मंगलवार, 10 जनवरी 2023

 कानोंकान

सुरेंद्र किशोर

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मार्केट काॅम्प्लेक्स के भू तल को पार्किंग के लिए खाली कराने की जरूरत

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यह समस्या बिहार के लगभग सभी नगरों की है।

पटना में तो कुछ अधिक ही गंभीर हैै।

 नगर की मुख्य सड़कों पर अधिकतर बहुमंजिले मार्केट काॅम्प्लेक्स के मालिकों ने पार्किंग की जगह नहीं छोड़ी है।

शासन द्वारा पास नक्शों में तो पार्किंग का प्रावधान रहता है।

पर,सरजमीन पर वह गायब पाया जाता है।

उस पार्किंग स्थल पर भी दुकानें खोल दी जाती हैं।

इन सब बातों पर नजर रखने वाले अधिकतर सरकारी अफसरों और कर्मचारियों की रूचि दूसरे ही कामों में रहती है।

मार्केट के पार्किंग स्थल पर दुकानें रहेंगी तो ग्राहक अपने वाहन मुख्य सड़कों पर ही तो पार्क करेंगे।

 रोड जाम का वह बड़ा कारण होता है।

अस्सी के दशक में बिहार सरकार ने पटना के मजहरूल पथ पर एक होटल के नीचे पार्किंग स्थल बनवाया था।

पर, उसके बाद निहितस्वार्थियों के दबाव में आकर शासन ने अपने हाथ रोक दिए थे।

जनहित में मौजूदा शासन तंत्र यह काम एक बार फिर करे।  

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अवैध कब्जेदारों के मददगार

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भू माफिया ने पटना के दीघा स्थित सैकड़ों एकड़ सरकारी जमीन ‘लूट’ ली।

इस काम में उन्हें शासन के पथभ्रष्ट तत्वांे से पूरी मदद मिली।

 इसी तरह का ताजा मामला उत्तराखंड के हलद्वानी का है।

वहां रेलवे की 29 एकड़ जमीन पर दशकों से अतिक्रमण होता रहा।

फिर भी तंत्र का शीर्ष नेतृत्व तक सोया रहा।

तंत्र के निचले हिस्से ने कानून तोड़कों की मदद की।कुछ नेताआंे ने भी अतिक्रमण करवाया। 

शासन के एक हिस्से ने वहां उस जमीन पर मंदिर,मस्जिद,स्कूल, अस्पताल ,मकान, बैंक आदि बनने दिए।

 पूरे देश में रेलवे की करीब आठ सौ एकड़ जमीन अवैध कब्जे में है।

अवैध कब्जे का एक शर्मनाक पक्ष है ।

 भ्रष्ट तंत्र की मदद से अवैध जमीन पर लोगबाग आसानी से आवास के अलावा मंदिर,मस्जिद,अस्पताल स्कूल बनवा लेते हैं।

साथ ही, सरकारी खर्चे पर शासन की अनुमति से  बिजली,सड़क और जालपूर्ति की भी व्यवस्था हो जाती  है।

ऐसी जमीन पर अवैध कब्जेदारों की इस तरह मदद करने वाले सरकारी तंत्र के अफसरों -कर्मचारियों की बर्खास्तगी का कानून बनाया जाना चाहिए।

जब तक ऐसा नहीं होगा,तब तक सरकारी जमीन हड़पने का काम इस देश में अनंत काल तक चलता रहेगा।   

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चुनाव का एक गणित 

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सन 2016 के पश्चिम बंगाल विधान सभा चुनाव में 

 कांग्रेस और सी.पी.एम. ने मिलकर तृणमूल कांग्रेस का मुकाबला किया।

कांग्रेस को 44 सीटें मिलीं।

पर,सी.पी.एम.को सिर्फ 26 सीटें।जबकि, सी.पी.एम.वहां कांग्रेस से बडी पार्टी मानी जाती थी।

आखिर  ऐसा क्यों हुआ ?

एक जानकार व्यक्ति ने बताया कि सी.पी.एम.के समर्थकों ने तो कांग्रेस उम्मीदवारों को वोट दे दिए।

किंतु कांग्रेस के बहुत सारे समर्थकों ने सी.पी.एम. उम्मीदवारों को वोट नहीं दिए।क्योंकि वाम मोरचा के शासन काल में कांग्रेस कार्यकर्ताओं और उनके समर्थकों के साथ वाम मोरचा का अच्छा व्यवहार नहीं था।

  ऐसा ही कुछ सन 2019 में उत्तर प्रदेश में हुआ।लोक सभा चुनाव में बसपा और सपा ने तालमेल करके चुनाव लड़ा।

सपा को सिर्फ 5 सीटें मिलीं जबकि बसपा को दस सीटें मिल गईं।

वहां भी वही कहानी थी।

सपा के शासन काल में बसपा के अनेक लोग खुद को असुरक्षित महसूस कर रहे थे।

  इसलिए अगले किसी चुनाव में आपसी तालमेल करने से पहले संबंधित दल इस बात का पता लगा लें कि उन दलों का सरजमीन पर पहले से कैसा आपसी संबंध रहा है। 

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   ़भूली -बिसरी याद

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 बात तब की है जब कर्पूरी ठाकुर मुख्य मंत्री और जगजीवन राम केंद्र में मंत्री थे।

पटना में भोजपुरी सम्मेलन हो रहा था। 

दोनों नेता मंच पर थे।

जगजीवन बाबू भोजपुरी में भी बहुत प्रभावशाली भाषण करते थे।

उनके पास भोजपुरी शब्दों का अपार खजाना था।

उन्होंने भोजपुर इलाके की बोली में मर्दागनी और मिजाज में बहादुरी  की विस्तार से चर्चा की।

 खूब तालियां बटोरीं।

साथ ही, उन्होंने बिहार की कुछ अन्य स्थानीय भाषाओं से भोजपुरी की तुलना भी कर दी थी।

खुद कर्पूरी ठाकुर मैथिली भाषी क्षेत्र से आते थे।

 मैथिली प्रेमी कर्पूरी ठाकुर को यह तुलना अच्छी नहीं लगी।

उन्होंने अपने भाषण में अन्य बातों के अलावा यह भी कहा कि यदि भोजपुरी लोगों में इतना ही दम खम है तो भोजपुरी भाषी ‘बाबूजी’ केंद्र की सरकार में अपना थोड़ा दम खम दिखाकर इस गरीब इलाके को उसका वाजिब हक क्यों नहीं दिलवाते ? जगजीवन राम को ‘बाबू जी’ कहा जाता था।यानी, बिहार में सरकार चला रहे कर्पूरी ठाकुर को तभी यह अच्छी तरह समझ में आ गया था कि आर्थिक मदद के मामले में बिहार के साथ केंद्र भेदभाव करता रहा है।

इस राज्य के पिछड़ापन का यह एक बड़ा कारण रहा है।याद रहे कि तब केंद्र में भी जनता पार्टी की सरकार थी जिस दल के कर्पूरी ठाकुर थे।

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और अंत में

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भरोसेमंद सूत्रों से यह जानकारी मिली है कि बिहार के नए डी.जी.पी.भट्टी साहब पर राजनीतिक कार्यपालिका या कहीं और से उनके काम में कोई नाजायज  हस्तक्षेप नहीं है।

खुद डी.जी.पी.एक कर्तव्यनिष्ठ अफसर रहे हैं।

इस परिस्थिति में बिहार के शांतिप्रिय लोगों में यह उम्मीद बंधती है कि उन्हें अपराधियों से भयग्रस्त होने की अब कोई जरूरत नहीं है। 

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प्रभात खबर,पटना

9 जनवरी 23



     नफरती बोल की अलग-अलग परिभाषाएं

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       सुरेंद्र किशोर

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अकबरुद्दीन ओवैसी ने भड़काऊ बयान दिया था कि 

हम 25 करोड़, तुम 100 करोड़ ,15 मिनट के लिए पुलिस हटा दो तो पता चल जाएगा कि कौन कितना ताकतवर है।

इसके बाद भी कोर्ट ने उसे बरी कर दिया।

अगर यही अमेरिका में बोला होता तो उसे सजा दी जाती।

    ---कल्पना श्रीवास्तव,वकील

  राष्ट्रीय सहारा,पटना संस्करण

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सांसद सह बैरिस्टर असदुद्दीन ओवेसी के छोटे भाई अकबरुद्दीन का यह भाषण टी.वी.चैनलों पर तब पूरी दुनिया ने देखा-सुना था।

इसके बावजूद तेलांगना के मुख्य मंत्री के. चंद्रशेखर राव की पुलिस को कोर्ट में पेश करने के लिए अकबरुद्दीन के खिलाफ कोई सबूत नहीं मिला।

  याद रहे कि ओवैसी की पार्टी और चंद्रशेखर राव की पार्टी में गाढ़ी देास्ती है।

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चंद्र शेखर राव प्रधान मंत्री पद के गंभीर उम्मीदवार हैं।

यदि चंद्रशेखर राव प्रधान मंत्री बन गए तो जो काम ओवैसी बंधु हैदराबाद में कर रहे हैं,वह काम वे पूरे देश में करेंगे।

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वैसे भी सिर्फ चंद्रशेखर राव को दोष क्यों दिया जाए ?

मुस्लिम वोट के लिए किसी भी हद तक जाकर राष्ट्रद्रोहियों की मदद करने वाले इस देश के किसी भी तथाकथित सेक्युलर राजनीतिक दल ने अकबरुद्दीन की उस साम्प्रदायिक धमकी की निन्दा नहीं की थी।किसी ने की थी तो बताइए।मैं खुद को सुधार लूंगा।बात -बात में जहर उगलने वाले सिनियर 

ओवैसी से पत्रकारों ने जब -जब उनके अनुज की करतूत के बारे में पूछा तो बैरिस्टर साहब ने कहा कि मामला कोर्ट में है।वे जानते थे कि कोर्ट में कुछ होने वाला नहीं है।  

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कांग्रेस के राहुल गांधी के कथित ‘‘नफरती बोल’’ के दायरे में अकबरुद्दीन का कुबोल कभी शामिल नहीं रहा है।

  सिर्फ प्रज्ञा सिंह ठाकुर का कुबोल राहुल गांधी के लिए नफरती बोल है।

अकबरुद्दीन के बोल राहुल के लिए मुहब्बत के बोल हैं।

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याद रहे कि अकबरुद्दीन अन्य अवसरों पर भी जन सभाओं में हिन्दू देवी-देवताओं के खिलाफ अत्यंत आपत्तिजनक टिप्पणियां कर चुके हैं।

सेक्युलर दलों के ऐसे ही दोहरे मापदंड का चुनावी लाभ भाजपा को मिलता रहा है।

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न्यायसंगत बात तो यह है कि भोपाल से भाजपा सांसद प्रज्ञा सिंह ठाकुर और अकबरुद्दीन की समान रूप से आलोचना की जानी चाहिए।

दोनों को अदालतांे से यथासंभव कठोर सजा दिलवाई जानी चाहिए।पता नही,ं इस देश में इस तरह की संतुलित कार्रवाई 

कब होगी !!

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10 जनवरी 23


     आज का चिंतन

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‘‘त्रिदोष मुक्त’’ राजनीति के लिए काम करें

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       ---सुरेंद्र किशोर--

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राजनीति से वैसे नेताओं और कार्यकर्ताओं का विलोप होता

जा रहा है जो ‘‘त्रि-दोष रोग’’ से ग्रस्त नहीं हैं।

त्रि-दोष यानी,

1.-भ्रष्टाचार,

2.-परिवारवाद 

3.-जातीय-धार्मिक वोट बैंक की सौदागरी

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  इस माहौल में भी कुछ नेता ऐसे मौजूद व सक्रिय हैं जो इस त्रिदोष से लगभग मुक्त हैं।

चाहे वे जिस किसी दल के हों,जिस किसी विचारधारा के हों,उनकी मदद होनी चाहिए।

अन्यथा, देर-सबेर,एक न एक दिन हमारा लोकतंत्र भारी खतरे में पड़ जाएगा।

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पुनश्चः

  यदि बाल ठाकरे परिवार ने उद्धव ठाकरे के बदले राज ठाकरे को आगे बढ़ाया होता ,उधर नेहरू-गांधी परिवार राहुल गांधी के बदले वरुण गांधी को आगे बढ़ाता, तो क्रमशः शिवसेना और कांग्रेस की स्थिति आज की अपेक्षा बेहतर रहती।

4 मई, 1981 को इंदिरा गांधी ने अपनी वसीयत में अन्य बातों के अलावा यह भी लिखा कि

 ‘‘मैं यह देखकर खुश हूं कि राजीव और सोनिया ,वरुण को उतना ही प्यार करते हैं जितना अपने बच्चों को।

  मुझे पक्का भरोसा है कि जहां तक संभव होगा,वो हर तरह से वरुण के हितों की रक्षा करेंगे।’’

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10 जनवरी 23 


       हिन्दी दिवस पर विशेष आग्रह

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     सुरेंद्र किशोर

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 भारत के संविधान के अनुच्छेद-357(2) में यह प्रावधान किया गया है कि 

