रविवार, 4 अप्रैल 2010

पत्रकारिता के 40 साल पूरे कर चुके वरिष्ठ पत्रकार सुरेंद्र किशोर से ‘ ‘प्रभात खबर ’ की बातचीत

कोई सरकारी परसादी लेनी होती तो नीतीश कुमार का शासन आने की प्रतीक्षा क्यों करता ?



अपना यही है सहन/आंगन/,यही सायबान/छप्पर/है,

फैली हुई जमीन,खुला आसमान है,

---- मख्मूर सईदी



मैं पूरी ताकत के साथ

शब्दों को फेंकता हूं आदमी की तरफ

यह जानते हुए कि आदमी का कुछ नहीं होगा

मैं भरी सड़क पर सुनना चाहता हूं वह धमाका

जो शब्द और आदमी की टक्कर से पैदा होता है

यह जानते हुए कि लिखने से कुछ नहीं होगा

मैं लिखना चाहता हूं ।

----- केदार नाथ सिंह



मशहूर शायर मख्मूर सईदी और प्रख्यात कवि केदार नाथ सिंह की इन पंक्तियों से गुजरते हुए सुरेंद्र किशोर का चेहरा सामने आता है। बिहार के जाने-माने पत्रकार सुरेंद्र किशोर के लिए फैली हुई जमीन ही आंगन और खुला आसमान ही छप्पर है, और वह लिखने और बिना किसी लाग लपेट के लिखने की असीम ऊर्जा से लैस हैं, यह जानते हुए कि लिखने से कुछ नहीं होगा, वह लिखने की चाहत से भरे रहे और भरे हैं, शायद यही वजह है कि क्लीन सेव के कारण साफ-सुथरा और लंबा चेहरा या घने बालों को पूरी मजबूती से दाहिनी ओर रखने का उनका हेयर स्टाइल, अहंकारशून्य व्यक्तित्व या फिर साधारण पहनावा ही उनकी पहचान नहीं, सुरेंद्र किशोर, आज सुरेंद्र किशोर हैं, क्योंकि गोपाल सिंह नेपाली की तरह उनका भी धन रही स्वाधीन कलम, और कलम इसलिए भी स्वाधीन रही कि उन्होंने न बहुत कुछ पाने की चाहत पाली और न ही कुछ नहीं मिल पाने का मलाल रहा।



बीते 40 वर्षों से निरंतर लिखते रहे सुरेंद्र किशोर को पढ़कर न सिर्फ बिहार और झारखंड, बल्कि एक हद तक हिंदी पटटी की पत्रकारिता की दो पीढ़ियां जवान हुईं हैं। समाजवादी राजनीति की सीढ़ी से सत्ता और शक्ति के शीर्ष पर जाने की जगह पत्रकारिता व लेखन का क्षेत्र चुनने वाले सुरेंद्र किशोर ने अपनी जिंदगी को अपने मायनों में आकार देने की आजादी दी। अपनी ईमानदारी, अपनी कर्तव्यनिष्ठा, अपने हुनर, अपनी दढ़ता से वह खुद को तरासते गये। संघर्ष के चिराग की रोशनी से जीवन को रोशन किया। मोटे फ्रेम और पावर के शीशे से बने चश्मे के पीछे उनकी आंखों की गहराई काफी कुछ कहती है, बशर्ते आप सुनना चाहें। लेखन व पत्रकारिता के क्षेत्र में चार दशक गुजारने के बहाने ‘प्रभात खबर’ के संपादकीय समन्वयक माधवेंद्र ने श्री किशोर से लंबी बातचीत की।



प्रश्न - कितने साल से आप पत्रकारिता में हैं ?

उत्तर - वैसे तो मैं सन 1969-70 से ही इस पेशे में हूं, पर शब्दों के सही अर्थों में पेशेवर पत्रकारिता की शुरुआत मैंने सन 1977 में दैनिक ‘आज’ से की थी।

हालांकि 1969 से ही पत्रकारिता से रोटी कमानी जरूर शुरू कर दी थी। तब पटना से ‘लोकमुख’ नाम से लोहियावादी समाजवादियों की एक साप्ताहिक पत्रिका निकलती थी। मैंने 120 रुपये महीने पर कुछ समय तक वहां काम किया था। मेैंने जार्ज फर्नांडिस के संपादकत्व में निकल रही चर्चित पत्रिका ‘प्रतिपक्ष’ और जेपी द्वारा संस्थापित ‘जनता’ साप्ताहिक में भी सत्तर के दशक में काम किया।

प्रश्न - पेशेवर पत्रकार के रूप में आपने अनेक मंत्रिमंडलों को काम करते हुए देखा। अपने अनुभव बताइए।

उत्तर - दैनिक आज ज्वाइन करने के बाद सत्ता व प्रतिपक्ष की राजनीति व विभिन्न मुख्यमंत्रियों के काम काज को करीब से देखने का अवसर मिला।

हालांकि उससे पहले के कुछ मुख्यमंत्रियों की कार्य शैलियों के बारे में बहुत कुछ जान सुन व पढ़ रखा है। मैं विभिन्न मुख्यमंत्रियों के कामकाज के मोटा-मोटी तुलनात्मक अध्ययन की स्थिति में अब हूं।

प्रश्न - आपके बारे में यह कहा जाता है कि अपने पत्रकारिता जीवन में आपने कभी किसी मुख्यमंत्री की तारीफ नहीं की । क्या कारण है कि आप इन दिनों नीतीश कुमार के प्रशंसक बने हुए हैं ? इस अति प्रशंसा के कारण आपकी पुरानी छवि को धक्का लग रहा है?

उत्तर - आपने बिलकुल सही कहा। कुछ लोग तो नेट पर यह भी लिख रहे हैं कि मैं किसी तरह की ‘परसादी’ पाने के लिए नीतीश कुमार की चापलूसी कर रहा हूं। दरअसल ऐसे लोग न तो मुझे जानते हैं और न ही बिहार व देश के सामने आज जो गंभीर समस्याएं हैं, उनका उन्हें कोई अनुमान है। यदि किसी को अनुमान है भी तो वे स्वार्थ या किसी अन्य कारणवश उन्हें देख नहीं पा रहे हैं।

यह बात सही नहीं है कि मैंने किसी मुख्यमंत्री की अपने लेखन में आम तौर पर कभी कोई सराहना ही नहीं की। जिस नेता के बारे में मुझे सबसे अधिक लिखने का मौका मिला, वे हैं लालू प्रसाद यादव। उन्होंने भी अपना काम किया और मेरे खिलाफ कुछ ऐसे कदम उठाए जो अभूतपूर्व रहे। इसके बावजूद 1990 में मंडल आरक्षण आंदोलन के दौरान मैंने लालू प्रसाद के पक्ष में और आरक्षण विरोधियों के खिलाफ लगातार जोरदार लेखन किया।

इस लेखन के कारण मुझे अपने स्वजातीय, सवर्णों और यहां तक कि अपने परिजनों से भी आलोचनाएं सुननी पड़ी थीं। अनेक मुख्यमंत्रियों को देखने के बाद मैं यह कह सकता हूं कि नीतीश कुमार जैसा मुख्यमंत्री कुल मिलाकर इससे पहले मैंेने तो नहीं देखा। यदि यह बात मैं किसी लाभ की प्राप्ति के लिए कहूं तो मेरी इस बात पर किसी को ध्यान देने की जरूरत नहीं है। पर यदि राज्यहित में कह रहा हूं तो मेरी बात सुनी जानी चाहिए अन्यथा बाद में राज्य का नुकसान होगा। मंडल आरक्षण विवाद के समय मेरी बातें नहीं सुनी गईं जिसका नुकसान खुद उनको अधिक हुआ जो आरक्षण के खिलाफ आंदोलनरत थे। बाद में वे थान हार गये, पर पहले वे गज फाड़ने को तैयार नहीं थे। यदि 1990 में बिहार में आरक्षण का उस तरह अतार्किक विरोध नहीं हुआ होता तो लालू प्रसाद का दल 15 साल तक सत्ता में नहीं बना रहता। कांग्रेस के पूर्व विधायक हरखू झा अब भी यह कहते हैं कि ‘सुरेंद्र जी तब आरक्षण विरोधियों से कहा करते थे कि गज नहीं फाड़ोगे तो थान हारना पड़ेगा।’

प्रश्न - आपका लेखन इन दिनों नीतीश सरकार के पक्ष में एकतरफा लगता है। यह किसी पत्रकार के लिए अच्छा नहीं माना जाता। इस पर आपकी क्या राय है ? क्या नीतीश जी सारे काम ठीक ही कर रहे हैं ?

उत्तर - इस आरोप को एक हद तक में स्वीकरता हूं। हालांकि यह पूरी तरह सच नहीं है। नीतीश कुमार की सरकार की कुछ गलत नीतियों की मैंेने लिखकर समय-समय पर आलोचना की है। आगे भी यह स्वतंत्रता मैं अपने पास रिजर्व रखता हूं क्योंकि न तो मैंने खुद को कभी किसी के यहां गिरवी रखा है और न ही ऐसा कोई इरादा है। जब जीवन के कष्टपूर्ण क्षण मैंेने काट लिए तो अब किसी से किसी तरह के समझौते की जरूरत ही कहां है?

