शुक्रवार, 22 सितंबर 2017

भूख से अधिक भोजन के खिलाफ भी अभियान जरूरी

इन दिनों ‘चीनी छोड़ो अभियान’ की चर्चा है। पटना के बड़े चिकित्सकों के इससे जुड़ जाने से इसकी गंभीरता और भी बढ़ी है। लोगों पर इसका अच्छा असर दिख रहा है। पर एक दिक्कत आ रही है। सवाल है ंकि चीनी के बदले में हम जो गुड़ खरीदते हैं, वह कितना शुद्ध है!

कभी -कभी नकली और हानिकारक गुड़ कृत्रिम तरीके से बनाते हुए मिलावटखोर टी.वी. चैनलों पर नजर आते रहते हैं। ‘चीनी छोड़ो अभियान’ के साथ -साथ भूख से ‘कम खाओ अभियान’ की भी आज जरूरत है।
पांच साल पहले हुए एक सर्वेक्षण के अनुसार दुनिया भर में अति भोजन जनित मोटापा की समस्या, कुपोषण और भुखमरी की अपेक्षा अधिक बड़ी समस्या बन चुकी थी। उससे पहले बात उल्टी थी। आज तो स्थिति और भी खराब बताई जा रही है।

भारत के बारे में एक पुरानी कहावत है कि जितने लोग अति भोजन से मरते हैं, उससे कम ही लोग भोजन के अभाव में मरते हैं। मैंने खुद अपने कई परिचितों को अति भोजन का अभ्यस्त पाया। उनमें से शायद ही कोई व्यक्ति अपने शरीर की नियमित डाक्टरी या पैथोलाॅजिकल जांच कराता था। उनमें से कई व्यक्ति कम ही उम्र में  दुनिया से उठ गए।

अस्सी के दशक की बात है। न्यूयार्क टाइम्स के नई दिल्ली ब्यूरो चीफ माइकल टी. काॅफमैन पटना आए थे। उनके साथ भोजन का मौका मिला था। उन्होंने सिर्फ तली मछली के कुछ टुकड़े खाए। इधर मैंने चार रोटियों के साथ-साथ और भी बहुत कुछ खा लिया। बाद में मैंने अपने खानपान पर विचार किया। देखा कि मैं अति भोजन का आदी हो गया था। बहुत प्रयास के बाद आदत छूटी। आज यदि मैं एक रोटी से अधिक खा लूं तो असहज महसूस करता हूं। इसके बावजूद मैं बिना थके घंटांे काम करता हूं।

नियमित पैथोलाजिकल जांच कराने और अति भोजन से बचने का अभियान यदि बड़े डाॅक्टर चलाएं तो उसका अच्छा असर पड़ेगा। पर साथ-साथ राज्य सरकार कुकुरमुत्ते की तरह उग आए मानकरहित  पैथालाजिकल जांच केंद्रों पर ताले लगवाए। अच्छा है कि पटना हाईकोर्ट इस समस्या पर गंभीर है।  


अतिवादियों से दूर ही रहें नेता

अहमदाबाद विस्फोट के आरोपित तौसीफ का संबंध सिमी की बिहार शाखा का प्रधान रह चुका गुलाम सरवर से था। याद रहे कि तौसीफ को हाल में गया से गिरफ्तार किया गया। तौसीफ पर  आतंकवादी तैयार करने का आरोप है।

सिमी कैसा संगठन था, इस बात का पता एक बार फिरं देश को चला है। उसका घोषित उद्देश्य हथियारों के बल पर भारत में इस्लामिक शासन कायम करना था। जमात-ए-इस्लामी के छात्र संगठन के रूप में 1977 में सिमी का गठन अलीगढ़ में हुआ था। पर जब सिमी की अतिवादी गतिविधियों की खबर जमात-ए-इस्लामी को मिली तो उसने सिमी से अपना संबंध तोड़ लिया।

सिमी को 2001 में प्रतिबंधित किया गया। बाद में सिमी के लोगों ने मिल कर इंडियन मुजाहिद्दीन बना लिया है। इन दिनों आई.एम. किस तरह विस्फोटक कार्रवाइयां कर रहा है, यह हर जागरूक नागरिक को मालूम है। जिसे जमात-ए-इस्लामी जैसे संगठन से दुत्कार दिया, उसे हमारे देश के कुछ तथाकथित ‘सेक्युलर’ नेताओं ने अपना लिया।

करीब 15 साल पहले सिमी के समर्थन में कई राजनीतिक दल और उनके बड़े नेता सार्वजनिक रूप से उठ खड़े हुए थे। उनमें बिहार और उत्तर प्रदेश के चार बड़े नेता प्रमुख  थे। क्या वे नेता लोग जनता से इस बात के लिए अब माफी मांगेंगे कि सिमी को पहचानने में उनसे गलती हुई थी ? दरअसल ऐसी गलतियों के कारण ही भाजपा इस देश में मजबूत हुई है। पता नहीं माफी मांगेंगे या नहीं , पर कुछ ऐसे ‘सेक्युलरिस्ट’ नेतागण आज भी उसी तरह की गलतियां दुहरा रहे हैं।


डाॅ. स्वामी की चेतावनी

भाजपा के राज्यसभा सदस्य डाॅ. सुब्रमणियन स्वामी ने कहा है कि मैं अपनी जीवनी लिखूंगा और उसके बाद कई लोगों की प्रतिष्ठा समाप्त हो जाएगी। कौन -कौन लोग उनके दिमाग में हैं, यह तो वे ही जानते हैं। पर कुछ अनुमान जरूर लगाया जा सकता है। यानी राजनीतिक क्षेत्र के कुछ दिग्गज।

दरअसल डाॅ. स्वामी ने मनमोहन ंिसंह के शासनकाल में अनेक महाघोटालों को उजागर किया था। उन्होंने केस करके कई बड़ी हस्तियों को जेल भिजवाया। इस तरह 2014 चुनाव से पहले उन्होंने राजग के लिए राजनीतिक जमीन मजबूत की थी।

यानी 2014 की जीत में कुछ योगदान तो स्वामी का भी रहा। इसके एवज में उन्हें कैबिनेट मंे एक सीट तो मिलनी ही चाहिए थी। इसकी उम्मीद वह कर रहे थे। पर उनका दबंग व्यक्तित्व और कुछ मामलों में उनकी अतिवादी सोच के कारण वह नहीं हो सका।

उधर मोदी कैबिनेट में डाॅ. स्वामी के एक कट्टर विरोधी मजबूत स्थिति में हैं। अतः भविष्य में भी कोई चांस नहीं लगता। इस पृष्ठभूूमि में यदि डाॅ. स्वामी कोई विस्फोटक किताब लिखकर कुछ लोगों को बेनकाब करते हैं तो इसमें किसी को एतराज नहीं होना चाहिए। आम लोगों को भी यह जानने का हक है कि किस दल का कौन नेता देश की सेवा कर रहा है या कोई और धंधा। यह सब बताने की हिम्मत कम ही लोग में है। उन साहसी लोगों में डाॅ.  स्वामी भी  हंै।


बुलेट ट्रेन तो ठीक, पर आम यात्रियों की भी सुध लीजिए!

