भारतीय राजनीति का सफर-जनसेवा से
‘व्यापार’ होते हुए ‘उद्योग’ तक का !!
--------------
(अपवाद स्वरूप अब भी राजनीति में सेवा भाव वाले नेता-कार्यकर्ता मौजूद हैं, पर उनकी संख्या अंगुलियों पर गिनने लायक ही है।अपवादों से देश नहीं चलता।)
-----------------
सुरेंद्र किशोर
-------------
1.-राजनीति पहले सेवा थी।
2.-प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी ने पूर्व सांसदों के लिए पेंशन का प्रावधान करके इसे नौकरी की श्रेणी में ला खड़ा किया।
3.-नब्बे के दशक में प्रधान मंत्री पी.वी.नरसिंह राव ने
सांसद फंड का प्रावधान करके इस राजनीति को ‘व्यापार’ बना दिया।
4.-अब जब पता चलता है कि इस देश-प्रदेश के कुछ बड़े नेताओं के पास अरबों की संपत्ति है,जबकि पहले वे साइकिल के लिए भी तरसते थे,उन्होंने कभी कोई व्यापार भी नहीं किया,तो राजनीति को उद्योग मान लेने मेें अब किसको एतराज हो सकता है ?
-------------------
मौजूदा बिहार विधान सभा चुनाव में बहुत बड़ी अकल्पनीय राशि लेकर टिकट बेचने की जो चर्चा आम है,उससे तो यही लगता है कि अपवादों को छोड़ कर लोग टिकट वैसे ही पा रहे हैं जैसे कोई डीलर कार बेचने का डीलरशिप हासिल करता है।
--------------
और अंत में
---------
मैं सन 1972-73 में कर्पूरी ठाकुर का निजी सचिव था।
उन्हें विधायक के रूप में वेतन मद में मासिक 300 रुपए मिलते थे।
कमेटी की बैठक होने पर प्रति बैठक 15 रुपये भत्ता।
महीने में अधिकत्तम 4 बैठकें ही होती थीं।यानी 60 रुपए।
कर्पूरी जी की पत्नी ने एक बार मुझसे कहा कि ठाकुर जी से कहिए कि एक ही बार महीने भर का राशन खरीद कर घर में रख दिया करें।
कर्पूरी जी का जवाब था--‘‘सुरेंद्र जी,उन लोगों से कहिए कि वे जाकर पितौंझिया (यानी कर्पूरी जी के पुश्तैनी गांव )जाकर रहें।’’यानी, कर्पूरी जी की जायज आय पटना में परिवार रखकर उसका पालन-पोषण करने लायक नहीं थी।जबकि उससे पहले कर्पूरी जी मुख्य मंत्री रह चुके थे।
फिर भी कर्पूरी जी ने कभी सरकार से यह मांग नहीं की कि विधायकों का वेतन बढ़ना चाहिए।
-------------
मेरे देखते -देखते क्या से क्या हो गया !!
जन सुराज पार्टी के मुखिया का चुनावी खर्च अरबों में है।यह उनकी ही स्वीकृति है।
आज विधायकों और सांसदों को वेतन आदि के रूप में कितने रुपए मिलते हंै ,उसका विस्तृत विवरण दैनिक जागरण (18 अक्तूबर 25)ने छापा है।
डा.आम्बेडकर कहते थे कि सांसदों-विधायकों को समुचित वेतन मिलना चाहिए।पर सवाल है कि समुचित का अर्थ कितना होता है ?
राजनीति को इतना महंगा बनाकर साधनहीन व स्वाभिमानी लोगों को लोकतंत्र से दूर रखने की जाने- अनजाने साजिश तो नहीं हो रही है ?
जितने बड़े पैमाने पर इन दिनों नेताओं के परिजनों को टिकट दिये जा रहे हैं,उससे सवाल उठता है कि आजादी से पहले देश में जो 565 रजवाडे थे,उस स्थिति में और आज के लोकतंत्र में क्या व कितना फर्क रह गया है ?
-------------
19 अक्तूबर 25
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें