रविवार, 5 अप्रैल 2026

 प्रो.(डा.)एस.चद्रा --एक डाॅक्टर लीक से हटकर

एम.बी.बी.एस.करने के बाद होमियोपैथिक प्रैक्टिस

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सुरेन्द्र किशोर

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बहुत पहले की बात है।

मैंने पहली बार सुना कि सुमन चन्द्रा ने पहले एम.बी.बी.एस.पास किया।उसके बाद होमियोपैथ में उन्होंने उच्च शिक्षा ग्रहण की।

लंदन में भी पढ़े।

 लंबे समय से पटना में होमियोपैथ चिकित्सा की प्रैक्टिस करते हैं।

उनसे मिलने की इच्छा थी ही।

    मशहूर पत्रकार स्वयं प्रकाश जी ने मुझे डा.चंन्द्रा से मिलवाया।

चन्द्रा साहब की जीवन संगिनी डा.अंजू चन्द्रा भी उनके साथ ही प्रैक्टिस करती हैं।

  डा.एस.चन्द्रा साहब आज सफलत्तम चिकित्सकों में एक हैं।उनके यहां भारी भीड़ रहती है।रहे भी क्यों नहीं !

मैं भी जिस किसी मर्ज के इलाज के लिए जब कभी उनसे मिला,मुझे उनके इलाज से उम्मीद से बेहतर मुझे राहत मिली ।

  डाॅक्टर, धरती के भगवान कहे जाते रहे हैं।

इस मामले में इधर स्थिति थोड़ी बदली जरूर है।

फिर भी जिन अनेक डाॅक्टरों को अब भी आप धरती का भगवान कह सकते हैं,उनमें डा.चन्द्रा प्रमुख हैं।मेरे लिए तो डा.चन्द्रा धरती के भगवान साबित भी हुए हैं। 

   ऐसे ‘धरती के भगवान’ यानी चन्द्रा दंपति के साथ मेरी और मेरी पत्नी रीता का ग्रूप फोटो हमारे लिए सौभाग्य की बात है।

(चित्र में डा.एस.चन्द्रा,सुरेन्द्र किशोर,रीता सिंह और डा.अंजू चन्द्रा)

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अगली बार के लिए उम्मीदवार न बनाये जाने के 

बावजूद हरिवंश जी की जुबान पर नीतीश कुमार 

के लिए अब भी प्रशंसा के ही शब्द आपको मिलेंगे।

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मौजूदा राजनीति में यह विरल है।

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सुरेंद्र किशोर

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राज्य सभा या विधान परिषद के टिकट से वंचित हो जाने या अगली बार फिर से नामांकित न होने पर अधिकतर नेताओं को दलीय सुप्रीमो के खिलाफ कटु शब्दों का इस्तेमाल करते और दल से नाता तोड़ते हुए दशकों से मैंने अनेक उदाहरण देखे-सुने हंै।

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चूंकि हरिवंश जी का मित्र होने का मुझे गौरव हासिल है,इसलिए मैं कुछ वैसी बातें भी जानता हूं जो सार्वजनिक नहीं हैं।

हरिवंश जी इस बात से काफी एहसानमंद रहे हैं कि नीतीश जी ने उन्हें बिन मांगे दो -दो बार राज्य सभा का सदस्य बनवाया।

हां, सन 2022 में हरिवंश जी काफी धर्म संकट में थे जब नीतीश जी राजग छोड़कर कांग्रेसनीत गठबंधन मेें शामिल हो गये थे।धर्म संकट यह था कि खुद हरिवंश जी को राज्य सभा के उप सभापति पद को छोड़ देना चाहिए या नहीं।

संभवतः राजनीतिक दूर दृष्टि वाले उनके किसी मित्र ने हरिवंश जी को बताया होगा कि खुद नीतीश जी कांग्रेस गठबंधन में अधिक दिनों तक नहीं टिकेंगे।इसलिए आपको उप सभापति का पद छोड़ने की जरूरत नहीं है। 

वही हुआ भी।

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कुछ संस्कारी लोग किसी का उपकार कभी नहीं भूलते।किंतु आज का यह जमाना ऐसा है कि मत पूछिए।

एक नमूना पेश है--

बिहार के भोजपुर इलाके के एक पूर्व एम.पी.से पूछा गया कि आप इस बार चुनाव कैसे हार गये ?

उनका जवाब था--

एक बड़े गांव के प्रभावशाली परिवार के चार बेरोजगार लड़कों को मैंने बारी -बारी से नौकरी दिलवाई।जब पांचवंे को नहीं दिलवाई तो वह परिवार मेरे खिलाफ हो गया और पूरे गांव का वोट हमारे विरोधी को दिलवा दिया।

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3 अप्रैल 26

 


मंगलवार, 24 मार्च 2026

 केरल से लेकर बिहार तक देश की शिक्षा-परीक्षा पर

लंबा प्रश्न चिन्ह खड़ा है !

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सुरेंद्र किशोर

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पीढ़ियां बर्बाद हो रही हैं।

जो राज्य सरकार परीक्षा में कदाचार रोकती है,वह अगला चुनाव हार कर सत्ता से बाहर हो जाती है।

इसलिए सत्ता कौन गंवाना चाहेगा ??

फिर उपाय क्या है ?

समझदार लोग चिंता करें और चिंतन भी।

कोई रास्ता निकालें !

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 सन 1992 में कल्याण सिंह सरकार ने नकल विरोधी कानून बनाया।

मुलायम सिंह की सरकार ने 1994 में उस कानून को रद कर दिया।

दरअसल यू.पी.बोर्ड की परीक्षा में कदाचार पूरी तरह रोक देने के कारण कल्याण सिंह की सरकार 1993 के चुनाव में सत्ता से बाहर हो गई।

1992 में बाबरी ढांचा गिराने के कारण उत्पन्न भावना को भंजाने का चुनावी लाभ तक भाजपा को नहीं मिल सका था।

(राम मंदिर से अधिक महत्वपूर्ण साबित हुई थी परीक्षा में कदाचार की छूट)

मुलायम सिंह यादव कदाचारी विद्यार्थियों व उनके अभिभावकों के ‘हीरो’ बन गए थे।

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   यानी,मुझे यह लगने लगा है कि  चुनाव लड़ने वाली कोई भी सरकार आम परीक्षाओं में नकल नहीं रोक सकती।

उसके लिए शायद किसी तानाशाह शासक की जरूरत पड़ेगी।

या फिर कोई सरकार चुनाव जीतने के प्रथम साल से ही शिक्षा-परीक्षा माफियाओं पर नकल कसना शुरू कर दे तो शायद कुछ  बात बने।

 कम से कम तकनीकी संस्थानों की हालत तो सुधरे !

  आज उद्योग जगत कहता है कि सिर्फ 27 प्रतिशत इंजीनियर ही ऐसे हैं जिन्हें नौकरी पर रखा जा सकता है।

 हमारे स्वास्थ्य की देखरेख करने वाले ‘‘धरती के भगवान’’ तो ठीकठाक पढ़- लिखकर निकलें।

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जब-जब शिक्षा -परीक्षा के ध्वस्त होने की बात होती है,तब -तब कई लोग अपनी -अपनी राजनीतिक ‘सुविधा’ के अनुसार अपना ‘टारगेट’ तय करके आरोप का गोला दागने लगते हैं।

पर 1963 से इस संबंध में मैंने जो कुछ अपनी  आंखों से देखा है,उसे संक्षेप में शेयर करता हूं।

1.-राजनीति और प्रशासन में गिरावट के अनुपात में शिक्षा में भी गिरावट होनी ही थी।

हुई भी।

2.-पहले परीक्षाओं में ‘सामंतवाद’ था।सन 1967 से उसमें ‘समाजवाद’ आ गया।

3.-इमरजेंसी में माक्र्स के आधार पर बिहार में लाखों सरकारी शिक्षक बहाल हुए।तब की सरकार ने जेपी आंदोलन को कमजोर करने के लिए यह काम किया था।

4.-सरकारी नौकरियां देने के लिए कत्र्तव्यनिष्ठ उच्च पदस्थ अफसरों व सेना की देखरेख में उम्मीदवारों की कदाचारमुक्त प्रतियोगी परीक्षाएं हों।या फिर उच्च न्यायालयों और जिला जजों की देखरेख में परीक्षाएं हों।जनहित याचिका के बाद बिहार में 1996 में वैसा हुआ था।नतीजतन बिहार इंटर बोर्ड परीक्षा में 85 प्रतिशत परीक्षार्थी फेल कर गये थे।मैट्रिक परीक्षा का रिजल्ट भी ऐसा ही रहा था।

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छोटी -छोटी टुकड़ियों में सालों भर बड़े हाॅल में ऐसी परीक्षाएं होती रहें।

तभी सिर्फ योग्य लोग ही सेवाओं में आ सकेंगे।

अब भी योग्य लोग सेवा में हैं,पर काफी कम संख्या में।

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1963 में मैं मैट्रिक की परीक्षा दे रहा था।

जिला स्कूल में केंद्र था।

उस जिले के सबसे अधिक प्रभावशाली सत्ताधारी नेता के परिवार के एक सदस्य के लिए चोरी की छूट थी।

केंद्र में किसी अन्य के लिए वह ‘सुविधा’ उपलब्ध नहीं थी।

   मैं बी.एससी.पार्ट वन की परीक्षा दे रहा था।

संयोग से उस काॅलेज के प्राचार्य के पुत्र की सीट मेरे ही हाॅल में पड़ी थी।

नतीजतन पूरे हाॅल को चोरी की छूट थी।

उसी केंद्र में किसी अन्य हाॅल में कोई छूट नहीं थी।

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उन दिनों मेडिकल - इंजीनियरिंग काॅलेजों में माक्र्स के आधार पर दाखिला हो जाता था।

प्रैक्टिकल विषयों में कुल 20 में उन्नीस अंक मिल जाने पर कम तेज उम्मीदवार भी डाक्टर या इंजीनियर आसानी से बन जाते थे।

  संयोग से मेरा रूम मेट ही इन 250 रुपयों को इधर से उधर करता था।

न जाने कितनों को उसने डाक्टर-इंजीनियर बनवा दिया।

एक दिन मुझसे उसने पूछा, 

‘का हो सुरिंदर,तुमको भी नंबर चाहिए।

तुमको कुछ कम ही पैसे लगेंगे।’’दो सौ में वह काम हो रहा था।

मैंने कहा कि मुझे कोई नौकरी नहीं करनी है।

मेरा वह रूम मेट खुद हाई स्कूल का शिक्षक बना।

ऐसे गोरखधंघे के कारण ही माक्र्स के आधार पर दाखिला बाद में बंद हो गया।

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  1967 के चुनाव के बाद परीक्षाओं में धुंआधार चोरी शुरू हो गई।

कहा भी जाने लगा कि ‘चोरी में समाजवाद’ आ गया।

महामाया सरकार ने उसे रोकने की कोशिश भी नहीं की।

छात्रगण महामाया बाबू के ‘जिगर के टुकड़े’ जो थे ! 

के.बी.सहाय की सरकार को चुनाव में हराने में छात्रों की बड़ी भूमिका थी।

1967 के आम चुनाव से पहले बड़ा छात्र और जन आंदोलन हुआ था।

छात्रों पर भी जमकर पुलिस दमन हुआ था।

मैं भी तब एक छात्र कार्यकत्र्ता था।

मैंने खुद परीक्षा छोड़ दी थी क्योंकि आंदोलन के कारण मेरी तैयारी नहीं हो पाई थी।

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1972 में केदार पांडेय की सरकार ने नागमणि और आभाष चटर्जी जैसे कत्र्तव्यनिष्ठ आई.ए.एस.अफसरों की मदद से परीक्षा में चोरी को बिलकुल समाप्त करवा दिया।

  पर सवाल है कि अगले ही साल से ही फिर चोरी किसने होने दी ?

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1996 में पटना हाईकोर्ट के सख्त आदेश और जिला जजों की निगरानी में मैट्रिक व इंटर परीक्षाआंे  में कदाचार पूरी तरह बंद कर दिया गया।शिक्षा मंत्री जयप्रकाश नारायण यादव ने प्रेस को बताया कि ‘‘शिक्षा माफिया को समाप्त कर दिया गया।’’

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पर, अगले ही साल से कदाचार फिर क्यों शुरू करवा दिया गया ?

किसने शुरू करवाया ?शिक्षा माफिया के दबाव में तब की लालू सरकार ने करवाया।क्योंकि छात्र नहीं मिलने के कारण अधिकतर निजी काॅलेज बंद होने लगे थे।

क्या कदाचार की इस महामारी के लिए आप किसी एक दल एक सरकार या एक नेता या फिर किसी एक समूह को जिम्मेवार मान कर खुश हो जाना चाहते हैं ?

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 याद रहे कि सन 1996 में बिहार इंटर विज्ञान परीक्षा में 85 प्रतिशत परीक्षार्थी फेल कर गये थे।

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सन 2026 में बिहार इंटर विज्ञान परीक्षा में 96 प्रतिशत परीक्षार्थी पास कर गये।यह चमत्कार कैसे हुआ ?

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  दिल्ली विश्वविद्यालय में सन 2022 से पहले प्राप्तांकों के आधार पर नामांकन होते थे।

यानी, राज्यों के स्कूली बोर्ड्स की परीक्षाओं में मिले अंकों के आधार पर।

  यह देखा गया कि केरल तथा कुछ दूसरे राज्यों की बोर्ड परीक्षाओं में असामान्य ढंग से 100 प्रतिशत अंक मिल रहे हैं ताकि दिल्ली विश्वविद्यालयों के विभिन्न प्रतिष्ठित काॅलेजों में उनका दाखिला हो जाये।

उसके बाद सन 2022 से दाखिला के लिए टेस्ट परीक्षा होने लगी।

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   टेस्ट परीक्षा शुरू होने से ठीक पहले केरल के 1672 छात्रों को दिल्ली विश्व विद्यालय में दाखिला मिल गया  था।

प्रतियोगी परीक्षा के बाद केरल से वह संख्या घटकर 350 रह गयी।

  दूसरी ओर, जहां पहले यानी 2021 में बिहार के 556 विद्यार्थियों को दाखिला मिला था ,वहीं टेस्ट शुरू होने के बाद 1280 बिहारी विद्यार्थी 2022 में दिल्ली यूनिवर्सिटी .में दाखिला के योग्य पाए गए।

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उधर केरल में सन 2002 में ही शिक्षा का क्या हाल हो चुका था,उसके बारे में टाइम्स आॅफ इंडिया ने एक खबर दी थी। 

14 नवंबर 2002 को छपी खबर चैंकानेे वाली थी।

चूंकि खबर केरल के बारे थी,इसलिए और भी चैंकाती थीं।उस राज्य के बारे में यह कहा जाता रहा है कि वहां सर्वाधिक साक्षरता है।माना जा रहा था कि लोग पूर्ण साक्षर हंै तो सुशिक्षित और कुशल भी होंगे।पर ,सब सुशिक्षित व कुशल वहां भी नहीं हैं।कुछ जरूर होंगे जैसे अन्य राज्यों में भी होते हैं।

  केरल के सार्वजनिक क्षेत्र के एक संस्थान ने क्लर्क आदि पद पर बहाली के लिए 2002 में विज्ञापन निकाला।करीब 13500 आवेदन आये।

उनमें से 5 हजार उम्मीदवार हाईली क्वालिफायड थे।उनमें 20 इंजीनियर और दो डाक्टर्स भी थे।

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वैसे शिक्षा-परीक्षा को लेकर बिहार की आदर्श स्थिति नहीं है।बहुत सुधार की जरूरत है।

किंतु केरल के बारे में यह सब जान-सुनकर किसी को सिर्फ बिहार को ‘‘सिंगल आउट’’ करने का नैतिक हक नहीं है। 

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और अंत में

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1963 में मैंने साइंस विषयों के साथ मैट्रिक फस्र्ट डिविजन से पास किया था।

आसपास के गांव के कई लोग मुझे देखने आये थे।

2026 में जो विद्यार्थी फेल कर गए हैं ,उन्हें देखने कुछ लोग गए होंगे !

कैसा परीक्षार्थी निकला जो बहती गंगा में भी हाथ

 नहीं धो पाया !

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24 मार्च 26 





सोमवार, 9 मार्च 2026

    पद्म सम्मान लेने मैं राष्ट्रपति भवन इसलिए नहीं गया

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   सुरेंद्र किशोर

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कई लोग यह सवाल पूछते रहे हैं कि मैं पद्म सम्मान लेने राष्ट्रपति भवन मैं क्यों नहीं गया था ?

वह अकारण नहीं था।उसका कारण मैं आपको पहली बार बताता हूं।

पद्म सम्मान की स्थापना के बाद पहली बार सन 2024 में बिहार में कार्यरत किसी बिहारी पत्रकार को,यानी मुझे यह सम्मान मिला-वह भी बिन मांगे।

मेेरी इसकी न तो कभी इच्छा रही और न ही मैंने इसके लिए किसी से याचना की।

मैंने अपने परिवार की खुशी के लिए इसे स्वीकार भी कर लिया।

मुझे मिला यह सम्मान बिहार की पत्रकारिता का भी सम्मान था।

एक ऐसे व्यक्ति को मिला जो अपने परिवार का पहला मैट्रिकुलेट हैं।किसान परिवार से आता है।गांव में पला-बढ़ा।घर में राम चरित मानस-आल्हा उदल पर पुस्तक  के अलावा पढ़ने के लिए भी कोई पुस्तक उपलब्ध नहीं थी।

,न्यूज सेंस भी यही कहता है कि बिहार की मुख्य धारा की पत्रकारिता की ओर से मुझसे पूछा जाता कि यह उपलब्धि आपने कैसे हासिल की ?

मैं कुछ बताता ताकि पत्रकारिता की अगली पीढ़ी को प्रेरणा मिले और उन्हें भी कभी पद्म सम्मान मिले।

पर, देखा कि मुख्य धारा की पत्रकारिता की इस बात में कोई रूचि नहीं थी यानी न्यूज सेंस पर ‘‘भावना’’ हावी हो गयी थी।

कुछ उल्टी-सीधी बातें भी सुनीं।इसलिए मैंने सोचा कि राष्ट्रपति भवन जाकर किसी की ‘‘भावना’’ को और अधिक आहत क्यों करूं ? 


शुक्रवार, 6 मार्च 2026

  बिहार का सी.एम.कैसा हो  ???

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बिहार का सी.एम.कैसा हो ?

