रविवार, 8 नवंबर 2026

क्या यह इंदिरा छवि चमकाओ अभियान है !

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सोनिया गांधी ने अपनी पुस्तक मंे लिखा है--

‘‘आपातकाल लगाना गलती थी,इंदिरा गांधी को 

बाद में इसका एहसास हुआ।’’

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सुरेंद्र किशोर

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यदि सोनिया जी की बात सही है तो वह कांग्रेस शासित राज्य सरकारों को जल्द यह निदेश दें कि बर्बर आपातकाल में नाहक अपार पीड़ा झेल चुके उन राज्यों के लोगों के परिवारों को क्षतिपूत्र्ति दे।या कम से कम पार्टी -सरकार की ओर से उनसे माफी मांगे।

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मध्य प्रदेश ,राजस्थान आदि राज्यों की गैर कांग्रेसी सरकारों ने

जेपी सेनानियों -आपातकाल पीड़ितों को पेंशन दी।पर वहां कांग्रेस  सरकार जब सत्ता में आई तो उन पेंशनों को बंद कर दिया।बाद में गैर कांग्रेसी सरकारों ने फिर शुरू किया।

यानी,लगता है कि आपातकाल को लेकर इंदिरा का पछतावा सिर्फ सोनिया तक ही सिमट कर रह गया अन्यथा कांग्रेसी राज्य सरकारें जेपी-आपात पीड़ित  पेंशन बंद नहीं करती।

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नमूने के तौर पर कर्नाटका में आपातकाल की बर्बरता की चर्चा करूंगा।

आपातकाल में मैं जार्ज फर्नांडिस के साथ भूमिगत आंदोलन में शामिल था।मैं आपातकाल में भूमिगत जार्ज से बारी बारी से पटना, कलकत्ता,दिल्ली और बंगलोर में मिला था। मंै जब बंगलोर गया था तो वहां जार्ज की करीबी फिल्म अभिनेत्री स्नेहलता रेड्डी के घर भी गया था।

  बाद में पता चला कि जार्ज की करीबी होने के कारण कर्नाटका की कांग्रेसी सरकार की पुलिस ने जेल में स्नेहलता रेड्डी को इतना अधिक प्रताड़ित किया कि वह मरणासन्न हो गयीं।खराब स्थिति होने पर जेल से रिहा कर दी र्गइं।रिहा होने के कुछ ही समय बाद उनका निधन हो गया।दरअसल वह हत्या थी।आपातकाल की बर्बरता वाले इस देश में ऐसे अनेक उदाहरण सामने आए हैं।

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5 जुलाई 1975 को भूमिगत फर्नांडिस पटना आए।

समाजवादी एम.एल.सी.रेवतीकांत सिंहा के सरकारी आवास में टिके।उनसे अनेक लोग मिले।कहा गया कि अगली रात जार्ज कहीं और ठहरें।सरकार के भय से उनका कोई सहयोगी उन्हें पटना के अपने घर में छिपाने के लिए तैयार नहीं हुआ । मैं जार्ज को अपने एक कमरे वाले घर ले गया।अगले दिन जार्ज इलाहाबाद चले गये।इमर्जेंसी के आतंक की पराकाष्ठा की कल्पना कर लीजिए।

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बाद में बड़ौदा डायनामाइट षड्यंत्र केस के नाम पर सी.बी.आई.ने जो मुकदमा चलाया,उसमें इन पंक्तियों के लेखक(सुरेंद्र किशोर उर्फ सुरेंद्र अकेला )को चार मुख्य षड्यंत्रकारियों में से एक षड्यंत्रकारी ठहरा दिया। 

  इस केस में ईमानदार नेता रेवतीकांत सिन्हा को सी.बी.आई.ने धमकाया--कहा--आप मुखबिर नहीं बनिएगा तो आपका पूरा परिवार जेल में होगा।रेवती बाबू से सी.बी.आई.ने दिल्ली के कोर्ट में यह बयान दिलवाया--मेरे आवास में हुई बैठक में मैंने,जार्ज फर्नांडिस ने,एम.एन.वाजपेयी ने और सुरेंद्र अकेला ने मिलकर यह षड्यंत्र किया कि डायनामाइट से देश में जगह -जगह

विस्फोट करना है।

   जबकि सच यह है कि ऐसी कोई बैठक रेवती बाबू के आवास में नहीं हुई थी।यह बात मैं किसी की भी कसम खाकर कह सकता हूं।

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अब आप कल्पना कीजिए कि उन दिनों सी.बी.आई.किस बेचैनी से मुझे खोज रही होगी !

  सी.बी.आई.की टीम मुख्य मंत्री डा.जगन्नाथ मिश्र के आॅफिस में पहुंची।मेरा पता पूछ रही थी।सी.एम.सचिवालय के अफसर ने जो मेरे मित्र थे,वहां से तुरंत  अपने लेम्बे्रटा स्कूटर पर निकल कर मुझे लक्ष्मी साहु (कर्पूरी ठाकुर के पूर्व निजी सचिव)के जरिए आगाह कर दिया।मैं फरार हो गया।पटना और राज्य के अन्य हिस्से में जब मुझे कोई शरण देने को तैयार नहीं हुआ तो मैं मेघालय (फुलबाड़ी--जिला गारो हिल्स)चला गया।वहां मेरे बहनोई व्यापार करते थे।मेघालय में तब गैर कांग्रेसी सरकार थी।

मेरे जैसे आर्थिक रूप से कमजोर व्यक्ति को कितना कष्ट हुआ होगा,उसकी कल्पना आप कर सकते हैं।न खाने का ठीक, न रहने का ठौर।

याद रहे कि आपातकाल में इंदिरा सरकार ने लोगों के जीने का अधिकार भी काननून छीन लिया था।