इस देश में बुलेट ट्रेन आ रही है। कुछ लोगांे को वह भी चाहिए। सरकार तो सबके लिए होती है। पर अब रेल ंत्री को चाहिए कि वह आम यात्रियों पर भी ध्यान दें। पिछली बार जब मैंने रेल यात्रा की थी तो यह अनुभव हुआ कि सेकेंड ए.सी. के शौचालय का दरवाजा टूटा हुआ है। किसी तरह काम चलाया।

अन्य समस्याएं अनेेक हैं। मोदी सरकार के आने के बाद लोगांे में उम्मीद बंधी थी। पर पता नहीं क्यों चीजें नहीं सुधर रही हैं। 

क्यों नहीं सुधर रही हैं, उस संबंध में एक खबर जवाब देगी। हजारों गैंग मैन रेलवे के बड़े अफसरों की निजी सेवा मंे हैं और उधर पटरियां असुरक्षित हैं। दुर्घटनाएं हो रही हैं। जिस महकमे में ऐसे -ऐसे अफसर हों, वहां किस तरह की उम्मीद आप कर सकते हैं? 


एक भूली बिसरी याद 

प्रधानमंत्री बनने से पहले तक लाल बहादुर शास्त्री के पास अपनी कोई निजी कार नहीं थी। याद रहे कि उससे पहले वे देश के गृहमंत्री और रेलमंत्री रह चुके थे। प्रधानमत्री बनने के बाद परिवार के सदस्यों ने उनसे कहा कि कम से कम अब तो एक अपनी कार होनी चाहिए। शास्त्री जी मान गए। उन्होंने अपना बैंक खाता चेक किया। उसमें 7 हजार रुपए थे। फिएट कार की कीमत उन दिनों 12 हजार रुपए थी। उन्होंने 5 हजार रुपए बैंक से कर्ज लिया।

कर्ज वापस करने से पहले ही शास्त्री जी का निधन हो गया। परवर्ती प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने कहा कि इस कर्ज को हम माफ कर देना चाहते हैं। दिवंगत नेता की विधवा ललिता शास्त्री ने मना कर दिया। पेंशन के पैसे से कर्ज का भुगतान हुआ।   


और अंत में

स्वच्छ भारत अभियान का काम जहां से शुरू करना चाहिए था, वहां से नहीं हो रहा है। पहले तो देखना चाहिए कि देश के महानगरों और नगरों में जो वेतन भोगी सफाईकर्मी हैं, क्या उनकी संख्या पर्याप्त हैं ?
कार्यरत सफाई कर्मियों में से कितने कर्मी अफसरों के घरेलू नौकर बने हुए हैं और कितने सरजमीन सक्रिय हंै ? जिन सफाईकर्मियों को वेतन मिल रहे हैं, उनमें से कितने बोगस हैं और कितने असली ?
सफाई के काम के लिए ठीके पर लगाई गयी निजी एजेंसियों के साथ निकायों के अफसरों के घूसखोरी के रिश्ते की खबर में कितनी सच्चाई है ? 

(प्रभात खबर पटना में 22 सितंबर 2017 को प्रकाशित)

शनिवार, 16 सितंबर 2017

वंशवादी राजनीति के बुरे नतीजे

सबसे पहले कांग्रेस ने इस देश की राजनीति में वंशवाद की शुरुआत की और जब कुछ अन्य दलों ने उसे अपना लिया तो अब राहुल गांधी कह रहे हैं कि ‘भारत ऐसे ही चलता है। यह भारत के अधिकतर दलों की समस्या है।’ जिसने शुरू किया, वही इसे समाप्त करने की पहल करे तो कांग्रेस भी बच सकती है और अन्य दल भी।
कांगे्रस यदाकदा यह कहती रही है कि जवाहर लाल नेहरू ने इस देश को वैज्ञानिक सोच दी। अनेक उच्चस्तरीय संस्थान भी दिए। पर वह यह कहना भूल जाती है कि सर्वाधिक समय तक इस देश पर राज करने वाली कांग्रेस के शासनकाल में यदि गरीबी बढ़ी, भ्रष्टाचार फैला और वंशवाद-परिवारवाद कायम हुआ तो उसके लिए किसे जिम्मेदार माना जाए ?


मीठा-मीठा गप और कड़ुआ कड़ुआ थू ?

आज तो केंद्र के चारों शीर्ष पदों पर बैठे कोई नेता परिवारवाद की उपज नहीं हैं। फिर भी देश बेहतर ढंग से चल रहा है। अधिकतर आम लोगों की सोच है कि देश बेहतर चलना चाहिए चाहे वंशवादी चलाएं या गैर वंशवादी। पर घटनाएं बताती हैं कि अपवादों को छोड़कर गैर वंशवादियों ने ही देश को बेहतर ढंग से चलाया है।
आज शीर्ष पदों पर गैरवंशवादी ही क्यों बैठे हैं ? आखिर यह कैसे संभव हुआ ? इसलिए संभव हुआ क्योंकि मतदाताओं ने 2014 में कांग्रेस को सत्ता से हटा दिया जो अनेक बुराइयों और विफलताओं की प्रतीक बन चुकी थी। उनमें से अपनी एक -दो विफलताएं तो खुद राहुल गांधी ने भी स्वीकारी हैं।
पर विफलताएं तो अनेक हैं।