योगी आदित्य नाथ जैसा हो।

चाहे जिस किसी ‘सामाजिक समूह’ से आता हो !

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जिससे भी बात हो रही है,उसकी यही आवाज है।

दरअसल बिहार और यू.पी की समस्याएं 

लगभग समान रही हैं।भीषण और जटिल हैं।

जिन समस्याओं से योगी जूझ रहे हैं,बिहार के नये

 सी.एम. में भी उन समस्याओं से उसी तरह जूझने का यदि 

जज्बा हो तो नेपाल की सीमा पर बसे बिहार की 

रक्षा-सुरक्षा बेहतर ढंग से हो सकती है।

शांति रहेगी तो देश-विदेश से बिहार में और भी निवेश आएगा।

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6 मार्च 26  


गुरुवार, 5 मार्च 2026

 मुख्य मंत्री नीतीश कुमार को 

उनके जन्म दिन पर हार्दिक बधाई !

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सुरेंद्र किशोर

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सत्तर के दशक में नीतीश कुमार ने मुझसे कहा था कि

‘‘मैं एक दिन मुख्य मंत्री जरूर बनूंगा।

मुख्य मंत्री बनकर अच्छा काम करूंगा।’’

उस समय तक वे 1977 का अपना पहला विधान 

सभा चुनाव हार चुके थे।

मैं तब ‘आज’ अखबार में काम कर रहा था।

हमलोग कभी -कभी काॅफी हाउस में मिलते थे।

तब मैं उनके इस आत्म विश्वास पर कुछ अचम्भित और कुछ सशंकित था।

लगा था कि यह तो इनका बड़बोलापन है।

लेकिन नीतीश सही साबित हुए और मैं गलत।

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कहा तो था कि ‘‘अच्छा काम करूंगा’’, किंतु मुख्य मंत्री बन कर, कर दिए ‘‘बहुत सारे अच्छे काम।’’

(मैंने 1967 से अब तक बिहार के सारे मुख्य मंत्रियों को काम करते देखा है।इसलिए यह बात कहने की स्थिति में हूं।)

इसलिए भी नीतीश को डबल बधाई।

पर ,नीतीश कुमार का एक भटकाव भी रहा,हालांकि एक ही भटकाव।

प्रधान मंत्री बनने के लोभ में उन्होंने 

 राजग को दो बार छोड़ा।उन दिनों मुझसे पूछते तो मैं नीतीश जी को बताता कि कांग्र्रेस को सत्ता यदि मिलेगी भी तो वह आपको पी.एम.नहीं बनाएगी।वैसे तो मिलेगी नहीं क्योंकि देश अभी मोदी के साथ है।

आप तो किसी को ‘‘न तो बचाते हंै और न फंसाते हंै।’’

कांग्रेस को तो एक और मनमोहन सिंह चाहिए होगा।

  मेरे मित्र उदयकांत मिश्र ने नीतीश कुमार की जीवनी लिखी है।बहुत अच्छा लिखा है,उसमें सारी बातेें आ गई हैं।

 पर, एक खास कोण से नीतीश कुमार के बारे में अब भी लिखने की जरूरत है ताकि राजनीति में जो कुछ थोड़े से आदर्शवादी लोग मौजूद हैं या आना चाहते हैं, उन्हें प्रेरणा मिले।

वह कोण यह है कि इस ‘‘बीहड़’’ प्रदेश बिहार में ‘‘बहुत अच्छा काम’’ करने के सिलसिले में नीतीश कुमार को किन -किन परेशानियों-कठिनाइयों-बाधाओं-असुविधाओं आदि का सामना करना पड़ा और उन पर उन्होंने कैसे काबू पाया।क्या -क्या न कर पाने का अफसोस रहा ?

उस क्रम में कितनों की नाराजगी झेली।कितने खुश हुए।यदि नीतीश यह सब बातें बताना चाहंे तो ही।

 जाहिर हैं कि इस बारे में तभी कोई बात करना चाहेगा जब वह सब आॅफ द रिकाॅर्ड हो।वह भी तभी हो सकेगा जब शासकीय जिम्मेदारी के दौर मुक्ति पा ले। 

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नीतीश कुमार से मेरा परिचय उस समय से हैं जब वे पटना इंजीनियरिंग काॅलेज के प्रथम वर्ष के छात्र थे।तब मैं लेहियावादी पार्टी का एक सामान्य पर सिरियस कार्यकर्ता था।नीतीश जी पटना के मुसल्लहपुर हाट के जिस कृष्णा लाॅज में रहते थे,उनके कमरे के बगल वाले कमरे में मेरा छोटा भाई नागेंद्र रहता था ।वह पटना लाॅ कालेज में छात्र था।

कहीं से पटना आने पर मैं नागेंद्र के कमरे में रुकता था।तब देखा था कि लोहिया और लोहियावादी राजनीति में तब से ही नीतीश जी गहरी रूचि थी।

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नीतीश जी को इसलिए भी बधाई क्योंकि वे राजनीति व प्रशासन में ‘‘भ्रष्टाचार की आंधी’’ और ‘‘परिवारवाद के तूफान’’ के बीच भी अविचलित होकर इन दोनों बुराइयों से कोसों दूर रहे।यह विरल है। 

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आम तौर पर पत्रकार किसी नेता खासकर सत्ताधारी नेता को इस तरह बधाई नहीं देता।पर नीतीश कुमार ने बिहार के लिए विशेष काम किया और अपने राजनीतिक जीवन के प्रारंभिक वर्षों में आर्थिक परेशानियां उठाने के बावजूद राजनीति में वे डटे रहे,इसलिए भी बधाई।

सक्रिय राजनीति में तो मैं भी करीब दस साल (1967-76) तक  था।पर उन परेशानियों को मैं नहीं झेल सका।सक्रिय पूर्णकालिक राजनीति से पलायन कर गया। पत्रकारिता में आ पहुंचा।यहां कम से कम पहले ही दिन से दोनों शाम भोजन लायक पैसे का इंतजाम हो गया।राजनीति में तो वह भी सुविधा नहीं थी।कल्पना कर सकता हूं कि नीतीश जी ने अपने वैसे दिन कैसे काटे होेंगे !

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2 मार्च 26 

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रविवार, 1 मार्च 2026

 प्रखर श्रीवास्तव की पुस्तक ‘‘हे राम’’ के बारे में 

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हमें किसी नेता,दल और विचारधारा को खुले 

मन-मिजाज से देखना -पढ़ना चाहिए।

सारे तथ्य हमारे सामने हों तो हमें कोई फैसला करने में 

सुविधा होती है।

क्योंकि न तो कोई व्यक्ति पूर्ण है और न कोई संस्था 

या विचारधारा-- न मैं, न आप और न वह।

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मेरी धारणा यह बनी है कि अपवादों को छोड़कर हमारे अधिकतर 

इतिहासकारों ने जितना जाहिर किया है,उससे अधिक छिपाया है।

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1--पहले मैं कहा करता था कि इस देश के नेताओं 

के चाल,चरित्र और चिंतन को बाहर-भीतर से जानना हो तो एम.ओ.मथाई(जवाहरलाल नेहरू के निजी सचिव)की दोनों किताबें पढ़िए।

2--बिहार के नेताओं को,जो स्वतंत्रता सेनानी भी थे, जानना हो तो अय्यर कमीशन की रपट पढ़िए।

3.--अब मैं एक और किताब उसमें जोड़ता हूं।

नई पीढ़ी को चाहिए कि वह प्रखर श्रीवास्तव की हाल में आई पुस्तक

 ‘हे राम’ जरूर पढ़े।

  प्रखर श्रीवास्तव ने अद्भुत किताब लिखी है।पुस्तक हो तो ऐसी !

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----सुरेंद्र किशोर

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1 मार्च 26

     


रविवार, 22 फ़रवरी 2026

   मैं भारतीय पहले, पत्रकार बाद में 

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सुरेंद्र किशोर

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मैं पत्रकार हूं।

लेखक हूं।

किसान भी हूं।

गृहस्थ हूं।

पर,सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि मैं इस देश का

नागरिक हूं।

एक नागरिक के रूप में मैं चाहता हूं कि यह देश 

लोकतांत्रिक बना रहे।पर दूसरी ओर देश-विदेश की हिंसक-अंिहंसक शक्तियां इसे इस्लामिक देश बनाने के लिए जी-जान से लगी हुई हैं।

कुछ लोग वोट के लिए और अन्य लोग ‘गजवा ए हिन्द’ के लिए

अपनी- अपनी शैली में प्रयत्नशील हैं।

कई जगह दोनों तत्व जाने-अनजाने एक दूसरे के मददगार

 बन रहे हैं।

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मध्य युग की वापसी की कोशिश को रोकने का मेरा प्रयास है।भले यह

गिलहरी प्रयास है,पर जारी रहेगा।

ताकि, मेरे वंशज को भी सनातन धर्म-संस्कृति का शांतिपूर्वक पालन करने की अनंत काल तक सुविधा उपलब्ध रहे।

इस क्रम में बाकी बातें मेरे लिए कोई महत्वहीन हैं।

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इसी बात को ध्यान में रखते हुए कोई व्यक्ति मेरे लेख या पोस्ट को पढ़े।

मुझसे जो बिलकुल सहमत नहीं हैं,उन्हें मेरा फेसबुक फें्रड बने रहने का कोई औचित्य नहीं है।

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 22 फरवरी 26


 कितने दूरदर्शी थे अटल जी !

