मेरा रोज का नाश्ता है आर्गेनिक सत्तू
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बचपन में हम हलवाहे के भोजन के लिए
खेत में सत्तू लेकर जाते थे।
रोज सत्तू खाकर भी हलवाले हट्््ठे-कट्ठे रहते थे।
पर,तब का सत्तू मिलावट रहित होता था।
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सुरेंद्र किशोर
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हर दिन की तरह आज भी मैंने नाश्ते में मिलावट रहित आर्गेनिक सत्तू खाया और अखबार पढ़ने बैठा।
दैनिक हिदुस्तान की एक खबर पर नजर टिक गई--
‘‘ब्रिक्स सम्मेलन में बिहार का सत्तू और मखाना परोसा गया।’’
मुख्य मंत्री सम्राट चैधरी ने धन्यवाद देते हुए लिखा कि प्रधान मंत्री ने
लोकल टू ग्लोबल के संकल्प को साकार किया है।
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मेरी एक ही आशंका है--जब सत्तू बड़े पैमाने पर विदेश जाने लगेगा तो उस पर मिलावट खोरों की राक्षसी प्रवृति हावी न हो जाए !
यदि वैसा हुआ तो
इस देश की उल्टे बदनामी होगी।
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मुझे शुद्ध सत्तू का स्वाद अच्छी तरह याद है जो अपने गांव में मैंने पचास-साठ के दशकों में खाया था।
इन दिनों मैं यहां जो सत्तू मंगवाता हूं,वह उसी ओरिजनल स्वाद का है।यह मेरा रोज का नश्ता है--हां,उसमें कुछ मूंगफली-किशमिश मिला देता हूं।
महंगा पड़ता है यानी 350 रुपए प्रति किलोग्राम।पर,स्वास्थ्य के लिए सही है।
सत्तू की कंपनी का नाम मत पूछिएगा अन्यथा मुझे उसका प्रचारक मान लिया जाएगा।हां,जिन्हें इतना अधिक महंगा सत्तू फिर भी खाना है,वे मुझसे फोन पर पूछ सकते हैं।
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12 सितंबर 26
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