अपनी पहली पुस्तक पूरी कर लेेने के बाद अपनी
संस्मरणात्मक(राजनीतिक जीवन और पत्रकारिता
काल के संस्मरण) पुस्तक की तैयारी में लगा हूं।
उसकी एक झलक यहां पेश है--
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निर्भीक पत्रकारिता यानी तलवार
की धार पर चलना
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सुरेंद्र किशोर
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बिहार से एक केंद्रीय मंत्री के बारे में मैंने कुछ लिखा था।
उन्हें बहुत खराब लगा।मेरी बात झूठी होती तो वे मानहानि का केस कर सकते थे।पर,उन्होंने दूसरा रास्ता अपनाया।
उनके एक आदमी ने मुझे फोन किया और कहा--
‘‘जिस तरह हमने रियाज अजीमाबादी (ब्लिट्ज संवाददाताता)को रेप केस में फंसाया था,
तुम्हें भी फंसा दूंगा।’’
उसके बाद मेरी पत्नी को भी फोन किया।
कहा कि मुझे मालूम है कि आपके बच्चे कहां पढ़ने जाते हैं।आपको भी मैं उठवा लूंगा।
मेरी पत्नी बोल्ड है।बोली --गाड़ी लेकर आ जाइए,मैं तब तक तैयार हो जाती हूं।
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धमकियां तो हमें मिलती रहती थी,पर रेप की धमकी पर मैं सचमुच डर गया।
क्यांेकि रेप के आरोप को अधिकतर लोग सच मानने के लिए तैयार बैठे रहते हैं।
मैंने डी.जी.पी को पत्र लिखा।धमकी का पूरा विवरण लिखा।जांच और कार्रवाई की मांग की।
डी.जी.पी.ने कार्रवाई शुरू भी कर दी।आरोपी घबरा गया।
पुलिस से भागने लगा।
मुख्य मंत्री तक बात पहुंची।
मुख्य मंत्री ने डी.जी.पी.को समझा दिया--अरे, वह झूठ लिखता रहता है।
इस केस को खत्म कीजिए।
केस खत्म हो गया।मुख्य मंत्री मेरे स्वजातीय ही थे।
पर,उन्हें अपनी गद्दी प्यारी थी।
जाति और गद्दी में चुनना हो तो नेता क्या चुनेंगे ?
फिर पत्रकार क्या होता है ?
उसकी औकात ही क्या है ?
अस्सी के दशक के एक मुख्य मंत्री पत्रकारों के बारे में कहा करते थे-‘‘दो कौड़ी के लोग !’’
मेरे मामले में भी एक वरीय पत्रकार के साथ हो रहे अपराध की चिंता मुख्य मंत्री को कत्तई नहीं थी।
क्योंकि वह केंद्रीय मंत्री प्रधान मंत्री का बहुत करीबी था।मुख्य मंत्री को लगा होगा कि
वह मेरी कुर्सी हिला सकता है।
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27 अप्रैल 25
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पुनश्चः
बेचारा रियाज अजीमाबादी !
मेरा दोस्त भी था।अब इस दुनिया में नहीं रहा।
बाद में तो इंडियन एक्सप्रेस के पटना आॅफिस में सर्कुलेशन का काम देखता था।उन दिनों मैं जनसत्ता में था।
जब उस पर रेप केस हुआ होगा,तब उसके परिवार व खुद उसको कितनी पीड़ा हुई होगी ?
मुझसे उम्र में छोटा था।जब वह इस दुनिया से उठा तो उस समय उसकी उम्र बहुत नहीं थी।क्या रेप केस की पीड़ा ने भी उसकी आयु कम कर दी थी ?
पता नहीं।
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27 अपैल 25
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