो हर जेहादी  हिंसा के लिए उल्टे हिन्दुओं को दोषी ठहरा देती है।

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और अंत में

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यदि पाकिस्तान ने परमाणु हथियारों का इस्तेमाल किया तो भारत को थोड़ा नुकसान जरूर होगा।पर उसकी प्रतिक्रिया में भारत क्या करेगा ?

चुप बैठेगा ?बिलकुल नहीं।

फिर पाकिस्तान का क्या होगा ?

(नोट-मुझे यह कड़ा पोस्ट क्यों लिखना पड़ा ?क्योंकि मुझे 

अपने वंशजों के भविष्य की चिंता है।साथ ही, मुझे कोई चुनाव तो लड़ना नहीं !

  मैं इतिहास का विद्यार्थी रहा हूं।साथ ही,उसके अलावा भी बहुत कुछ पढ़ता रहता हूं।पूरी दुनिया का दृश्य मेरी आंखों के सामने है।इसलिए मुझे जेहादियों की मानसिकता और उनके लक्ष्य का पूरा-पूरा पता है।)

भारत में आज यदि नरेंद्र मोदी का शासन नहीं होता तो न जाने कितने और मुर्शिदाबाद यहां अब तक बन गये होते।

न जाने कितने लाख लोगों का आंतरिक पलायन हो चुका होता।

ब्रिटेन के कमजोर शासन के कारण आज वहां के मोहल्ला दर मोहल्ला पर जेहादियों का कब्जा होता जा रहा है।ब्रिटेन के सात नगरों के मेयर अब मुस्लिम हैं।

ब्रिटेन की गैर मुस्लिम बच्चियों के साथ हो रहे कुकर्म की चिंता अमेरिका के एलन मस्क को करना पड़ रहा है,न कि मुस्लिम वोट लोलुप प्रधान मंत्री स्टार्मर को।

  जिस तरह भारत के राजाओं -बादशाहों के बीच डिवाइड एंड रूल करके भारत पर ब्रिटिशरों ने कब्जा किया था,

( ब्रिटिश इतिहासकार सर जे.आर.सिली ने यह बात अपनी किताब में दर्ज की है )उसका बदला घुसपैठ करके व शरणार्थी बन कर तथा लेबर पार्टी और कंजरवेटिव पार्टी के मतभेद का फायदा उठाकर बाहरी मुस्लिम लोग ब्रिटेन की राजनीति-सत्ता पर कब्जा करते जा रहे हैं।

भारत में भी लेबर और कंजरवेटिव की प्रतिमूर्ति मौजूद हैं जो वही काम यहां कर रहे हैं।ऐसे ही माहौल में श्रीकृण को गीता मंे अर्जुन से यह कहते पढ़ा जा सकता है-- हे अर्जुन युद्ध करो !

लखनऊ के अर्जुन ने कहा था--माफियाओं को मिट्टी में मिला दूंगा।काफी हद तक वह काम हो गया।

अब हस्तिानापुर का अर्जुन जेहादियों से कह रहा है--मिट्टी में मिला दूंगा।पता नहीं, इसे कार्य रूप कब दिया जाएगा ?

लोग कहते हैं बड़े अर्जुन पर भी भरोसा रखो।

अधीर मत बनो।

एक बार फिर कह दूं--मुझे अपने वंशजों की चिंता है।

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28 अपैल 25


रविवार, 27 अप्रैल 2025

 अपनी पहली पुस्तक पूरी कर लेेने के बाद अपनी 

संस्मरणात्मक(राजनीतिक जीवन और पत्रकारिता 

काल के संस्मरण) पुस्तक की तैयारी में लगा हूं।

उसकी एक झलक यहां पेश है--

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निर्भीक पत्रकारिता यानी तलवार 

की धार पर चलना

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सुरेंद्र किशोर

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बिहार से एक केंद्रीय मंत्री के बारे में मैंने कुछ लिखा था।

उन्हें बहुत खराब लगा।मेरी बात झूठी होती तो वे मानहानि का केस कर सकते थे।पर,उन्होंने दूसरा रास्ता अपनाया।

उनके एक आदमी ने मुझे फोन किया और कहा--

‘‘जिस तरह हमने रियाज अजीमाबादी (ब्लिट्ज संवाददाताता)को रेप केस में फंसाया था,

तुम्हें भी फंसा दूंगा।’’

उसके बाद मेरी पत्नी को भी फोन किया।

कहा कि मुझे मालूम है कि आपके बच्चे कहां पढ़ने जाते हैं।आपको भी मैं उठवा लूंगा।

मेरी पत्नी बोल्ड है।बोली --गाड़ी लेकर आ जाइए,मैं तब तक तैयार हो जाती हूं।

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धमकियां तो हमें मिलती रहती थी,पर रेप की धमकी पर मैं सचमुच डर गया।

क्यांेकि रेप के आरोप को अधिकतर लोग सच मानने के लिए तैयार बैठे रहते हैं।

मैंने डी.जी.पी को पत्र लिखा।धमकी का पूरा विवरण लिखा।जांच और कार्रवाई की मांग की।

डी.जी.पी.ने कार्रवाई शुरू भी कर दी।आरोपी घबरा गया।

पुलिस से भागने लगा।

मुख्य मंत्री तक बात पहुंची।

मुख्य मंत्री ने डी.जी.पी.को समझा दिया--अरे, वह झूठ लिखता रहता है।

इस केस को खत्म कीजिए।

केस खत्म हो गया।मुख्य मंत्री मेरे स्वजातीय ही थे।

पर,उन्हें अपनी गद्दी प्यारी थी।

जाति और गद्दी में चुनना हो तो नेता क्या चुनेंगे ?

फिर पत्रकार क्या होता है ?

उसकी औकात ही क्या है ?

अस्सी के दशक  के एक मुख्य मंत्री पत्रकारों के बारे में कहा करते थे-‘‘दो कौड़ी के लोग !’’

मेरे मामले में भी एक वरीय पत्रकार के साथ हो रहे अपराध की चिंता मुख्य मंत्री को कत्तई नहीं थी।

क्योंकि वह केंद्रीय मंत्री प्रधान मंत्री का बहुत करीबी था।मुख्य मंत्री को लगा होगा कि 

वह मेरी कुर्सी हिला सकता है।

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27 अप्रैल 25

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पुनश्चः

बेचारा रियाज अजीमाबादी !

मेरा दोस्त भी था।अब इस दुनिया में नहीं रहा।

बाद में तो इंडियन एक्सप्रेस के पटना आॅफिस में सर्कुलेशन का काम देखता था।उन दिनों मैं जनसत्ता में था।

जब उस पर रेप केस हुआ होगा,तब उसके परिवार व खुद उसको कितनी पीड़ा हुई होगी ?

मुझसे उम्र में छोटा था।जब वह इस दुनिया से उठा तो उस समय उसकी उम्र बहुत नहीं थी।क्या रेप केस की पीड़ा ने भी उसकी आयु कम कर दी थी ?

पता नहीं।

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27 अपैल 25


 

 

 


शनिवार, 26 अप्रैल 2025

    पहलगाम के परिणाम !?

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भारतीय कश्मीर के कुछ जेहादियों में तो 

सुधार परिलक्षित,क्या पाक और उसके 

भारतीय पिट्ठू भी सुधरेंगे ?

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सुरेंद्र किशोर

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35 साल में पहली बार-पहलगाम आतंकी हमले के विरोध में जम्मू -कश्मीर में ऐतिहासिक बंद

    ----दैनिक भास्कर--24 अप्रैल 25

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पाक के रक्षा मंत्री ने स्वीकारा--दशकों से 

आतंकवाद को हम दे रहे हैं समर्थन

       --दैनिक जागरण--26 अपैल 25

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पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने यह भी कहा कि आतंकी संगठनों के पोषण और प्रशिक्षण का ‘गंदा काम’ 30 सालों से अमेरिका और पश्चिमी देशों के इशारे पर हमने 

किया है।

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पहलगाम के जेहादी कत्लेआम के बाद कुछ फर्क दिखाई 

पड़ने लगे हंै।क्या ये स्थायी भी साबित होंगे ?

 फर्क पर एक नजर

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1.-पाकिस्तान में पहले से उठने लगा था एक सवाल--

 आटा या जेहाद ?

