सोमवार, 9 दिसंबर 2019

खुद को बचाने के लिए जरूरी है ‘जल जीवन हरियाली’ की सफलता--सुरेंद्र किशोर



प्रकृति,पर्यावरण और पृथ्वी की रक्षा के साथ ही मानव अस्तित्व जुड़ा हुआ है।
बिहार सरकार के ‘जल जीवन हरियाली अभियान’ से आज कोई अन्य बेहतर अभियान हो ही नहीं सकता।
इसे मानव के अस्तित्व की रक्षा से जुडे़ एक अभियान के रूप में देखा जा सकता है। 
इस अभियान की सफलता बेहद जरूरी है।
इससे पृथ्वी बचेगी और साथ- साथ उससे मानव की भी रक्षा होगी।
बिगड़ते पर्यावरण की समस्या की गंभीरता को लेकर अभी जागरूकता कम है।
हर स्तर की शालाओं में पर्यावरण विज्ञान की पढ़ाई जब और अधिक होगी तो उसके साथ ही जागरूकता भी बढ़ेगी। 
 बिहार सरकार ने जल जीवन हरियाली योजना पर अगले तीन साल में 24 हजार 500 करोड़ रुपए खर्च करने कव निर्णय किया है।
इसके तहत वर्षा जल संचयन की योजना है।
जल स्त्रोतों का जीर्णेाद्धार करना है।
पौधरोपण होगा।
इससे जुड़ी कुछ अन्य योजनाएं भी हैं। 
  पर सबसे बड़ी समस्या यह है कि इस योजना के लिए निर्धारित धन का सदुपयोग हो।उसका पूरा कव पूरा इस्तेमाल हो।रिसाव कम से कम हो।
भ्रष्टाचार के राक्षसगण  24 हजार करोड़ रुपए का बजट देखेंगे और उनके मंह से लार टपकने लगेगी।
खबर है कि अनेक नल जल योजनाआंे का वैसे ही लोग बंटाढार कर रहे हैं।हांलाकि उस लूट पर सरकारी चैकसी इधर बढ़ी है।  
   --नन-प्रैक्टिसिंग भत्ता--
 इस नवीन और महत्वाकांक्षी योजना की सफलता मनुष्य जीवन की रक्षा के लिए जरूरी है। इसीलिए जल जीवन हरियाली योजना की मोनिटरिंग के काम में राज्य सरकार ऐसे अफसरों को लगाए जिनकी ईमानदारी निर्विवाद रही है।
   इस काम के लिए कुछ रिटायर अफसरों की सेवाएं भी ली जा सकती हंै।
जो आम अफसर व कर्मचारी लगाए जाएं ,उन्हें किसी और नाम से ‘नन-प्रैक्टिसिंग भत्ता’ दिया जाए।
जिस तरह सरकारी डाक्टरों को दिया जाता रहा ताकि वे प्रायवेट प्रैक्टिस न कर सकें।
उनसे यह विनती भी की जाए कि कम से कम अपनी अगली पीढि़यों की रक्षा के लिए तो इस योजना में पूरा का पूरा धन लगने दो।
    --एन.आर.सी.के लाभ--
    