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वाजपेयी जी यह जानते थे कि भारत की एक पार्टी 

को बर्बाद करने की क्षमता किस व्यक्ति में है !

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सुरेंद्र किशोर

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   प्रधान मंत्री अटल बिहारी वाजपेयी जान गए थे कि अमेरिका में गिरफ्तार इसी व्यक्ति में अपनी ही पार्टी को नष्ट करने की पूरी क्षमता है।

वह क्षमता अकेली मेरी पार्टी में नहीं है।भाजपा को परोक्ष मदद चाहिए होगी !

  इसलिए उस व्यक्ति को तब के प्रधान मंत्री वाजपेयी ने अमरीकी सरकार पर अपने प्रभाव का उपयोग करके साफ रिहा करवा दिया।यानी गिरफ्तारी से संबंधित कागज-पत्र भी गायब करवा दिया।हालांकि वहां के अखबार में गिरफ्तारी की यह खबर छपी थी।

अटल जी का पूर्वानुमान सही साबित हो रहा है।

यहां अपनी पार्टी को बर्बाद करने का वह काम वे तेजी से कर रहे हैं।

सन 2015 में डा.सुब्रह्मण्यम स्वामी ने सार्वजनिक रूप से उस ‘‘क्षमतावान’’ व्यक्ति का नाम भी बताया था।

डा.स्वामी का वह बयान,जिसमंे नाम छपा था, 20 जून 2015 के दैनिक भास्कर में छपा था।

उस अखबार की कटिंग मेरे पास है।

पर,मैं नाम नहीं बताऊंगा।

अब आप कल्पना कीजिए कितने दूरदर्शी 

थे अटल जी !!!

अटल जी की मदद से व्यक्ति रिहा नहीं हुआ होता तो उसे अमेरिका के कानून के अनुसार वहां 25 साल की सजा हो गई होती।

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22 फरवरी 26


 देश के बड़े पत्रकार और चिंतक दिलीप मंडल के अनुसार,

‘‘संसद की कार्यवाही में दर्ज है और कोई भी इसे चेक कर सकता है कि इंदिरा गांधी सरकार में कानून और वक्फ मंत्री रहे मोहम्मद यूनुस सलीम ने राज्य सभा में गर्व के साथ विस्तार से बताया था--‘‘हां, न्यायप्रिय बादशाह औरंगजेब ने काशी में विश्वनाथ मंदिर को तोड़ा था।’’

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इतिहासकार इरफान हबीब ने भी कहा है कि ‘‘औरंगजेब ने काशी और मथुरा में मंदिरों को ध्वस्त कर दिया था।’’

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पर,इसके बावजूद मुस्लिम वोटलोलुप राजनीतिक दल,मुस्लिम धार्मिक नेता,वामपंथी इतिहासकार और पथ भटके पत्रकार-बुद्धिजीवी  इन मामलों में लगातार झूठ क्यों बोलते हैं ?

 उनके झूठ बोलने के कारण ही हिन्दू वोट भाजपा कीे ओर जाता रहा है।

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सन 2002 में गोधरा में जेहादियों ने 59 कार सेवकों को जिन्दा जला दिया था।कितने तथाकथित सेक्युलर व भाजपा विरोधी दलों ने उस मानव दहन कांड की सार्वजनिक तौर पर निन्दा की ?

आज भी कितने वैसे लोग बंगाल में प्रस्तावित बाबरी मस्जिद का विरोध कर रहे हैं ?

इसके बावजूद कोई चाहेगा कि भाजपा न बढ़े तो हिन्दू बहुल देश में यह कैसे हो सकता है ?

जबकि भारत के भीतर भी तरह तरह के ‘जेहादी हिंसा’ में इन दिनों बड़ी संख्या में देशी-विदेशी मुस्लिम लगे हुए हैं।ऐसे जेहादियों के खिलाफ कितने भाजपा विरोधी नेताओं के बयान आते हैं ?

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बुधवार, 18 फ़रवरी 2026

 पहले से कुछ हिन्दी अखबार पटना के पास के जेपी गंगा पथ को मरीन ड्राइव लिखते रहे हैं।

अब तो पटना के अंग्रेजी अखबार भी जेपी गंगा पथ को मरीन ड्राइव लिखने लगे हैं।

क्या बिहार सरकार ने जेपी गंगा पथ का नाम बदल कर मरीन ड्राइव कर दिया है ?

क्योंकि मैं यह बात नहीं मान सकता कि अंग्रेजी के पत्रकारों को भी अंग्रेजी मरीन शब्द का हिन्दी अर्थ नहीं मालूम।

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अब क्या पटना के बिस्कोमान टावर का नाम हम अखबार में किसी दिन एफिल टावर पढंेगे ?

 एफिल टावर पेरिस में है।मरीन ड्राइव बंबई में है--जाहिर है समुद्र किनारे।


मंगलवार, 3 फ़रवरी 2026

    20 लाख किताबों वाली निजी लाइ्रब्रेरी के मालिक 

   को इस साल का पद्म श्री सम्मान

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बेंगलुरु से प्रभाकर मणि तिवारी की एक बहुत ही अच्छी,प्रेरणादायक खबर 

दैनिक भास्कर में छपी है।

खबर के शीर्षक और उप शीर्षक से ही पूरी कहानी आप जान जाएंगे।

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उपलब्धि - कर्नाटका के एन.के.गौड़ा को अनूठे काम के लिए 

(सन 2026 का ) पद्म श्री सम्मान दिया जाएगा

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80 प्रतिशत वेतन किताबों पर खर्च कर बनाई देश की सबसे बड़ी 

निजी लाइब्रेरी 

घर में 20 लाख किताबें , फर्श पर सोते हैं।

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लाइब्रेरी में कुछ किताबें दो से तीन सौ साल पुरानी

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यहां पुराण,उपनिषदों और कुरान,दो से तीन सौ साल पुरानी इतिहास की किताबों के 

अलावा रामायण और महाभारत के तीन -तीन हजार संस्करण हंै---आदि आदि

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मेरे पास भी पटना में एक संपन्न निजी लाइब्रेरी है।

पर एन.के गौड़ा के मुकाबले यह कुछ भी नहीं।

उनके पास तो बहुमूल्य हीरा है।

पर, मैं अपने अनुभवों के आधार पर यह कल्पना कर सकता हूं कि किसी संपन्न लाइब्रेरी 

का रख-रखाब कितना

 कठिन श्रम,एकाग्रता और साधन खोजता है।

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 मेरे निजी पुस्तकालय सह संदर्भालय में अब करीब तीन दर्जन आलमारियां हैं।पर,मेरी लाइब्रेरी अनमोल 

पुस्तक आधारित नहीं बल्कि साठ-सत्तर-अस्सी के दशकों के अब अप्राप्य पत्रिकाएं आधारित हैं।मेरे पास कुछ सौ अच्छी 

किताबों के अलावा ऐसे सैकड़ों विषयवार लिफाफे हैं जिनमें संबंधित विषयों की अखबारी कतरनें भरी पड़ी हैं।जिस विषय की 

कल्पना कीजिएगा ,उम्मीद है,उस विषय से संबंधित कटिंग यहां मिल जाएंगी।ऐसी कटिंग्स तैयार करने 

के लिए मैं दिल्ली और पटना के एक दर्जन अखबार खरीदता हूं।

यह सब अखबारी लेखन और अब पुस्तक लेखन में सहायक होते हैं।

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अपवादों को छोड़ दें तो मोदी सरकार इन दिनों एन.के.गौड़ा जैसे अनूठे काम करने

वालों को ही पद्म सम्मान से 

सम्मानित करती है।हां, अपवाद स्वरूप कुछ नेता भी राजनीतिक कारणों से पद्म सम्मान

पा रहे हैं। 

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यदि एन.के.गौड़ा साहब ओड़िशा के मूल निवासी होते तो उन्हें वहां की सरकार हर माह 

30 हजार रुपए मानदेय देती जिससे उन्हें 

अपने अनोखे लाइब्रेरी के रख-रखाव में सुविधा होती।वह सरकार तथा देश के तीन अन्य 

राज्य सरकारें अपने 

यहां के पद्म अवार्डियों को मासिक मानदेश देती है।

पर, याद रहे कि पदम् अवार्डीज को न तो भारत सरकार कोई मानदेय देती है और न ही चार राज्य सरकारों

 को छोड़ कर इस देश की कोई अन्य राज्य सरकार।

इसे विरोधाभास ही कहेंगे।मेरा मानना है कि या तो कोई सरकार मानदेय

 न दे या सारे राज्य सरकार दें।या, खुद केंद्र सरकार देना शुरू करे। 

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करीब दो दशक पहले प्रभाष जोशी और डा.नामवर सिंह मेरे पटना स्थित आवास पर आये थे।

मेरी लाइब्रेरी में तब सिर्फ 15 आलमारियां थीं।उनमें रखी सामग्री को देखकर प्रभाष जोशी ने कहा था 

कि ‘‘मेेरी जानकारी के अनुसार देश के किसी अन्य पत्रकार के पास इतनी संपन्न निजी लाइबे्ररी नहीं है।’’

डा.नामवर सिंह ने दिनमान (1965 से आखिरी अंक तक-बीच के कुछ अंक गायब हैं।)को देखकर कहा था-

‘‘सुरेंद्र जी,आपने तो हीरा संजो कर रखा है।’’

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अब तो आलमारियों की संख्या तीस हो चुकी है।बढ़ती ही जा रही हैं।

मेरे सामने समस्या है--मेरी निजी पक्की आय सिर्फ 1261 रुपए मासिक है--पीएफ.पेंशन।

बाकी अखबारों में लिखकर कमाता हूं।

गांव में खेती कराने जा रहा हूं।वहां से कुछ आय हो सकती है।

मेरी लाइब्रेरी को अपडेट करते जाने में समय,साधन और एकाग्रता की जरूरत रहती है।

मेरी उम्र भी बढ़ रही है।सहायक की जरूरत महसूस होती है।अपने लेखन के काम को भी 

जारी रखना है।वैसे मेरे बाद मेरे परिवार में एकाधिक सदस्य हंै जो इस लाइब्रेरी को ंसंभाल सकते हैं।

उनकी रूचि भी है और उनका पेशा भी इसके अनुकूल है।प्रतिभा भी है।

मेरी पहली पुस्तक की सफलता के बाद दूसरी किताब की तैयारी में लग गया हूं।

देखे आगे- आगे क्या होता है !