राहुल गांधी अपने वंशवाद को जायज ठहराने के लिए 

अखिलेश यादव से लेकर स्टालिन तक का उदाहरण दे रहे हैं। इस तरह वे अपने वंशवाद का बचाव करना चाहते हैं। पर 1928 में तो न कोई अखिलेश थे और न ही कोई स्टालिन। तब कांग्रेस अध्यक्ष मोतीलाल नेहरू थे। महात्मा गांधी सर्वोच्च नेता थे।

मोतीलाल ने महात्मा गांधी को लिखा कि ‘वैसे तो सरदार बल्लभ भाई पटेल कांग्रेस अध्यक्ष पद के लिए सर्वोत्तम उम्मीदवार हैं, पर आप जवाहर लाल नेहरू को अध्यक्ष बना दीजिए।’

नेहरू मेमोरियल में मोतीलाल पेपर्स पढ़ने के बाद इतिहासकार रिजवान कादरी ने लिखा कि ‘मोतीलाल नेहरू युवा को आगे बढ़ाना चाहते थे।’

आखिर किसी युवा की तलाश सिर्फ अपने ही घर से क्यों? एक चिट्ठी आने के बावजूद महात्मा गांधी जवाहर लाल को कांग्रेस अध्यक्ष बनाने को तैयार नहीं थे। इसीलिए इसके लिए मोतीलाल नेहरू ने उन्हें दो  चिट्ठयां और लिखीं। इतना ही नहीं बल्कि उन्होंने अन्य हस्तियों से भी गांधी जी को लिखवाया। गांधी भारी दबाव में आ गए।
दरअसल यही तो वंशवाद है जिसे देश के अन्य दलों ने अपने स्वार्थवश बाद में अपनाया। ‘महाजनो येन गतः स पंथाः !’ नब्बे के दशक में लालू प्रसाद ने कहा था कि ‘मेरा परिवार बिहार का नेहरू परिवार है।’ उन्होंने इसे साबित करके भी दिखाया।

वंश को आगे बढ़ाने में मोतीलाल जी को थोड़ी कठिनाई जरूर हुई थी, पर जवाहर लाल नेहरू को नहीं हुई। उन्होंने 1958 में इंदिरा गांधी को 24 सदस्यीय कांग्रेस कार्यसमिति का सदस्य बनवा दिया। उससे पहले जवाहर लाल जी फिरोज गांधी तथा अपने परिवार के अन्य अनेक सदस्यों को महत्वपूर्ण पदों को बिठवा चुके थे।
1959 में जब इंदिरा गांधी को कांग्रेस अध्यक्ष बनवाने की प्रक्रिया शुरू हुई तो कांग्रेसी सांसद और पूर्व केंद्रीय मंत्री महावीर त्यागी ने जवाहर लाल नेहरू को चिट्ठी लिखी। त्यागी ने कई वजहें गिनाते हुए 31 जनवरी 1959 को लिखा कि ‘मेरी राय है कि इंदु को कांग्रेस प्रधान चुने जाने से रोको। या फिर आप प्रधानमंत्री पद से अलग हो जाओ।’उसके जवाब में जवाहर लाल नेहरू ने त्यागी को 1 फरवरी 1959 को लिखा कि ‘मेरा यह भी ख्याल है कि बहुत तरह से उसका इस वक्त कांग्रेस अध्यक्ष बनना मुफीद होगा।’

आज राहुल गांधी अन्य दलों के वंशवाद की चर्चा कर रहे हैं। पर 1959 में किस दल के किस नेता ने अपनी पार्टी का अध्यक्ष पद अपनी संतान के हवाले कर दिया था ?  अब देखिए इंदिरा गांधी ने प्रधानमंत्री बनने के बाद क्या किया ? उन्होंने अपने पुत्र संजय गांधी को शासन  का संविधानेत्तर केंद्र बनातेे हुए आपातकाल में उनके जिम्मे एक तरह से सरकार ही सौंप दी थी। संजय गांधी के नहीं रहने के बाद इंदिरा जी ने राजीव गांधी को पार्टी सौंप दी। वे किसी राजनीतिक अनुभव के बिना महासचिव बना दिए गए।

हाल के वर्षों में सोनिया गांधी ने दस साल तक परदे के पीछे से राज चलाया। कैसा राज चला ? लोकसभा में 44 सीटें लायक ही तो। अब राहुल कह रहे हैं कि वह प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार बनने को तैयार हैं।

वंशवाद की तारीफ होती, यदि वंशवादियों ने सत्ता में आकर देश का सचमुच देश का भला किया होता। यदि भला हुआ होता तो 1969 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने गरीबी हटाओ का नारा नहीं दिया होता।
आजादी के बाइस साल बाद भी, जिसमें 19 साल एक वंश का शासन रहा हो, आखिर गरीबी क्यों नहीं हटी थी? क्या गरीबी हटाओ का नारा 17 साला शासन पर टिप्पणी नहीं था ?


अमरीकी शोधकर्ता पाॅल आर ब्रास का शोध


अमरीकी शोधकर्ता पाॅल आर ब्रास ने साठ के दशक में उत्तर प्रदेश सरकार में भ्रष्टाचार पर गहन शोध किया था। ब्रास के शोध का नतीजा था कि मंत्रियों ने जिलों में अपने गुटों को ताकत देने के लिए ऊपर से नीचे की ओर सरकारी भ्रष्टाचार को फैलाया।

 जवाहर लाल नेहरू के निजी सचिव ने लिखा है कि नेहरू ने भ्रष्ट मंत्रियों और अफसरों के खिलाफ कार्रवाई की पोख्ता व्यवस्था इसलिए नहीं की क्योंकि वे मानते थे कि इससे शासन में पस्तहिम्मती आएगी।

जवाहर लाल और इंदिरा गांधी के शासनकाल मंे भ्रष्टाचार का क्या हाल था, उसका जवाब खुद राजीव गांधी ने अस्सी के दशक में दिया था। तत्कालीन प्रधान मंत्री राजीव गांधीे ने कहा था कि हम सौ पैसे दिल्ली से भेजते हैं और गांवों तक उसमें से सिर्फ 15 पैसे ही मिल पाते हैं।क्या यह एक दिन में हुआ ?