2.-पाक को मिल रहे विदेशी पैसों के स्त्रोत सूखने लगे थे। 

3.-इधर जम्मू कश्मीर में मोदी सरकार के कारण राजनीतिक-प्रशासनिक स्थिति कुछ बदली है।

4.-कश्मीर में पत्थर चलाने वालों के लिए अब बाहरी पैसे 

उपलब्ध नहीं रहे।

 5.-जम्मू कश्मीर में अपेक्षाकृत शांति के कारण पर्यटकों की संख्या बढ़ी।पर्यटकों से इस राज्य को हर साल करीब 25 हजार करोड़ रुपए का राजस्व मिलने लगा।

लोगों की आय बढ़ी।

नतीजतन जम्मू कश्मीर के जेहादी तत्व कमजोर पड़ने लगे।

पर,बाहरी जेहादी फिर भी सक्रिय।कुछ भीतरी जेहादी भी।पर आम कामकाजी लोग बढ़ते पर्यटन उद्योग से खुश हैं।

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नतीजतन

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पहलगाम में हुए आतंकी हमले के विरोध में 35 साल में पहली बार जम्मू कश्मीर में ऐतिहासिक बंद रहा।यह एक सकारात्मक 

विकास है।

अधिकतर कश्मीरियों के इसी बदले हुए रुख को देखते हुए भारत के प्रतिपक्षी राजनीतिक दलों ने भी पहलगाम जेहादी हिंसा की निन्दा की।अन्यथा कुछ उल्टी सीधी बातें करते।

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नरेंद्र मोदी सरकार अब पाकिस्तान नामक मरीज का स्थायी इलाज करना चाहती है।यदि भारत सरकार ने देर-सवेर सिंधु नदी पर बांध का निर्माण कर पाकिस्तान को पानी के लिए बूंद- बूंद तरसा दिया तब क्या होगा ?

पाक ने धमकी दी कि वैसी स्थिति में युद्ध होगा (और हमारे पास परमाणु बम हंै।)

यदि पाक ने भारत पर बम गिराया तो भारत के कुछ इलाकों को जरूर  नुकसान पहुंच सकता है।पर उसके बाद ?

भारत पाक के साथ क्या करेगा ?

 अपने परमाणु बमों के जरिए पाक को दुनिया के नक्शे से भारत गायब कर सकता है।क्योंकि नरेंद्र मोदी और मन

मोहन सिंह की सरकारों में काफी फर्क है। 

26 नवंबर 2008 को मुम्बई में पाक आतंकियों ने हमला करके 174 लोगों को मार डाला था। करीब 300 लोगों को घायल कर दिया।उसके बावजूद तब की कांग्रेस सरकार ने पाक के खिलाफ कोई कदम नहीं उठाया। क्योंकि उसे डर था कि वैसा कुछ करने पर आगामी लोक सभा चुनाव (2009)में कांग्रेस को मुस्लिम वोट नहीं मिलेंगे।

याद रहे कि मोदी सरकार को वैसी कोई चिंता करने की जरूरत नहीं है।पहलगाम में 27 निर्दोष लोगों की कायरतापूर्वक निर्मम हत्या के बाद मोदी के रौद्र रुप और उनकी सरकार के ठोस कदमों से देश की आम जनता काफी खुश नजर आ रही है।

याद कीजिए। 2008 में जब बंबई में 174 लोगों को कसाब व कसाइयों ने मार डाला था तो उस समय तब के प्रधान मंत्री के चेहरे के कैसे हाव-भाव थे ?

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26 अपैल 25

 


मंगलवार, 22 अप्रैल 2025

 


वीर कंुवर सिंह विजयोत्सव दिवस(23 अप्रैल) 

की पूर्व संध्या पर

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स्वतंत्रता सेनानी पंडित सुंदरलाल की चर्चित पुस्तक ‘‘भारत में अंग्रेजी राज’’( द्वितीय खंड) पर आधारित इस प्रस्तुत विवरण में आप ही गिन लीजिए कि अंग्रेज,वीर कुंवर सिंह से कितनी बार हारे थे !

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सुरेंद्र किशोर

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पहले पढ़िए 23 अप्रैल के युद्ध में पराजित अंग्रेज सेना

के अफसर की रोमांचक व्यथा-कथा

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 उस अंग्रेज सैनिक अफसर के शब्दों में,

‘‘वास्तव में, इसके बाद जो कुछ हुआ,उसे लिखते हुए मुझे अत्यंत लज्जा आती है।

  लड़ाई का मैदान छोड़कर हमने जंगल में भागना शुरू किया।

शत्रु हमें बराबर पीछे से पीटता रहा।

हमारे सिपाही प्यास से मर रहे थे।

एक निकृष्ट गंदे छोेटे से पोखर को देखकर वे उसकी तरफ लपके।

 इतने में कुंवर सिंह के सवारों ने हमें पीछे से आ दबाया।

 इसके बाद हमारी जिल्लत की कोई हद न थी।

हमारी विपत्ति चरम सीमा को पहुंच गई।

हम में से किसी में शर्म तक न रही।

जहां जिसको कुशल दिखाई दी,वह उसी ओर भागा।

अफसरों की आज्ञाओं की किसी ने परवाह नहीं की।

व्यवस्था और कवायद का अंत हो गया।

चारों ओर आहों, श्रापों और रोने के सिवा कुछ सुनाई न देता था।

 मार्ग में अंग्रेजों के गिरोह के गिरोह मरे।

किसी को दवा मिल सकना असंभव था।

 क्योंकि हमारे अस्पतालों पर कुंवर सिंह ने पहले ही कब्जा कर लिया था।

 कुछ वहीं गिर कर मर गए ।

बाकी को शत्रु ने काट डाला।

हमारे कहार डोलियां रख -रख कर भाग गए।

सब घबराए हुए थे,सब डरे हुए थे।

सोलह हाथियों पर हमारे घायल साथी लदे हुए थे।

 स्वयं जनरल लीगै्रण्ड की छाती में एक गोली लगी और वह मर गया।

  हमारे सिपाही अपनी जान लेकर पांच मील से ऊपर दौड़ चुके थे।

उनमें अब बंदूक उठाने तक की शक्ति न रह गई थी।

 सिखों को वहां की धूप की आदत थी।

उन्होंने हमसे हथियार छीन लिए और हमसे आगे भाग गए।

गोरों का किसी ने साथ न दिया।

  199 गोरों में से 80 इस भयंकर संहार से जिन्दा बच सके।

हमारा इस जंगल में जाना ऐसा ही हुआ,जैसा पशुओं का कसाईखाने में जाना।

हम वहां केवल वध के लिए गए थे।’’

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इतिहास लेखक व्हाइट ने भी लिखा है कि 

‘‘इस अवसर पर अंग्रेजों ने पूरी और बुरी से बुरी हार खाई।’’

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  इससे पहले के युद्धों में अंग्रेजों 

  की लगातार पराजय के विवरण पेश है--

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ईस्ट इंडिया कंपनी की फौजें कई युद्धों में जिस भारतीय राजा से हार गयी थी ,उस राजा का नाम था बाबू वीर कुंवर सिंह।

वीर कुंवर सिंह की याद में बिहार में बड़े पैमाने पर 23 अप्रैल को विजयोत्सव मनाया जाता है।

बिहार के जगदीशपुर के कंुवर सिंह जब अंग्रेजों से लड़ रहे थे, तब उनकी उम्र 80 साल थी।

यह बात 1857 की है।

  याद रहे कि भोजपुर जिले के जगदीशपुर नामक पुरानी राजपूत रियासत के प्रधान  को सम्राट् शाहजहां ने राजा की उपाधि दी थी।

  मशहूर पुस्तक ‘‘भारत में अंग्रेजी राज’’के यशस्वी लेखक पंडित सुंदरलाल ने उन युद्धों का विस्तार से विवरण लिखा है।

  (अंग्रेजों के शासनकाल में ही यह पुस्तक लिखी गई थी।अंग्रेज सरकार ने इस किताब पर सन 1929 में प्रतिबंध लगा दिया था।गांधी जी की अपील पर 1937 में प्रतिबंध हटा दिया गया।मेरे पास उपलब्ध संस्करण को भारत सरकार के प्रकाशन विभाग ने प्रकाशित किया है।)

लेखक के अनुसार ‘जगदीश पुर के राजा कुंवर सिंह आसपास के इलाके में अत्यंत सर्वप्रिय थे।

 कुवंर सिंह बिहार के क्रांतिकारियों के प्रमुख नेता और सन 57 के सबसे ज्वलंत व्यक्तियों में थे।

  जिस समय दानापुर की क्रांतिकारी सेना जगदीशपुर पहुंची, बूढ़े कुंवर सिंह ने तुरंत अपने महल से निकल कर शस्त्र उठाकर इस सेना का नेतृत्व संभाला।

 कुंवर सिंह इस सेना सहित आरा पहुंचे।

 बिहार में 1857 का संगठन अवध और दिल्ली जैसा तो न था,फिर भी उस प्रांत में क्रांति के कई बड़े -बड़े केंद्र थे।