यदि मैं किसी लाभ या लोभ के चक्कर में किसी सरकार या नेता का विरोध या समर्थन करूं तो जरूर मेरे नाम पर थूक दीजिएगा। पर यदि देश और प्रदेश के व्यापक हित में ऐसा करता हूं तो उसे उसी संदर्भ में देखनेे की जरूरत है।

मैं पूछता हूं कि आजादी की लड़ाई के दिनों में क्या भारतीय पत्रकारों से यह सवाल पूछा जाता था कि आप आजादी की लड़ाई के पक्ष में एकतरफा क्यों हैं ? आज देश व प्रदेश में उससे मिलती-जुलती स्थिति है।

खतरे उससे कई मामलों में अधिक गंभीर हैं। खतरा लोकतांत्रिक व्यवस्था की समाप्ति का है। खतरा अलोकतांत्रिक अतिवाद व आतंकवाद के काबिज हो जाने का है। इन दोनों खतरों को हमारे देश व प्रदेश के कुछ खास नेतागण अपने स्वार्थ में अंधा होकर जाने अनजाने आमंत्रित कर रहे हैं। इस स्थिति में जो नेता सुशासन लाने की कोशिश कर रहा है, जो नेता भ्रष्टाचार के खिलाफ कड़े कदम उठाना चाहता है और भरसक उठा भी रहा है। और जो नेता सांप्रदायिक मसलों पर संतुलित रवैया अपनाता है, वही इन खतरों से सफलतापूर्वक लड़ भी सकता है। वैसे नेताओं के प्रति पक्षधरता दिखाना ही आज देशहित व राज्यहित है। लोकतंत्र बना रहेगा तभी तो स्वतंत्र प्रेस भी रहेगा।

प्रश्न - आप तो पहले राजनीतिक रूप से सक्रिय थे। क्या अब दुबारा राजनीति में आने की इच्छा नहीं होती ? राजनीति में शामिल होकर आप नीतीश कुमार के कामों को और भी आगे बढ़ा सकते हैं।

उत्तर - मैंने 1973 में ही यह तय कर लिया था कि मैं राजनीति छोड़कर पत्रकारिता करूंगा। विशेष परिस्थिति में आपातकाल के दौरान जरूर राजनीतिक काम कर रहा था। यदि मैं पत्रकारिता को जिस दिन राजनीतिक कर्म की अपेक्षा दोयम दर्जे का काम मान लूंगा, उसी दिन सक्रिय राजनीति के प्रति मेरा आकर्षण हो जाएगा! या फिर मेरी इच्छा यदि निजी धनोपार्जन की हो जाए तो मैं राजनीति में दुबारा जाउंगा। एमपी-विधायक फंड ने तो राजनीति को काजल की कोठरी बना दिया है। वैसे भी जो लोग मुझे जानते हैं, वे मुझसे कभी यह नहीं कहते कि मुझे राजनीति में आना चाहिए। क्योंकि मुझे वे उस काम के लिए अनफिट मानते हैं।

प्रश्न - क्या आपको ऐसा कोई आॅफर मिला था ?

उत्तर - आॅफर तो सक्रिय राजनीति में शामिल होने के लिए नहीं हुआ था, पर ‘राजनीतिक नौकरियों’ का आॅफर जरूर हुुआ था। पर मैंने विनम्रतापूर्वक तब उसे अस्वीकार ही कर दिया था।

प्रश्न - अपने बारे में कुछ और बताइए।

उत्तर - सन 1966 में के.बी. सहाय की सरकार के खिलाफ छात्र आंदोलन के कारण मेरी पढ़ाई बीच में ही छूट गई थी। उन दिनों मैं सारण जिला क्रांतिकारी विद्यार्थी संघ का सचिव था। वह लोहियावादी समाजवादी छात्रों का संगठन था। 1969 में मैं बिहार प्रदेश समाजवादी युवजन सभा के तीन में से एक संयुक्त सचिव चुना गया था। उनमें से एक अन्य संयुक्त सचिव लालू प्रसाद थे। सचिव थे शिवानंद तिवारी। संसद पर युवजनों के प्रदर्शन के सिलसिले में मैं अन्य लोगों के साथ गिरफ्तार होकर तिहाड़ जेल भी गया था।

मैं 1972-1973 में कर्पूरी ठाकुर का गैर सरकारी निजी सचिव था। आपातकाल में सी.बी.आई. ने बड़ौदा डायनामाइट मुकदमे का एक केस तैयार किया था। उसमें मेरा नाम उन चार मुख्य षडयंत्रकारियों में एक था जिन पर आपातकाल में देशभर में सरकारी प्रतिष्ठानों को डायनामाइट से उड़ाने का षडयंत्र रचने का आरोप लगाया गया था। अन्य तीन थे जार्ज फर्नाडिस, रेवतीकांत सिन्हा और महेंद्र नारायण वाजपेयी। वाजपेयी जी रेलवे यूनियन के नेता हैं और इन दिनों पटना में ही रहते हैं। यह खबर 1976 के देशभर के अखबारों में पहले पेज पर छपी थी।

ऐसे में यह कोई आश्चर्य की बात नहीं थी कि कर्पूरी ठाकुर की सरकार के कोई सदस्य या फिर मोरारजी देसाई मंत्रिमंडल के प्रभावशाली सदस्य जार्ज फर्नांडीस मेरे लिए कुछ सोचें ओर आॅफर भी करें। उन लोगों ने किया भी ,पर मुझे वह सब मंजूर ही नहीं था। क्योंकि मैं एक मामूली पत्रकार के रूप में ही संतुष्ट था और हूं भी।

यह बात मैं इसलिए कह रहा हूं कि मुझे कभी कोई सरकारी परसादी लेनी होती तो नीतीश कुमार का शासन आने तक मैं प्रतीक्षा ही क्यों करता ? क्या दूसरे ऐसे लोग अवसर मिलने पर ऐसी कोई प्रतीक्षा करते भी हैं ? जब मेरी पत्नी मेरे सुख-दुःख में साथ देने के लिए हमेशा तैयार रहती हंै। जब मेरी संतानें आज्ञाकारी हैं। और मेरी जरूरतें जब सीमित हैं तो फिर अपनी स्वतंत्र लेखनी की कीमत पर किसी सत्ताधारी नेता के सामने मुझे हाथ पसारने या फिर याचक बनने की जरूरत ही क्या है? परसादी लेने की बात वही लोग करते हैं जो खुद छोटे मन-मिजाज के हैं। यह बात यहां मैं इसलिए भी कह रहा हूं कि लोग यह समझें कि करीब 40 साल के अनुभव वाला एक पत्रकार किसी लाभ-लोभ की इच्छा रखे बिना यदि यह बात कह रहा है कि किस तरह एक मुख्यमंत्री आज बिहार को पटरी पर लाने का ईमानदार प्रयास रात दिन कर रहा है तो इस बात को गंभीरता से समझना चाहिए और मुख्यमंत्री के इस प्रयास में उन तमाम लोगों को मदद करनी चाहिए जिनका अपना कोई निजी एजेंडा नहीं है। अन्यथा प्रदेश और देश को बचाना एक दिन असंभव हो जाएगा। मैं राजनीतिक दलों की बात नहीं कर रहा हूं। उनका तो काम ही विरोध करना और मौका मिलने पर सत्ता में आना है।

प्रश्न - पर नीतीश कुमार की एक ऐसी सरकार के समर्थन के कारण आपने अपनी छवि दांव पर लगा दी है जिस सरकार में भ्रष्टाचार बहुत अधिक है?

उत्तर - सरकारी भ्रष्टाचार के मामले में आपकी टिप्पणी सही है। पर सवाल मुख्यमंत्री की मंशा का है। राहुल गांधी ने भी नीतीश कुमार की मंशा को सही बताया है।

मैंने पिछले 40 साल से बिहार के मुख्यमंत्रियों को करीब और दूर से काम करते हुए देखा है। विपरीत परिस्थितियों में भी इतना अच्छा काम करते हुए मैंने इससे पहले किसी अन्य मुख्यमंत्री को नहीं देखा। ऐसा नहीं कि वे बाकी सब भ्रष्ट व निकम्मे थे। उनमें कई अच्छी मंशा के ईमानदार नेता थे। पर उनमें से कोई नीतीश कुमार जैसा नहीं थे।

नीतीश के काम के रिजल्ट भी बिहार की जनता को मिल रहे हैं। गत लोकसभा चुनाव में बिहार में 40 में से 32 सीटें राजग को देकर आम जनता ने भी नीतीश सरकार के काम पर अपने भारी समर्थन की मुहर ही लगाई। पर बटाईदारी के बारे में नीतीश सरकार की एक घोषणा से नीतीश कुमार थोड़े दबाव में जरूर आ गये हैं। पर यह बिहार के लिए दुर्भाग्यपूर्ण बात ही होगी कि अगले चुनाव के बाद नीतीश कुमार को मौका नहीं मिलेगा।

मैं बिहार के बाकी सारे नेताओं को भी जानता हूं। नीतीश कुमार और अन्य मुख्यमंत्रियों में मैं यह अंतर पाता हूं कि अन्य मुख्य मंत्रियों में से कुछ ने राजनीतिक व प्रशासनिक भ्रष्टाचार से समझौता कर लिया, कुछ ने खुद को किनारा कर लिया, कुछ ने लड़ने की कोशिश की तो वे हटा दिए गए। पर नीतीश कुमार अब भी भ्रष्टाचार से भरसक लड़ रहे हैं। साढ़े चार साल तक बिहार का मुख्यमंत्री कोई रहे और इस काजल की कोठरी में कोई दाग नहीं लगे, यह बिहार के लिए बड़ी बात है। पर यह सहसा या संयोगवश नहीं हुआ है, बल्कि ऐसा नीतीश कुमार की सावधानी के कारण हुआ है। दरअसल सरकारी व राजनीतिक भ्रष्टाचार कम नहीं होगा तेा गरीबी नहीं कम होगी। गरीबी कम नहीं होगी तो अराजकतावादी अलोकतांत्रिक तत्व देर-सवेर बिहार में पूरी तरह छा जाएंगे। जब यहां भी छा जाएंगे तो पूरे देश पर छा जाने में उन्हें काफी सुविधा हो जाएगी।

कमजोर नजर वाले लोग या फिर स्वार्थ में अंधे लोग इस खतरे को देख नहीं पा रहे हैं। आज देश और प्रदेश के सामने विशेष परिस्थिति उत्पन्न कर दी गई है। पत्रकार सहित हर नागरिक को आज अपनी विशेष भूमिका निभानी चाहिए,ऐसा मैं मानता हूं।



राजनीति में गांधी-नेहरू नहीं तो मीडिया में पराड़कर की तलाश क्यों ?

