बुधवार, 19 अगस्त 2026

 18 अगस्त, 2026 के प्रभात खबर (पटना संस्करण) में प्रकाशित

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 12 टाउनशिप के लिए केंद्रीयकृत गुणवत्ता नियंत्रण प्रशाखा जरूरी 

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सुरेंद्र किशोर

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बिहार में प्रस्तावित 12 ग्रीन फील्ड सैटेलाइट टाउनशिप शहरी मेगा प्रोजेक्ट है।

इसके बन कर तैयार हो जाने के बाद यह एक युगांतरकारी योजना साबित होगी।

इसका श्रेय मौजूदा राज्य सरकार को मिलेगा।व्यवस्थित ढंग से बसने वाले इन शहरों में रहना अपने आप में एक सुखद अनुभव होगा।

यह टाउनशिप विकास का इंजन भी साबित होगा।इसी को ध्यान में रखकर इसकी योजना तैयार की जा रही है।

पर,एक समस्या भी है।निर्माण में गुणवत्ता की समस्या।

 12 टाउनशिप का गुणवत्तापूर्ण निर्माण सुनिश्चित किया ही जाना चाहिए।

गुणवत्ता नियंत्रण का काम तो इन दिनों और भी  कठिन हो गया है ,पर असंभव नहीं।  

 एक कत्र्तव्यनिष्ठ अफसर के नेतृत्व में गुणवत्ता नियंत्रण प्रशाखा की स्थापना होनी चाहिए।

प्रशाखा निरंतर सभी 12 टाउनशिप के गुणवत्तापूर्ण निर्माण को सुनिश्चत करे।बात साफ है।यदि राज्य सरकार गुणवत्ता बनाए रखेगी तो उसे यश मिलेगा।यदि गुणवत्ता नहीं रहेगी तो अपयश मिल सकता है।

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नक्सल आन्दोलन का चढ़ाव-उतार

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  बिहार सरकार के गृह विभाग द्वारा सन 1982 में राज्य में नक्सल आंदोलन पर तैयार विस्तृत नोट में कहा गया था कि नक्सल  समस्या सिर्फ कानून -व्यवस्था की ही समस्या नहीं है,बल्कि यह सामाजिक -आर्थिक समस्या भी है।

तब तक अविभाजित बिहार के मात्र 13 जिलों के 47 प्रखंडोें में नक्सली सक्रिय हुए थे।

पर, बाद के वर्षों में बिहार और झारखंड मेें नक्सलियों का फैलाव काफी बढ़ा।

इस बीच नक्सल आंदोलन में कई उतार -चढ़ाव भी आये।

 केंद्र और राज्य की मौजूदा सरकारों ने नक्सल आंदोलन को एक अलग नजर से देखा और तदनुसार उससे मुकाबला किया। 

इसी महीने बिहार सरकार ने यह सूचना दी कि बिहार अब नक्सल मुक्त हो चुका है।हाल तक राज्य के 22 जिले नक्सल प्रभावित थे।अब कोई जिला वैसा नहीं है।

आने वाले दिनों में यह बात सामने आएगी कि सचमुच नक्सल समस्या से बिहार मुक्त हुआ है या नहीं।पर इससे अलग नक्सल अभियान को लेकर उस विचारधारा को मानने वालों में भी समय- समय पर मतभेद उभरा है।

 चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के चेयरमैन माओ त्से तुंग ने सन 1967 में उनसे मिलने गये नक्सली नेता कानू सान्याल व तीन अन्य से कहा था कि ‘‘यहां आपने जो भी सीखा,उसे भूल जाएं और अपने देश की स्थिति के अनुसार 

वहां काम करें।’’