कोई पूछे कि ऐसी नौबत किसने लाई थी ? तो इस सवाल के जवाब के लिए किसी को सिर खुजलाना नहीं पड़ेगा।
 वंशवाद ने तो देश को यही दिया है ! कभी मिस्टर क्लिन कहलाने वाले प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने सत्ता के दलालों के खिलाफ आवाज उठाई थी। पर विडंबना यह रही कि बोफर्स तोप सौदे के दलाल को बचाने के प्रयास में ही उन्होंने अपनी गद्दी गंवा दी। यह अनुभवहीनता का परिणाम था या कुछ और ?

 उधर अधिकतर वंशवादी क्षेत्रीय दलों ने सत्ता में आकर तो हदें पार कर दी हैं। वैसे अनेक नेताओं पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों के तहत मुकदमे चल रहे हैं।

इस बीच इन दिनों गैर वंशवादी प्रधानमंत्री सत्ता में हैं। खुद नरेंद्र मोदी कौन कहे, उनके मंत्रिमंडल के किसी सदस्य के खिलाफ किसी भ्रष्टाचार के आरोप की कोई खबर नहीं मिल रही है।

यही नहीं, पंजाब के मुख्यमंत्री प्रताप सिंह कैरो को उनके पद से तभी हटाया जा सका जब 1964 में लाल बहादुर शास्त्री प्रधानमंत्री बने थे। उनपर और उनके परिजन पर भ्रष्टाचार के आरोप थे। जबकि कैरो के खिलाफ जांच आयोग ने पहले ही अपनी रपट दे रखी थी।
  दरअसल अधिकतर मामलों में वंशवाद और जातिवाद जुड़वा भाई हैं। वंशवादी नेता अपने जातीय वोट बैंक को लेकर निश्चिंत रहते हैं। फिर तो वह समझने लगते हंै कि वह कोई भी अनर्थ करके बच सकते हंै। उसके मतदातागण हर हाल में उसका साथ देते ही रहेंगे। इस प्रचलन-प्रवृत्ति से देश का अधिक नुकसान हुआ है।
 पर जो वंशवादी नहीं हैं, उन्हें सरकार में आने पर कुछ काम करके दिखाना पड़ता है।

(इस लेख का संपादित अंश 15 सितंबर 2017 के दैनिक जागरण में प्रकाशित)

शुक्रवार, 18 अगस्त 2017

अपनी ही सुरक्षा से बेपारवाह नेता

 गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने बीते दिनों लोकसभा में जब यह   सनसनीखेज जानकारी दी कि राहुल गांधी ने गत दो साल में सौ बार सुरक्षा नियमों को तोड़ा है तो कांग्रेसी सांसद नाराज हो गए। समझना कठिन है कि इसमें नाराज होने की क्या बात थी ? खैर इस खबर के साथ इस देश के उन तमाम बड़े नेताओं के नाम स्मृति पटल पर उभर आये जिन नेताओं ने अपनी सुरक्षा में लापरवाही के कारण अपनी जान गंवाई। न सिर्फ इंदिरा गांधी और राजीव गांधी, बल्कि खुद महात्मा गांधी ने भी अपनी सुरक्षा संबंधी पूर्व चेतावनियों को नजरअंदाज कर दिया था।

 इसका खामियाजा न सिर्फ खुद उन नेताओं को बल्कि इस देश को भी भुगतना पड़ा। ऐसे नेताओं की ओर इस देश के करोड़ों लोग बड़ी उम्मीद भरी नजरों से देखते हैं। इसलिए उनकी जान पर सिर्फ उनका ही नहीं बल्कि देश का भी अधिकार है।

आजादी के बाद एक बार महात्मा गांधी ने कहा था कि वह सौ साल जीना चाहते हैं। पर देश के तनावपूर्ण माहौल में भी अपनी लंबी उम्र के लिए उन्होंने कोई प्रयास नहीं किया। नई दिल्ली की प्रार्थना सभा में सरकारी सुरक्षा की उच्चस्तरीय  पहल को महात्मा गांधी ने इसलिए भी बार-बार ठुकरा दिया था क्योंकि उन्हें ईश्वर पर अटूट विश्वास था। 

    दूसरी ओर तत्कालीन गृहमंत्री सरदार बल्लभ भाई पटेल ईश्वर के साथ-साथ सुरक्षा प्रबंध पर भी भरोसा करते थे। उन्होंने गांधी जी से कई बार विनती की थी कि वे बिड़ला भवन के आसपास हल्की सुरक्षा व्यवस्था भी मंजूर कर लें।  

     बिड़ला भवन के पास 20 जनवरी 1948 को हुए बम विस्फोट की घटना के बाद भी गांधी जी ने सरदार पटेल को धमकी दे दी थी कि यदि प्रार्थना सभा में आने वाले किसी भी व्यक्ति की तलाशी ली गई तो वे उसी क्षण से आमरण अनशन शुरू कर देंगे। आखिर वही हुआ जो गांधी जी के अनुसार ईश्वर को मंजूर था। 30 जनवरी 1948 को प्रार्थना सभा में नाथू राम गोड्से ने महात्मा गांधी की गोली मारकर हत्या कर दी। वह पिस्तौल लेकर प्रार्थना सभा में गांधी जी के पास तक आसानी से पहुंच गया था। यदि आगंतुकों की तलाशी हुई होती तो गोड्से की पिस्तौल तो पकड़ ही ली गई होती। महात्मा गांधी यदि सौ साल तक जीवित रहते तो इस देश की तस्वीर शायद कुछ और ही बन सकती थी। शायद बेहतर होती।

     जब महात्मा गांधी की जान नहीं बचा पाने के लिए कसूरवार ठहराते हुए जय प्रकाश नारायण और डा. राम मनोहर लोहिया ने तत्कालीन स्वराष्ट्र मंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल पर तीखा वाक् प्रहार किये तो पटेल ने इन शब्दों में उसका प्रत्युत्तर दिया, ‘समाजवादी कहते हैं कि मैं महात्मा की रक्षा करने में असफल रहा। मैं महात्मा गांधी की सुरक्षा के लिए किए गए अनेक उपाय, जो मानव मस्तिष्क में आ सकते हैं, का यहां ब्योरा देते हुए उनके आरोप को अस्वीकार करता हूं।’ दरअसल गांधी जी तलाशी को ही राजी नहीं थे तो सरदार पटेल कितना कुछ करते!