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 मेरे जैसे हजारों लोगों ने किसी पद या इनाम की उम्मीद किए बिना इमर्जेंसी की बर्बरता के खिलाफ जान हथेली पर रख कर भूमिगत संघर्ष किया था।जेपी सहित एक लाख से अधिक लोग तो जेलों में ठूंस दिए गए थे।

यासीन मलिक के केस की सुनवाई भी हो रही है, किंतु इमर्जेंसी में किसी सुनवाई के बिना ही एक लाख से अधिक कैदी अनिश्चित काल के लिए देश के जेलों में बंद थे।खैर,जेल में उन्हें भोजन तो मिल रहा था,पर मेरे जैसे फरारी को कभी -कभी भोजन के भी लाले पड़ जाते थे। परिचित भी मुझे देखते ही मुंह फेर लेते थे।

उन दिनों पटना के मेरे बहादुर मित्र राम बिहारी सिंह जैसे अत्यंत थोड़े से लोगों ने जरूर मदद की।

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आपातकाल के तत्काल बाद गठित सरकार के मुख्य मंत्री कर्पूरी ठाकुर थे।

हम पति-पत्नी ने जेपी आंदोलन व इमर्जेंसी में अपार कष्ट सहे।मेरी पत्नी जेपी आंदोलन में तीन बार जल गई थीं।

कर्पूरी ठाकुर का, समाजवादी कार्यकर्ता की हैसियत से, मैं 1972-73 में निजी सचिव था।हमें  कितना कष्ट हुआ,वह सब कर्पूरी जी जानते थे।पर हमने उनसे कोई मुआवजा नहीं मांगा,न ही उन्होंने दिया।कितनों को देते ?

लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार बाद में बारी -बारी से मुख्य मंत्री बने।ये दोनों युवजन सभा के दिनों से ही मेरे मित्र थे।साठ के दशक में बिहार युवजन सभा के मैं और लालू प्रसाद एक साथ संयुक्त सचिव चुने गये थे।उस समय हमारे नेता शिवानन्द तिवारी सचिव चुने गये थे।लालू-नीतीश से भी मैंने न तो कुछ मांगा और न ही उन्होंने कुछ दिया।

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जब जेपी सेनानियों के लिए पेंशन योजना शुरू हुई तो मैंने अपनी पत्नी रीता से कहा कि तुम आवदेन मत दो।क्योंकि हमने किसी पेंशन के लिए आंदोलन नहीं किया था।

उसने आवेदन नहीं दिया ।जबकि, नियम बना है कि है कि जेपी आंदोलन में कोई महिला एक दिन के लिए भी जेल गई थी तो वह पेंशन की हकदार है।

पर जब आवेदन नहीं देने वाले 57 नेताओं जैसे लालू प्रसाद ,नीतीश कुमार,लल्लन सिंह को जेपी पेंशन आॅफर किया गया तो 57 की उस सूची में मेरी पत्नी रीता सिंह का भी नाम था।पत्नी ने पूछा--अब क्या करूं ?

मैंने कहा --अब ले लो।

संयोगवश उसी जेपी पेंशन राशि से इन दिनों हमारा घर चलता है।

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मैंने यह सब इसलिए लिखा ताकि नई पीढ़ी और नये शासक यह जान सकें कि किसी भौतिक लाभ की उम्मीद किए बिना व उसके लिए किसी से आग्रह न करने वाले हजारों जेपी सेनानी व आपातकाल पीड़ित लोग इस देश में हुए हैं।

हां,जेपी की बात और थी।वे सबका ध्यान रखते थे।

डा.राजंेद्र प्रसाद की पोती माननीया तारा सिन्हा ने हाल में मेरी पत्नी को बताया कि ‘‘रीता, दादा जी (यानी जेपी) 1977 में तुमको विधान सभा का टिकट देने के लिए खोज रहे थे ,तुम कहां थी ?’’

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दरअसल डाइनमाइट केस में मैं फरार था तो हमने यह तय किया था कि हम दोनों में से एक नौकरी कर लें।

यानी, तुम नौकरी कर लो।मेरा भविष्य तो अनिश्चित है।पता नहीं इमरजेंसी कब हटेगी।कब तक फरार रहना पड़ेगा।

हालांकि रेवती कांत की गवाही के बावजूद मेरा नाम चार्जशीट में शामिल नहीं हुआ था क्योंकि मैं पकड़ा नहीं जा सका था।

आपातकाल हटने के बाद जांच कार्य में लगे एक सी.बी.आई.अफसर ने जो पटना के मूल निवासी थे,मेरे एक मित्र को बताया कि पकड़े जाने पर सुरेंद्र अकेला (अब सुरेंद्र किशोर)से कोर्ट में हमें यह गवाही दिलवानी थी कि वह 

हर माह काठमांडू जाकर चीनी दूतावास से जार्ज के लिए पैसा लाता था।(जबकि सच यह है कि मैं आज तक नेपाल नहीं गया।--

कल्पना कीजिए इंदिरा के इशारे पर सी.बी.आई.किस हद तक झूठ गढ़ रही थी !!)

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सोनिया गांधी की जीवनी के इस अश्ंा को पढ़कर जानकार लोग तो यही कहेंगे कि सोनिया गांधी क्रूर इंदिरा गांधी की छवि चमकाने के लिए अब लिख रही हैं कि इंदिरा जी को बाद में इमर्जेंसी लगाने का अफसोस था।

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अफसोस था तो स्नेहलता रेड्डी के परिवार से जाकर माफी मांगो।

उनकी पुत्री नन्दना रेड्डी अभी मौजूद हैं।

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8 नवंबर 2 0 26 

 


 

 


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