 पटना में जबर्दस्त केंद्र था जिसकी शाखाएं चारों ओर फैली  थीं।

पटना के क्रांतिकारियों के मुख्य नेता पीर अली को अंग्रेजों ने फांसी पर चढ़ा दिया।

 पीर अली की मृत्यु के बाद दानापुर की देशी पलटनों ने स्वाधीनता का एलान कर दिया।

ये पलटनें जगदीश पुर की ओर बढ़ीं।

बूढ़े कुंवर सिंह आरा पहुंचे।

उन्होंने आरा में अंग्रेजी खजाने पर कब्जा कर लिया।

जेलखाने के कैदी रिहा कर दिए गए।

अंग्रेजी दफ्तरों को गिराकर बराबर कर दिया गया।

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     आरा के बाग का संग्राम

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    29 जुलाई को दानापुर के कप्तान डनवर के अधीन करीब 300 गोरे सिपाही और 100 सिख सैनिक आरा की ओर मदद के लिए चले।

आरा के निकट एक आम का बाग था।कुंवर सिंह ने अपने कुछ आदमी आम के वृक्षों की टहनियों में छिपा रखे थे।

रात का समय था।

जिस समय सेना ठीक वृक्षों के नीचे पहुंची,अंधेरे में ऊपर से गोलियां बरसनी शुरू हो गयीं।

सुबह तक 415 सैनिकों में से सिर्फ 50 जिंदा बचकर दाना पुर लौटे।

डनवर भी मारा गया था।

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बीबी गंज का संग्राम

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इसके बाद मेजर आयर एक बड़ी सेना और तोपों सहित आरा किले में घिरे अंग्रेजों की सहायता के लिए बढ़ा।

2 अगस्त को आरा के बीबी गंज में आयर और कुंवर सिंह की सेनाओं के बीच संग्राम हुआ।

इस बार आयर विजयी हुआ।

उसने 14 अगस्त को जगदीश पुर के महल पर भी कब्जा कर लिया।

कुंवर सिंह 12 सौ सैनिकों व अपने महल की स्त्रियों को साथ लेकर जगदीश पुर से निकल गए।

उन्होंने दूसरे स्थान पर जाकर अंग्रेजों के साथ अपना बल आजमाने का निश्चय किया।

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   मिलमैन की पराजय

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  18 मार्च, 1858 को दूसरे क्रांतिकारियों के साथ कुंवर सिंह आजमगढ़ से 25 मील दूर अतरौलिया में डेरा डाला। 

मिलमैन के नेतृत्व में अंग्रेज सेना ने 22 मार्च 1858 को कुंवर सिंह से मुकाबला किया।मिलमैन हार कर भाग गया।

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    डेम्स की पराजय

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28 मार्च को कर्नल डेम्स के नेतृत्व में एक बड़ी सेना ने कुंवर सिंह पर हमला किया।

इस युद्ध में भी कुंवर सिंह विजयी रहे।

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   लार्ड केनिंग की घबराहट

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कुंवर सिंह ने आजमगढ़ पर कब्जा किया।

किले को दूसरों के लिए छोड़कर कुंवर सिंह बनारस की तरफ बढ़े।

लार्ड केनिंग उस समय इलाहाबाद में था।

इतिहासकार मालेसन लिखता है कि बनारस पर कुंवर सिंह की चढ़ाई की खबर सुन कर कैनिंग घबरा गया।

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लार्ड मार्क की पराजय

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  उन दिनों कंुवर सिंह जगदीश पुर से 100 मील दूर  बनारस के उत्तर थे।

लखनऊ से भागे कई क्रांतिकारी कुंवर सिंह की सेना में आ मिले।

लार्ड कैनिंग ने लार्ड मारकर को सेना और तोपों के साथ कुंवर ंिसंह से लड़ने के लिए भेजा।

6 अप्रैल को लार्ड मारकर की सेना और कुंवर सिंह की सेना में संग्राम हुआ।

किसी ने उस युद्ध का विवरण इन शब्दों में लिखा है,‘

उस दिन 81 साल का बूढ़ा कुंवर सिंह अपने सफेद घोड़े पर सवार ठीक घमासान लड़ाई के अंदर बिजली की तरह इधर से उधर लपकता हुआ दिखाई दे रहा था।’

अंततः लार्ड मारकर हार गया।

उसे अपनी तोपों सहित पीछे हटना पड़ा।

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लगर्ड की पराजय

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कुंवर सिंह की अगली लड़ाई सेनापति लगर्ड के नेतृत्व वाली सेना से हुई।

कई अंग्रेज अफसर व सैनिक मारे गए।

कंपनी की सेना पीछे हट गयी।

कुंवर सिंह गंगा नदी की तरफ बढ़े।वे जगदीश पुर लौटना चाहते थे।

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डगलस की पराजय

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एक अन्य सेनापति डगलस के अधीन सेना कुंवर सिंह से लड़ने के लिए आगे बढ़ी।

नघई नामक गांव के निकट डगलस और कुंवर सिंह की सेनाओं में संग्राम हुआ।

अंततः डगलस हार गया।

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कुंवर सिंह गंगा की तरफ बढ़े

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कुंवर सिंह अपनी सेना के साथ गंगा की ओर बढ़े।

कुंवर सिंह गंगा पार करने लगे।बीच गंगा में थे।

अंग्रेजी सेना ने उनका पीछा किया।

एक अंग्रेज सैनिक ने गोली चलाई।गोली  कुंवर सिंह को लगी।

गोली दाहिनी कलाई में लगी।

विष फैल जाने के डर से कुंवर सिंह ने बाएं हाथ से तलवार खींच कर अपने दाहिने हाथ को कुहनी पर से काट कर गंगा में फेंक दिया।

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जगदीश पुर में प्रवेश

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22 अप्रैल को कंुवर सिंह ने वापस जगदीश पुर में प्रवेश किया।

आरा की  अंग्रेजी सेना 23 अप्रैल को लीग्रंैड के अधीन जगदीश पुर पर हमला किया।

इस युद्ध में भी कुंवर सिंह विजयी रहे।

पर घायल कुंवर सिंह की 26 अप्रैल, 1858 को मृत्यु हो गयी।

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कुंवर सिंह का चरित्र

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इतिहास लेख के अनुसार ,

कुंवर सिंह का व्यक्तिगत चरित्र अत्यंत पवित्र था।

उनका जीवन परहेजकारी का था।

उनके राज में कोई मनुष्य इस डर से कि कुंवर सिंह देख न लंे, खुले तौर पर तंबाकू तक नहीं पीता था।

उनकी सारी प्रजा उनका बड़ा आदर करती थी और उनसे प्रेम करती थी।

युद्ध कौशल में वे अपने समय में अद्वितीय थे।

इतिहास लेखक होम्स ने लिखा है कि ‘‘उस बूढ़े राजपूत की,जो ब्रिटिश सत्ता के विरूद्ध इतनी बहादुरी और आन से लड़ा, 26 अप्रैल, 1858 को मृत्यु हुई।’’

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22 अप्रैल 25


 आज के दैनिक जागरण में मुर्शिदाबाद के बारे में एक खबर छपी है।उसका शीर्षक है--

‘‘मुर्शिदाबाद के दंगाइयों ने महिलाओं से कहा कि 

वे अपनी बेटियों को दुष्कर्म के लिए भेज दें।’’

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      सुरेंद्र किशोर

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  19 जनवरी, 1990 को कश्मीर में मस्जिदों के लाउड स्पीकरों के जरिए यह एलान किया गया--‘‘कश्मीरी पंडित काफिर हैं।उन्हें कश्मीर छोड़ना होगा।धर्म परिवर्तन या मरने के लिए तैयार हो जाओ।

जिन्हें कश्मीर छोड़ना है,वे अपनी महिलाओं को यहीं छोड़ कर जाएं।’’

ध्यान रहे कि करीब एक लाख हिन्दुओं ने उसके बाद कश्मीर छोड़ दिया।

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राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष विजया राहटकर ने मुर्शिदाबाद की ताजा घटना के बारे में हैरान करने वाली जानकारी दी।बताया कि कुछ महिलाओं से तो दंगाइयों ने यहां तक कहा कि वह अपनी बेटियों को दुष्कर्म के लिए भेज दें।

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चर्चित और मशहूर यू ट्यूबर मनीष कश्यप ने यह खबर दी है कि बिहार के किशनगंज और अररिया में यादवों की संख्या घट रही हैं

किशनगंज में यादव 14 प्रतिशत से घटकर 6 प्रतिशत रह गये हैं और अररिया में 12 प्रतिशत से घट कर 8 प्रतिशत रह गये।

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यानी,कश्मीर,मुर्शिदाबाद और किशनगंज होते हुए कब बिहार की मुख्य भूमि में यह मुगलयुगीन महा संकट पहुंच जाएगा,कुछ कहा नहीं जा सकता।

किसी दिन कोई आपके घर आए और कहे कि अपनी बेटी दे दो,तो आपको यही इच्छा होगी कि उसे गोली मार दी जाए।लेकिन आप सबके पास हथियार तो है नहीं।फिर क्या होगा ?

