शुक्रवार, 11 अप्रैल 2025

 सरकारी दफ्तरों में लूट-भ्रष्टाचार-काहिली  के रहते

 निजी क्षेत्रों के विकास को रोका नहीं जा सकता।

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चीन  और रूस की कम्युनिस्ट सरकारें भी सरकारी 

भ्रष्टाचार को न रोक सकने के कारण आज निजी 

क्षेत्रों पर निर्भर हंै।

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सुरेंद्र किशोर

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भारत के पूर्व माओवादी यदि चाहें तो वे जनहित में अपने 

लिए एक अहिंसक रास्ता निकाल सकते हंै  

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अडाणी-अंबानी को लेकर मोदी सरकार के खिलाफ बहुत सारी बातें इन दिनों कही जाती हैं।

पर,वे तो कांग्रेसी शासन काल से ही फलते-फूलते रहे हैं।

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सन 2014 तक अडाणी समूह का व्यवसाय 44 हजार करोड़ रुपए का हो चुका था।स्वाभाविक है--‘मनी बीगेट्स मनी।’

 अंबानी समूह भी कांग्रेस शासन काल में हाईवे पर सिर्फ कोई ढाबा नहीं चला रहा था।

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जिस टाटा विमान सेवा का आजादी के तत्काल बाद नेहरू  सरकार ने राष्ट्रीयकरण किया था,उसे मौजूदा सरकार ने वापस कर दिया है।बल्कि वापस करना पड़ा।क्योंकि मनमोहन सरकार के दौर में अनावश्यक ढंग से बड़ी संख्या में विमानों की खरीद की गयी थी।ऐसी खरीद किस उद्देश्य से होती है,यह बात सब जानते हैं।नतीजतन सरकारी उपक्रम बैठ गया।

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कांग्रेसी सरकार ने कलकत्ता के ग्रेट ईस्टर्न होटल का राष्ट्रीयकरण किया था।दुनिया के 10 सबसे अच्छे होटलों में वह शुमार किया जाता था।

काहिली-कुप्रबंधन-भ्रष्टाचार के कारण वर्षों तक भारी घाटेे में रहने के कारण सी.पी.एम.सरकार ने उस होटल को निजी हाथों को बेच दिया।शासन में आने के बाद वाम मोर्चा सरकार ने बंगाल खासकर कलकत्ता के निजी उद्योगों को पहले बर्बाद किया।बाद में वाम मोर्चा सरकार ही निजी हाथों को देने के लिए नन्दी ग्राम आदि मेें किसानों से जमीन का अधिग्रहण करने लगी थी।

वाम मोर्चा सरकार के पतन का वह बड़ा कारण बना।पर,असली कारण यह था कि पश्चिम बंगाल के मुस्लिम मतदाताओं ने वाम को छोड़कर एकमुश्त ममता को पकड़ लिया।क्योंकि ममता का तुष्टीकरण बिना शर्त है जबकि वाम सरकार चाहती थी कि और जो करना हो, वे करें, पर जेहादी तत्व शासन तंत्र को निरर्थक न बना दें।

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जवाहरलाल-इंदिरा शासन काल में मैं भी एक राजनीतिक कार्यकर्ता था।हम सोशलिस्टों-कम्युनिस्टों का नारा था--

‘‘टाटा-बिड़ला की सरकार, नहीं चलेगी--नहीं चलेगी।’’

 ‘‘तब तक देश कंगाल है,जब तक बिड़ला-जवाहरलाल है।’’

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दरअसल सार्वजनिक क्षेत्रों में जब तक भ्रष्टाचार-काहिली का राज रहेगा,तब तक निजी क्षेत्रों पर निर्भरता बनी रहेगी,बढ़ती जाएगी।

चीन और रूस की कम्युनिस्ट सरकारों का भी निजी क्षेत्रों पर निर्भरता देखने लायक है।जबकि चीन में भ्रष्टाचार के लिए फांसी की सजा का प्रविधान है।भारत में तो अपवादों को छोड़ कर जो जितना अधिक भ्रष्ट -जातिवादी-साम्प्रदायिक है,उसके उतना ही अधिक प्रमोशन के चांस हंै।

चीन-रूस के अनुभव के बावजूद भारत के कम्युनिस्ट पिछली ही दुनिया में अब भी जी हैं।इसीलिए अप्रासांगिक होते जा रहे हैं। 

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एक ताजा अनुभव मेरा भी  

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कुछ महीने पहले मैं पटना के बी एस एन एल आॅफिस गया था। अपने मोबाइल के सिम का के.वाई.सी.कराना था।

करीब ढाई-तीन घंटे तक काउंटर के पास प्रतीक्षा करता रहा।काउंटर क्लर्क अपनी सीट से लगातार गायब था।

बगल के क्लर्क से बार-बार पूछता रहा--कब आएंगे ?