‘‘घुसपैठियों की पहचान हो जाने के बावजूद बंगलादेश 
सरकार उन्हें अपने यहां नहीं बुलाएगी।’’
आम तौर से यह तर्क दिया जाता है।
जब से एन.आर.सी.यानी राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर पर काम शुरू हुआ है,तभी से यह तर्क दिया जा रहा है।
राष्ट्रव्यापी एन.आर.सी.की जरुरत से संबंधित केंद्रीय गृह मंत्री के ताजा बयान के बाद एक बार फिर यही तर्क दिया जा रहा है।
ऐसा तर्क देने वालों में अधिकतर निहितस्वार्थी तत्व हैं।
  मान लीजिए कि बंगला देश उन्हें नहीं स्वीकारेगा।
पर रजिस्टर तैयार हो जाने पर घुसपैठ तो कम हो जाएगी।
क्योंकि जब रजिस्टर बन जाएगा तो किसी बाहरी के लिए यहां का वोटर बनना लगभग असंभव होगा।
  कुछ खास विचारधारा वाले नेता और कार्यकत्र्तागण खास स्वार्थ में दशकों से  घुसपैठियों को बोर्डर टपवाने में मदद करते रहे।
उन्हें भारत में राशन कार्ड दिलवाने और वोटर बनवाने में मदद करते रहे।
  पर रजिस्टर तैयार हो जाने पर ऐसा करना असंभव नहीं तो मुश्किल जरुर हो जाएगा। फिर वोट के सौदागरों को उन्हें बोर्डर टपाने से क्या लाभ मिलेगा ?
उस कारण घुसपैठियों की आमद काफी कम हो जाएगी ।क्या इसे एन.आर.सी.का लाभ नहीं कहेंगे ?   
--एक भूली बिसरी याद--
रामावतार शास्त्री पटना से तीन बार लोक सभा के सदस्य चुने गए थे।उन्हें अक्सर पैदल चलते मैं देखता था।यदाकदा ही रिक्शे पर होते थे।
 राजनीति में धन की बढ़ते असर के बीच सी.पी.आई.नेता शास्त्री जी की याद आती है।वे आम लोगों की तरह ही थे।
  स्वतंत्रता सेनानी थे।
कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी से होते हुए शास्त्री जी 1942 में सी.पी.आई. में शामिल हो गए।
अंत तक उसी दल में रहे।श्रमिक मोर्चे पर भी सक्रिय रहे।
 पहली बार वे 
1967 में पटना से लोक सभा के लिए चुने गए।
फिर वे 1971 और 1980 में भी सांसद बने।
बात तब की है जब मैं भी पटना में पैदल यात्री ही था।बाद में साइकिल से चलने लगा।छोटे अखबारों में काम करता था।
शास्त्री जी पत्रकार भी रहे।
शास्त्री जी सरल स्वभाव के थे ।पर अपने विचारों से दृढ़ भी थे।
वे तेरह साल जेल में रहे थे।पर इस बात का कोई गुमान उनके चेहरे पर नहीं देखा।
कई अन्य कम्युनिस्ट नेताओं की तरह ही शास्त्री जी ने भी
अपने लिए शायद ही कुछ किया।
 राजनीति पर काले धन के बढ़ते प्रभाव के आज के दौर में 
शास्त्री जी को याद करना इस प्रदूषित वातावरण में साफ हवा 
के झोंके की तरह हैं।
उस जमाने में शास्त्री जी जैसे ही कुछ अन्य दलों में भी कुछ नेता मौजूद थे।पर सांसद होकर भी अक्सर पटना में पैदल चलते सिर्फ शास्त्री जी को ही मैंने देखा था।   
  --और अंत में--
गत महराष्ट्र विधान सभा चुनाव से ठीक पहले कांग्रेस और और एन..सी.पी.के कुछ नेता भाजपा में शामिल हो गए थे।उनमें से कुछ भाजपा के टिकट पर एम.एल.ए.भी बने।वे सत्ता के लिए भाजपा में गए थे।
खबर है कि अब वे फिर अपने पुराने घर में लौटना चाहते हैं।
ऐसे मौसमी पक्षियों पर भरोसा करने का यही हाल होता है।ऐसा बिहार सहित पूरे देश में समय- समय पर होता रहा है।आश्चर्य है कि राजनीतिक दल अपने कार्यकत्र्ताओं -नेताओं को नजरअंदाज कर ऐसे आदतन दलबदलुओं को तरजीह क्यों देते हैं ?
ऐसे मामले में एकाध अपवाद की बात समझ में आती है।पर अब तो थोक दल बदल हो रहे हैं।
दल बदलुओं के लिए देश में  कोई सर्वोच्च पुरस्कार स्थापित हो तो वह बिहार के ही एक नेता को मिलेगा,किसी अन्य राज्य के नेता को नहीं।भले महाराष्ट्र के नेता दल बदल करते रहंे। 
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6 दिसंबर, 2019 को प्रभात खबर-पटना --में प्रकाशित मेरे काॅलम कानोंकान से।

मनमोहन सिंह ने 1984 में सेना नहीं बुलाने 
के लिए पीवी नरसिंह राव को दोषी माना
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सज्जन कुमार को उम्र कैद की सजा देने वाले दिल्ली हाईकोर्ट ने 17 दिसंबर, 2018 को कहा था कि 
‘‘ 1 से 4 नवंबर तक पूरी दिल्ली में 2733 सिखों की बेरहमी से हत्या कर दी गई थी।
उनके घरों को नष्ट कर दिया गया था।
देश के बाकी हिस्सों में भी हजारों सिख मारे गए थे।
इस भयावह त्रासदी के अपराधियों के बड़े समूह को राजनीतिक संरक्षण का लाभ मिला और जांच एजेंसियों से भी उन्हें मदद मिली।’’
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श्रीमान मनमोहन सिंह जी,
क्या राजनीतिक संरक्षण और जांच एजेंसियों से उन्हें मदद दिलवाने के लिए भी नरसिंह राव ही जिम्मेवार थे ?