अल्ला जाने क्या होगा आगे ??

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अंत में एन.के. गौड़ा साहब को सलाम !

प्रभाकर मणि तिवारी और दैनिक भास्कर को धन्यवाद जिन्होंने ऐसी बहुमूल्य जानकारी दी।

पद्म श्री चयन समिति को भी धन्यवाद जिसने गौड़ा के रूप में एक और मोती 

चुन लिया है।

पर यदि गौड़ा इच्छा प्रकट करें तो उनके लिए कुछ आर्थिक साधन का भी प्रबंध करंे केंद्र व राज्य सरकारें।

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1 फरवरी 26   


 


ं   ं


गुरुवार, 22 जनवरी 2026

 बिहार विधान सभा चुनाव नतीजों पर बिहार की 

त्रैमासिक पत्रिका ‘‘न्यूज हाट’’ का संग्रहणीय अंक

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सुरेंद्र किशोर

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गत बिहार विधान सभा चुनाव के नतीजों को लेकर बिहार की त्रैमासिक पत्रिका ‘‘न्यूज हाट’’ने अपने ताजा अंक में विस्तार से जानकारियां दी हैं।

इसलिए मेरे निजी संदर्भालय के लिए यह अंक (अक्तूबर-दिसंबर 2025)संग्रहणीय है।

  लोक सभा-विधान सभा चुनावों के नतीजों से संबंधित खबरों का भी मेरे यहां दस्तावेजीकरण होता रहता है।न्यूज हाट ने मेरा काम थोड़ा आसान कर दिया है।

सन 2025 के बिहार विधान सभा चुनाव पर कोई पत्रिका विशेषांक निकाले और उसमें प्रशांत किशोर की अलग से चर्चा न हो ,ऐसा कैसे हो सकता है ! प्रशंात किशोर पर प्रकाशित लेख का शीर्षक एकदम सटीक है--

‘फुस्स’ हो गये प्रशांत किशोर’

इस अंक में मेरा जो लेख छपा है,वह जेपी आंदोलन पर है।

खासकर 18 मार्च 1974 की ऐतिहासिक घटनाओं का विवरण है।संवाददाता के रूप में मैंने उस दिन यानी 18 मार्च 1974 को पटना के विभिन्न घटनास्थलों का दौरा किया था।

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21 जनवरी 26

  



बुधवार, 7 जनवरी 2026

 पत्रकार अमलेंदु भाई को

 भाव-भीनी श्रद्धांजलि

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सुरेंद्र किशोर

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अपने समय के जाने-माने पत्रकार अमलेंदु नारायण सिन्हा का

कल पटना स्थित उनके आवास पर निधन हो गया।

मेरी श्रद्धांजलि।

खुश मिजाज और प्रभावशाली व्यक्तित्व के धनी अमलेंदु भाई ने सन 

1973 में चर्चित राजेश्वरी हत्या कांड की खबर ब्रेक की थी।तब वे दैनिक 

‘सर्चलाइट’ में काम कर रहे थे।कमिश्नर स्तर के एक आई.ए.एस.अफसर की वह पत्नी थीं।उनकी रहस्यमय ढंग से हत्या कर दी गयी थी।

उस आरोप में अफसर एन.नागमणि जेल भी गये थे।पर, बाद में वे 

अदालत से दोषमुक्त करार दे दिए गए।

संवाददाता के रूप में अमलेंदु भाई के साथ मैं अक्सर प्रेस कांफे्रंसेज में शामिल हुआ करता था।

उनकी रपटें पढ़ता था।उस जमाने में अक्सर जूनियर पत्रकार अपने सिनियर से

कुछ -कुछ सीखा करते थे।जाहिर है अमलेंदु जी मुझसे वरीय थे।

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7 जनवरी 26

 


मंगलवार, 6 जनवरी 2026

मत चूको चैहान ! ------------ मुख्य मंत्री नीतीश कुमार की हरी झंडी के बाद ‘सम्राट-विजय’ को चाहिए कि वे अपराध-भ्रष्टाचार विरोधी अपने अभियान को और तेज, और सघन कर दें। -------------- सुरेंद्र किशोर ---------- इतिहास ने आप लोगों को जो मौका दिया है,उसे किसी बाहरी-भीतरी दबाव में आकर गंवा देने से न तो बिहार की जनता को फायदा है और न ही आपके राजनीतिक करियर को। ------------------------ बिहार के उप मुख्य मंत्री द्वय सम्राट चैधरी और विजय कुमार सिन्हा के क्रमशः अपराध-अतिक्रमण विरोधी और भ्रष्टाचार विरोधी अभूतपूर्व अभियानों से राज्य की शांतिप्रिय जनता इन दिनों गद्गद् है।उसे बेहतरी की उम्मीद बंधी है। इसे स्थायी खुशी में बदलने का भार इन दो युवा और उत्साही नेताओं पर है। इतिहास ने इन्हें सुनहरा मौका दिया है।अवसर उपलब्ध है तो आप मौके पर चैका लगाइए। इस बीच मुख्य मंत्री नीतीश कुमार ने कल कह ही दिया कि ‘‘सम्राट बहुत अच्छा काम कर रहे हैं और आगे बहुत दूर तक जाएंगे।’’ अब क्या चाहिए -------------- हांके भीम बढ़े चैगुना !! -------------- हनुमान की तरह अपनी ताकत पहचानिए।जनता साथ है तो सत्ता की ताकत के सामने कोई अन्य ताकत कारगर नहीं हो पाएगी। जो कर रहे हैं , उस ऐतिहासिक काम में चैगुना जोर लगा दीजिए। इतिहास में अपना नाम स्थायी तौर पर दर्ज करा दीजिए। आम लोगों को तो काम से मतलब है।उन्हें अपराध-भ्रष्टाचार-अतिक्रमण से राहत से मतलब है। अपनी मौजूदा पीड़ा दूर होने से मतलब है।अपवादों को छोड़कर वे जातपात नहीं देखते यदि नेता अच्छा काम कर रहा हो। -------------- इस देश में मौका मिलने पर चैका लगाने वाले नेताआंे में खुद नीतीश कुमार भी शामिल हैं। उन्होंने बिहार को बदल दिया। निहितस्वार्थ के चंगुल में फंसे बिना नीतीश ने राज्य का लगभग कायापलट कर दिया। उस काम को और बेहतर करने के लिए जरूरी है कि सड़कों पर से अतिक्रमण हटे। सरकारी आॅफिसेज में जारी भीषण भ्रष्टाचार दूर हो और राजनीतिक संरक्षण प्राप्त खूंखार अपराधी भी यह महसूस करें कि जो काम योगी आदित्य नाथ यू.पी.में कर सकते हैं,वही काम बिहार का एक ‘‘सम्राट’’ भी करके लोगों का ‘‘हृृदय सम्राट’’ बन सकता है। बाबा तो यू.पी.में हृदय सम्राट बन ही चुके हंै। वहां के आम लोग खुश हैं।यहां तक कि मुस्लिम महिलाएं भी टी.वी.चैनलों पर कहती हैं कि बाबा के राज में हम अब रात-बिरात सड़कों पर निकल सकती हैं। आम लोग कहने लगे हैं कि अगला प्रधान मंत्री योगी को ही बनना चाहिए। ---------------- वी.पी.सिंह बाद में प्रधान मंत्री बने थे।पर जनता ने उन्हें पहले ही प्रधान मंत्री मान लिया था। क्योंकि वी.पी.ने भ्रष्टाचार के खिलाफ समझौता विहीन अभियान चला दिया था। नरेंद्र मोदी जब मुख्य मंत्री थे तभी उनके अच्छे कामों के कारण देश के अनेक लोग उन्हें पी.एम.पद पर देखना चाहते थे। राम जेठमलानी ने रजत शर्मा से बातचीत में तभी कहा था कि मैं देश में जहां भी जाता हूं लोग पूछते हैं--‘‘मोदी को प्रधान मंत्री कब बना रहे हो ?’’ --------------- जनसत्ता के संवाददाता के रूप में मैंने इस बात को जानने के लिए बिहार में व्यापक सर्वे करवाया था कि अगला मुख्य मंत्री आप किसको बनाना चाहते हैं ? तब के बिहार के मुख्य मंत्री भागवत झा आजाद के भ्रष्टाचार विरोधी अभियान से लगभग 75 प्रतिशत जनता दोबारा आजाद जी को ही सी.एम.बनाना चाहती थी। क्योंकि आजाद जी ने कांग्रेस के निहितस्वार्थियों के कड़े विरोध को ठुकरा कर अपना सुधार अभियान जारी रखा था।आजाद ने ताकतवर सहकारी माफियाओं के होश ठिकाने लगा दिए थे। यदि कांग्रेस हाईकमान ने,जिसने कभी ईमानदार नेता को बरदाश्त नहीं किया ,आजाद जी को मुख्य मंत्री पद से हटाया नहीं होता तो बिहार के अगले मुख्य मंत्री भी दोबारा आजाद जी ही होते,ऐसा मुझे तब सर्वे से लग गया था। ---------- जैसा कि आम तौर से होता रहा है,मौजूदा बिहार राजग के कुछ नेता,कार्यकर्ता या कुछ निहितस्वार्थी लोग ईष्र्या वश या स्वार्थवश विजय-सम्राट की जोड़ी के इन अच्छे कामों के विरोधी होंगे। पर इस जोड़ी को भी जनहित में यह चाहिए कि वे आंतरिक विरोध को दबा दें या नजरअंदाज कर दें। उसके दबाव में नहीं आएं। तभी सम्राट चैधरी और विजय कुमार सिन्हा राज्य का पूरा भला कर पाएंगे जैसा कि वे करना चाहते हैं।ध्यान रहे, कोई काम अधूरा न रहे। सांप को घायल करके नहीं छोड़ा जाता। ------------------ 5 जनवरी 26