    इसी तरह जून, 1984 में अमृतसर के स्वर्ण मंदिर में हुए ‘ब्लू स्टार आपरेशन’ के बाद प्रधानमंत्री आवास से सारे सिख सुरक्षाकर्मी हटा दिए गए थे। ऐसा इंदिरा जी को बताए बिना किया गया था। प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने इस पर सख्त नाराजगी जाहिर की। उनके सचिव आर.के. धवन ने संबंधित सुरक्षा अधिकारी को बुलाकर पूछताछ की। अधिकारी से धवन ने कहा कि मैडम बहुत नाराज हैं। डी.सी. (पुलिस-सुरक्षा) ने कहा कि ब्लू स्टार आपरेशन के बाद अभी देश का माहौल तनावपूर्ण है। ऐसे में धार्मिक भावना में आकर कोई गार्ड प्रधानमंत्री की सुरक्षा पर खतरा पैदा कर सकता है।

   इस तर्क के बावजूद इंदिरा गांधी के सख्त आदेश के मद्देनजर धवन ने उस अफसर को निदेश दिया। आदेश यह था कि वह सिख सुरक्षाकर्मियों को प्रधानमंत्री आवास में इस तरह तैनात करें ताकि वे अक्सर प्रधानमंत्री की नजरों के सामने आते रहंे। ऐसा ही हुआ। नतीजा सामने था। सिख संतरियों ने उनके आवास में ही इंदिरा गांधी की हत्या कर दी। प्रतिक्रियास्वरूप हजारों सिख मार डाले गये।

प्रधानमंत्री आवास में यदि सिख संतरी नहीं होते तो हजारों निर्दोष सिखों की जान तो बच जाती। सिख संतरियों को हटाये जाने से जो नुकसान होना था, उससे अधिक कीमती हजारों सिखों की जान थी। पर इस देश के नेता यह समझें तब तो !

  राजीव गांधी की हत्या तमिल उग्रवादियों ने 1991 में कर दी। उससे तीन सप्ताह पहले राजीव गांधी के सुरक्षा अधिकारी प्रदीप गुप्त ने एक पत्रकार को बताया था कि ‘मैं जानता हूं कि राजीव गांधी अपनी सुरक्षा के प्रति लापारवाह हैं। पर हम सावधान हैं। यदि कुछ होता है तो वह मेरी लाश पर होगा।’

  अब एक रपट पढि़ए जिसमें यह दर्ज है कि किस तरह  राजीव गांधी ने मौत को अपने पास बुलाया था। ‘राजीव गांधी 10 बजे रात में पहुंचे और तुरंत माला पहनानेवाले लोगों ने उन्हें घेर लिया। महिला सब इंस्पेक्टर अनुसूया ने एक बार फिर धनु को राजीव के निकट जाने से रोकने की कोशिश की। उन्होंने करीब- करीब उस हत्यारिन को पकड़ ही लिया था। लेकिन अनुसूया के अनुसार खुद राजीव गांधी ने कहा कि सबको मौका दो। उसके बाद अनसूया वहां से दूर चली गयी। इस तरह खुद उसकी जान बच गयी। धनु इस प्रकार झुुकी ंंजैसे राजीव के पैर छूना चाहती है। फिर राजीव उसे उठाने के लिए झुके। तभी धनु के दाहिने हाथ की उंगली ने बम का स्विच दबा दिया।’

  सन 2002 में लोकसभा के स्पीकर बालयोगी की आंध्र प्रदेश में हेलिकाॅप्टर दुर्घटना में मौत हो गयी। इस मामले में भी सुरक्षा नियमों का सरासर उलंघन किया गया था। नियम है कि वी.वी.आई.पी. जिस विमान या हेलिकाॅप्टर से यात्रा करेंगे, वह दो इंजन वाला होना चाहिए। उसमें दो पायलट भी होने जरूरी हैं। बालयोगी के मामले में इस में से किसी भी नियम का पालन नहीं किया गया था।

  सन् 1988 में प्रधानमंत्री राजीव गांधी के लिए एस.पी.जी.सुरक्षा का कानूनी प्रावधान किया गया। पर यह सुविधा तब लोकसभा में प्रतिपक्ष के नेता को नहीं दी गयी थी। दरअसल जब नेता सत्ता में होते हैं तो वे सत्ता के नशे में यह नहीं समझ पाते कि वे खुद कभी प्रतिपक्ष में भी जाएंगे।

 इस तरह 1989 में जब राजीव गांधी प्रतिपक्ष के नेता बने तो उन्हें एस.पी.जी. सुविधा उपलब्ध नहीं थी। 1989 में वी.पी. सिंह की सरकार ने भी प्रतिपक्ष के नेता के लिए इसकी जरूरत नहीं समझी थी। यहां तक कि जब 1990 में कांग्रेस के समर्थन से चंद्रशेखर प्रधानमंत्री बने तौभी राजीव गांधी के लिए एस.पी.जी.सुरक्षा का प्रावधान नहीं किया गया। कांग्रेस ने इसकी मांग भी नहीं की।

 पर जब तमिलनाडु में 1991 में राजीव गांधी की हत्या हो गयी तो कांग्रेस ने वी.पी. सिंह पर आरोप लगाया कि उन्होंने राजीव गांधी को यह सुविधा नहीं दी थी। इस तरह वी.पी. ने राजीव की सुरक्षा को नजरअंदाज किया। पर जब कोई नेता खुद ही अपनी सुरक्षा के साथ खिलवाड़ कर रहा हो तो भला कोई क्या कर सकता है ?

 राहुल गांधी को तो एस.पी.जी. की सुरक्षा मिली हुई है। फिर भी वह कई बार उसका उपयोग ही नहीं करते। राहुल अपनी विदेश यात्रा में एस.पी.जी. का सुरक्षा कवर नहीं लेते। हाल के गुजरात दौरे में भी राहुल गांधी अपने बुलेट प्रूफ कार के बदले एक अन्य कार पर सवार थे। उसी पर रोड़े लगे थे।

इस मामले में भी कांग्रेसी नेतागण सरकार पर आरोप लगा रहे हैं। राजनीतिक लाभ के लिए वे सिर्फ यही कर सकते हैं। क्योंकि वे सुरक्षा के प्रति सावधान रहने की सलाह राहुल गांधी को देने की हिम्मत तो कर नहीं सकते!
हालांकि यदि बड़े नेताओं के साथ कुछ बुरा घटित होता है तो उसका कुपरिणाम देश और संबंधित पार्टी को भी भुगतना पड़ता है। कल्पना कीजिए कि यदि राजीव गांधी हमारे बीच आज भी होते तो क्या होता ? कम से कम कांग्रेस लोकसभा में 44 सीटों पर तो नहीं ही सिमटती !  