वही होगा जैसा कश्मीर ,मुर्शिदाबाद और बांग्ला देश में हो रहा है।मध्य युग में भी यही हुआ था।

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घातक हमले के विरुद्ध प्राइवेट प्रतिरक्षा के लिए हमारे देश में कानून मौजूद है।

भारतीय न्याय संहिता की धारा-44 में दृष्टांत के रूप में यह लिखा हुआ है,ध्यान से पढ़ लें--

‘‘क पर भीड़ द्वारा आक्रमण किया जाता है,जो भीड़ उसकी हत्या करने का प्रयत्न करती है।वह उस भीड़ पर गोली चलाये बिना प्राइवेट प्रतिरक्षा के अपने अधिकार का प्रयोग कार्य साधक के रूप में नहीं कर सकता और वह भीड़ में मिले हुए छोटे -छोटे बालको को अपहानि करने की जोखिम उठाए बिना  गोली नहीं चला सकता।

  यदि वह इस प्रकार गोली चलाने से उन बालकों में से किसी बालक को अपहानि करे तो क कोई अपराध नहीं करता।’’

  यह तो ठीक है कि आत्म रक्षा के लिए कानूनी प्रावधान उपलब्ध है।पर गोली चलाने के लिए गोली-बंदूक भी तो चाहिए।आज कितने लोगों के पास कारगर हथियार है ?

सरकार जल्दी राइफल -बंदूक का लाइसेंस देती ही नहीं।

नई परिस्थिति में सरकार कम से कम संवदेनशील इलाकों के लोगों को उदारतापूर्वक आग्नेयास्त्र का लाइसेंस दे या फिर कानून की किताब से इस धारा--44 को हटा दे।

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सभ्यताओं का संघर्ष तेज

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नब्बे के दशक में अमरीकी राजनीतिक वैज्ञानिक सैमुएल पी.हंटिंगटन की एक किताब आई थी।

उसका नाम है  ‘‘सभ्यताओं का संघर्ष’’।

उस पुस्तक के जरिए लेखक ने यह कहा था कि 

‘‘शीत युद्धोत्तर संसार में लोगों की सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान ही संघर्षों का मुख्य कारण होगी।’’

भारत और यूरोप सहित दुनिया के अनेक देशों में वैसा संघर्ष इन दिनों जारी है जिसकी कल्पना हंटिंगटन ने की थी।हाल के वर्षों में वैसा संघर्ष भारत में तो काफी सघन और तेज हो चुका है।

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और अंत में

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कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे को मुर्शिदाबाद जाना चाहिए था।नहीं गये । वहां जाने से उनके एकमात्र मुस्लिम 

 वोट बैंक के भी नाराज हो जाने का उन्हें खतरा महसूस हुआ होगा।उसके बदले कांग्रेस अध्यक्ष कल बक्सर(बिहार)में थे।

  टाइम्स आॅफ इंडिया ने कांग्रेस अध्यक्ष की यात्रा की जो खबर बनाई,उसका शीर्षक है--बक्सर में कांग्रेस अध्यक्ष का खाली कुर्सियों ने स्वागत किया।

कांग्रेस ही नहीं, किसी भी दल का अब कोई राजनीतिक भविष्य नहीं रहेगा जो मुर्शिदाबाद जैसी जघन्य घटनाओं का विरोध नहीं करेगा। मनीष कश्यप की खबर की सच्चाई की राजद जांच करे ,कोई कार्रवाई करे अन्यथा वोट बैंक खिसकते देर नहीं लगती।कभी कांग्रेस का मुख्य वोट बैंक ब्राह्मण वोट था।

अब क्या हाल है ?

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मंगलवार, 15 अप्रैल 2025

 कमजोर पंखोें से ऊंची 

उडान इसलिए !

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जिन दलों के सत्ता में आने की उम्मीद नहीं है,वे भी अधिक से अधिक सीटों पर अपने उम्मीदवार खड़ा करना चाहते हैं।

ऐसा इसलिए कि कम से कम टिकट के बदले उम्मीदवारों से 

भारी चंदा मिल सके।

वे पैसे ‘‘सूखे दिनों में’’ दल के या नेता के काम आएंगे।

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याद रहे कि बिहार के एक मजबूत दल ने सन 2020 के विधान सभा चुनाव का टिकट 50 लाख से 1 करोड़ रुपए तक चंदा लेकर दिया।

 वत्र्तमान के लिए एक करोड़ और पूर्व के लिए 50 लाख रुपए।

तब एक पूर्व विधायक से मैंने पूछा था-- चुनाव लड़ रहे हैं ?

उसने कहा था कि मेरे पास 50 लाख होते तो मैं जरुर लड़ता।

अपुष्ट खबर है कि इस बार उस दल ने रेट बढ़ाकर दुगुना कर दिया है।अन्य कुछ दलों का भी यही हाल है। 

महंगी का असर जो है !

सितंबर आते -आते शायद तीन गुना हो जाए ! 



 जेपी-लोहिया पर सी.आई.ए.का एजेंट होने 

का आरोप लगाना दिमागी दिवालियापन

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सुरेंद्र किशोर

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एक किताब का सहारा लेकर एक व्यक्ति ने हाल में लिख दिया कि जेपी और लोहिया सी.आई.ए.के एजेंट थे।

 जहां तक मेरी जानकारी है, इससे बड़ा झूठ कुछ और नहीं हो सकता।

किसने लिखा ,उनका नाम मैं यहां जानबूझ कर नहीं लिख रहा हूं।क्योंकि मैं किसी के साथ किसी विवाद में नहीं पड़ना चाहता।हालांकि सोशल मीडिया पर उनका नाम तैर रहा है।

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जेपी के बारे में

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जिस इंदिरा गांधी को जेपी ने 1977 में सत्ताच्युत किया,उन्होंने भी जेपी को सी.ए.आई.का एजेंट नहीं कहा।हां,जेपी की ओर इशारा करते हुए प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी ने इतना जरूर कहा था कि जो लोग पूंजीपतियों (जाहिर है कि उनका इशारा भारतीय पूंजीपतियों की ओर था।)के पैसों पर पलते हैं,उन्हें हमारी सरकार पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाने का कोई नैतिक हक नहीं है।

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जेपी ने उसके जवाब में बताया था कि मेरा निजी खर्च कैसे चलता है।जेपी के निजी आय-व्यय का पूरा विवरण तब की साप्ताहिक पत्रिका ‘एवरीमैन’ में छपा था।

मेगासेेसे अवार्ड के पैसों के सूद से जेपी का खर्च चलता था।गांव से अनाज आता था।कपड़े वगैरह उनके दोस्त बनवा देते थे।आदि आदि 

जेपी के निजी सचिव को रामनाथ गोयनका वेतन देते थे--कागज पर एक्सप्रेस का उन्हें पत्रकार बना कर।मैंने जेपी का जीवन स्तर करीब देखा था।

उतना बड़ा नेता सी.आई.ए.का एजेंट होता तो उसके जीवन स्तर पर भी उसकी झलक साफ दिखाई पड़ती।

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डा.राममनोहर लोहिया

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सन 1967 के आम चुनाव के बाद प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी ने

आई.बी.से इस बात की जांच करवाई थी कि चुनावों में किन -किन दलों और नेताओं को विदेशी धन मिले।

इंदिरा जी को शक था कि प्रतिपक्षी नेताओं ने विदेशी पैसों के बल पर ही कांग्रेस को सात राज्यों में चुनाव में हरा कर सत्ता से बाहर कर दिया।(याद रहे कि कुछ ही समय बाद मध्य प्रदेश और यू.पी.में दल बदल से कांग्रेस सरकार हटी थी।)

उधर आई.बी.की रिपोर्ट आ गई।पर वह रिपोर्ट कांग्रेस के लिए भी असुविधाजनक थी।विदेशी पैसा लेने वालों में कांग्रेसी नेताओं के भी नाम थे।

इसलिए रिपोर्ट को दबा दिया गया।

पर,न्यूयार्क टाइम्स ने उस रिपोर्ट को छाप दिया।सन 1967 में संभवतः अप्रैल या मई में उस रिपोर्ट पर संसद में भारी हंगामा हुआ।

उस हंगामें के बाद गृह मंत्री वाई.बी.चव्हाण ने संसद में कहा था कि ‘‘खुफिया ब्यूरो की उस रपट को सार्वजनिक करना उचित नहीं होगा।क्योंकि उससे इस देश के उन विभिन्न राजनीतिक दलों की बदनामी होगी जिन पर चुनाव के दौरान विदेशों से पैसे लेने की सूचना मिली है।’’

 रिपोर्ट में यह लिखा हुआ था--सी.आई.ए. ने कुछ दलों के नेताओं को धन दिया।के.जी.बी.ने कुछ अन्य दलों के लोगों को धन दिया।

कांग्रेस के नेताओं में से कुछ ने सी.आई.ए. और कुछ अन्य लोगों ने के.जी.बी.से पैसे लिये।सिर्फ एक राजनीतिक दल के किसी नेता ने किसी देश से कोई पैसा नहीं लिया,वह दल डा.लोहिया का था--यानी संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी।