 मत चूको चैहान !

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मुख्य मंत्री नीतीश कुमार की हरी झंडी के बाद ‘सम्राट-विजय’ 

को चाहिए कि वे अपराध-भ्रष्टाचार विरोधी अपने 

अभियान को और तेज, और सघन कर दें।

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सुरेंद्र किशोर

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इतिहास ने आप लोगों को जो मौका दिया है,उसे किसी बाहरी-भीतरी दबाव 

में आकर गंवा देने से न तो बिहार की जनता को फायदा है और न ही 

आपके राजनीतिक करियर को।

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बिहार के उप मुख्य मंत्री द्वय सम्राट चैधरी और विजय कुमार सिन्हा के

क्रमशः अपराध-अतिक्रमण विरोधी और भ्रष्टाचार विरोधी अभूतपूर्व अभियानों से

राज्य की शांतिप्रिय जनता इन दिनों गद्गद् है।उसे बेहतरी की उम्मीद बंधी है।

  इसे स्थायी खुशी में बदलने का भार इन दो युवा और उत्साही नेताओं पर है।

इतिहास ने इन्हें सुनहरा मौका दिया है।अवसर उपलब्ध है तो आप मौके पर चैका लगाइए।

इस बीच मुख्य मंत्री नीतीश कुमार ने कल कह ही दिया कि ‘‘सम्राट बहुत 

अच्छा काम कर रहे हैं और आगे बहुत दूर तक जाएंगे।’’

अब क्या चाहिए 

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हांके भीम बढ़े चैगुना !!

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हनुमान की तरह अपनी ताकत पहचानिए।जनता साथ है तो सत्ता की ताकत 

के सामने कोई अन्य ताकत कारगर नहीं हो पाएगी।

जो कर रहे हैं , उस ऐतिहासिक काम में चैगुना जोर लगा दीजिए।

इतिहास में अपना नाम स्थायी तौर पर दर्ज करा दीजिए।

आम लोगों को तो काम से मतलब है।उन्हें अपराध-भ्रष्टाचार-अतिक्रमण

 से राहत से मतलब है।

अपनी मौजूदा पीड़ा दूर होने से मतलब है।अपवादों को छोड़कर वे जातपात नहीं देखते

यदि नेता अच्छा काम कर रहा हो।

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इस देश में मौका मिलने पर चैका लगाने वाले नेताआंे में खुद नीतीश कुमार भी शामिल हैं।

उन्होंने बिहार को बदल दिया।

 निहितस्वार्थ के चंगुल में फंसे बिना नीतीश ने राज्य का लगभग कायापलट कर दिया।

उस काम को और बेहतर करने के लिए जरूरी है कि सड़कों पर से अतिक्रमण हटे।

सरकारी आॅफिसेज में जारी भीषण भ्रष्टाचार दूर हो 

और राजनीतिक संरक्षण प्राप्त खूंखार अपराधी भी यह महसूस करें कि जो काम योगी आदित्य नाथ यू.पी.में कर सकते हैं,वही काम बिहार का एक ‘‘सम्राट’’ भी करके लोगों का ‘‘हृृदय सम्राट’’ बन सकता है।

बाबा तो यू.पी.में हृदय सम्राट बन ही चुके हंै।

   वहां के आम लोग खुश हैं।यहां तक कि मुस्लिम महिलाएं भी टी.वी.चैनलों पर कहती हैं कि बाबा के राज में हम अब रात-बिरात सड़कों पर निकल सकती हैं।

आम लोग कहने लगे हैं कि अगला प्रधान मंत्री योगी को ही बनना चाहिए।

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वी.पी.सिंह बाद में प्रधान मंत्री बने थे।पर जनता ने उन्हें पहले ही प्रधान मंत्री मान लिया था।

क्योंकि वी.पी.ने भ्रष्टाचार के खिलाफ समझौता विहीन अभियान चला दिया था।

नरेंद्र मोदी जब मुख्य मंत्री थे तभी उनके अच्छे कामों के कारण देश के अनेक लोग उन्हें पी.एम.पद पर देखना चाहते थे।

राम जेठमलानी ने रजत शर्मा से बातचीत में तभी कहा था कि मैं देश में जहां भी जाता हूं लोग पूछते हैं--‘‘मोदी को प्रधान मंत्री कब बना रहे हो ?’’

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जनसत्ता के संवाददाता के रूप में मैंने इस बात को जानने के लिए बिहार में व्यापक सर्वे करवाया था कि अगला मुख्य मंत्री आप किसको बनाना चाहते हैं ?

तब के बिहार के मुख्य मंत्री भागवत झा आजाद के भ्रष्टाचार विरोधी अभियान से लगभग  75 प्रतिशत जनता दोबारा आजाद जी को ही सी.एम.बनाना चाहती थी।

क्योंकि आजाद जी ने कांग्रेस के निहितस्वार्थियों के कड़े विरोध को ठुकरा कर अपना सुधार अभियान जारी रखा था।आजाद ने ताकतवर सहकारी माफियाओं के होश ठिकाने लगा दिए थे।

यदि कांग्रेस हाईकमान ने,जिसने कभी ईमानदार नेता को बरदाश्त नहीं किया ,आजाद जी को मुख्य मंत्री पद से हटाया नहीं होता तो बिहार के अगले मुख्य मंत्री भी दोबारा आजाद जी ही होते,ऐसा मुझे तब सर्वे से लग गया था।

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जैसा कि आम तौर से होता रहा है,मौजूदा बिहार राजग के कुछ नेता,कार्यकर्ता या कुछ निहितस्वार्थी लोग ईष्र्या 

वश या स्वार्थवश विजय-सम्राट की जोड़ी के इन अच्छे

कामों के विरोधी होंगे।

पर इस जोड़ी को भी जनहित में यह चाहिए

कि वे आंतरिक विरोध को दबा दें या नजरअंदाज कर दें।

उसके दबाव में नहीं आएं।

तभी सम्राट चैधरी और विजय कुमार सिन्हा राज्य का पूरा भला कर पाएंगे जैसा कि वे करना चाहते हैं।ध्यान रहे, कोई काम अधूरा न रहे।

सांप को घायल करके नहीं छोड़ा जाता।

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5 जनवरी 26 



सोमवार, 5 जनवरी 2026

 डा.राम मनोहर लोहिया की भविष्यवाणी

 सही साबित हो रही है

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सुरेंद्र किशोर

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डा.राम मनोहर लोहिया ने कहा था कि 

‘‘जो लोग राजनीति में हैं,उन्हें संपत्ति 

और संतति से दूर रहना चाहिए।’’

इसलिए कहा था क्योंकि डा.लोहिया जानते थे कि दूर नहीं रहने के

 कुपरिणाम भयानक होंगे।

शुरुआती पीढ़ी के समाजवादी नेतागण मधु लिमये,राजनारायण,

कर्पूरी ठाकुुर आदि  आदि

तो संपत्ति-संतति से दूर रहे।पर, बाद की पीढ़ियों के कई तथाकथित 

समाजवादी नेता इन मामलों में कांग्रेस से भी आगे निकल गये।

उसका कुपरिणाम कांग्रेस से लेकर अन्य दल आज भुगत रहे हैं।

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गांधी और लोहिया के नाम लेकर राजनीति करने वालों ने 

यदि लोहिया की चेतावनी पर ध्यान दिया होता,धन,जाति,संप्रदाय व 

परिवारवाद के मामलों में संयम रखा होता तो उन नेताओं 

और उनके दलों की आज जैसी दुर्दशा नहीं होती।

अयोग्य पारिवारिक उत्तराधिकारियों के कारण दल के दल बर्बाद हो रहे हैं।

जेहादी वोट बैंक के चक्कर में उनका जन समर्थन घट रहा है।संतति के 

लिए येन केन प्रकारेण देश-विदेश में अपार धन -संपत्ति एकत्र करने के लोभ में इस 

देश के अनेेक नेतागण गंभीर मुकदमे झेल रहे हैं।

उन मुकदमों के परिणामों से बचने का कोई उपाय भी नहीं है।

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यदि बांग्ला देश में हिन्दू संहार जारी रहा और भारत के लोग अपने टी.वी.सेटों 

पर उन निर्मम दृश्यों को देख-देखकर मध्य युग की कल्पना करते रहे तो

 जातीय-सांप्रदायिक वोट बैंक के सौदागर राजनीतिक दलों की 

बची-खुची ताकत भी देर-सबेर अब समाप्त ही हो जाएगी।

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5 जनवरी 26

  



रविवार, 4 जनवरी 2026

 अपने बहाने देश के लाखों पी.एफ.पेंशनधारियों

 की पीड़ा का प्रकटीकरण

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सुरेंद्र किशोर

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मेरी पी.एफ.पेंशन राशि जो सन 2005 में तय हुई,

वह राशि आज भी उतनी ही (1231 रुपए)

मुझे अनवरत मिल रही है।उसमें एक रुपए 

की भी कटौती नहीं की भारत सरकार ने।

क्या उसकी यह कम कृपा है मुझ पर ?!!