प्रश्न - नीतीश कुमार की कौन सी बात आपको सबसे अधिक पसंद है ?

उत्तर - जब वे कें्रदीय मंत्री थे तो मुझे उनके कामकाज को करीब से देखने का मौका नहीं मिला था। इसलिए उनके बारे में मेरी कोई विशेष राय नहीं बन पाई थी। पर पूत के पांव उसी समय पालने में दिखाई पड़ने लगे जब नीतीश कुमार मुख्यमंत्री बने। सत्ता में आते ही उनकी सरकार ने बड़े पैमाने पर सड़क निर्माण का काम शुरू करवा दिया। यह भी कोई अजूबी बात नहीं थी। नई बात यह थी कि सड़क की बगल में नालियों का भी साथ-साथ नीतीश सरकार ने निर्माण कराना शुरू कर दिया। ऐसा पहले नहीं होता था। यहीं ईमानदार मंशा की झलक मिली।

मुझे उर्दू पत्रकार मोईन अंसारी ने एक बार बताया था कि पटना जिले के ही एक शहर में पहले से बनी एक सीमेंटी सड़क को एक भ्रष्ट मंत्री ने साठ के दशक में किस तरह तोेड़वा कर उसे अलकतरा वाली सड़क में परिणत करवा दिया था। पूछने पर उसने मोईन चचा को बेशर्मी से बताया था कि मेरे और मेरे ठेकेदारों के पास भी अपने पेट हैं। सड़कें टूटेंगी नहीं तो उनकी मरमत कैेसे होगी ? हर साल मरम्मत नहीं होगी तो ठेकदार जिएगा कैसे ? तब से बिहार में भ्रष्टाचार आगे ही बढ़ता गया है।

सन 1971 के लोकसभा चुनाव के बाद तो उसने संस्थागत रूप ले लिया। सरकारी धन की इसी लूट-खसोट की भावना और संस्थागत भ्रष्टाचार को विभिन्न मुख्यमंत्रियों ने पाला पोसा, आगे बढ़ाया या फिर उसके साथ सह अस्तित्व का जीवन जिया। कुछ ईमानदार मुख्यमंत्री थोड़े ही दिनों में हटा दिए गए। सबका नतीजा यह हुआ कि विकास नहीं हुआ। गरीबी बढ़ी, साथ में नक्सली भी।

देश में नक्सली आंदोलन का हाल यह है कि उसे बिहार का गढ़ फतह करके नेपाल तक का कोरीडोर पूरा कर लेना है। यदि यह हो गया तो मौजूदा लोकतांत्रिक व्यवस्था समाप्त हो जाएगी। नीतीश जैसे मुख्यमंत्री विकास व सुशासन के जरिए उस स्थिति को टालने की कोशिश कर रहे हैं। पर राजनीतिक कार्यपालिका तथा प्रशासनिक कार्यपालिका नीतीश कुमार के अनुकूल उतना नहीं बन पा रही है जितना मुख्यमंत्रीे चाहते हैं।

उनके ही दल के कुछ नेता लोकतंत्र पर उस खतरे को स्वार्थवश नहीं देख पा रहे हैं। जदयू के अनेक नेताओं के लिए पुत्र मोह, पैसा मोह और जाति मोह अधिक महत्वपूर्ण है। ऐसे लोग सकीर्ण स्वार्थ में पड़ कर अपनी ही आने वाली पीढ़ियों के साथ अन्याय कर रहे हैं। आज बिहार में जितने नेता मुख्यमंत्री के घोषित -अघोषित उम्मीदवार हैं जितना उन्हें मैं जानता हूं, उसके अनुसार उनमें से किसी में भी भ्रष्टाचार व अपराधियांे से लड़ने की नीतीश कुमार जैसा माददा नहीं है। नीतीश कुमार की यही बात मुझे सर्वाधिक पसंद है।

आज बिहार में कोई रामराज नहीं आया है। पर एक बात जरूर हुई है कि इस लोकतांत्रिक व्यवस्था में नीतीश कुमार उम्मीद की आखिरी किरण के रूप में जरूर उभरे हैं। कोई अन्य राजनीतिक व्यवस्था देश-प्रदेश के जनजीवन में कैसे फर्क ला पाएगी, यह मैं नहीं जानता।

प्रश्न - नीतीश कुमार की सरकार में आपको कोई भी खराबी नजर आती है या नहीं ?

उत्तर - क्यों नहीं नजर आती ? मैंने कई बार लिखा भी है कि नीतीश सरकार ने प्राथमिक स्कूलों में शिक्षकों की बहाली के लिए प्राप्तांकों को आधार बना कर भयंकर भूल की है। बहाली के पहले उनके लिए प्रतियोगिता परीक्षा का आयोजन किया जाना चाहिए था। साथ ही, शराब की दुकानों की संख्या बढ़ाने का काम भी गलत हुआ। इससे उलट शराबबंदी की दिशा में राज्य सरकार को आगे बढ़ना चाहिए था जैसा कि संविधान के नीति निदेशक तत्व चैप्टर में राज्य को निदेश दर्ज है।

जिस प्रदेश के ब्यूरोक्रेसी व राजनीति के रग -रग में भ्रष्टाचार प्रवेश कर चुका हो, वहां नीतीश कुमार क्या ब्रहमा-विष्णु-महेश भी एक साथ आ जाएं तो इतने थोड़े समय में उसे सुधार नहीं सकते। यहां अधिक महत्वपूर्ण सवाल यह है कि कोई मुख्यमंत्री स्थिति को सुधारने की भरसक कोशिश कर रहा है या फिर सरकारी भ्रष्टाचार के समुद्र में खुद डुबकी लगा रहा है।

प्रश्न - आपका प्रारंभिक जीवन कैसा रहा और आप पत्रकारिता में कैसे आये?

उत्तर - मेरा प्रारंभिक जीवन गांव में बीता। छठवीं कक्षा में भी पढ़ने के लिए अपने गांव भरहापुर से 4 किलोमीटर दूर दिघवारा रोज पैदल जाना पड़ता था। पैर में चप्पल-जूता कुछ नहीं। सड़क कच्ची। गर्मी के दिनों में धूल में पैर वैसे ही जलते थे मानो गर्म तवे पर शरीर का कोई अंग।

मेरे पिता जी कम ही पढ़े-लिखे थे। पर वे परंपरागत विवेक से लैस थे। उन्होंने जमीन बेच कर भी हम भाइयों को उच्च शिक्षा दिलाई। मैंने 1963 में साइंस से फस्र्ट डिवीजन से मैट्रिक पास किया। मैं परिवार का पहला मैट्रिकुलेट था। बाबू जी मेरी सफलता पर काफी खुश थे। मैं परिवार का पहला मैट्रिकुलेट जो था। मेरे छोटे भाई नागेंद्र पढ़ाई में मुझसे एक साल जूनियर थे, पर अधिक गंभीर थे। बाबू जी चाहते थे कि में ओवरसियर बनूं और मेरा छोटा भाई वकील बने।
मैट्रिक में प्रथम श्रेणी वालों के लिए ओवरसियरी में प्राप्तांक के आधार पर ही नामांकन संभव हो जाता था। पर मेरी इच्छा वैसी नहीं थी। मैट्रिक में पढ़ते समय ही मैं गांधीवाद से प्रभावित हो गया। कालेज जाने के बाद लोहियावादी हो गया। कालेज जाने के बाद पढ़ाई में मन नहीं लगने लगा। पहले अध्यात्म व फिर राजनीति की ओर मुखातिब हुआ। पर जब सक्रिय राजनीति से जब मन उचटा तो पत्रिकाओं व अखबारों से जुड़ा।

छपरा में राजेंद्र कालेज में बिताये गये अपने छात्र जीवन में ‘सारण संदेश’ जैसी छोटी पत्रिकाओं में लेख लिखता ही था। वहीं रवींद्र कुमार ने मुझे 1965 में दिनमान पढ़ने की प्रेरणा दी जिसने मुझे पत्रकार बनाया।

राजनीति प्रसाद ने जार्ज फर्नांडीस से मेरा परिचय कराया और मुझे प्रतिपक्ष का पटना संवाददाता बनवा दिया। इधर ‘जनता’ साप्ताहिक में भी काम करता था। उसे रामानंद तिवारी निकालते थे। आपातकाल तक यही चलता रहा। क्योंकि स्थापित अखबारों में नौकरी पाना मेरे जैसे व्यक्ति के लिए तब कठिन था। पर सन 1977 में ‘आज’ में नौकरी पाई।

प्रश्न - बड़े अखबारों में काम करने का अपना कुछ अनुभव बताएं। आप जब पत्रकारिता में आये थे, उस समय और आज के समय में कितना फर्क आया है ?