‘‘राज्य के विधान मंडल की शक्ति का प्रयोग करते हुए संसद द्वारा अथवा राष्ट्रपति या खंड -1 के उप खंड (क)में निर्दिष्ट अन्य प्राधिकारी  द्वारा बनाई गई ऐसी विधि जिसे संसद अथवा राष्ट्रपति या ऐसा अन्य प्राधिकारी अनुच्छेद-356 के अधीन की गई उद्घोषण के अभाव में बनाने के लिए सक्षम नहीं होता,उद्घोषणा के प्रवर्तन में न रहने के पश्चात एक वर्ष की अवधि के अवसान पर,अक्षमता की मात्रा तक ,उन बातों के सिवाय जिन्हें उक्त अवधि के अवसान के पहले किया गया है या करने का लोप किया गया है प्रभावहीन हो जाएगी यदि वे उपबंध जो प्रभावहीन हो जाएंगे ,सक्षम विधान मंडल के अधिनियम द्वारा पहले ही निरसित या उपांतरणों के सहित या उनके बिना पुनः अधिनियमित नहीं कर दिए जाते हैं।’’

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ऊपर लिखा वाक्य 135 शब्दों का है।

यह भारतीय संविधान के अधिकृत हिन्दी अनुवाद से उधृत किया गया है।

मेरे लिए तो इस हिन्दी अनुवाद की अपेक्षा इसकी मूल यानी अंग्रेजी वाक्य को समझना 

अधिक आसान है।

क्योंकि मुझे थोड़ी -बहुत अंग्रेजी आती है।

किंतु यदि कोई हिन्दी भाषी, जिसे अंग्रेजी नहीं आती, इसे पढ़कर समझना चाहेगा,तो क्या वह समझ पाएगा ? 

मुझे तो नहीं लगता।

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संविधान के हर अनुच्छेद का अनुवाद इसी तरह लंबे वाक्यों में क्लिष्ट हिन्दी के साथ किया गया है।

  यानी, सामान्य हिन्दी भाषा भाषियों के लिए संविधान को पढ़ना-समझना ‘‘मना’’ है।

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इस लिए आज ‘हिन्दी दिवस’ के अवसर पर मेरी यह अपील है कि बेहतर समझदारी के लिए संविधान का समझ में आ जाने वाला हिन्दी अनुवाद करवाया जाना चाहिए।

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इतना ही नहीं,आई.पी.सी.,सीआर.पी.सी.तथा अन्य कानूनी किताबों का भी हिन्दी अनुवाद इसी तरह हुआ है।

दरअसल,लंबे-लंबे वाक्य अंग्रेजी के स्वभाव में है।

   हिन्दी में छोटे-छोटे वाक्य और भरसक आम बोलचाल में आने वाले शब्द लिखने पर सराहना मिलती है।उसकी उपयोगिता भी बढ़ती है।

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10 जनवरी 23


शनिवार, 7 जनवरी 2023

 हाल ही में एक संभ्रांत महिला ने मुझे बताया कि 

‘‘मेरी एक सहेली ने कहा कि तुम भाग्यशालिनी हो क्योंकि तुम्हारी बेटी भी है।’’

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सुरेंद्र किशोर

4 जनवरी 23

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पुनश्चः-अब आप इस उक्ति का निहितार्थ समझिए और बताइए।

उन्होंने तो इस एक वाक्य से अधिक मुझे कुछ नहीं बताया था।

मैंने पूछा भी नहीं।


शुक्रवार, 6 जनवरी 2023

    इंडियन एक्सप्रेस और जनसत्ता

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      सुरेंद्र किशोर

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‘इंडियन एक्सप्रेस’ अब भी एक जीवंत अखबार है।

उसे मैं रोज सुबह पढ़े बिना नहीं रह सकता।

अब तो वह पटना से भी छपता है।

एक्सप्रेस अपनी पेशेवर गरिमा बनाए हुए है।

हालांकि रामनाथ जी गोयनका-अरूण शौरी के जमाने वाली बात नहीं।वैसे भी वह दौर ही अलग था।

  पर,यही बात मैं आज के ‘जनसत्ता’ के बारे में नहीं कह सकता।

मैंने 1983 से 2001 तक ‘जनसत्ता’ में काम किया।

जनसत्ता को मैंने अपना ‘बेस्ट’ दिया।

जनसत्ता ने भी मुझे बहुत कुछ दिया।

इसलिए मैं ‘जनसत्ता’ से आज भी एक विशेष तरह का लगाव महसूस करता हूं।

जनसत्ता की जीवंतता में कमी के लिए उसके आज के संपादक नहीं बल्कि प्रबंधन अधिक जिम्मेदार हैं।

  यदि एक्सप्रेस की खास खबरें जनसत्ता को आज भी उपलब्ध होने लगें तो इस अखबार में भी तेवर आ जाएगा।

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प्रभाष जोशी के जमाने में भी एक्सप्रेस वाले अपनी खास खबरें जनसत्ता से शेयर करना नहीं चाहते थे।

किंतु प्रभाष जी ने उच्चत्तम स्तर से कहलवा कर एक्सप्रेस की खबरें हासिल करने का प्रावधान करा दिया था।

यह काम आज भी क्यों नहीं हो सकता ?