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मेरी पक्की आय 1231 रुपए मासिक ही है।यह पी.एफ.एफ.पेंशन

 योजना के तहत मुझे उपलब्ध है।

इसके अलावा अखबारों में लेख लिखकर या यदाकदा पुस्तक लेखन से 

कमाता हूं।

मैं केंद्र सरकार, पी.एफ.के कंेद्रीय न्यासी बोर्ड, केंद्रीय श्रम 

व वित्त मंत्रालय का आभारी हूं जिसने

इस 1231 रुपए की राशि में कभी कोई कटौती नहीं की।हां,यदि 

अवमूल्यन के कारण 2005 में 1231 रुपए की जितनी क्रय शक्ति थी,वह घट गई 

है तो इसमें केंद्र सरकार का भला क्या कसूर ?!

मुझे पेंशन 2005 से मिलती है।इस पेंशन योजना में बढ़ोत्तरी का 

कोई प्रावधान ही नहीं है।जिसने महंगी को ध्यान में नहीं रखा,बढ़ोत्तरी का प्रावधान नहीं किया,

उसका दिमाग कितना क्रूर होगा,उसकी कल्पना कर लीजिए।

यह योजना प्रधान मंत्री पी.वी.नरसिंह राव के शासन काल में 

शुरू हुई।यह संयोग नहीं है कि राव साहब ने ही सांसद क्षेत्र 

विकास फंड शुरू किया।उस फंड के बारे में केंद्रीय मंत्री जीतनराम 

मांझी ने हाल ही में बयान दिया है कि सभी एम.पी.-विधायक इस फंड 

में कमीशन लेते हैं।नरसिंह राव कितने दूरदृष्टि वाले नेता थे !!

अपने पेशेवालों का भला कर गये।

दूसरी ओर नरसिंह राव सरकार,जिसके वित्त मंत्री मनमोहन सिंह थे,यह 

 सरकार मानती थी कि कुछ लाख रिटायर कर्मचारियों को 

दिव्य भारतीय अपरिग्रही परंपरा के अनुसार अपने पर खर्च 

समय बीतने के साथ घटाते जाना चाहिए।या प्राचीन संतों की तरह वन में 

जाकर कंद-मूल खाकर गुजारा करना चाहिए।

यदि राव साहब सेवानिवृतों पर ही खर्च कर देते तो एक से एक घोटालों के जरिए 

अपने लोगों को उपकृत करने के लिए पैसे बेचारे कहां से आते ?

उनका अपना भी परिवार बहुत बड़ा था।उसकी भी राक्षसी साॅरी ‘‘राजसी इच्छाएं’’ थीं।

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पी.एफ.पेंशन में वृद्धि के लिए सन 2011 में राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग के सदस्य व 

बिहार सरकार के पूर्व मंत्री डा.शकील उज्जमा अंसारी ने तब के केंद्रीय श्रम एवं 

रोजगार मंत्री मल्लिकार्जुन खरगे को पत्र लिखा था।

खरगे साहब ने एक रूटीन टाइप का जवाब दे दिया।

राज्य सभा के उप सभापति पद पर आसीन होने से पहले सदस्य के रूप में 

हरिवंश जी ने मेरे नाम का जिक्र करते हुए राज्य सभा में इस पेंशन में बढ़ोत्तरी 

की जरूरत के लिए जोरदार आवाज उठाई थी।

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पी.एफ.पेंशनर्स संघ के लोग इस संबंध में तो वर्षों से बढ़ोत्तरी के लिए 

संगठित रूप से आवाज उठाते रहे हैं।

पर नरेंद्र मोदी सरकार भी शायद यह चाहती है कि इस अनोखी पेंशन योजना 

का नाम गिन्नी बुक आॅफ वल्र्ड रिकाॅर्ड में शामिल हो जाये।शायद दुनिया की 

यह एक मात्र पेंशन योजना है जिसमें महंगी का ध्यान रखते हुए बढ़ोत्तरी का कोई 

प्रावधान ही नहीं है।ऐसा सिर्फ ऋषियों के देश भारत में ही

संभव है।

किसी ने मुझे बताया कि यदि आप ओड़िशा या तीन अन्य राज्यों में से किसी राज्य के मूल निवासी 

होते तो आपको पद्मश्री अवार्डी होने के नाते हर माह 30 हजार रुपए (ओड़िशा)का मानदेय मिल जाता।

  पर, यह भी पता चला कि बिहार के किसी पद्मश्री अवार्डी ने ऐसे ही मानदेय के लिए उप मुख्य मंत्री विजय कुमार सिन्हा से आग्रह किया था।उस पर सिन्हा साहब ने कहा कि पद्मश्री अवार्डी लोगों की निजी आय बहुत है।

जहां तक मेरी जानकारी है,कुछ लोगों के बारे में यह बात सच है।

पर जिस तरह के अभावग्रस्त लोगों को भी मोदी सरकार ने पद्म अवार्ड देना शुरू किया है,वैसे में विजय बाबू की बात अनेक अवार्डी पर लागू नहीं होती।

सन 2025 में बिहार के समाज सेवी सह पत्रकार भीम सिंह भवेश को पद्म सम्मान मिला।

भवेश जी की पक्की आय सिर्फ 3 हजार रुपए मासिक है।

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खैर,इन सब मामलों को मैं ज्यादा तुल नहीं देता।मैंने अपने लिए सन 1965 से ही निजी लाइब्रेरी खड़ी करनी शुरू कर दी थी।मैं जानता था कि पत्रकारिता का जीवन आर्थिक रूप से कोई संतोष देने वाला नहीं होगा।इसलिए रिटायर होने पर स्वतंत्र पत्रकार के रूप में लेखन करना होगा जो मैं कर रहा हूं।

उससे मेरी आय अच्छी-खासी हैं।क्योंकि मेरे पास जो लाइब्रेरी सह सदंर्भालाय है,उसमें 30 आलमारियों में सामग्री भरी पड़ी है।विषयवार कटिंग्स के सैकड़ों लिफाफे चार आलमारियों में भरे हुए हंै।संदर्भालय-पुस्तकालय-पत्रिका -लय के कारण 

लिखने में तथ्यों की भूल होने की गुंजाइश बहुत ही कम रहती है।इसलिए अखबार अब भी मुझे छापते हंै।

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पर, यह सब तभी तक,जब तक हाथ-पैर-आंखें सक्रिय हैं।यदि अंग काम देना बंद कर देंगे तो क्या होगा ??

तब तो ईश्वर ही सहारा होगा--सरकारें तो अपने दूसरे जरूरी-गैर जरूरी कामों मगन रही हैं और रहेंगी भी। 

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2 जनवरी 2025

    


शनिवार, 3 जनवरी 2026

 कैसे -कैसे नोबल विजेता ?

ऐसे -ऐसे नोबल विजेता !

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सुरेंद्र किशोर

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बांग्ला देश के नोबल विजेता मुहम्मद यूनुस (2006 के नोबल विजेता)के कारनामों से आप अच्छी तरह परिचित हो ही चुके हैं।

अब नोबल विजेता द्वय अमत्र्य सेन और अभिजीत बनर्जी से भी परिचित हो जाइए।

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अभिजीत बनर्जी (2019 का नोबल विजेता)

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 ‘‘चाहे यह भ्रष्टाचार का विरोध हो या भ्रष्ट के रूप में देखे जाने का भय,शायद भ्रष्टाचार अर्थ -व्यवस्था के पहियों को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण था, इसे काट दिया गया है।

मेरे कई व्यापारिक मित्र मुझे बताते हैं निर्णय लेेने की गति धीमी हो गई है।.............’

