जब विधायकी से अधिक
कुछ और ही महत्वपूर्ण था
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सुरेंद्र किशोर
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सन 1957 के आम चुनाव के समय मोरारजी देसाई
पर्यवेक्षक बन कर बिहार आए थे।
पटना के सदाकत आश्रम में कांग्रेस उम्मीदवारों से मिल रहे थे।
किसी ने पूर्वोत्तर बिहार के एक निवर्तमान विधायक और टिकट के उम्मीदवार के बारे में देसाई से शिकायत कर दी कि वे छुआछूत मानते हैं।
मोरारजी ने उस टिकटार्थी से पूछा--क्या यह सच है ?
उन्होंने कहा-- हां,मैं छुआछूत मानता हूं।
देसाई ने कहा कि कांग्रेस तो छुआछूत नहीं मानती।आपको टिकट कैसे मिलेगा ?
उस उम्मीदवार ने कहा--टिकट अपने पास रखिए।मैं चला।
(यहां छुआछूत के समर्थन में यह पोस्ट नहीं लिखा गया है।बल्कि यह बताने के लिए कि तब के कई विधायकों के लिए पैसे या पद का महत्व अपेक्षाकृत कम था।
अब तो सांसद-विधायक के साथ कानूनी तौर से प्रत्यक्ष-परोक्ष रूप से इतने अधिक धन जुड़ गये हैं कि अपवादों को छोड़कर टिकट के लिए वे कुछ भी करने को तैयार रहते हैं।ध्यान रहे कि बिहार विधानसभा के मौजूदा चुनाव में जितने अधिक खर्च हो रहे हैं और जितने अधिक खर्च होने वाले हैं,वे अभूतपूर्व व अकल्पनीय है।राज्य के बाहर के लोगों को भी यदि राजनीति में इस भारी गिरावट के घिनौने दृश्य देखने हों तो वे इन दिनों बिहार का चुनाव आकर देखें।सिर्फ पैसे फेंक कर जीतेगा,वह इस अभागे प्रदेश को निर्ममता से लूटेगा ही।यह अब जनता पर है कि वह लूटने वालों को वोट देगी या
किसी बड़े उद्देश्य मतदातन करेगी !
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एक दूसरी कहानी
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पूर्वोत्तर बिहार के आलम नगर के पूर्व जमीन्दार परिवार के सदस्य रहे वीरेन्द्र कुमार सिंह आलम नगर से चार बार विधायक रह चुके थे।उनके खिलाफ अनियमितता की कोई शिकायत भी नहीं थी।
पर 1995 में जनता दल ने उनका टिकट काट दिया।
नरेंद्र नारायण यादव को टिकट मिला।
वीरेंद्र बाबू ने इन पंक्तियों के लेखक से बातचीत करते हुए तब कहा था कि भले मेरा टिकट काट दिया,पर मेरी जगह एक ईमानदार व्यक्ति को टिकट मिला है।यह अच्छी बात है।
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वीरेंद्र बाबू की राजनीति में पहले कोई रूचि नहीं थी।हां,कांग्रेस उम्मीदवार विद्याकर कवि की ही वे मदद करते थे।पर विशेष परिस्थिति में 1977 में पहली बार चुनाव लड़े और जीते।
विधायक के रूप में कैसा अनुभव रहा ?यह पूछने पर
वीरेंद्र बाबू ने बताया कि ‘‘विधान सभा में पहले मामूली चापाकल के बारे में सवाल उठाये जाते थे तो प्रशासन हिल जाया करता था।आज वह स्थिति नहीं रही।सब कुछ (ये संस्थाएं)जड़ हो गया है।
यह तो 1995 तक का हाल था।
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पर आज ?
लोक सभा या विधान सभा की बैठक जैसे ही शुरू होती है,भारी शोरगुल शुरू हो जाता है।लगता है कि पागलखाने के गेट को तोड़कर कुछ लोग सीधे विधायिका मंे घुस गये हैं।
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स्पीकर,मार्शल,सत्ताधारी दल,कार्य संचालन नियमावली और अखिल भारतीय पीठासीन पदाधिकारी सम्मेलनों की सिफारिशें सब कुछ आज बेमतलब साबित हो चुके हैं।शांति पूर्वक -नियमपूर्वक सदनों के संचालन के पक्षधर सांसदों -विधायकों की संख्या अंगुलियों में गिनने लायक रह गई है।
ऐसे में नई पीढ़ी के आदर्शवादी युवक ,हालांकि समाज में अब उनकी संख्या काफी कम हो गई है,कैसे राजनीति की ओर आकर्षि होंगे ?
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3 अक्तूबर 25
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