उत्तर - यदि पारसनाथ सिंह और प्रभाष जोशी जैसे ऋषितुल्य संपादक मुझे नहीं मिले होते तो मैं वह सब नहीं कर पाता जितना कुछ भी कर पाया। आज यदि मैं अपने पत्रकार जीवन से संतुष्ट हूं तो वह सब ‘आज’ के पारसनाथ सिंह और जनसत्ता के प्रभाष जोशी की कपा से ही यह संभव हो पाया।

वैसे एक बात जरूर कहूंगा कि राजनीति व खास कर सत्तापक्ष की राजनीति का पत्रकारिता पर असर पड़ता ही है। जब गांधी -नेहरू जैसे नेता राजनीति में थे तो बाबू राव विष्णु पराड़कर जैसे संपादक भी हुआ करते थे। जब मैं पत्रकारिता में आया तब तक गांधी युग के अनेक नेता जीवित थे और राजनीति में सक्रिय भी थे। उनकी मीडिया के प्रति अलग राय थी। मीडिया से निपटने का उनका तरीका आज के नेताओं से बिल्कुल भिन्न था।। मोरारजी देसाई तब सक्रिय थे। जवाहर लाल नेहरू के निधन के कोई पांच साल ही हुए थे। डा. श्रीकष्ण सिंह आठ साल पहले ही गुजरे थे। इनके कार्यकाल का हैंगओवर बाकी था।

इन लोगों के नाम इसलिए ले रहा हूं क्योंकि मैं बताना चाहता हूं कि उनके कार्यकाल में मीडिया को काम करने की कैसी आजादी थी। यह बात नहीं है कि मीडिया इन नेताओं की तीखी आलोचना नहीं करती थी। पर नेहरू, मोरारजी और श्रीबाबू उन अखबारों व पत्रिकाओं को पढ़ना ही छोड़ देते थे जिन प्रकाशनों के बारे में वे समझते थे कि वे प्रकाशन उनके साथ लेखन के स्तर पर अन्याय कर रहे हैं। वे बदले की भावना से मीडिया या फिर मीडियाकर्मियों के खिलाफ कार्रवाई नहीं करते थे।

बाद के वर्षों में तो आलोचना करने वाले अखबारों के मालिकों के व्यवसाय नष्ट किए गये, संपादकों को सत्ताधारी दल के नेताओं ने नौकरियों से हटवा दिया। पत्रकार जेल तक भिजवा दिए गए। धमकियां दी गईं और उन पर नाहक परेशान करने के लिए मुकदमे किए गए। अब ऐसे में अखबार मालिक व्यापारीगण अखबारों को युद्ध का मैदान तो बनाने से रहे।

यह संयोग नहीं है कि मीडिया को उसी सत्ताधारी नेताओं ने तंग तबाह किया जिन पर भ्रष्टाचार के गम्भीर आरोप लगे। जब राजनीति में ही आदर्श नहीं रहा तो सिर्फ मीडिया में ही उसे क्यों खोजा जा रहा है। यह बात और है कि मीडिया व राजनीति में आदर्श के कुछ टापू जरूर आज भी जहां- तहां मौजूद हैं।

( 15 मार्च और 16 मार्च 2010 को ‘प्रभात खबर’ के पटना संस्करण में दो किस्तों में प्रकाशित )

शुक्रवार, 12 मार्च 2010

बिहार को मिला एक नया चुनावी मुद्दा

बिहार में विधान सभा का चुनाव इसी साल होना है। महिला आरक्षण एक प्रमुख चुनावी मुद्दा बन जाए तो यह कोई अजूबी बात नहीं होगी।

महिला आरक्षण के मौजूदा स्वरूप के सबसे बड़े विरोधी नेताआंें में से एक नेता लालू प्रसाद इसी प्रदेश से हैं। विधान सभा चुनाव में मतदाता अन्य बातों के साथ -साथ इस बात पर भी अपना मत देंगे कि महिला आरक्षण के मौजूदा स्वरूप का किस दल ने विरोध और किसने समर्थन किया।

लालू प्रसाद तथा अन्य विरोधियांे को तो यह लगता है कि चूंकि इस देश में पिछड़ों की आबादी अन्य समुदायों की अपेक्षा काफी अधिक है, इसलिए उन्हें इस आरक्षण के विरोध का चुनावी लाभ जरूर मिलेगा। पर क्या ऐसा हो पाएगा? इसका जवाब तो बिहार का अगला चुनाव नतीजा ही देगा।

हालांकि लालू-मुलायम से अलग राय रखने वाले लोग बताते हैं कि इस विरोध का नुकसान ही लालू प्रसाद को बिहार में होगा क्योंकि उनका विरोध पिछड़ी और अल्पसंख्यक महिलाओं के हितों को ध्यान में रख कर कम बल्कि अपने कुछ खास चुनाव क्षेत्रों को महिलाओं से बचाने की समस्या को ध्यान में रख कर अधिक है।

लालू प्रसाद ने कहा है कि दुनिया के किसी देश में महिलाओं के लिए संसद में आरक्षण नहीं हैं। फिर यहीं क्यों ? उन्होंने यह भी कहा है कि यह पुरुष प्रधान समाज है। इसमें पति जहां वोट देने को कहता है, पत्नी वहीं वोट देती है। इसलिए इस विधेयक के पास हो जाने से कांग्रेस या भाजपा को महिलाओं के वोट नहीं बढ़ जाएंगे।

लालू प्रसाद ने यह कह कर समाज में महिलाओं की दयनीय स्थिति का वर्णन खुद ही कर दिया है। इससे भी शीघ्र महिला आरक्षण की जरूरत बढ़ जाती है। ऐसे पुरुष प्रधान समाज में यदि आरक्षण देकर महिलाओं का सशक्तीकरण कर दिया जाए तो वे किसी को वोट देने के बारे में खुद निर्णय लेने की स्थिति में हो जाएंगी। लोकतंत्र के लिए यह जरूरी भी है। लोकतंत्र के लिए यह कोई अच्छी बात तो है नहीं कि एक बड़ी आबादी अपने पतियों के कहने पर ही मतदान किया करे !

महिला आरक्षण के मामले को गत 14 साल से लटका कर रखना कहां का लोकतंत्र है जबकि इस विधेयक के पक्षधर दलों व सांसदों की संख्या हमेशा ही विरोधियों की अपेक्षा अधिक रही है ? अब जब मौजूदा लोकसभा में महिला आरक्षण विधेयक के घोषित विरोधियों की संख्या और भी कम हो गई है तो लालू प्रसाद कहते हैं कि इस विधेयक के खिलाफ ‘युद्ध’ होगा। ऐसे ही युद्ध की घोषणा जब अल्पमत सवर्ण लोग सन 1990 में मंडल आरक्षण के खिलाफ कर रहे थे तो खुद लालू प्रसाद की उस पर कैसी प्रतिक्रिया थी ? यह भी याद रखने की जरूरत है कि वी.पी. सिंह की सरकार को जितने सांसद समर्थन कर रहे थे, उन सांसदों का बहुमत मंडल आरक्षण के खिलाफ ही था। फिर भी जरूरत समझ कर वी.पी. सिंह सरकार ने वह काम कर दिया था।

दरअसल लोकतंत्र का तकाजा यह है कि लालू प्रसाद और मुलायम सिंह यादव यह कहते कि अभी तो मौजूदा स्वरूप में भले कांग्रेस इस विधेयक को पारित करा ले ,पर जब हमारे मत के लोग बहुमत में आएंगे तो हम आरक्षण के भीतर आरक्षण का प्रावधान कर देंगे।

पर सवाल है कि पिछड़ा बहुल इस देश में लालू प्रसाद और मुलायम सिंह यादव जैसे नेताओं के दल संसद में बहुमत क्यों नहीं प्राप्त कर पा रहे हैं ताकि वे आरक्षण के भीतर आरक्षण का प्रावधान करा पाएं ? दरअसल वे इसलिए बहुमत नहीं कर पा रहे हैं क्योंकि पिछड़े और अल्पसंख्यकों को भी उनकी कथनी और करनी पर अब कम ही भरोसा हो रहा है। पिछड़े वर्ग के एक नेता जी ने गत लोकसभा चुनाव में अपने दल के एक निवर्तमान अल्पसंख्यक सांसद का टिकट काट कर उनकी जगह अपने एक करीबी रिश्तेदार को टिकट देकर वहां से लोकसभा में पहुंचा दिया। वे नेताजी आज गला फाड़ कर यह ़कह रहे हंै कि मौजूदा महिला आरक्षण विधेयक अल्पसंख्यक विरोधी है।

बिहार विधानसभा के अगले चुनाव में महिला आरक्षण मुद्दा इस रूप में भी चर्चित हो सकता है कि आरक्षण के भीतर आरक्षण के बहाने इस आरक्षण को अनंतकाल तक टाले रखना उचित है या फिर विधायिकाओं में महिलाओं को बड़ी संख्या में भेज कर उनका जल्द सशक्तीकरण जरूरी है ? यह मानी हुई बात है कि गाड़ी के दोनों पहिए यानी स्त्री-पुरुष समान रूप से मजबूत होंगे तो ही गाड़ी ठीक से चलेगी।

बिहार में पंचायतों व नगर निकायों में महिलाओं के लिए 50 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान नीतीश सरकार ने किया। इन निकायों के चुनावों का अनुभव यह रहा कि ऐसी कुछ सामान्य सीटों से भी पिछड़ी जातियों की महिलाएं विजयी हुई जो सीटें सामान्य महिलाओं के लिए आरक्षित हैं। संभवत इसी अनुभव के आधार पर नीतीश कुमार ने यह समझा है कि संसद में पेश महिला आरक्षण विधेयक के लागू हो जाने के बाद भी पिछड़े वर्ग की महिलाओं को कोई नुकसान नहीं होगा। यह जाहिर बात है कि जिस चुनाव क्षेत्र में जिस जाति की बहुलता होती है,उस क्षेत्र में उस जाति के उम्मीदवार की ही जीत की अधिक गुंजाइश रहती ही है चाहे उम्मीदवार महिला हो या पुरुष।

आजादी की लड़ाई के समय भी कुछ नेताओं ने ऐसे सवाल उठाए थे। कुछ दलित, अल्पसंख्यक व कमजोर वर्ग के नेतागण तब यह चाहते थे कि आजादी से पहले ही यह तय हो जाए कि आजाद भारत में उन समुदायों की स्थिति क्या होगी। उनकी बात सुनी जाती तो आज तक अंग्रेज यहीं रहते।

साभार: दैनिक जागरण पटना संस्करण (09 मार्च, 2010)