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एक्सप्रेस वालों को यह समझना चाहिए कि आपकी खबरें जनसत्ता में छप जाने से एक्सप्रेस के ग्राहक को जनसत्ता अपनी ओर नहीं खींच लेगा।

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अंग्रेजी अखबार के एक मशहूर कार्टूनिस्ट यह नहीं चाहते थे कि उनके कार्टून उस अखबार समूह के भाषाई संस्करण में छपे।

उससे वे अपनी तौहीन मानते थे।

उम्मीद है कि एक्सप्रेस में यह भावना नहीं होगी।

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  6 जनवरी 23

 


     टी.वी.चैनलों के बारे में दो शब्द

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        सुरेंद्र किशोर

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 कोई यदि मुझसे पूछे कि निजी इलेक्टा्रॅनिक मीडिया का कौन सा कार्यक्रम

 आपको अच्छा लगता है ?

कोई एक कार्यक्रम ?

मैं कहूंगा-- ‘आप की अदालत।’

 और सबसे खराब ?

मेरा जवाब होगा--किसी चैनल पर आठ या दस......... को एक साथ बैठा दिए जाएं 

और उन्हें झांव-झांव और कांव -कांव करने के लिए आपस में भिड़ा दिया जाए।

ऐसे में अधिकतर ‘अतिथियों’ की अधिकांश बातें दर्शक-श्रोता नहीं सुन पाते।

 रजत शर्मा की स्क्रीन पर और स्क्रीन से बाहर भी शालीन आवाज सुनना अच्छा लगता है,

इसलिए भी।

‘आप की अदालत’ के शुरूआती दिनों में वे मुझे भी अपनी शालीन आवाज में कभी-कभी फोन किया करते थे।

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सन 2014 के लोस चुनाव से ठीक पहले अर्नब गोस्वामी ने राहुल गांधी का एक लंबा इंटरव्यू लिया था।

तब तक अर्नब अच्छा-खासा रिसर्च करते थे-टिम सेबेस्टीयन(बी.बी.सी.) की झलक मिलती थी।

 मेरा अनुमान है कि उस एक इंटरव्यू मात्र से कांग्रेस व राहुल जी का काफी राजनीतिक और चुनावी नुकसान हो गया होगा।

अब तो अपना नुकसान करने के लिए खुद राहुल जी ही काफी हैं।

 अर्नब ने अब अपनी भूमिका बदल ली है।

पेशेवर पत्रकार से अभियानी पत्रकार तक का सफर !

खैर, उनकी नई भूमिका से मुझे कोई शिकायत नहीं।

जिस तरह मुझे रविश कुमार से भी कोई शिकायत है।

दोनों अपने -अपने काम में लगे रहें !!

मेरी शुभकामनाएं !

एक इच्छा जरूर रहती है कि अर्नब हो, या रविश वे जो भी सामग्री पेश करें,

वह रिसर्च करके करें और जो तथ्यपूर्ण हो-भले वह एकतरफा हो।

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 इतना ही कह सकता हूं कि इलेक्ट्रानिक मीडिया जैसे सशक्त माध्यम का इससे बेहतर इस्तेमाल हो सकता था।

कुछ अपवादों को छोड़कर सोशल मीडिया तो अराजक हो चुका है।

उससे कोई उम्मीद नहीं बनती।

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आज भी दूरदर्शन इस देश का वास्तविक प्रतिनिधि है,एक बात को छोड़कर।

वह यह कि बेचारा सरकार की कमियों और घोटालों की चर्चा नहीं कर सकता।

हाल में एक अच्छी बात मैंने देखी कि दूरदर्शन रिकाॅर्ड करने के बाद उसे संपादित करके ही स्क्रीन पर कोई डिबेट भेजता है।

संसद टी.वी.को भी लाइव डिबेट नहीं दिखाना चाहिए।

लाइव दिखाने की परंपरा शुरू होने के बाद पीठासीन अधिकारियों को एक बड़े अधिकार से अघोषित तौर पर ‘‘वंचित’’ कर दिया गया है।

वह यह कि वे किसी सांसद, मंत्री या प्रधान मंत्री की अवांछित टिप्पणी को कार्यवाही से निकाल सकते हैं।

अरे भई, जब दुनिया ने पहले ही देख-सुन ही लिया तो बाद में उसे कार्यवाही से निकाल कर आप 

क्या कर लेंगे ?

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5 जनवरी 23