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दरअसल शीत युद्ध के जमाने में इस देश के जो नेता व अन्य सी.आई.ए.से पैसे लेते थे,वे अपने विरोधी नेताओं के बारे में प्रचार करते थे कि वे के.जी.बी.से लेते हैं।

के.जी.बी.(मित्रोखिन पेपर्स में सब दर्ज है)से पैसे लेने वाले अपने राजनीतिक विरोधियों के खिलाफ यह प्रचार करते थे कि वे सी.आई.ए. से लेते हैं।

अरे भई, हर नियम का अपवाद भी होता है।

डा.लोहिया वही अपवाद थे।लोहिया के जीवन काल में उनके दल के किसी नेता को भी चाहते हुए भी विदेश से कोई पैसा लेने की हिम्मत ही नहीं थी।

लोहिया दो बार सांसद रहे--फिर भी अपनी निजी कार नहीं थी।

सी.आई.ए.अपने एजेंट को दिल्ली की सड़कों पर लोहिया की तरह पैदल चलने नहीं देता था।बल्कि साधन मुहैया करा देता था।

यहां तक कि साठ के दशक में इस देश के एक बडे़ औद्योगिक घराने के पे -रोल पर विभिन्न दलों के पंाच दर्जन 

सांसद थे।जाहिर है कि लोहिया उनमें भी शामिल नहीं थे।

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जिस सज्जन ने जेपी-लोहिया को बदनाम करने की कोशिश की है,उनसे एक आग्रह है--

अमेरिका के न्यूयार्क शहर में उनका कोई मित्र हो तो 1967 के उस न्यूयार्क टाइम्स की उस  खबर की फोटो काॅपी मंगवा लें।उसमें भारतीय एजेंट नेताओं के नाम मिल जाएंगे।

या फिर न्यूयार्क टाइम्स के नई दिल्ली ब्यूरो के प्रधान से संपर्क करें, शायद उनसे मदद मिले।

अस्सी के दशक में नई दिल्ली ब्यूरो के प्रमुख माइकल टी काॅफमैन पटना में मुझसे मिले थे।अब वे इस दुनिया में नहीं हैं।यदि होते तो मैं उनसे संपर्क कर सकता था।

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और अंत में 

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सही सूचनाओं के आधार पर कोई भी लेखक-पत्रकार किसी के खिलाफ सच बात लिखता है ,भले राजनीतिक दुराग्रह के तहत ही एकतरफा ही क्यों न लिखे, तो उसके लिए मेरे मन में आदर पैदा होता है।पर निराधार बातों से खुद लेखक की साख खराब होती है।उसकी किसी दूसरी सही बात पर भी शंका होने लगती है।

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सोमवार, 14 अप्रैल 2025

   एक शादी जिसकी चर्चा इतिहासकारों ने नहीं की

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बादशाह अकबर की पुत्री शहजादी खानम की शादी मेवाड़ के महाराणा प्रताप के पुत्र महाराजा अमर सिंह के साथ हुई थी।

ऐतिहासिक अभिलेखों में बहुत बारीकी से यह प्रसंग दर्ज है।

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आप इसे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस व वीकीपीडिया के जरिए भी आज भी जान सकते हैं।

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शुक्रवार, 11 अप्रैल 2025

 सरकारी दफ्तरों में लूट-भ्रष्टाचार-काहिली  के रहते

 निजी क्षेत्रों के विकास को रोका नहीं जा सकता।

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चीन  और रूस की कम्युनिस्ट सरकारें भी सरकारी 

भ्रष्टाचार को न रोक सकने के कारण आज निजी 

क्षेत्रों पर निर्भर हंै।

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सुरेंद्र किशोर

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भारत के पूर्व माओवादी यदि चाहें तो वे जनहित में अपने 

लिए एक अहिंसक रास्ता निकाल सकते हंै  

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अडाणी-अंबानी को लेकर मोदी सरकार के खिलाफ बहुत सारी बातें इन दिनों कही जाती हैं।

पर,वे तो कांग्रेसी शासन काल से ही फलते-फूलते रहे हैं।

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सन 2014 तक अडाणी समूह का व्यवसाय 44 हजार करोड़ रुपए का हो चुका था।स्वाभाविक है--‘मनी बीगेट्स मनी।’

 अंबानी समूह भी कांग्रेस शासन काल में हाईवे पर सिर्फ कोई ढाबा नहीं चला रहा था।

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जिस टाटा विमान सेवा का आजादी के तत्काल बाद नेहरू  सरकार ने राष्ट्रीयकरण किया था,उसे मौजूदा सरकार ने वापस कर दिया है।बल्कि वापस करना पड़ा।क्योंकि मनमोहन सरकार के दौर में अनावश्यक ढंग से बड़ी संख्या में विमानों की खरीद की गयी थी।ऐसी खरीद किस उद्देश्य से होती है,यह बात सब जानते हैं।नतीजतन सरकारी उपक्रम बैठ गया।

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कांग्रेसी सरकार ने कलकत्ता के ग्रेट ईस्टर्न होटल का राष्ट्रीयकरण किया था।दुनिया के 10 सबसे अच्छे होटलों में वह शुमार किया जाता था।

काहिली-कुप्रबंधन-भ्रष्टाचार के कारण वर्षों तक भारी घाटेे में रहने के कारण सी.पी.एम.सरकार ने उस होटल को निजी हाथों को बेच दिया।शासन में आने के बाद वाम मोर्चा सरकार ने बंगाल खासकर कलकत्ता के निजी उद्योगों को पहले बर्बाद किया।बाद में वाम मोर्चा सरकार ही निजी हाथों को देने के लिए नन्दी ग्राम आदि मेें किसानों से जमीन का अधिग्रहण करने लगी थी।

वाम मोर्चा सरकार के पतन का वह बड़ा कारण बना।पर,असली कारण यह था कि पश्चिम बंगाल के मुस्लिम मतदाताओं ने वाम को छोड़कर एकमुश्त ममता को पकड़ लिया।क्योंकि ममता का तुष्टीकरण बिना शर्त है जबकि वाम सरकार चाहती थी कि और जो करना हो, वे करें, पर जेहादी तत्व शासन तंत्र को निरर्थक न बना दें।

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जवाहरलाल-इंदिरा शासन काल में मैं भी एक राजनीतिक कार्यकर्ता था।हम सोशलिस्टों-कम्युनिस्टों का नारा था--

‘‘टाटा-बिड़ला की सरकार, नहीं चलेगी--नहीं चलेगी।’’

 ‘‘तब तक देश कंगाल है,जब तक बिड़ला-जवाहरलाल है।’’

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दरअसल सार्वजनिक क्षेत्रों में जब तक भ्रष्टाचार-काहिली का राज रहेगा,तब तक निजी क्षेत्रों पर निर्भरता बनी रहेगी,बढ़ती जाएगी।

चीन और रूस की कम्युनिस्ट सरकारों का भी निजी क्षेत्रों पर निर्भरता देखने लायक है।जबकि चीन में भ्रष्टाचार के लिए फांसी की सजा का प्रविधान है।भारत में तो अपवादों को छोड़ कर जो जितना अधिक भ्रष्ट -जातिवादी-साम्प्रदायिक है,उसके उतना ही अधिक प्रमोशन के चांस हंै।

चीन-रूस के अनुभव के बावजूद भारत के कम्युनिस्ट पिछली ही दुनिया में अब भी जी हैं।इसीलिए अप्रासांगिक होते जा रहे हैं। 

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एक ताजा अनुभव मेरा भी  

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कुछ महीने पहले मैं पटना के बी एस एन एल आॅफिस गया था। अपने मोबाइल के सिम का के.वाई.सी.कराना था।

करीब ढाई-तीन घंटे तक काउंटर के पास प्रतीक्षा करता रहा।काउंटर क्लर्क अपनी सीट से लगातार गायब था।

बगल के क्लर्क से बार-बार पूछता रहा--कब आएंगे ?

वह कहता रहा--बैठिए न, आते ही होंगे।

कुछ देर के लिए तो उस दिन सी.टी.ओ. के प्रेस रूम में जाकर बैठा जहां मेरे पत्रकार मित्र महेश बाबू और शत्रुघ्न जी मिले।

  जब तीन घंटे के बाद भी क्लर्क नहीं आया तो मैं लौट आया। बी.एस.एन.के सिम को एक निजी कंपनी के सिम में बदलवा दिया।ऐसे में,आप ही बताइए, निजी व्यवसायियों को बढ़ाने में कौन मदद कर रहा है ?