शनिवार, 20 फ़रवरी 2010

निंदक नियरे राखिए

चीन ने कहा है कि भारत, मिसाइल टैक्नोलाजी के मामले में, चीन से अभी दस साल पीछे है। संभव है कि यह बात चीन ने अपने लोगों का मनोबल बढ़ाने के लिए कही होगी! यह बात भी संभव है कि इसमें शायद सच्चाई भी हो। इस संबंध में अंतिम वाक्य तो कोई वैज्ञानिक ही बोल सकता है। याद रहे कि अग्नि -3 के सफल परीक्षण के बाद यह खबर आई थी कि चीन के सुदूर उत्तरी इलाके भी अब भारत के हमले की जद में हैं।

खैर जो हो, पर निंदक नियरे राखिए........वाली कबीर वाणी कम से कम कुछ मामलों में तो इस देश को माननी चाहिए। इससे पहले चीन ने यह भी कहा था कि ‘भारत में सरकारी भ्रष्टाचार इतना अधिक बढ़ चुका है कि विकास व कल्याण कार्यों के लिए आवंटित पैसों में से अधिकांश, वैसे ही जाया हो जाता है जिस तरह छेद वाले किसी लोटे में से उसका अधिकांश पानी नीचे गिर जाता है। ’याद रहे कि चीन में भ्रष्ट लोगों के लिए फांसी की व्यवस्था है जबकि भारत में जो जितना अधिक भ्रष्ट है, उस व्यक्ति के लिए उतना ही अधिक महत्वपूर्ण पद पर पहुंच जाने की गुंजाइश है।

चीन की इन बातों का मनन करके यदि भारत खुद को बेहतर बनाने की कोशिश करे तो यह कोई हेठी की बात नहीं होगी। हमारे बाद आजाद हुए चीन ने अनेक मामलों में हमसे बेहतर ढंग से अपने देश को बनाया है तो उसे उपदेश देने का नैतिक अधिकार भी है।

सरकारी भ्रष्टाचार को कम करने के मामले में हमारे देश का यदि खराब रिकार्ड है तो इसके लिए हमारे हुकमरान ही जिम्मेदार रहे हैं। पर यह भ्रष्टाचार रक्षा खरीद मामलों में भी अपना असर दिखा रहा है जो देश की सुरक्षा के लिए खतरनाक बात है। हाल में यह भी खबर आई थी कि मुम्बई के ताज होटल आदि पर हुए आतंकी हमले के समय हमारे पुलिस अफसरों ने जो बुलेट प्रूफ जैकेट पहन रखे थे, वे घटिया थे क्योंकि उसकी खरीद में घोटाला हुआ था। सोफमा जैसी बेहतर तोप को छोड़कर हमने बोफर्स तोप खरीदी थी, यह बात तो जगजाहिर है। पर इसके अलावा बहुत सी बातें जगजाहिर नहीं होतीं और बड़े बड़े घोटाले पलते रहते हैं। इससे हमारी रक्षा तैयारियां पीड़ित होती है।

भले अब हम सन 1962 की स्थिति में नहीं हैं जब हमारी चीन से शर्मनाक हार हुई थी। पर हमें जो चीन तक पहुंचना चाहिए था, हम वह काम भी नहीं कर पा रहे हैं तो इसके पीछे विभिन्न सरकारी स्तरों पर व्याप्त भीषण भ्रष्टाचार ही है। इस समस्या के कोढ़ में खाज का काम करती है उस भीषण भ्रष्टाचार के प्रति हमारे यहां की विभिन्न सरकारों व नेताओं की भारी सहिष्णुता।

कई बार यह कहा जा चुका है कि रक्षा मामलों में हमारी बदतर तैयारियों ने इस देश को विदेशी हमलावरों के समक्ष लाचार भी बना दिया था।

मध्य युग में बाबर कीे फौज में तोप थी तो राणा सांगा के सैनिकों के पास महज तलवारें और भालें। युद्ध में बाबर की ओर से एक तोप चलती थी और अनेक राजपूत वीर , तत्काल वीर गति को प्राप्त कर जाते थे। एक बार फिर तोप के सामने तलवार लेकर खड़े हो जाने के लिए सैनिकों की जमात तैयार हो जाती थी।

बाद के दिनों में भी इस देश में शाहजहां ने ताज महल और विशाल किलों के निर्माण में समय, शक्ति व धन तो खूब लगाये जबकि उसे देश की हमलावरों से रक्षा के लिए नेवी पर भी खर्च करना चाहिए था। हमलावर समुद्री मार्ग से भारत आये थे।

आज जब भारत का अपने पड़ोस से अच्छा संबंध नहीं है तो हमारी तैयारी भी ऐसी होनी चाहिए ताकि दुश्मन हमारे खिलाफ कोई खिलवाड़ करने से पहले थोड़ा रुक कर सोंचें। परमाणु संपन्न देश बन जाने के कारण भारत की सैनिक धाक जरूर बढ़ी है। पर वही काफी नहीं है। हमें आर्थिक रूप से भी एक संपन्न देश बनना पड़ेगा। इसके लिए भ्रष्टाचार पर काफी हद तक काबू पाना होगा। भ्रष्टाचार कम होने से रक्षा तैयरियों में भी बेहतरी आएगी। साथ ही देश का आर्थिक स्वास्थ्य भी सुधरेगा। गांवों में भी जो व्यक्ति आर्थिक रूप से संपन्न होता है, उसे उसके विरोधी भी जल्दी उससे नहीं उलझते।

चीन का मन इसलिए भी बढ़ा रहता है क्योंकि भारत ने आजादी के बाद खुद को बुलंद नहीं बनाया। अब भी यहां 84 करोड़ लोग औसतन बीस रुपये रोज पर किसी तरह पेट को पीठ से अलग रखने के लिए प्रयत्नशील रहते हैं। दूसरी ओर इस देश में धनपशुओं, कालाबाजारियों, करोड़पति-अरबपति नेताओं की संख्या बढ़ती ही जा रही है। इस देश का भारी धन विदेशी बैंकों की शोभा बढ़ा रहे हैं। ऐसे में चीन की निंदा को कबीर तरह हम लें तो हमारा ही भला होगा।

(दैनिक ‘जागरण’ पटना संस्करण:16 फरवरी 2010 से साभार)

मंगलवार, 2 फ़रवरी 2010

राजनयज्ञों की उठती पीढ़ी

इस देश में नेता कई तरह के होते हैं। अत्यंत थोड़े से राजनयज्ञ यानी स्टेटसमैन होते हैं। कुछ अन्य नेता होते हैं। कुछ कबीलाई सरदार होते हैं। कुछ शुद्ध माफिया व हत्यारे होते हैं जो राजनीति भी करते हैं। कुछ जातीय व सांप्रदायिक वोट बैंकों के सौदागर होते हैं। कुछ अन्य कोटियां भी हैं जिनकी चर्चा यहां उचित नहीं।

जब देश की सत्ता राजनयज्ञों या कम से कम नेताओं के हाथों में आती है तो देश भरसक सुरक्षित माना जाता है। पर जब बाकी श्रेणियों के राजनीतिक कर्मियों के हाथों में प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से सत्ता आ जाती है तो देश या प्रदेश असुरक्षित माना जाने लगता है।

इस देश के साथ परेशानी यह पैदा हो रही है कि यहां एक-एक करके राजनयज्ञ यानी स्टेटसमैन उठते जा रहे हैं। ज्योति बसु अब हमारे बीच नहीं हैं। अटल बिहारी वाजपेयी और जार्ज फर्नांडीस बुरी तरह बीमार हैं और सक्रिय राजनीति से दूर जा चुके हैं। एल.के. आडवाणी को परिस्थितियों ने किनारे कर दिया। उनके अर्ध-संन्यास के लिए वे खुद कतई जिम्मेदार नहीं हैं। यदि पूरे देश के राजनीतिक नजारे को गौर से देखें तो स्टेटसमैन शायद ही कहीं नजर आएगा। यदि इक्के-दुक्के हैं भी तो उनकी संख्या इतनी कम है कि वे देश पर आने वाले किसी संकट में कोई निर्णायक भूमिका निभाने की स्थिति में नहीं हैं।

नेताओं की नई नई पीढ़ियां आंदोलनों की आंच से तप कर निकलती हैं। अब परिवारवाद के घरौदों से राजनीति में नई पीढ़ियां जबरन निकाली जा रही हैं। और इस अभागे व गरीब देश पर थोपी जा रही है। परिवारवाद की कल्पना ही स्वार्थ व जातिवाद पर आधारित है। इसलिए आम तौर पर परिवारवादी राजनीति का स्वरूप भी वैसा ही बनता जा रहा है। शायद ही किसी परिवारवादी नेता ने देश का भला किया हो। अपवादों की बात और है।

ब्रिटेन के प्रधान मंत्री विंस्टन चर्चिल को स्टटेसमैन कहा जाता है। स्टेटसमैन न सिर्फ देश व दुनिया के सामने मौजूद समस्याओं से मजबूती व होशियारी से लड़ता है बल्कि राजनीति का स्वरूप भविष्य में कैसा हो सकता है, इसका भी सही अनुमान रखता है। चर्चिल ने सफलतापूर्वक द्वितीय विश्व युद्ध का नेतृत्व किया था। साथ ही उसे यह भी पता था कि आजादी दे देने के बाद भारत के नेतागण उस देश के साथ क्या कर गुजरेंगे। उनकी यह भविष्यवाणी भारत में सही साबित हुुई है जिसकी यहां अक्सर चर्चा होती रहती है। हालांकि इससे यह साबित नहीं होता कि भारत को आजाद करना गलत था।ं

पर आज जब हम भारत में स्टटेसमैन की कमी की चर्चा करते हैं तो हमारे दिलोदिमाग में यह बात रहती है कि यदि देश के सामने कोई बहुत बड़ी व खतरनाक समस्या आ जाए तो हमारे नेतागण उससे कैसे निपटेंगे।