कभी भूमिगत अभियान में शामिल रहे माले (लिबरेान)के दिवंगत महेंद्र प्रसाद सिंह बाद में चुनाव प्रक्रिया में शामिल हुए।तीन बार बगोदर से विधायक बने।जब उन्होंने देखा कि आम जनता घूसखोरी से परेशान है तो उन्होंने सत्याग्रह के जरिए जन दबाव बना कर सरकारी कर्मियों को घूस के पैसे जनता को लौटाने को विवश करना शुरू किया।इससे उनकी लोकप्रियता बढ़ी।महंेद्र जी अपने जीवन काल में कभी चुनाव नहीं हारे।यह था देश और जनता की स्थिति के अनुसार काम करना।

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 फुटपाथों पर बेलगाम अतिक्रमण

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सुप्रीम कोर्ट ने गत जून में कहा कि सीमांकित फुटपाथों पर सुरक्षित रूप से चलने का अधिकार संविधान के अनुच्छेद-19 और 21 के तहत नागरिकों का मौलिक अधिकार है।

सरकार का कत्र्तव्य है कि वह नागरिकों के लिए सुरक्षित पैदल मार्ग प्रदान करे।

  कुछ साल पहले पटना हाई कोर्ट ने अदालत में मौजूद पटना के एक थानेदार से पूछा-‘‘सड़कों पर अतिक्रमण करा कर रोज कितना कमा लेते हो ?’’

  यानी, अतिक्रमण एक मुनाफे का ध्ंाधा रहा है।इसके बावजूद अदालतें फुटपाथों पर से अतिक्रमण हटाने का सख्त आदेश सरकारों को नहीं दे पा रही है ?

यह समस्या देशव्यापी है।

  फिलहाल अदालत सरकार को यह निदेश दे सकती है कि वह राज्य पुलिस के बदले अर्ध सैनिक बल के सहयोग से फुटपाथों पर से अतिक्रमण हटाए।

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भूली-बिसरी यादें

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एक बार लोक सभा में कांग्रेस के भागवत झा आजाद ने कह दिया था कि ‘‘काबुल की सड़कों पर सिर्फ घोड़े ही नहीं होते,गधे भी होते हैं।’’

प्रतिपक्ष के अटल बिहारी वाजपेयी ने इस उक्ति पर एतराज किया और स्पीकर से कहा कि आप इस उक्ति को सदन की कार्यवाही से निकाल दें ।क्योंकि इससे पड़ोसी मित्र देश से संबंध बिगड़ सकते हैं।

 वाजपेयी की इस बात से सदन में हंसी फूट पड़ी।

हस्तक्षेप करते हुए भागवत झा आजाद ने कहा कि ‘‘चलिए आप कहते हैं तो बदल देता हूं।

मैं कह देता हूं कि बंबई की सड़कों पर घोड़े ही नहीं ,गधे भी होते हैं।

इससे पहले आजाद साहब ने अंग्रेजी में कहा था कि ‘‘मुझे अपना मंुह मत दीजिए,अपना कान दीजिए।’’

अटल जी ने कहा कि अभिव्यक्ति की यह भाषा उचित नहीं है।

इस पर आजाद जी ने कहा कि मेरा मतलब यह है कि ‘‘आप अपना मुंह बंद रखिए और अपने कान खुले रखें।’’   

 ( तब की अपेक्षा सदन में आज की चर्चा का स्तर देखिए और दुखी होइए।)

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और अंत में

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 सन 1962 में डा.राम मनोहर लोहिया ने प्रधान मंत्री जवाहरलाल नेहरू ने खिलाफ चुनाव लड़ा।

किसी ने पूछा कि ऐसी जगह से क्यों लड़े जहां से आपकी हार तय थी ?

डा. लोहिया ने कहा कि पार्टी के प्रचार के लिए लड़ा।साथ ही ,चट्टान को मैं तोड़ तो नहीं सका,पर उसमें दरार जरूर डाल दी। फूलपुर लोक सभा चुनाव क्षेत्र के भीतर पांच विधान सभा चुनाव क्षेत्र पड़ते थे।उनमें से नेहरू तीन क्षेत्रों में और लोहिया दो क्षेत्रों में विजयी हुए।

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(अनियतकालीन काॅलम ‘यदाकदा’ से)



 


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