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निष्कर्ष

टाटा-बिड़ला-अंबानी-अडाणी की आलोचना करने वाले राजनीतिक और गैर राजनीतिक लोग पहले सरकारी दफ्तरों के भीषण भ्रष्टाचार-काहिली-अनुशासनहीनता  के खिलाफ डायरेक्ट एक्शन के लिए तैयार हों।एक साहसी समूह यह काम कर सकता है--पर उसे पहले अहिंसा अपनानी पड़ेगी।

पूर्व माओवादी-नक्सली लोग सरकारी दफ्तरों के भ्रष्ट लोगों के खिलाफ ‘स्टिंग आॅपरेशन ग्रूप’  बनाएं।

(झारखंड के बगोदर से माले विधायक दिवंगत महेंद्र प्रसाद सिंह सरकारी कर्मियों से लोगों से वसूले गए रिश्वत के पैसे जबरन वापस करवाते थे।वे कभी चुनाव नहीं हारे।) 

क्योंकि आज हमारी सरकार तभी कार्रवाई करती है जब स्ंिटग में कोई घूस लेते पकड़ा जाता है।

हालांकि सरकार जानती है कि उसके शायद ही किसी  आॅफिस का काम नजराना -शुकराना के बिना होता है।अपवादों की बात और है।

जो -जो भी घूस लेता है,वह कहता है कि मैं क्या करूं ?

मुझे तो ऊपर भी पहुंचाना पड़ता है।

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हथियारबंद माओवादियों से

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चीन में 1949 में और रूस में 1917 में कम्युनिस्ट इसलिए हथियारबंद क्रांति कर पाए क्योंकि तब वहां सरकारी तंत्र व सेना मजबूत नहीं थी।

आज भारतीय सेना -पुलिस-अर्ध सैनिक बल आपको सफल नहीं होेने देंगे।

इसलिए हिंसा छोड़ कर फिलहाल अहिंसक -आत्म बलिदानी स्टिंग दस्ते बनाइए।कोई आपको पीटता है तो मार खा लीजिए।पर उस भ्रष्ट का पीछा मत छोड़िए।

आपके कारण यदि सरकारी -गैर सरकारी भ्रष्टों की नानी मरने लगेगी तो आप जनता में यकायक बहुत लोकप्रिय हो जाएंगे।

(क्योंकि दूसरा कोई भी जनता की इस पीड़ा को आज नहीं समझ रहा है।उससे जजिया टैक्स की तरह वसूली हो रही है।)

स्टिंग वाले चुनाव जीत कर सत्ता भी पा सकते हैं।

यूं ही नौजवानों को बलि का बकरा बना देने से कोई लाभ नहीं होगा।

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अब माओवाद का पहले जैसा आकर्षण भी नहीं रहा।

कभी पश्चिम बंगाल के टाॅपर छात्र भी पढ़ाई छोड़ कर कम्युनिज्म लाने के लिए जान दे रहे थे।

अब वहां भी यह स्थिति नहीं है।

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एक बार बिहार के जंगल में माओवादी ट्रेंनिंग परेड को दिखाने के लिए पटना के कुछ संवाददाताओं को माओवादी बुिद्धजीवी  वहां ले गये थे।उनमें से एक संवाददाता ने लौट कर मुझे बताया कि यूनिफार्म पहन कर पटना का एक बड़ा पत्रकार वहां माओवादियों के साथ हथियार चलाने की ट्रेनिंग ले रहा था।

वह एक राष्ट्रीय अखबार का कार्यरत बिहार संवाददाता है।

उसके बारे में मैंने सोचा कि इतना बड़ा त्याग-खतरा देश के लिए !!

उसके प्रति सम्मान बढ़ गया।

वह मेरा भी दोस्त था।

मैं उसका विचार जानता था-पर, उसका ‘हथियार’ नहीं जानता था।

फिर सोचा--ना.. ना ।त्याग तो ठीक है,पर यह तो दिशा भ्रम है !

इतनी ताकतवर राज-शक्ति के सामने हथियारबंद कांति संभव नहीं।

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11 अप्रैल 25

       


गुरुवार, 10 अप्रैल 2025

 बिहार के एक गालीबाज नेता का शुक्र 

गुजार हूं जिसके कारण मैं अब टी.वी.

चैनल के लाइव डिबेट में शामिल नहीं होता।

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शुक्रगुजार इसलिए हूं क्योंकि उससे मेरा 

समय बचता है। उस समय में मैं कुछ अन्य

उपयोगी  काम कर पाता हूं।

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सुरेंद्र किशोर

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कुछ लोग कई बार मुझसे पूछते हैं कि आप टी.वी.

चैनलों के डिबेट्स में क्यों नहीं जाते ?

क्या चैनल वाले आपको नहीं पूछते ?

मैं उनसे कहता हंू कि चैनल वाले मुझ पर बहुत 

मेहरबान हैं।वे अक्सर पूछते रहते हैं।डिबेट में 

शामिल होने का आग्रह करते हैं।पर,मैं उनसे 

कह देता हूं कि मेरे पास समय नहीं है।

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पर,असली कारण कुछ और है।

कई साल पहले की बात है।एक चैनल के लाइव 

डिबेट में मैं शामिल हुआ था।

राजनीतिक चर्चा के दौरान बिहार के एक गाली बाज 

नेता ने मेरे खिलाफ ऐसी सड़क-छाप अशिष्ट टिप्पणी 

कर दी कि उसके बाद ही मैंने तय कर लिया कि मैं किसी डिबेट में शामिल 

नहीं होऊंगा।

दरअसल मेरे परिवार का एक सदस्य वह डिबेट देख रहा था।उसने मुझसे कहा कि आपके खिलाफ बोला तो हमें बहुत अपमान महसूस हुआ।जब आपकी कोई महत्वाकांक्षा नहीं है या किसी दल में आप नहीं हैं,कोई मजबूरी नहीं है तो क्यों अपनी और परिवार की प्रतिष्ठा दांव पर लगाने के लिए टी.वी.डिबेट में शामिल होते हैं ?

उसके बाद तो यह निश्चय करना ही था।

अब आप ही अनुमान लगाइए कि उस निश्चय से मुझे कितना लाभ हुआ होगा।दूसरे काम के लिए मेरा समय कितना बचता है।इसलिए मैं उस गालीबाज नेता का बहुत-बहुत शुक्रगुजार हूं।

उस नेता का नाम नहीं बताऊंगा अन्यथा वह मेरे घर में घुस कर भी मुझे अपमानित करने की ताकत रखता है।

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लगे हाथ राष्ट्रीय चैनलों पर इन दिनों  हो रहे डिबेट्स पर जरा ध्यान दीजिए।

आए दिन गाली-गलौज-,मारपीट की नौबत आ जाती है।

जो गेस्ट लोग उस जंगली व्यवहार में शामिल होते हैं,उन्हें शामिल होने की कोई मजबूरी होगी।या फिर उनके बाल-बच्चे उनसे यह नहीं कहते होंगे कि पापा,आपको जब टी.वी.डिबेट के दौरान कोई गाली देता है,अपमानित करता है या

मारने दौड़ता है तो हमें बहुुत अपमान महसूस होता है।

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और अंत में 

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लगता है कि अधिकतर टी.वी.चैनल वाले कई गाली बाज, असभ्य और अप्रासंगिक बातें करने के लिए कुख्यात गेस्ट को जानबूझ कर बुलाते हैं ताकि दर्शकों -श्रोताओं का मनोरंजन हो सके।चैनल की दर्शक-संख्या बढ़े।

पर,वे यह नहीं महसूस करते कि ऐसे अशिष्ट डिबेट्स से नई पीढ़ियों के मानस पर प्रतिकूल असर पड़ता है, ठीक उसी तरह जिस तरह अनेक सांसदों के सदन में लगातार असंसदीय व्यवहार से आम लोगों की राजनीति के प्रति घृणा बढ़ती जाती है।

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6 अप्रैल 25



मंगलवार, 8 अप्रैल 2025

 ऐसे मारी जाती है अपने

ही पैरों पर कुल्हाड़ी

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सुरेंद्र किशोर

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           1

 आरक्षण आंदोलन के दिनों मंडल आरक्षण के विरोधियों से मैं  कहा करता था कि आरक्षण का विरोध मत करो।

यह उनका संवैधानिक हक है।

‘‘गज नहीं फाड़ोगे तो थान हारना पड़ेगा।’’

नहीं माने।

थान हारना पड़ा।

 ‘थान-गज’ वाली मेरी उक्ति को कांग्रेस के पूर्व विधायक हरखू झा आज भी यदा कदा याद करते हैं।

मंडल आरक्षण के विरोध का नतीजा यह हुआ कि वर्षों तक 

बिहार को पटना हाईकोर्ट के अनुसार ‘जंगल राज ’ झेलना पड़ा।साथ ही,यह तर्क हावी रहा कि ‘‘विकास से वोट नहीं मिलते बल्कि सामाजिक समीकरण से वोट मिलते हंै।’’नतीजतन बिहार का विकास रुका।

इतना ही नहीं, बिहार में आज भी किसी सवर्ण के मुख्य मंत्री बनने का कोई चांस दूर -दूर तक दिखाई नहीं पड़ रहा।

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      2 

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नब्बे के दशक में मैं कम्युनिस्टों से सवाल पूछता था-

आप लोग खुद तो व्यक्तिगत रुप से ईमानदार हैं।फिर भी आप भ्रष्ट-जातिवादी राजनीतिक तत्वों का समर्थन क्यों करते हैं ?