आज भारत के सामने सबसे बड़ी समस्या सरकारी भ्रष्टाचार है। इसी से लगभग अन्य सभी समस्याएं पैदा हो रही हैं। आज की भीषण महंगाई की समस्या भी सरकारी भ्रष्टाचार से ही पैदा हुई है। महंगाई से जूझने में हमारे देश व प्रदेश के नेतागण विफल हैं। जबकि निष्पक्ष विशेषज्ञ कह रहे हैं कि यदि ईमानदारी, दूरदर्शिता व कड़ाई से इस समस्या का समय पर समाधान कर दिया गया होता तो आज यह इतना भीषण रूप नहीं ले पाता। सरकारी भ्रष्टाचार की समस्या से सफलतापूर्वक जूझने के लिए ऐसे राजनयज्ञों की सख्त जरूरत है जो ईमानदारी से इस बीमारी पर हमला करे। इसके लिए यह जरूरी है कि वह राजनयज्ञ खुद भी ईमानदार हांे। वैसे भी व्यक्तिगत ईमानदारी के बिना कोई राजनयज्ञ का दर्जा पा ही नहीं सकता।

आज इस देश में कितने नेता बच गये हैं जिनकी व्यक्तिगत ईमानदारी ‘सीजर की पत्नी की तरह संदेह से परे’ है ? ऐसे माहौल में सरकारी भ्रष्टाचार के खिलाफ जरूरी कदम कौन उठाएगा ? यह एक बड़ी समस्या है जो समय के साथ इस देश में बढ़ती ही जा रही है। यह बात सही है कि अटल बिहारी वाजपेयी, जार्ज फर्नांडीस और ज्योति बसु ऐसी सरकारों में रहे जो भ्रष्टाचार से मुक्त नहीं थी। पर ये तीन नेता कम से कम ऐसे तो माने ही गये जो सरकारी भ्रष्टाचार को बढ़ावा देकर अपने तथा अपने परिवार के घर नहीं भरते थे। ये नेता जिन पदों पर रहे, उन पदें को तो कम से कम पैसे कमाने की मशीन बनाने से उन्होंने रोके रखा। पर आज अधिकतर सत्ताधारी व प्रतिपक्षी नेताओं की हालत कैसी है? एम.पी.-विधायक फंड ने तो अधिकतर नेताओं की बखिया उधेड़ कर रख ही दी है।

इस माहौल में ज्योति बसु जैसे राज नेताओं का जाना अखरता है। राजनयज्ञों की दिनानुदिन घटती संख्या और भी अखरने वाली बात है। यह देश व इसके लोकतंत्र के भविष्य के लिए कतई शुभ नहीं है। आगे- आगे देखिए होता है क्या !

साभार दैनिक जागरण पटना

शनिवार, 30 जनवरी 2010

तीन-तीन बार उनके दरवाजे पर आकर लौट गया था प्रधान मंत्री का पद

प्रधान मंत्री का पद तीन-तीन बार ज्योति बसु के दरवाजे पर आकर लौट गया था। एक बार तो सी.पी.एम. की केंद्रीय कमेटी ने उन्हें प्रधान मंत्री पद स्वीकारने ही नहीं दिया। यह 1996 की बात है। अन्य दो अवसरों पर खुद ज्योति बसु ने यह पद ठुकरा दिया। 1996 से पहले उन्हंे ऐसा आफर 1989 और 1990 में भी मिला था।

संभवतः ऐसा इस देश में सिर्फ ज्योति बसु के ही साथ हुआ। इस बारे में खुद ज्योति बसु ने कहा था कि ‘भारत का प्रधान मंत्री बनने का प्रस्ताव मेरे सामने पिछले कई वर्षों से विभिन्न स्त्रोतों से आता रहा है। 1996 में जब वी.पी. सिंह ने प्रस्ताव दिया तब मुझे लगा कि इसे स्वीकार करने का समय आ गया है।’ इस बात का पता तो पूरे देश को तभी चल गया था कि किस तरह सी.पी.एम. ने ज्योति बसु को प्रधान मंत्री नहीं बनने दिया था। पर यह बात कम ही लोग जानते हैं कि 1989 में भी प्रधान मंत्री बनने का प्रस्ताव अरुण नेहरू ने ज्योति बसु को दिया था। यह प्रस्ताव राजीव गांधी की ओर से अरुण नेहरू ने ज्योति बाबू तक पहुंचाया था।

ज्योति बसु के जीवन पर लिखित अरुण पांडेय की पुस्तक में इस बात का जिक्र है। पुस्तक 1997 में राज कमल प्रकाशन ने प्रकाशित की थी। ज्योति बसु ने बताया था कि ‘मैंने तब अरुण नेहरू का आॅफर अस्वीकार कर दिया था।’

अरूण पांडेय लिखते हैं कि ‘उनके स्वीकारों व अस्वीकारों का अर्थ समझा जा सकता है। यदि वे 1989 में प्रधान मंत्री पद का ख्वाब देखने लगे होते तो भारतीय मतदाता उन्हें खलनायक मानते। क्योंकि 1989 के नायक तो विश्वनाथ प्रताप सिंह थे। ठीक उसी तरह यदि वे 1990 में राजीव गांधी से हाथ मिला कर प्रधान मंत्री बनते तो उन्हें विश्वासघाती कहा जाता। इससे अलग 1996 का प्रस्ताव उन्हें नायक बनाता लग रहा था। क्योंकि वे समूचे तीसरे मोर्चे की आखिरी पसंद थे। चुनौतियां विकट थीं, पर उनसे टकराने का पर्याप्त अनुभव उनके पास था। इसीलिए ज्योति बसु ने माकपा के इस निर्णय को भयंकर ऐतिहासिक भूल घोषित किया। याद रहे कि उनकी पार्टी ने ही उन्हें 1996 में प्रधान मंत्री नहीं बनने दिया था।’

इस संबंध में ज्योति बसु ने कहा था कि ‘सरकार में शामिल होने के सवाल पर पार्टी ने जैसा अड़ियल और अनम्य रूख अख्तियार किया, उसका कारण था मेरे अपने पाॅलिट ब्यूरो और केंद्रीय कमेटी के साथियों में उपयुक्त राजनीतिक समझ का अभाव। इसीलिए वे स्थिति का सामना सकारात्मक रूप से नहीं कर सके। अधिकतर के विचार युक्तियुक्त नहीं थे। उन्होंने भयंकर भूल की। इस बात का हमें दिली अफसोस है कि सरकार में शामिल न होने का निर्णय करके हमारी पार्टी के साथियों ने मेरे सुझाव को महत्वहीन माना और एक प्रकार से मेरे विवेक को अपमानित किया। लोग हमें इस निर्णय के लिए उसी प्रकार दोषी ठहराएंगे जिस प्रकार उन्होंने तब दोषी ठहराया था जब हमने मोरारजी सरकार को समर्थन नहीं दिया था।’

1979 में चैधरी चरण सिंह मोरारजी की सरकार गिराने पर अमादा थे। ज्योति बसु उसी समय की चर्चा कर रहे थे। तब ज्योति बसु विदेश में थे। बसु ने इस संबंध में कहा था कि ‘तत्कालीन प्रधान मंत्री मोरारजी देसाई ने अपनी सरकार बचाने के लिए समर्थन की मांग मुझसे तब की थी, जब मैं बुखारेस्ट में छुटिटयां मना रहा था। उन्होंने मुझे फौरन भारत लौटने को कहा था। मैंने स्थिति का अध्ययन कर मन ही मन फैसला कर लिया कि मोरारजी देसाई को पद पर बैठाए रखने के लिए हमारी पार्टी को उनका समर्थन करना चाहिए। लेकिन इससे पहले कि मैं भारत पहुंचता, हमारी पार्टी उन्हें समर्थन नहीं देने का फैसला कर चुकी थी। मैं कुछ नहीं कर पाया। क्योंकि मैं पार्टी के भीतर अल्पमत में था। मेरी दृष्टि में यह भी भारी भूल थी। इंदिरा गांधी ने राजनीतिक निर्णय लेते समय राजनीतिक नैतिकता की कतई परवाह नहीं की। हमारी पार्टी पर मोरारजी देसाई सरकार को गिराने का आरेाप लगा। हमारी गलती ही इंदिरा गांधी की सत्ता में वापसी का कारण बनी। याद रहे कि इंदिरा गांधी ने समर्थन देकर चरण सिंह को प्रधान मंत्री बनवा दिया था और लोकसभा का कार्यकाल पूरा होने से पहले समर्थन भी वापस ले लिया था।

माकपा में मौजूद उनके विरोधियों ने इस तरह के मामलों में ज्योति बसु के तर्कों को खारिज कर दिया था। उनके विरोधियों का मानना था कि पार्टी ऐसी किसी सरकार में शामिल नहीं हो सकती, जिसकी नीतियों को प्रभावित करने की स्थिति में वह नहीं हो। दूसरा तर्क यह था कि कांग्रेस के समर्थन से सरकार चलाने का हर अभियान पार्टी के विस्तार में बाधक होगा। तीसरा तर्क यह था कि सरकार से बाहर रहते हुए पार्टी सरकार पर अपना दबाव भी बना सकती हेै। साथ ही पार्टी मोर्चे के विभिन्न धड़ों के बीच सामंजस्य स्थापित करने में अधिक सक्षम हो सकती है। ज्योति बसु को गम इस बात का नहीं था कि वे प्रधान मंत्री नहीं बन सके, बल्कि उन्हें इस बात का गम रहा कि उनकी पार्टी ने राष्ट्रीय राजनीति में सशक्त हस्तक्षेप करने का एक सुनहरा अवसर खो दिया।