--नोबेल विजेता अभिजीत बनर्जी,

हिन्दुस्तान और हिन्दुस्तान टाइम्स

23 अक्तूबर 2019

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यह कोई संयोग नहीं है कि बनर्जी राहुल गांधी के

करीबी रहे हैं।

अभिजीत बनर्जी ने ही राहुल गांधी को ‘‘न्याय योजना’’ शुरू करने की सलाह दी थी। 

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अमत्र्य सेन(1998 के नोबल विजेता)

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नोबल विजेता अमत्र्य सेन ने जनवरी, 2023 में कहा था कि ममता बनर्जी प्रधान मंत्री पद के लिए योग्य उम्मीदवार हैं।यह सुनकर ममता बनर्जी ने कहा कि उनकी इच्छा मेरे लिए आदेश है।

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नोबल विजेता के ऐसा कहने का कारण

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 मुख्य मंत्री ममता बनर्जी यह भी कह चुकी हैं कि ‘‘विश्व भारती भूमि नाजायज कब्जा प्रकरण’’ मामले में मैं अमत्र्य सेन के साथ हूं।

याद रहे कि विश्व विद्यालय की 13 डिसमिल जमीन पर अवैध कब्जा का आरोप लगाते हुए गत 20 अप्रैल, 23 को विश्व भारती विवि ने जमीन खाली करने के लिए अमत्र्य सेन से कहा था।   

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याद रहे कि डायनामाइट के आविष्कारक अल्फ्रेंड नोबल ने नोबल पुरस्कार की स्थापना की थी।वे स्वीडेन के निवासी थे।

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1.-मुहम्मद यूनुस ने शेख हसीना के धर्म निरपेक्ष बांग्ला देश में डायनामाइट लगाया।

2.-अभिजीत बनर्जी ने नरेंद्र मोदी के भ्रष्टाचार विरोधी अभियान में डायनामाइट लगाने की कोशिश की।

3.-अमत्र्य सेन ने जमीन पर अवैध कब्जा कर विश्व विद्यालय जैसे पवित्र स्थान की पवित्रता में डायनामाइट लगा दिया। 

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26 दिसंबर 25

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पुनश्चः

ध्यान रहे कि अमत्र्य सेन ने सी.ए.ए.का भी विरोध किया था।यानी इस मामले में वे भारत के जेहादियों के साथ थे।पी.एफ.आई.ने सी.ए.ए.के विरोध में दंगे किये थे। 

इससे पहले दुनिया की कई ऐसी राजनीतिक हस्तियों को भी शांति का नोबल पुरस्कार मिल गया था जिन पर आरोप लगा कि वे तो शंति को डायनामाइट लगाने का काम भी कर रहे थे। 

             

  

 


 अपने बहाने देश के लाखों पी.एफ.पेंशनधारियों

 की पीड़ा का प्रकटीकरण

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सुरेंद्र किशोर

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मेरी पी.एफ.पेंशन राशि जो सन 2005 में तय हुई,

वह राशि आज भी उतनी ही (1231 रुपए)

मुझे अनवरत मिल रही है।उसमें एक रुपए 

की भी कटौती नहीं की भारत सरकार ने।

क्या उसकी यह कम कृपा है मुझ पर ?!!

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मेरी पक्की आय 1231 रुपए मासिक ही है।यह पी.एफ.एफ.पेंशन

 योजना के तहत मुझे उपलब्ध है।

इसके अलावा अखबारों में लेख लिखकर या यदाकदा पुस्तक लेखन से 

कमाता हूं।

मैं केंद्र सरकार, पी.एफ.के कंेद्रीय न्यासी बोर्ड, केंद्रीय श्रम 

व वित्त मंत्रालय का आभारी हूं जिसने

इस 1231 रुपए की राशि में कभी कोई कटौती नहीं की।हां,यदि 

अवमूल्यन के कारण 2005 में 1231 रुपए की जितनी क्रय शक्ति थी,वह घट गई 

है तो इसमें केंद्र सरकार का भला क्या कसूर ?!

मुझे पेंशन 2005 से मिलती है।इस पेंशन योजना में बढ़ोत्तरी का 

कोई प्रावधान ही नहीं है।जिसने महंगी को ध्यान में नहीं रखा,बढ़ोत्तरी का प्रावधान नहीं किया,

उसका दिमाग कितना क्रूर होगा,उसकी कल्पना कर लीजिए।

यह योजना प्रधान मंत्री पी.वी.नरसिंह राव के शासन काल में 

शुरू हुई।यह संयोग नहीं है कि राव साहब ने ही सांसद क्षेत्र 

विकास फंड शुरू किया।उस फंड के बारे में केंद्रीय मंत्री जीतनराम 

मांझी ने हाल ही में बयान दिया है कि सभी एम.पी.-विधायक इस फंड 

में कमीशन लेते हैं।नरसिंह राव कितने दूरदृष्टि वाले नेता थे !!

अपने पेशेवालों का भला कर गये।

दूसरी ओर नरसिंह राव सरकार,जिसके वित्त मंत्री मनमोहन सिंह थे,यह 

 सरकार मानती थी कि कुछ लाख रिटायर कर्मचारियों को 

दिव्य भारतीय अपरिग्रही परंपरा के अनुसार अपने पर खर्च 

समय बीतने के साथ घटाते जाना चाहिए।या प्राचीन संतों की तरह वन में 

जाकर कंद-मूल खाकर गुजारा करना चाहिए।

यदि राव साहब सेवानिवृतों पर ही खर्च कर देते तो एक से एक घोटालों के जरिए 

अपने लोगों को उपकृत करने के लिए पैसे बेचारे कहां से आते ?

उनका अपना भी परिवार बहुत बड़ा था।उसकी भी राक्षसी साॅरी ‘‘राजसी इच्छाएं’’ थीं।

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पी.एफ.पेंशन में वृद्धि के लिए सन 2011 में राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग के सदस्य व 

बिहार सरकार के पूर्व मंत्री डा.शकील उज्जमा अंसारी ने तब के केंद्रीय श्रम एवं 

रोजगार मंत्री मल्लिकार्जुन खरगे को पत्र लिखा था।

खरगे साहब ने एक रूटीन टाइप का जवाब दे दिया।

राज्य सभा के उप सभापति पद पर आसीन होने से पहले सदस्य के रूप में 

हरिवंश जी ने मेरे नाम का जिक्र करते हुए राज्य सभा में इस पेंशन में बढ़ोत्तरी 

की जरूरत के लिए जोरदार आवाज उठाई थी।

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पी.एफ.पेंशनर्स संघ के लोग इस संबंध में तो वर्षों से बढ़ोत्तरी के लिए 

संगठित रूप से आवाज उठाते रहे हैं।

पर नरेंद्र मोदी सरकार भी शायद यह चाहती है कि इस अनोखी पेंशन योजना 

का नाम गिन्नी बुक आॅफ वल्र्ड रिकाॅर्ड में शामिल हो जाये।शायद दुनिया की 

यह एक मात्र पेंशन योजना है जिसमें महंगी का ध्यान रखते हुए बढ़ोत्तरी का कोई 

प्रावधान ही नहीं है।ऐसा सिर्फ ऋषियों के देश भारत में ही

संभव है।

किसी ने मुझे बताया कि यदि आप ओड़िशा या तीन अन्य राज्यों में से किसी राज्य के मूल निवासी 

होते तो आपको पद्मश्री अवार्डी होने के नाते हर माह 30 हजार रुपए (ओड़िशा)का मानदेय मिल जाता।

  पर, यह भी पता चला कि बिहार के किसी पद्मश्री अवार्डी ने ऐसे ही मानदेय के लिए उप मुख्य मंत्री विजय कुमार सिन्हा से आग्रह किया था।उस पर सिन्हा साहब ने कहा कि पद्मश्री अवार्डी लोगों की निजी आय बहुत है।

जहां तक मेरी जानकारी है,कुछ लोगों के बारे में यह बात सच है।

पर जिस तरह के अभावग्रस्त लोगों को भी मोदी सरकार ने पद्म अवार्ड देना शुरू किया है,वैसे में विजय बाबू की बात अनेक अवार्डी पर लागू नहीं होती।

सन 2025 में बिहार के समाज सेवी सह पत्रकार भीम सिंह भवेश को पद्म सम्मान मिला।

भवेश जी की पक्की आय सिर्फ 3 हजार रुपए मासिक है।

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खैर,इन सब मामलों को मैं ज्यादा तुल नहीं देता।मैंने अपने लिए सन 1965 से ही निजी लाइब्रेरी खड़ी करनी शुरू कर दी थी।मैं जानता था कि पत्रकारिता का जीवन आर्थिक रूप से कोई संतोष देने वाला नहीं होगा।इसलिए रिटायर होने पर स्वतंत्र पत्रकार के रूप में लेखन करना होगा जो मैं कर रहा हूं।

उससे मेरी आय अच्छी-खासी हैं।क्योंकि मेरे पास जो लाइब्रेरी सह सदंर्भालाय है,उसमें 30 आलमारियों में सामग्री भरी पड़ी है।विषयवार कटिंग्स के सैकड़ों लिफाफे चार आलमारियों में भरे हुए हंै।संदर्भालय-पुस्तकालय-पत्रिका -लय के कारण 

लिखने में तथ्यों की भूल होने की गुंजाइश बहुत ही कम रहती है।इसलिए अखबार अब भी मुझे छापते हंै।

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पर, यह सब तभी तक,जब तक हाथ-पैर-आंखें सक्रिय हैं।यदि अंग काम देना बंद कर देंगे तो क्या होगा ??

तब तो ईश्वर ही सहारा होगा--सरकारें तो अपने दूसरे जरूरी-गैर जरूरी कामों मगन रही हैं और रहेंगी भी। 

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2 जनवरी 2025