 ऐसे में तो आपका एक दिन ‘‘धृतराष्ट्र आलिंगन’’ हो जाएगा।

उसके जवाब में कम्युनिस्ट कहा करते थे कि ‘‘हम साम्प्रदायिक तत्वों यानी भाजपा को सत्ता में आने से रोकने के लिए ऐसा कर रहे हैं।’’

क्या वे भाजपा को सत्ता में आने से रोक सके ?

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            3

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आज के कई राजनीतिक दल एक खास धर्म के

बीच के अतिवादी तत्वों की तो सख्त आलोचना करते हैं, किंतु दूसरे खास धर्म के बीच के अतिवादी तत्वों को बढ़ावा देते हैं।वोट के लिए उनसे साठगांठ करते हैं।

ऐसा क्यों करते हो भाई ?

वे जवाब देते हैं--एक खास धर्म की साम्प्रदायिकता दूसरे खास धर्म की साम्प्रदायिकता की अपेक्षा देश के लिए अधिक खतरनाक है।

 मेरा उनसे कहना होता है--सभी धर्मांे के बीच के अतिवादी तत्वों का एक साथ समान रूप से विरोध नहीं करोगे तो  एक दिन तुम्हारा दल खुद एक दिन बर्बाद हो जाएगा। अस्तित्व तक नहीं बचेगा।

पर,वे नहीं मानते।

नतीजतन कई तथाकथित धर्म निरपेक्ष राजनीतिक दल देश में धीरे -धीरे सिकुड़ते जा रहे हैं।अभी वे और भी सिकुड़ेंगे।

अब उनका अस्तित्व सिर्फ उन्हीं इलाकों में बना रहेगा जहां के मुस्लिम मतदाता उन्हें चुनाव जितवाने के लिए निर्णायक स्थिति में हैं।

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8 अप्रैल 25


सोमवार, 7 अप्रैल 2025

 बिहार के एक गालीबाज नेता का शुक्र 

गुजार हूं जिसके कारण मैं अब टी.वी.

चैनल के लाइव डिबेट में शामिल नहीं होता।

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शुक्रगुजार इसलिए हूं क्योंकि उससे मेरा 

समय बचता है। उस समय में मैं कुछ अन्य

उपयोगी  काम कर पाता हूं।

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सुरेंद्र किशोर

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कुछ लोग कई बार मुझसे पूछते हैं कि आप टी.वी.

चैनलों के डिबेट्स में क्यों नहीं जाते ?

क्या चैनल वाले आपको नहीं पूछते ?

मैं उनसे कहता हंू कि चैनल वाले मुझ पर बहुत 

मेहरबान हैं।वे अक्सर पूछते रहते हैं।डिबेट में 

शामिल होने का आग्रह करते हैं।पर,मैं उनसे 

कह देता हूं कि मेरे पास समय नहीं है।

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पर,असली कारण कुछ और है।

कई साल पहले की बात है।एक चैनल के लाइव 

डिबेट में मैं शामिल हुआ था।

राजनीतिक चर्चा के दौरान बिहार के एक गाली बाज 

नेता ने मेरे खिलाफ ऐसी सड़क-छाप अशिष्ट टिप्पणी 

कर दी कि उसके बाद ही मैंने तय कर लिया कि मैं किसी डिबेट में शामिल 

नहीं होऊंगा।

दरअसल मेरे परिवार का एक सदस्य वह डिबेट देख रहा था।उसने मुझसे कहा कि आपके खिलाफ बोला तो हमें बहुत अपमान महसूस हुआ।जब आपकी कोई महत्वाकांक्षा नहीं है या किसी दल में आप नहीं हैं,कोई मजबूरी नहीं है तो क्यों अपनी और परिवार की प्रतिष्ठा दांव पर लगाने के लिए टी.वी.डिबेट में शामिल होते हैं ?

उसके बाद तो यह निश्चय करना ही था।

अब आप ही अनुमान लगाइए कि उस निश्चय से मुझे कितना लाभ हुआ होगा।दूसरे काम के लिए मेरा समय कितना बचता है।इसलिए मैं उस गालीबाज नेता का बहुत-बहुत शुक्रगुजार हूं।

उस नेता का नाम नहीं बताऊंगा अन्यथा वह मेरे घर में घुस कर भी मुझे अपमानित करने की ताकत रखता है।

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लगे हाथ राष्ट्रीय चैनलों पर इन दिनों  हो रहे डिबेट्स पर जरा ध्यान दीजिए।

आए दिन गाली-गलौज-,मारपीट की नौबत आ जाती है।

जो गेस्ट लोग उस जंगली व्यवहार में शामिल होते हैं,उन्हें शामिल होने की कोई मजबूरी होगी।या फिर उनके बाल-बच्चे उनसे यह नहीं कहते होंगे कि पापा,आपको जब टी.वी.डिबेट के दौरान कोई गाली देता है,अपमानित करता है या

मारने दौड़ता है तो हमें बहुुत अपमान महसूस होता है।

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और अंत में 

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लगता है कि अधिकतर टी.वी.चैनल वाले कई गाली बाज, असभ्य और अप्रासंगिक बातें करने के लिए कुख्यात गेस्ट को जानबूझ कर बुलाते हैं ताकि दर्शकों -श्रोताओं का मनोरंजन हो सके।चैनल की दर्शक-संख्या बढ़े।

पर,वे यह नहीं महसूस करते कि ऐसे अशिष्ट डिबेट्स से नई पीढ़ियों के मानस पर प्रतिकूल असर पड़ता है, ठीक उसी तरह जिस तरह अनेक सांसदों के सदन में लगातार असंसदीय व्यवहार से आम लोगों की राजनीति के प्रति घृणा बढ़ती जाती है।

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6 अप्रैल 25



शनिवार, 5 अप्रैल 2025

 रामानन्द तिवारी की पुण्य तिथि पर

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(1906--1980)

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बिहार के गृह मंत्री रहे रामानन्द तिवारी दूध 

बेच कर परिवार चलाते थे

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‘द हिन्दू’ के पटना स्थित विशेष संवाददाता रमेश उपाध्याय ने अपने अखबार में लिखा था कि पूर्व कैबिनेट मंत्री रामानन्द तिवारी दूध बेच कर परिवार चला रहे हैं। 

खैर,इन पंक्तियों का लेखक तो इस बात का खुद गवाह ही है कि तिवारी जी की गाय के दूध का एक हिस्सा उनके पड़ोसी(आर.ब्लाॅक,पटना)व कांग्रेस एम.एल.सी.कुमार झा के घर जाता था।

मैं अक्सर तिवारी के आवास के बरामदे में बैठकर उनकी बातें सुना करता था।

  उन्हीं दिनों एक दिन जो बातें मैंने सुनीं ,उसके बाद तिवारी जी के प्रति मेरा आदर काफी बढ़ गया।

वह बातचीत तब के संसोपा विधायक वीर सिंह (चनपटिया-1969-72)और तिवारी जी के बीच हो रही थी।

 पहले इसकी पृष्ठभूमि बता दूं।

सन् 1970 के सितंबर की घटना है।रामानन्द तिवारी के नेतृत्व में समाजवादियों ने भूमि संघर्ष के सिलसिले में चंपारण जिले के लालगढ़ फार्म पर सत्याग्रह किया था। पर, पुलिस बल की मौजूदगी में लठैतों की क्रूर जमात ने सत्याग्रहियों पर हमला कर दिया। मझौलिया चीनी मिल के मालिक की इस (हदबंदी से फाजिल)जमीन पर अहिंसक सत्याग्रह के सिलसिले में रामानन्द तिवारी पर जानलेवा हमला किया गया। कुछ सत्याग्रहियों ने यदि तिवारी जी को अपने शरीर से ढंक नहीं लिया होता तो उनकी मौत निश्चित थी। उनको बचाने के सिलसिले में रोगी महतो की जान चली गई और कई कार्यकर्ता घायल हो गये। खुद रामानन्द तिवारी को विमान से बेतिया अस्पताल से पटना पहंुचाया गया जहां उन्हें इलाज के लिए लंबे समय तक अस्पताल में रहना पड़ा।

   वीर सिंह, रोगी महतो हत्याकांड के मुकदमे में समझौता कर लेने का आग्रह तिवारी जी से उस दिन कर रहे थे। वीर सिंह की बातें सुनकर तिवारी जी की आंखों में आंसू आ गये। उन्होंने रुंधे गले से भोजपुरी में कहा कि ‘हम रोगी महतो के लास पर सउदा ना करब।’ वीर सिंह मन मसोस कर चले गये।