(इस लेख का संपादित अंश 18 अगस्त, 2017 के दैनिक जागरण में प्रकाशित)


शनिवार, 22 जुलाई 2017

भ्रष्टाचार को क्यों बनने दिया गया लोकतंत्र की अपरिहार्य उपज

महात्मा गांधी ने कहा था कि ‘भ्रष्टाचार और पाखण्ड को लोकतंत्र की अपरिहार्य उपज नहीं बनने दिया जाना चाहिए जैसा कि आज हो गया है।’ आजादी के तत्काल बाद सरकारों में जो कुछ हो रहा था, उससे महात्मा गांधी चिंतित थे। उन्होंने भ्रष्टाचार की शिकायतें मिलने पर बिहार के एक कैबिनेट मंत्री को पदच्युत कर देने की सलाह दी थी। पर उनकी बात नहीं मानी गयी।

1967 के आम चुनाव में बिहार में कांग्रेस की पहली बार पराजय हुई थी। उस पराजय के लिए जिम्मेवार नेताओं में उस खास नेता के भ्रष्टाचरण का सबसे बड़ा ‘योगदान’ बताया गया।

आजादी के तत्काल बाद प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने कहा था कि ‘भ्रष्टाचारियों को नजदीक के लैम्प पोस्ट से लटका दिया जाना चाहिए।’ नेहरू ने इसकी जरूरत समझी होगी तभी तो कहा होगा। पर यह काम भी वह नहीं कर सके। भ्रष्ट लोग फलते-फूलते गये।

पहले भ्रष्ट लोग ‘अंडे’ से अपना काम चला लेते थे। बाद में ‘मुर्गी’ को ही मार कर खाने लगे। समय बीतने के साथ सरकारी पैसों की इतनी लूट होने लगी कि टिकाऊ संरचना बनना भी कठिन होने लगा। अब तो देश में ‘प्राक्कलन घोटाले’ का दौर है।

प्रधानमंत्री बनने के बाद राजीव गांधी ने कहा था कि ‘सत्ता के दलालों के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए।’ राजीव ने सत्ता के दलालों का वर्चस्व देखा होगा तभी तो कहा होगा। पर दलालों के खिलाफ भी कार्रवाई नहीं हो सकी। उल्टे विडंबना यह रही कि बोफर्स दलाली के शोर के बीच ही 1989 के चुनाव में केंद्र में कांग्रेस की सरकार की पराजय हो गयी। 1991-1996 की नरसिंह राव की सरकार अल्पमत की  सरकार थी। बाद के वर्षों में कभी कांग्रेस को लोकसभा में अपना बहुमत नहीं हुआ। समय बीतने के साथ स्थिति बिगड़ती चली गयी। इसी पृष्ठभूमि में सन 2003 में पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त जे.एम. लिंगदोह ने कह दिया था कि ‘राजनेता कैंसर हैं जिनका इलाज अब संभव नहीं।’ तब अनेक लोग लिंगदोह से असहमत थे। पर यह जरूर मानने लगे थे कि चीजें तेजी से बिगड़ रही हैं।

राज्यसभा में कांग्रेस संसदीय दल के नेता मनमोहन सिंह ने 1998 में कहा था कि ‘इस देश की पूरी व्यवस्था सड़ चुकी है।’ उन्होंने सड़न देखी होगी तभी तो कहा होगा। पर जब श्री सिंह खुद प्रधानमंत्री बने तो उन्होंने उस सड़न को रोकने के लिए क्या किया ?

उल्टे उन्होंने जो कुछ किया, वह सब देश ने देखा और भोगा। 2014 के चुनाव में कांग्रेस लोकसभा में 44 सीटों पर सिमट गयी। इस देश के अधिकतर नेताओं ने प्रतिपक्ष में रहने पर तो अपने राजनीतिक विरोधियों के भ्रष्टाचार पर खूब हायतोबा मचायी। पर जब वे सत्ता में आए तो खुद बहती गंगा में हाथ धोया। अपवादों की बात और है।
अपवाद स्वरूप जो भी अच्छे नेता इस देश में बचे हुए हैं, वे या तो सत्ता के मोह में डूबे हुए हैं या फिर भ्रष्टाचारियों के खिलाफ बौने साबित हो रहे हैं। सत्ता संभालते ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश को आश्वासन दिया था कि ‘मैं न तो खाऊंगा और न ही किसी को खाने दूंगा।’ मोदी मंत्रिमंडल के किसी सदस्य पर तो घोटाले का अब तक कोई आरोप नहीं लगा है, पर सरकार के दूसरे अंग लगभग पहले ही जैसे ‘काम’ कर रहे हैं। लगता है कि वे मोदी से भी अधिक ताकतवर हैं।

संभवतः इसीलिए तीन साल के शासनकाल के बाद भी प्रधानमंत्री को 6 अप्रैल 2017 को साहिबगंज में यह कहना पड़ा कि ‘भ्रष्टाचार और ब्लैक मनी ने दीमक की तरह चाटकर इस लोकतंत्र को बर्बाद कर दिया है। इसके खिलाफ संघर्ष जारी रहेगा।’ पर सवाल है कि लोगबाग कब तक प्रतीक्षा करेंगे ?

मोदी सरकार की उपलब्धि और विफलताओं का सही आकलन तो 2019 में हो जाएगा। पर इस समस्या की गंभीरता को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट की एक टिप्पणी याद आती है। उसने 5 अगस्त 2008 को ही कह दिया था कि ‘भगवान भी इस देश को नहीं बचा सकता है।’ इस विकट स्थिति में इस देश के नेताओं तथा अन्य क्षेत्रों के जागरूक और देशभक्त लोगों का क्या कर्तव्य बनता है ?