सुरभि बनर्जी ज्योति बसु की अधिकृत जीवनीकार रही हैं। उन्होंने लिखा है कि ज्योति बसु किसी भी पद को स्वीकार करने में सदा संकोची रहे। उन्होंने यानी ज्योति बसु ने हंसते हुए जीवनीकार से कहा था कि ‘सरकार में शामिल नहीं होने का निर्णय लेकर केंद्रीय कमेटी के बहुमत ने मुझे बचा लिया। क्योंकि प्रधान मंत्री बनने के बाद मेरे उपर बोझ बढ़ जाता। स्वास्थ्य खराब होने के कारण मुझे तकलीफ होती।’ इस पर सुरभि बनर्जी ने लिखा है कि ‘केंद्रीय कमेटी के फैसले के बाद मैंेने माकपा के ढेर सारे सदस्यों और कई अन्य राजनीतिक विश्लेषकों से बात की। लगभग सभी ने कहा कि यह फैसला देशहित को ध्यान में रख कर किया गया फैसला नहीं था बल्कि पार्टी में मौजूद परंपरागत द्वंद्व का परिणाम था। ज्योति बसु से अपनी व्यक्तिगत दुश्मनी और विचारधारात्मक विरोधों के चलते केंद्रीय कमेटी के अधिकतर सदस्यों ने बैठक में आने से पहले ही यह तय कर लिया था कि किसी भी कीमत पर उन्हें प्रधान मंत्री नहीं बने देना है।’

इस मसले पर बंगाल बनाम केरल वाला पुराना निष्कर्ष निकालने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता है। क्योंकि उनकी व्यक्तिगत दुश्मनी किससे थी और विचारधारात्मक मतभेद किससे था, इस सवाल का किसी महत्वपूर्ण नेता की तरफ से कोई अधिकारिक बयान नहीं आया है।

साभार

बुधवार, 23 दिसंबर 2009

दूरगामी परिणामों वाला एक कदम

गुजरात विधानसभा ने स्थानीय निकायों के चुनाव में मतदान को अनिवार्य बनाने वाला विधेयक पास कर दिया। यह एक ऐसा कदम है जिसे देर सवेर सभी चुनावों में लागू कर दिया जाए तो उसका दूरगामी राजनीतिक परिणाम हो सकता है। जातीय व सांप्रदायिक वोट बैंक की बुराई को कम करने के लिए ऐसी मांग पिछले कई वर्षों से की जाती रही है। पर गुजरात की नरेंद्र मोदी सरकार ने स्थानीय निकायों से इसकी शुरुआत कर दी।

इस विधेयक में यह व्यवस्था जरूर रखी गई है कि यदि कोई मतदाता अपनी अनुपस्थिति का कोई उचित कारण बता देता है तो उसके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं होगी अन्यथा उसे अयोग्य मतदाता घोषित कर दिया जाएगा। संविधान निर्माताओं ने जब आजादी के बाद प्रत्येक बालिग नागरिक को मत देने का अधिकार दिया, तो उनसे यह उम्मीद की गई थी कि वे उस अधिकार समुचित उपयोग करके देश व प्रदशों के लिए जनसेवी सरकार बनवाएंगे। पर कई कारणों से ऐसा नहीं हो सका। उल्टे मतदाताओं की संख्या कम होने के कारण इस देश की राजनीति में कई तरह की बुराइयां पैदा होने लगीं।

कई साल पहले पटना जिले के एक विधानसभा क्षेत्र में एक बाहुबली सिर्फ इसलिए चुनाव जीत गया क्योंकि अधिकतर मतदाता मतदान के दिन अपने घरों में ही रहे। उस बाहुबली ने दो सौ मतदान केदं्रों में सिर्फ 30 मतदान केंद्रों पर कब्जा करवा कर जीत हासिल कर ली। उन दिनों मतदान केंद्रों पर कब्जा आम बात थी। यदि उस क्षेत्र के सारे नहीं तो कम से कम अधिकतर मतदाताओं ने मतदान में भाग लिया होता तो ऐसा रिजल्ट कतई नहीं होता।

पर कम मतदान का लाभ कई राजनीतिक दलों ने उठाकर इस देश की राजनीति का कचड़ा कर रखा है। पिछले दसियों साल का चुनावी अनुभव यह बताता है कि किसी दल या दलीय समूह को केंद्र की सत्ता पर कब्जा कर लेना हो तो उसे सिर्फ तीन या चार समुदाय या जाति समूहों का वोट बैंक बनाना होगा। यदि किसी प्रदेश की सत्ता हासिल करनी हो, तब तो किसी दो मजबूत समूहों से ही काम चल जाएगा।

कई मामलों में होता यह रहा है कि इस रीति से सत्ता में आया दल या नेता सिर्फ अपने समुदाय या जाति की थोड़ा बहुत जरूरतों को पूरी करता है और बाकी जनता को अपने हाल पर छोड़ देता है। इसके बावजूद उसे चुनावी जीत मिलती जाती है। क्योंकि उसके पास एक ठोस वोट बैंक जो है।

इस देश में किसी समुदाय या जाति की आबादी पूरी आबादी के 10 -15 प्रतिशत से अधिक नहीं है। यदि सौ या नब्बे प्रतिशत मतदाता मतदान केंद्रों पर जाने लगें तो फिर इन जातीय वोट बैंकों की करामात लगभग समाप्त हो जाएगी। जब वोट बैंक के कारण किसी दल या नेता के पास चुनावी निश्चिंतता नहीं रहेगी तो उसे आम जनता के लिए ईमानदारी व मेहनत से काम करना पड़ेगा, तभी वह कोई चुनाव जीत पाएगा।

अब तक के अनेक चुनावों में इस देश में जातीय व सांप्रदायिक भावनाएं भड़का कर ऐसे ऐसे नेता, दल और दलीय समूह सत्ता में आते रहे हैं,जिन्हें शाय तब सत्ता नहीं मिलती जब 90 से सौ प्रतिशत लोग मतदान करते।

ऐसा नहीं होना चाहिए कि चूंकि एक विवादास्पद मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने ऐसा विधेयक पास कराया है तो उस विधेयक पर खराब विधेयक करार दे दिया जाए। ऐसे दूरगामी परिणाम वाले कदम पर देश में ंखुले दिलो दिमाग से विचार होना चाहिए और उसे लोकसभा व विधानसभाओं के चुनावों में भी लागू करने का प्रयास होना चाहिए।इससे यह भी होगा कि उन गरीबों को भी मत देने का अवसर मिलेगा जिन लोगों को ऐसा अवसर कम ही मिलता है। चूंकि देश के 84 करोड़ लोगों की रोज की औसत आय मात्र बीस रुपये रोजाना है, इसलिए उनके बीच के मतदाता अपने लिए सही उम्मीदवारों को ही चुनेंगे, ऐसी उम्मीद की जानी चाहिए।

(साभार दैनिक जागरण:पटना संस्करण: 22 दिसंबर 09)

कांग्रेसी राज में ही क्यों बढ़ती है बेतहासा महंगाई ?

सन 1999 में गेहंू साढ़े सात रुपये प्रति किलो ग्राम की दर से बिक रहा था। सन 2004 में उसकी कीमत बढ़कर आठ रुपये प्रति किलो हो गई। आज लोग साढ़े 17 रुपये किलो गेहूं खरीदने को विवश हो रहे हैं।
साधारण चावल का दाम 1999 में साढ़े आठ रुपये किलो था। 2004 में बढ़कर दस रुपये किलो हो गया। अब कम से कम सोलह रुपये किलो चावल बिक रहा है। विभिन्न स्थानों में इनकी कीमतों में थोड़ी कमी -बेशी स्वाभाविक है। जिंसों के प्रकार के अनुसार भी दामों में कमी -बेशी स्वाभाविक है। इस विश्लेषण की मूल बात अभूतपूर्व मूल्य वद्धि की चर्चा है। मूंग दाल की हालत और भी खराब है। इस साल करीब सौ रुपये किलो बिकी। जबकि 1999 से 2004 तक इसकी कीमत 24 रुपये किलो पर स्थिर थी। चीनी और सरसों तेल की कीमतों में तो हाल के वर्षांे में अपेक्षा कत और भी अधिक बढ़ोतरी हुई है।

उपर्युक्त विवरण एनडीए के किसी आरोप पत्र से नहीं लिया गया है बल्कि दैनिक अखबारों के आर्थिक पन्नों से उतारा गया है।

आज जानकार लोग बता रहे हैं कि खाने पीने वाली सामग्री की कीमत मात्र गत एक साल में करीब 20 प्रतिशत बढ़ गई है। चीनी की कीमत तो एक साल पहले 18 रुपये प्रति किलो थी। इस साल क्यों वह 40 रुपये किलो बिकी ? जबकि किसानों को गन्ने के अलाभकर मूल्य निर्धारण के खिलाफ संसद भवन को घेरना पड़ा। क्यों गन्ने का समर्थन मूल्य तो दस साल में मात्र दुगुना किया जाता है, पर चीनी की कीमत मात्र एक साल में दुगुनी हो जाती है ? अन्य उपभोक्ता सामग्री का भी कमोवेश यही हाल है? आखिर इसमें केंद्र व राज्य सरकारों की कोई भूमिका रह भी गई है या नहीं ? या फिर आम निरीह जनता का खून चूसने के लिए विभिन्न सरकारोंने मुनाफाखार भेड़ियों को खुला छोड़ दिया है ? साफ -साफ लग रहा है कि केंद्र सरकार ने इस अभूतपूर्व महंगाई की समस्या के सामने न सिर्फ घुटने टेक दिये हैं, बल्कि संबंधित मंत्री शरद पवार ने यह कह कर मुनाफाखोरों व जमाखोरों का हौसला बढ़ा दिया है कि अगले तीन महीने तक महंगाई पर काबू नहीं पाया जा सकता है। इससे पहले कभी किसी सरकार को इतना निरीह नहीं पाया गया था। यह निरीहता है या मुनाफाखारों से सांठसांठ ?