वह कहता रहा--बैठिए न, आते ही होंगे।

कुछ देर के लिए तो उस दिन सी.टी.ओ. के प्रेस रूम में जाकर बैठा जहां मेरे पत्रकार मित्र महेश बाबू और शत्रुघ्न जी मिले।

  जब तीन घंटे के बाद भी क्लर्क नहीं आया तो मैं लौट आया। बी.एस.एन.के सिम को एक निजी कंपनी के सिम में बदलवा दिया।ऐसे में,आप ही बताइए, निजी व्यवसायियों को बढ़ाने में कौन मदद कर रहा है ?

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निष्कर्ष

टाटा-बिड़ला-अंबानी-अडाणी की आलोचना करने वाले राजनीतिक और गैर राजनीतिक लोग पहले सरकारी दफ्तरों के भीषण भ्रष्टाचार-काहिली-अनुशासनहीनता  के खिलाफ डायरेक्ट एक्शन के लिए तैयार हों।एक साहसी समूह यह काम कर सकता है--पर उसे पहले अहिंसा अपनानी पड़ेगी।

पूर्व माओवादी-नक्सली लोग सरकारी दफ्तरों के भ्रष्ट लोगों के खिलाफ ‘स्टिंग आॅपरेशन ग्रूप’  बनाएं।

(झारखंड के बगोदर से माले विधायक दिवंगत महेंद्र प्रसाद सिंह सरकारी कर्मियों से लोगों से वसूले गए रिश्वत के पैसे जबरन वापस करवाते थे।वे कभी चुनाव नहीं हारे।) 

क्योंकि आज हमारी सरकार तभी कार्रवाई करती है जब स्ंिटग में कोई घूस लेते पकड़ा जाता है।

हालांकि सरकार जानती है कि उसके शायद ही किसी  आॅफिस का काम नजराना -शुकराना के बिना होता है।अपवादों की बात और है।

जो -जो भी घूस लेता है,वह कहता है कि मैं क्या करूं ?

मुझे तो ऊपर भी पहुंचाना पड़ता है।

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हथियारबंद माओवादियों से

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चीन में 1949 में और रूस में 1917 में कम्युनिस्ट इसलिए हथियारबंद क्रांति कर पाए क्योंकि तब वहां सरकारी तंत्र व सेना मजबूत नहीं थी।

आज भारतीय सेना -पुलिस-अर्ध सैनिक बल आपको सफल नहीं होेने देंगे।

इसलिए हिंसा छोड़ कर फिलहाल अहिंसक -आत्म बलिदानी स्टिंग दस्ते बनाइए।कोई आपको पीटता है तो मार खा लीजिए।पर उस भ्रष्ट का पीछा मत छोड़िए।

आपके कारण यदि सरकारी -गैर सरकारी भ्रष्टों की नानी मरने लगेगी तो आप जनता में यकायक बहुत लोकप्रिय हो जाएंगे।

(क्योंकि दूसरा कोई भी जनता की इस पीड़ा को आज नहीं समझ रहा है।उससे जजिया टैक्स की तरह वसूली हो रही है।)

स्टिंग वाले चुनाव जीत कर सत्ता भी पा सकते हैं।

यूं ही नौजवानों को बलि का बकरा बना देने से कोई लाभ नहीं होगा।

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अब माओवाद का पहले जैसा आकर्षण भी नहीं रहा।

कभी पश्चिम बंगाल के टाॅपर छात्र भी पढ़ाई छोड़ कर कम्युनिज्म लाने के लिए जान दे रहे थे।

अब वहां भी यह स्थिति नहीं है।

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एक बार बिहार के जंगल में माओवादी ट्रेंनिंग परेड को दिखाने के लिए पटना के कुछ संवाददाताओं को माओवादी बुिद्धजीवी  वहां ले गये थे।उनमें से एक संवाददाता ने लौट कर मुझे बताया कि यूनिफार्म पहन कर पटना का एक बड़ा पत्रकार वहां माओवादियों के साथ हथियार चलाने की ट्रेनिंग ले रहा था।

वह एक राष्ट्रीय अखबार का कार्यरत बिहार संवाददाता है।

उसके बारे में मैंने सोचा कि इतना बड़ा त्याग-खतरा देश के लिए !!

उसके प्रति सम्मान बढ़ गया।

वह मेरा भी दोस्त था।

मैं उसका विचार जानता था-पर, उसका ‘हथियार’ नहीं जानता था।

फिर सोचा--ना.. ना ।त्याग तो ठीक है,पर यह तो दिशा भ्रम है !

इतनी ताकतवर राज-शक्ति के सामने हथियारबंद कांति संभव नहीं।

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11 अप्रैल 25

       


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