क्या भ्रष्ट नेताओं और अफसरों तथा इसी तरह के अन्य लोगों के खिलाफ देशहित में कठोर कार्रवाई होनी चाहिए या फिर यह तर्क दिया जाना चाहिए कि चूंकि पहले के लोगों ने इस देश को लूटा है, इसलिए हमें भी लूट लेने का जन्मसिद्ध अधिकार हासिल है?


मधु लिमये से एन.सी. सक्सेना तक के एक ही स्वर 

वैसे मधु लिमये तो 1988 में ही इस नतीजे पर पहुंच गए थे कि ‘मुल्क के शक्तिशाली लोग इस देश को बेच कर खा रहे हैं।’ सन 1998 में तत्कालीन केंद्रीय ग्रामीण विकास सचिव एनसी. सक्सेना ने कहा कि ‘इस देश में भ्रष्टाचार में जोखिम कम और लाभ ज्यादा है।’

याद रहे कि सक्सेना की इस टिप्पणी के बावजूद ‘जोखिम अधिक और लाभ कम’ करने वाले किन्हीं कानूनी प्रावधानों की जरूरत इस देश की सरकारें नहीं समझ पा रही हैं। इस दिशा में आधे -अधूरे मन से कहीं कुछ काम भी हुए हैं तो उसका कोई खास लाभ देश को नहीं मिल रहा है। याद रहे कि मधु लिमये ऐसे नेता थे जो न तो स्वतंत्रता सेनानी पेंशन लेते थे और न ही पूर्व सांसद पेंशन। अखबारों में लिखे अपने लेखों के पारिश्रमिक से ही वह जीवन यापन करते थे।


अब जरा आज के नेता को देखिए !

केंद्र सरकार प्रत्येक सांसद पर हर माह 2 लाख 70 हजार रुपए खर्च करती है। यह आंकड़ा 2015 का है। इसके बावजूद इस बुधवार को राज्यसभा में सपा के नरेंश अग्रवाल ने कहा कि मौजूदा तनख्वाह से सांसदों का काम नहीं चल रहा है। सांसदों का दबाव जारी रहा तो सरकार 2.70 लाख की राशि देर-सवेर बढ़ा ही देगी।

यह सब ऐसे देश में हो रहा है जहां के सरकारी अस्पतालों के पास सभी गंभीर मरीजों के लिए भी इलाज की व्यवस्था तक नहीं है। क्योंकि सरकारें धनाभाव से जूझ रही हंै। आए दिन यह खबर आती रहती है कि अस्पताल में मृतक मरीज के लिए शव वाहन का प्रबंध नहीं हो सका। कहीं शव दोपहिया पर ढोया जाता है तो कहीं ठेले पर।

पटना के एक बड़े सरकारी अस्पताल की ताजा खबर यह है कि अस्पताल के भीतर गंभीर मरीज को परिजन चादर पर रखकर उठा रहे हैं और एक जगह से दूसरी जगह पहुंचा रहे हैं।


पटना एम्स की मारक उपेक्षा

पटना में स्थापित एम्स में भी साधन के अभाव में मरीजों का उचित इलाज नहीं हो पा रहा है। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री अस्सी के दशक में पटना में विद्यार्थी परिषद के नेता थे। परिषद की खबरों के हैंड आउट लेकर अखबारों के दफ्तरों का चक्कर लगाते मैंने उन्हें देखा था। यानी उनका बिहार से जो लगाव होना चाहिए था, वह नहीं है।
जबकि दिल्ली एम्स के कुल मरीजों में बिहार के मरीजों का प्रतिशत 40 है। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए पटना के निर्माणाधीन एम्स का निर्माण जल्द पूरा कर लिया जाना चाहिए था।

2004 में इस पटना एम्स का शिलान्यास हुआ था। अब तक 50 प्रतिशत काम भी पूरा नहीं हुआ है। दरअसल केंद्र सरकार पूरा फंड ही नहीं देती। हां,सांसदों के वेतन भत्ते के लिए उसके पास पैसों की कभी कोई कमी नहीं रहती।


लोकसभा टी.वी. और राज्यसभा टी.वी.

अब तक राज्यसभा टी.वी. और लोकसभा टी.वी. के अलग- अलग राजनीतिक स्वर रहे हैं। अब वह बात नहीं रहेगी। वैसे पहले दो स्वर होने के कारण भी रहे हैं। लोकसभा की स्पीकर पहले भाजपा की नेता थीं। राजग का बहुमत राज्यसभा में नहीं है। राज्यसभा के निवर्तमान सभापति यानी उपराष्ट्रपति कांग्रेसी पृष्ठभूमि के रहे हंै। अब उस पद को अगले उपराष्ट्रपति संभालेंगे। वह भाजपा के अध्यक्ष भी रह चुके हैं।

अब या तो राज्यसभा टी.वी. और लोकसभा टी.वी. का विलयन हो जाएगा या फिर पिछले विरोधाभास की समाप्ति हो जाएगी।


और अंत में

  संविधान के अनुच्छेद- 212 के अनुसार ‘न्यायालयों द्वारा विधायिकाओं की कार्यवाहियों की जांच नहीं की जा सकेगी।’ जब संविधान बना था, उन दिनों सदन की कार्यवाही के सीधे प्रसारण की सुविधा नहीं थी। देवताओं के बारे में राज्यसभा में एक सपा नेता के कुवचन को देखते हुए अब नयी व्यवस्था की जरूरत आ पड़ी है। या तो सदनों में उच्चारित ऐसे कुवचनों के खिलाफ अदालत में मुकदमा चलाने की संवैधानिक छूट मिले या फिर सदन की कार्यवाहियों का सीधा प्रसारण यथाशीघ्र बंद हो।

 (इसका संक्षिप्त अंश 21 जुलाई 2017 के प्रभात खबर (बिहार) में प्रकाशित)

रविवार, 16 जुलाई 2017

सजायाफ्ता कर्मचारी मंजूर नहीं तो नेताओं को क्यों मिले छूट

इस देश की सरकार किसी सजायाफ्ता को चपरासी तक की नौकरी नहीं देती। पर  सजायाफ्ता नेता, प्रधानमंत्री के पद तक भी पहुंच सकता है। इस तरह की विसंगतियों को दूर करने की उम्मीद नरेंद्र मोदी सरकार से कुछ लोग कर रहे थे। पर उन्हें अब निराशा हो रही है। जब सजायाफ्ता नेताओं के चुनाव लड़ने पर आजीवन रोक की मांग को लेकर जनहित याचिका सुप्रीम कोर्ट में दायर की गयी तो केंद्र सरकार ने उस पर अपनी मंशा जाहिर कर दी।