अब तो केंद्रीय मंत्री महंगाई के लिए राज्यों को दोषी ठहरा कर अपनी राजनीतिक रोटी भी सेंक रहे हैं।

उधर विभिन्न राज्य सरकारों में व्याप्त भीषण भ्रष्टाचार के कारण सार्वजनिक जन वितरण प्रणलियां करीब करीब फेल कर गई हैं। इस विफलता ने मुनाफाखोरों व जमाखोरों की बांछें खिला दी हैं। केंद्र सरकार के अन्न भंडार भरे हुए हैं। पर उन्हें बाजारों में नहीं उतारा जा रहा है। ऐसा मुनाफाखोरों के हित को ध्यान में रख कर किया जा रहा है ? यानी जाहिरा तौर पर महंगाई के लिए केंद्र व राज्य दोनों सरकारें जिम्मेदार हैं। यह बात और है कि केंद्र सरकार अपेक्षाकत काफी अधिक जिम्मेदार है। क्योंकि उसने महंगाई बढ़ाने के लिए कुछ और कुकत्य किए हैं। विभिन्न राजनीतिक दल इसको लेकर एक दूसरे पर आरोप भले लगाएं, पर आम जनता सब कुछ जान रही है। इस पर इस गरीब देश में चर्चाएं जारी हैं। यदि सिर्फ गैर यू।पी.ए. राज्य सरकारें ही जिम्मेदार होतीं तो दिल्ली में महंगाई अन्य राज्यों की अपेक्षा कम होती क्योंकि यहां तो दोनों सरकारें एक ही दल की हैं।

यह भी कहा जा रहा है कि भीषण महंगाई के बावजूद जब कोई सत्ताधारी दल चुनाव जीतता ही चला जाए तो उसे इस पर काबू पाने की भला कौन सी मजबूरी रहेगी ? प्रतिपक्षी पार्टियां भी आधे मन से ही इसके खिलाफ आवाज उठा रही हंै। क्योंकि थोड़े बहुत उसके भी तो निहित स्वार्थ हैं ही। मर तो गरीब रहा है। लगता है कि राजनीतिक दलों का गरीबों से संबंध सिर्फ वोट का रहा गया है, भावना व सेवा गायब है। राजनीति में सांप्रदायिक, पारिवारिक व जातीय भावना जरूर मजबूती से उपस्थित है। अब तो इस देश के परंपरागत कम्युनिस्ट दलों को भी फाइव स्टार होटलों में अपने सम्मेलन करने और फाइव स्टार जीवन जीने में कोई शर्म नहीं आ रही है। कुछ अपवादों की बात और है। नई आर्थिक नीतियां आने के बाद बाजार की ताकतों को अर्थ व्यवस्था की बागडोर थमा दी गई है।

अर्थशास्त्री कमल नयन काबरा ने ठीक ही कहा है कि ‘आयात-निर्यात की मात्रा और कीमतों की अनिश्चितता तथा कीमत नियंत्रण के लिए आयात का जिम्मा मुनाफाखोर तबकों को देना, महंगाई को न्योतना है। सार्वजनिक वितरण प्रणाली की खामियों का कोई इलाज नहीं किया जाता है। नेताओं, पार्टियों और व्यवसायियों के गहराते निजी रिश्ते के परिप्रेक्ष्य में जनपक्षीय मूल्य नीति की उम्मीद करना बेमानी है।’

आज दिल्ली में किसी बहुमंजिली इमारत में तैनात जो गार्ड महीने भर काम करने के बाद मात्र 47 सौ रुपये पाता है, वह खुद क्या खाएगा और क्या गांव में अपने परिवार को भेजेगा ? वैसे भी इस देश के कितने लोगों को इतने पैसे भी हर महीने मिल पाते हैं ? इस देश के गरीबों के बारे में अर्थशास्त्री अर्जुन सेनगुप्त बताते हैं कि ‘84 करोड़ लोगों की रोजाना औसत आय मात्र बीस रुपये है।’ एक अन्य उदाहरण यहां पेश है। पी।एफ. से जुडी पेंशन राशि तो पांच सौ से हजार -डेढ़ हजार रुपये तक ही है। इस पंेशन राशि में भी किसी तरह की सालाना बढ़ोतरी का कानूनी प्रावधान तक नहीं है। ऐसे दरिद्र लोगों के लिए महंगाई का क्या मतलब है, यह बात अतुल्य भारत का सपना दिखाने वाले लोग नहीं समझ पा रहे हैं।

दूसरी ओर सरकार द्वारा इस देश में ऐसी अर्थ व्यवस्था जरूर बना दी गई है ताकि करोड़पतियों व अरबपतियों की संपत्ति सचिन तेंदुलकर की रन संख्या के अनुपात से भी अधिक बढ़ती जाए। ताजा आंकड़ों के अनुसार इस देश के अरबपतियों की संख्या मात्र गत एक साल में 27 से बढ़कर 54 हो गई है। एक सौ अमीरों के पास इस देश की 25 प्रतिशत संपत्ति है। जबकि संविधान के नीति निदेशक तत्व चैप्टर के अनुच्छेद 39/ग/में यह कहा गया है कि ‘राज्य ऐसी व्यवस्था करेगा ताकि उत्पादन के साधनों का अहितकारी संकेंद्रण नहीं हो।’

आर्थिक विशेषज्ञ, अखबारों व टी।वी.के टाॅक शो में यह बताते रहते हैं कि महंगाई बढ़ने के लिए किस तरह केंद्र सरकार अधिक और राज्य सरकारें कम जिम्मेदार रही हैं। उधर लोकसभा में महंगाई पर चर्चा होती है तो उस समय सदन में एक सौ सांसद भी उपस्थित नहीं रहते। आखिर उसकी उन्हें जरूरत ही कहां है ? उन्हें तो महंगाई छू भी नहीं गई है। सदन की बैठक के आखिरी दिन बिना बहस के संसद मत्रियों व सांसदों के वेतन भत्ते आये दिन सर्वसम्मति से बढ़ाती रहती है।ं 543 में से 316 सांसद करोड़पति हैं। उन्हें संसद की कैटीन में देश में सबसे सस्ता व स्तरीय खाना उपलब्ध ही है। वे क्यों महंगाई से तनिक भी दुःखी होंगे ?

ऐसा नहीं है कि इस मामले में गैर कांग्रेसी सरकारें व पार्टियां दूध की धुली हुई हैं। आम भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने के मामले में उनका रिकाॅर्ड भी लगभग कांग्रेस जैसा ही है। अब तो लगता है कि नेताओं के लिए भ्रष्टाचार कोई मुददा रहा ही नहीं। पर मुनाफाखोरों के प्रति कांग्रेस अपेक्षाकत अधिक उदार रही है। सरसों तेल की कीमत 1972 में 3 रुपये 95 पैसे प्रति लीटर थी। सन 1979 में वह घट कर 3 रुपये 50 पैसे हो गई। तब जनता पार्टी की सरकार केंद्र में थी। अन्य सामग्री की कीमतों का भी कमोवेश यही हाल था। पर सन 1980 में जब कांग्रेस सत्ता में वापस आ गई तो सरसों तेल की कीमत 1981 में बढ़कर साढ़े छह रुपये प्रति लीटर हो गई। मूंग दाल की कीमत सन 1972 में ढाई रुपये और 79 में सवा तीन रुपये थी, पर 81 में साढ़े छह रुपये हो गई। याद रहे कि यहां जो कीमतें दी जा रही हैं, उनमें से कई मद थोक कीमतों के हैं तो कुछ खुदरा के।कई साल के अखबारों की फाइलें देखने से यह लगता है कि 1999 से 2004 तक जिस रफतार से कीमतें बढ़ीं, उसकी अपेक्षा काफी अधिक गति से 2004 और 2009 के बीच में बढ़ी। मौजूदा केंद्र सरकार को इसका वाजिब जवाब देना चाहिए। क्या उसके पास जवाब है भी ? यदि नहीं है तो वह यह बात भी अच्छी तरह समझ ले कि इस मूल्य वद्धि की सर्वाधिक मार देश की 84 करोड़ आबादी पर पड़ रही है। माओवादियांे के खिलाफ किसी तरह के आपरेशन का कोई नतीजा सामने नहीं आएगा, यदि मूल्य वद्धि इसी तरह होती रहेगी।

मूल्य वद्धि की रफ्तार
(दर प्रति किलो रुपये में)

1947 --1972---1979 - 1981---1999--2004--2009
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गेहूं - 0.30 --1.25---1.80--- 2.20---7.50--8.00--17.50
मूंग दाल- 0.25 --2.50 --3.25 ---6.50-- 24.00--24.00--95.00
सरसों तेल-1.75--5.50---9.00----16.00- अनुपब्ध-33.00--91.00
चीनी--- 0.72 -3.95--3.50---- 6.50 -- 15.00--16.65--40.00
( इनमें से कुछ जिंसों का भाव थोक का है और कुछ का खुदरा का।)
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इन आंकड़ों को देखने से यह साफ है कि किसके शासन काल में कीमतों के बढ़ने का अनुपात अधिक था और किसके शासन काल में कम।शरद पवार से पहले शायद ही किसी कषि मंत्री ने यह आधिकारिक घोषणा की थी कि अगले तीन महीने तक कीमतें बढ़ेंगी ही।इससे पहले संबंधित मंत्री यह कहते थे कि सरकार कीमतों पर काबू पाने की कोशिश व उपाय कर रही है।दोनों बयानों के मतलब व संदेश जाहिर है कि मुनाफाखारों के लिए अलग अलग हैं। भला लगातार चुनाव जीतते जाने वाले नेता क्यों इसकी चिता करंेगे कि उनके बयानों का क्या अर्थ लगेगा !

(साभार प्रभात खबर: 22 दिसंबर 2009)