   उस सत्याग्रह पर क्रूर हिंसा का वर्णन साप्ताहिक ‘दिनमान’ ने तब बड़े मार्मिक ढंग से किया था। बुरी तरह घायल तिवारी जी ने अस्पताल में कराहती आवाज में संवाददाता से कहा था, ‘सात तारीख के सात बजे सुबह लालगढ़ फारम में पहुंचली। करीब पांच -छह हजार आदमी साथ में रहन। तीन गो हल, 10-15 कुदाल, 25-30 खुरपी आउर दू अढ़ाई सौ महिला। लोग के समझा देनी कि पत्थर -ढेला लेके ना चले के चाहीं। हिनसा न करे के होई। नहीं तो हम अपन पथ से भटक जायब। हिनसा से समाज बदली ना। अगर बदली भी तो जे हिंसा के नेता होला ओकर कलपना हिंसा से पूरा ना होला। गांधी जी इहे चंपारण में सत्याग्रह किये थे और गांधी जी के रास्ता से ही समाज बदली।’

   तिवारी जी ने कहा कि ‘फार्म पूर्व-पश्चिम लंबा था। पूर्व में भी ईंख और पश्चिम में भी ईंख लगी थी। बीचों-बीच कोई 50-60 बीघा जमीन परती थी। हम हल ले के खेत में चले। हमारे पीछे दो हल और था। अन्य सत्याग्रही मर्द - औरत कुदाल -खुरपी से खेत कोड़ने लगे। हमसे दक्षिण उत्तर की तरफ बीस -पच्चीस आदमी करीब दो सौ गज की दूरी पर लाठी, भाला और गंड़ासा लेकर खड़े थे। पुलिस के लोग भी थे।

हल चलने लगा तो पुलिस कोई बीस कदम की दूरी पर आकर खड़ी हो गई और तभी सीटी की आवाज आई। ईंख के खेत से चालीस- पचास आदमी मारो-मारो कहते हुए निकले। हम लोग अपने लोगों को न भागने को कहते हुए और आगे बढ़ गये। मुझको पहली लाठी दायें कंधे पर, दूसरी दायें पैर पर और तीसरी बायें हाथ पर लगी। मैं बेहोश होकर गिर पड़ा। मुझको नंद लाल, लक्ष्मण कलीम हुदा आदि कार्यकर्ताओं ने ढांप लिया। और बाद में पता चला कि एक फरसा मेरे सिर पर भी मारा था।’

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 तिवारी जी का जन्म उन्हीं के शब्दों में ‘एक कंगाल द्विज’ के घर हुआ था।

वे बिहार के अविभाजित शाहाबाद जिले के मूल निवासी थे।

  उनके होश सम्भालने से पहले ही उन पर से पिता का साया उठ गया।

  उनकी मां ने किसी तरह उन्हें बड़ा किया।

  पहले तो तिवारी जी रोजी-रोटी की तलाश में कलकत्ता गये।

   पर, उन्हें वहां काफी कष्ट उठाना पड़ा तो  वे लौट आये। 

  उन्हें हाॅकर, पानी पांड़े और कूक के भी काम करने पड़े। 

  वे पुलिस में भर्ती हो गये।

  सन 1942 में महात्मा गांधी के आह्वान पर आजादी की लड़ाई में शामिल हो गये।

  उन्होंने अपने कुछ साथी सिपाहियों को संगठित किया और आजादी के सिपाहियों पर गोली चलाने से इनकार कर दिया।

  तिवारी जी गिरफ्तार कर लिये गये।

  हजारीबाग जेल भेज दिये गये।

   जेल में उनकी जयप्रकाश नारायण से मुलाकात  हुई।

  जेपी से प्रभावित होने की घटना के बारे में तिवारी जी ने एक बार इन पंक्तियों के लेखक को बताया था। उन्होंने कहा कि दूसरे बड़े नेता जेल में अलग खाना बनवाते थे।

  पर, जेपी जेल में अपने साथियों के साथ ही खाते और रहते थे।

  इसी बात ने तिवारी जी को जेपी की ओर मुखातिब किया और वे भी समाजवादी बन गये।जेपी कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के संस्थापकों में थे।

  आजादी के बाद सन 1952 के चुनाव में ही तिवारी जी शाह पुर से समाजवादी पार्टी के विधायक बन गये।वे लगातार सन 1972 के प्रारंभ तक विधायक रहे।

सन 1972 में वे हार गये। सन 1977 में वे बक्सर से 

जनता पार्टी के सांसद बने ।

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  जेपी आंदोलन के समय का एक प्रेस कांफ्रेंस मुझे याद है।रामानंद तिवारी ने पटना के मजहरूल हक पथ स्थित पिं्रस होटल में संवाददाता सम्मेलन बुलाया था।

मैं भी उस प्रेस सम्मेलन में शामिल था।

  उसमें एक बड़े दैनिक अखबार के संवाददाता ने,जो जाति से ब्राह्मण था,तिवारी जी से एक असामान्य सवाल कर दिया।

  उसने कहा कि ‘‘तिवारी जी, आप भी ब्राह्मण हैं,इंदिरा जी भी ब्राह्मण हैं।आप अपनी ही जाति के प्रधान मंत्री के खिलाफ आंदोलन क्यों कर रहे हैं ?’’

तिवारी जी देर किए बिना जवाब दिया, ‘‘बाचा, तू पत्तरकारिता करत बाड़, खाली उहे कर।रजनीति मत कर।’’

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 तिवारी जी छोटे- छोटे समाजवादी कार्यकर्ताओं को भी चिट्ठियां लिखा करते थे।

साठ-सत्तर के दशकों में मैं भी संसोपा कार्यकर्ता था।

उन दिनों सारण जिला स्थित अपने गांव में ही आम तौर पर मैं रहता था।

कभी -कभी पटना भी आया करता था।

पार्टी के राष्ट्रीय और प्रादेशिक सम्मेलनों में जरूर जाया करता था।

मासिक पत्रिका ‘जन’ और साप्ताहिक ‘दिनमान’ आदि में मेरी चिट्ठियां प्रकाशित हुआ करती थीं।दिनमान में पत्र छप जाना भी तब बड़ी बात मानी जाती थी।

उन दिनों के समाजवादी नेताओं  और कार्यकर्ताओं में पढ़ने -लिखने वाले लोग अधिक होते थे।

इसलिए देश-प्रदेश  के अनेक नेता व कार्यकर्ता मुझे जानते थे।

इस पृष्ठभूमि में रामानंद तिवारी जी ने मुझे मेरे गांव के पते पर एक चिट्ठी लिखी।वह पोस्टकार्ड था।

 उसमें तिवारी जी ने मुझे अन्य बातों के अलावा यह भी लिख दिया था कि ‘‘सुरेंद्र,मैं तुम्हें शिवानंद से भी अधिक प्यार करता हूं।’’

मेरे बाबू जी ने वह चिट्ठी पढ़ ली।

बाबू जी ने मेरी मां से भोजपुरी में कहा,‘‘ देखीं, इ कतना करम जरू बा।

तेवारी जी एकरा के बेटा अइसन मानलन।

इ उनका से कहीत त एकरा के चपरासियो में नौकरी ने लगवा देतन !’’

दरअसल तिवारी जी कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ाने तथा उनसे अपनापन बनाये रखने के लिए वैसा पत्र लिखते रहते थे।

मैं तब जिस स्तर का कार्यकर्ता था,उस स्तर के आज के कार्यकर्ताओं को आज के बड़े नेता चिट्ठियां भी लिखते हैं,यह मुझे नहीं मालूम।    

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और अंत में

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  सन 1972-73 में मैं कर्पूरी ठाकुर का निजी सचिव था।पर,मैं पत्रकारिता में जाना चाहता था।(कर्पूरी जी मेरी कोई नाराजगी नहीं हुई थी।न उनकी मुझसे हुई थी।बस मैं अपना काम बदलना चाहता था।)

मुख्य धारा की पत्रकारिता में मेरा सीधा प्रवेश कई कारणों से तब एकबारगी संभव नहीं था।इसलिए समाजवादी आंदोलन से जुड़ी पत्रिकाओं के जरिए मुख्य धारा में जाना चाहता था।उन्हीं दिनों तिवारी जी ने पटना के नया टोला से साप्ताहिक ‘जनता’ का प्रकाशन फिर से  करवाया।उसमें तिवारी जी ने मुझे बुलाकर सहायक संपादक बनाया।

बाद में जब संपादक ने मुझे हटाने की कोशिश की तो तिवारी जी उस बात के लिए राजी नहीं हुए।यानी तिवारी जी के कारण मेरी नौकरी बच गई थी।

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5 अप्रैल 25