अपने बहाने देश के लाखों पी.एफ.पेंशनधारियों
की पीड़ा का प्रकटीकरण
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सुरेंद्र किशोर
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मेरी पी.एफ.पेंशन राशि जो सन 2005 में तय हुई,
वह राशि आज भी उतनी ही (1231 रुपए)
मुझे अनवरत मिल रही है।उसमें एक रुपए
की भी कटौती नहीं की भारत सरकार ने।
क्या उसकी यह कम कृपा है मुझ पर ?!!
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मेरी पक्की आय 1231 रुपए मासिक ही है।यह पी.एफ.एफ.पेंशन
योजना के तहत मुझे उपलब्ध है।
इसके अलावा अखबारों में लेख लिखकर या यदाकदा पुस्तक लेखन से
कमाता हूं।
मैं केंद्र सरकार, पी.एफ.के कंेद्रीय न्यासी बोर्ड, केंद्रीय श्रम
व वित्त मंत्रालय का आभारी हूं जिसने
इस 1231 रुपए की राशि में कभी कोई कटौती नहीं की।हां,यदि
अवमूल्यन के कारण 2005 में 1231 रुपए की जितनी क्रय शक्ति थी,वह घट गई
है तो इसमें केंद्र सरकार का भला क्या कसूर ?!
मुझे पेंशन 2005 से मिलती है।इस पेंशन योजना में बढ़ोत्तरी का
कोई प्रावधान ही नहीं है।जिसने महंगी को ध्यान में नहीं रखा,बढ़ोत्तरी का प्रावधान नहीं किया,
उसका दिमाग कितना क्रूर होगा,उसकी कल्पना कर लीजिए।
यह योजना प्रधान मंत्री पी.वी.नरसिंह राव के शासन काल में
शुरू हुई।यह संयोग नहीं है कि राव साहब ने ही सांसद क्षेत्र
विकास फंड शुरू किया।उस फंड के बारे में केंद्रीय मंत्री जीतनराम
मांझी ने हाल ही में बयान दिया है कि सभी एम.पी.-विधायक इस फंड
में कमीशन लेते हैं।नरसिंह राव कितने दूरदृष्टि वाले नेता थे !!
अपने पेशेवालों का भला कर गये।
दूसरी ओर नरसिंह राव सरकार,जिसके वित्त मंत्री मनमोहन सिंह थे,यह
सरकार मानती थी कि कुछ लाख रिटायर कर्मचारियों को
दिव्य भारतीय अपरिग्रही परंपरा के अनुसार अपने पर खर्च
समय बीतने के साथ घटाते जाना चाहिए।या प्राचीन संतों की तरह वन में
जाकर कंद-मूल खाकर गुजारा करना चाहिए।
यदि राव साहब सेवानिवृतों पर ही खर्च कर देते तो एक से एक घोटालों के जरिए
अपने लोगों को उपकृत करने के लिए पैसे बेचारे कहां से आते ?
उनका अपना भी परिवार बहुत बड़ा था।उसकी भी राक्षसी साॅरी ‘‘राजसी इच्छाएं’’ थीं।
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पी.एफ.पेंशन में वृद्धि के लिए सन 2011 में राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग के सदस्य व
बिहार सरकार के पूर्व मंत्री डा.शकील उज्जमा अंसारी ने तब के केंद्रीय श्रम एवं
रोजगार मंत्री मल्लिकार्जुन खरगे को पत्र लिखा था।
खरगे साहब ने एक रूटीन टाइप का जवाब दे दिया।
राज्य सभा के उप सभापति पद पर आसीन होने से पहले सदस्य के रूप में
हरिवंश जी ने मेरे नाम का जिक्र करते हुए राज्य सभा में इस पेंशन में बढ़ोत्तरी
की जरूरत के लिए जोरदार आवाज उठाई थी।
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पी.एफ.पेंशनर्स संघ के लोग इस संबंध में तो वर्षों से बढ़ोत्तरी के लिए
संगठित रूप से आवाज उठाते रहे हैं।
पर नरेंद्र मोदी सरकार भी शायद यह चाहती है कि इस अनोखी पेंशन योजना
का नाम गिन्नी बुक आॅफ वल्र्ड रिकाॅर्ड में शामिल हो जाये।शायद दुनिया की
यह एक मात्र पेंशन योजना है जिसमें महंगी का ध्यान रखते हुए बढ़ोत्तरी का कोई
प्रावधान ही नहीं है।ऐसा सिर्फ ऋषियों के देश भारत में ही
संभव है।
किसी ने मुझे बताया कि यदि आप ओड़िशा या तीन अन्य राज्यों में से किसी राज्य के मूल निवासी
होते तो आपको पद्मश्री अवार्डी होने के नाते हर माह 30 हजार रुपए (ओड़िशा)का मानदेय मिल जाता।
पर, यह भी पता चला कि बिहार के किसी पद्मश्री अवार्डी ने ऐसे ही मानदेय के लिए उप मुख्य मंत्री विजय कुमार सिन्हा से आग्रह किया था।उस पर सिन्हा साहब ने कहा कि पद्मश्री अवार्डी लोगों की निजी आय बहुत है।
जहां तक मेरी जानकारी है,कुछ लोगों के बारे में यह बात सच है।
पर जिस तरह के अभावग्रस्त लोगों को भी मोदी सरकार ने पद्म अवार्ड देना शुरू किया है,वैसे में विजय बाबू की बात अनेक अवार्डी पर लागू नहीं होती।
सन 2025 में बिहार के समाज सेवी सह पत्रकार भीम सिंह भवेश को पद्म सम्मान मिला।
भवेश जी की पक्की आय सिर्फ 3 हजार रुपए मासिक है।
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खैर,इन सब मामलों को मैं ज्यादा तुल नहीं देता।मैंने अपने लिए सन 1965 से ही निजी लाइब्रेरी खड़ी करनी शुरू कर दी थी।मैं जानता था कि पत्रकारिता का जीवन आर्थिक रूप से कोई संतोष देने वाला नहीं होगा।इसलिए रिटायर होने पर स्वतंत्र पत्रकार के रूप में लेखन करना होगा जो मैं कर रहा हूं।
उससे मेरी आय अच्छी-खासी हैं।क्योंकि मेरे पास जो लाइब्रेरी सह सदंर्भालाय है,उसमें 30 आलमारियों में सामग्री भरी पड़ी है।विषयवार कटिंग्स के सैकड़ों लिफाफे चार आलमारियों में भरे हुए हंै।संदर्भालय-पुस्तकालय-पत्रिका -लय के कारण
लिखने में तथ्यों की भूल होने की गुंजाइश बहुत ही कम रहती है।इसलिए अखबार अब भी मुझे छापते हंै।
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पर, यह सब तभी तक,जब तक हाथ-पैर-आंखें सक्रिय हैं।यदि अंग काम देना बंद कर देंगे तो क्या होगा ??
तब तो ईश्वर ही सहारा होगा--सरकारें तो अपने दूसरे जरूरी-गैर जरूरी कामों मगन रही हैं और रहेंगी भी।
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2 जनवरी 2025