गुरुवार, 22 अक्टूबर 2026

 इस देश के कुछ न्यूज चैनल्स अपने कार्यक्रमों में 

यदि शालीनता बरतेंगे तो उनकी ही प्रतिष्ठा बढ़ेगी।

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(सारे चैनल्स एक जैसे नहीं हैं।)

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सुरेंद्र किशोर

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इस देश के कुछ न्यूज चैनल्स के लिए अब यह जरूरी हो गया है कि वे अपने डिबेट शो आदि में शालीनता बरतें।

(याद रहे कि मीडिया का मूल काम सूचना देना,शिक्षित करना और मनोरंजन करना है।पर लगता है कि कुछ चैनल्स सस्ता मनोरंजन ही अधिक कर रहे हैं।)

यानी,ऐंकर कम चिल्लाएं और अपने ‘भाषण’ की अवधि कम कर दें।

एक साथ दो गेस्ट को बोलने देना और दोनों के चित्रों के बीच बनाम लगा देने का क्या मतलब है ?

मतलब है कि चैनल्स समझता है कि मुर्गा या कुत्ता लडव़ाना उनके लिए फायदामंद है।पर, ऐसा नहीं है।

मुंहफट, उदंड और कुसंस्कारी गेस्ट्स के फेडर समय -समय पर डाउन करते रहिए। क्योंकि ऐसे लोगों के कुबोल से नई पीढ़ी को गलत दिशा मिलती है।

उधर टी.वी.चैनलों की साख नहीं बढत़ी।

क्या राजनीतिक दलों में शालीन व गैर-गालीबाज वक्ताओं का अकाल हो गया है ?

 या ‘‘तमीज रहित’’ लोगों को डिबेट शो में बुलाकर चैनल्स समझते हैं कि लोग उन्हें शाबासी देते होंगे ?!यदि ऐसा समझते हो तो सर्वे करा लो।

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खबरें पढ़ने वालों और वालियों की बोलने की गति सामान्य कर दें तो सारी खबरें लोगों को समझ में आती रहेंगी।अभी तो सीमित समय में यदि सौ-सौ खबरें पढ़नी हैं तो गति बुलेट ट्रेन जैसी ही होगी।एक शब्द दूसरे शब्द पर सवार होता जाएगा।दर्शकों के पल्ले कुछ नहीं पड़ेगा। 

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कल एक टी.वी.चैनल पर एक गेस्ट बोल रहे थे कि ‘‘मैं एस.डी.एम.,डी.एम.और यहां तक कि एस.पी को भी पीट चुका हूं।’’

क्या ऐसे गेस्ट को बुला कर चैनल जाने-अनजाने देश में हिंसा को बढ़ावा दे रहे हैं ? हिंसा का अभी माहौल है भी।यानी आग में घी डालना इसे ही कहते हैं।

इस पर शासन को भी ध्यान देना चाहिए।

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सुरेंद्र किशोर

19 अक्तूबर 26   


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