जेल या जादूघर ?????
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जैसे ही कोई बड़ा नेता जेल भेजा जाता है तो उसके समक्ष 
तुरंत अस्पताल चले जाने की मजबूरी हो जाती है।
पर, जेल से निकलते ही ,वह अस्पताल शब्द भूल जाता
 है ।
और, तुरंत कूदते -फांदते कभी रांची,कभी पटना तो कभी मुम्बई जहां इच्छा करे वहां पहुंच जाता है।
 भारत में जेल, जेल  है या कोई जादू घर !!!!
8 दिसंबर 2019

इन्दौर और पटना का फर्क
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अब जाकर पता चला कि इन्दौर दशकों से एक अच्छा नगर कैसे बना हुआ है।
लोक सभा के पूर्व स्पीकर सुमित्रा महाजन ने हाल में कहा कि ‘‘मैंने इन्दौर के विकास के लिए आवाज उठाने के लिए कांग्रेस के विधायकों से कहा था।
तब शिवराज सिंह चैहान मुख्य मंत्री थे।
यह अच्छा नहीं लगता कि खुद मैं अपनी पार्टी की सरकार के खिलाफ आवाज उठाती।’’ 
तब महाजन इन्दौर से सांसद थीं।
पूर्व स्पीकर ने यह भी कहा कि इन्दौर के विकास के लिए हमलोग दलगत भावना से ऊपर उठकर काम करते हैं।
   इसके ठीक विपरीत एक कहानी पटना की है।
कई दशक पहले की बात है।
पटना के लोहिया नगर के एक प्रमुख सामाजिक कार्यकत्र्ता ने उस मुहल्ले में आए तब के मुख्य मंत्री से आग्रह किया कि यहां की सड़कें बहुत खराब हैं,मरम्मत करवा दीजिए।
इस पर उस मुख्य मंत्री ने कहा कि ‘‘क्यों मरम्मत करवाएं ?
आप लोग तो हमें वोट देते ही नहीं !’’
2019

रविवार, 8 दिसंबर 2019

डा.राजेंद्र प्रसाद के जन्म दिन पर
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 बिहार की पहली फिल्म ‘कल हमारा है’ के निर्माता गिरीश रंजन ने कई दशक पहले  मुझे एक संस्मरण सुनाया था।
   राजेंद्र बाबू के निधन के बाद कलकत्ता के एक मशहूर निर्माता - निदेशक एक अन्य व्यक्ति के साथ पटना आए।
फ्रेजर रोड स्थित एक होटल संभवतः ‘पिंटू में टिके ।
उन्होंने बिहार के तब के एक बहुत बड़े सत्ताधारी नेता से मुलाकात की।
  उनसे कहा कि हम राजेंद्र बाबू पर डाक्यूमेंटरी बनाना चाहते हैं।आपसे सहयोग की उम्मीद में आए हैं।
  नेता जी ने कहा कि
‘‘जब मर ही गए तो अब उन पर क्या कीजिएगा ?’’
उस निदेशक को सदमा लगा।
वह होटल लौटकर गम में  शराब पीने लगे।
खूब पी ली।
 किसी तरह उन्हें रिक्शे पर लाद कर कलकत्ता वाली गाड़ी में चढ़ाने के लिए पटना जंक्शन पहुंचाया गया था।
 गिरीश जी ने, जिनका 2014 में निधन हुआ, उपेक्षा का कारण तो नहीं बताया ।पर, मेरा अनुमान था कि बिहार के नेता को लगा होगा कि राजेंद्र बाबू के लिए कुछ करने से दिल्ली के एक बहुत बड़े नेता को अच्छा नहीं लगेगा।
--सुरेंद्र किशोर
3 दिसंबर 2019




       दोहरा चरित्र
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नागरिक संशोधन विधेयक, 2019 का विरोध करने वालों में इस देश के वैसे लोग भी शामिल हैं जो रोहिंग्या घुसपैठियों को इस देश में स्थायी तौर पर बसाने के पक्ष में रहे हैं।
   अभी 40 हजार रोहिंग्या घुसपैठिए इस देश में जमे हुए हैं।
बोध गया में बौद्ध तीर्थ यात्रियों को मारने के लिए जो बम रखे गए थे,उसे रखने का काम रोहिंग्या ने ही किया था।
वे बर्मा का बदला लेना चाहते हैं।
 दूसरी ओर पाकिस्तान से प्रताडि़त होकर भारत में आकर बसे हिन्दुओं ने अब तक किसी पर हमला नहीं किया है।
 याद रहे कि म्यांमार यानी बर्मा में रोहिग्ंया मुस्लिम बौद्ध लोगों की ओर से हो रही  हिंसा के श्किार होते हैं।
हालांकि मामला वहां दोतरफा है।जबकि खबर है कि पाक में मामला एकतरफा है।
  8 दिसंबर 2019



शनिवार, 7 दिसंबर 2019

सिख संहार ..1984
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 रंगनाथ मिश्र आयोग ने 1986 में कहा कि दंगा भड़काने में किसी बड़े नेता की भूमिका नहीं थी।
उनकी ‘लीपापोती रिपोर्ट’ में कहा गया था कि समाज विरोधी  तत्वों व तत्कालीन प्रधान मंत्री की हत्या के बाद लोगों में उठा गुस्सा मूल वजह रहा।
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दूसरी ओर, 2014 के लोक सभा चुनाव से ठीक पहले राहुल गांधी ने टी.वी.पत्रकार अर्नब गोस्वामी से बातचीत में यह स्वीकार किया कि 1984 के दंगे में कुछ कांग्रेसी शामिल थे।
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दिसंबर 2019