केंद्र सरकार के वकील ने कहा कि यह मामला सुनवाई के लायक ही नहीं। याचिकाकर्ता अश्विनी उपाध्याय ने यह ठीक ही सवाल उठाया है कि ऐसे में जब सरकारी कर्मचारियों और न्यायिक पदाधिकारियों पर आजीवन पाबंदी लग जाती है तो जनप्रतिनिधियों पर क्यों नहीं लगे ? उन्होंने राजनीति में बढ़ते अपराधीकरण और भ्रष्टाचार की पृष्ठभूमि में यह याचिका दायर की है। इस याचिका पर 19 जुलाई को  सुनवाई होगी।

गत बुधवार को सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को फटकारा। आयोग इस मुद्दे पर कोर्ट को यह नहीं बता रहा है कि वह आजीवन प्रतिबंध के पक्ष में है या नहीं। संभवतः आयोग इस मामले में केंद्र सरकार के रुख के अनुसार ही काम कर रहा है। राजनीति के अपराधीकरण और भ्रष्टीकरण से ऊबे इस देश के अनेक लोग सुप्रीम कोर्ट से ही यह उम्मीद कर रहे हैं कि वह इस मामले में सरकार को सख्त निर्देश दे। अन्यथा कुछ दिनों के बाद संविधान की रक्षा करना और भी मुश्किल हो जाएगा।

सुप्रीम कोर्ट को ही तो देखना है कि इस देश में संविधान के अनुसार काम चल रहा है या नहीं। यदि राजनीति में भ्रष्ट और अपराधी लोगों की बढ़ती संख्या की रफ्तार को तत्काल नहीं रोका गया तो विधायिकाएं भ्रष्टाचार और अपराध के आरोपियों से पूरी तरह भर जाएंगी। अभी उनकी संख्या सदन की कुल संख्या की एक तिहाई है। याद रहे कि  किसी सांसद या विधायक को कम से कम दो साल की सजा मिलने के तत्काल बाद उसकी सदस्यता समाप्त हो जाती है। पर सजा पूरी हो जाने के छह साल बाद वह फिर से चुनाव लड़ सकता है।



यूं हुई अच्छे कार्यकर्ताओं की कमी

जब तक इस देश में संयुक्त परिवारांे का दौर चलता रहा, अच्छी मंशा वाले राजनीतिक कार्यकर्ता विभिन्न राजनीतिक दलों को मिलते रहे। पर अब तो लघु परिवारों का जमाना है। अब भी जहां-तहां संयुक्त परिवार मौजूद हैं, पर उनकी संख्या कम होती जा रही है।

पहले संयुक्त परिवार से निकले राजनीतिक कार्यकर्ता के पत्नी और बाल-बच्चों की देखरेख संयुक्त परिवार कर देता था। यानी सच्चे राजनीतिक कार्यकर्ता बनने की इच्छा रखने वालों के लिए नौकरी करने की मजबूरी नहीं थी।

पर आज तो सबको अपने-अपने लघु परिवार का पालन-पोषण खुद ही करना है। इसलिए कोई व्यक्ति राजनीतिक कर्म में लगता भी है तो वह निजी खर्चे के लिए राजनीति या शासन से ही पैसे निकालना चाहता है। हालांकि सारे राजनीतिक कार्यकर्ता ऐसे नहीं हैं। कुछ कार्यकर्ता अब भी निःस्वार्थ भाव से राजनीति में लगे हुए हैं। पर अनेक कार्यकर्ताओं को या तो कोई ठेकेदारी चाहिए या दलाली का धंधा।

अपराध के धंधे में भी काफी पैसे हैं। राजनीति के पतन का यह बड़ा कारण है। पता नहीं इस स्थिति से देश की राजनीति को कौन बचाएगा ? मौजूदा राजनीति न  तो भ्रष्टाचार और न ही अपराध पर निर्णायक हमले की स्थिति में है। राजनीति की इन दो विपदाओं को जातीय और सांप्रदायिक वोट बैंक की ताकत भी बढ़ाती जा रही है।



संकट में दोस्तों की पहचान

1967 में विदेश मंत्री एम.सी. छागला ने लोकसभा में कहा था कि भारत-चीन सीमा विवाद पर सोवियत संघ अब भारत के पक्ष को समझ गया है और वह हमें ही सही मानता है। पर 1962 में चीन ने जब भारत पर हमला किया तो सोवियत संघ ने हमें मदद करने से साफ मना कर दिया था। तब वह हमारे देश का पक्ष समझने को भी तैयार नहीं था। उसने कहा था कि चीन हमारा भाई है और भारत हमारा दोस्त। यानी दोस्त के लिए कोई भाई से झगड़ा नहीं करता।

हां, तब प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने न चाहते हुए भी अमेरिका से मदद मांगी। चीन सीमा से इस आशंका से पीछे हट गया था कि कहीं अमेरिका हस्तक्षेप न कर दे। उससे पहले भारत अमेरिका से दोस्ताना संबंध नहीं रखना चाहता था। दूसरी ओर वह सोवियत संघ से घनिष्ठ संबंध के पक्ष में रहा।

आज भी जब हमारे  देश पर युद्ध का खतरा मंडरा रहा है, तो हमें विभिन्न देशों से दोस्ती के सिलसिले में अपने हितों को ध्यान में रखना चाहिए न कि किन्हीं अन्य बातों कोे। दुनिया के अन्य सभी देश भी अपने राष्ट्रीय हितों का ही ध्यान रखते हैं। पर हमारे ही देश में ऐसी राजनीतिक शक्तियां भी हैं जो परमाणु परीक्षण करने पर   चीन की तो तारीफ करती हैं, पर वही काम जब भारत सरकार करती है तो वह उसका विरोध करती है। 



कांग्रेसी वकील क्यों नहीं दिखाते करामात  

टू जी स्पैक्ट्रम आवंटन घोटाले में जीरो लाॅस का सिद्धांत पेश करने वाले मशहूर वकील कपिल सिब्बल ने अब एक नयी ‘थ्योरी’ पेश की है। स्पैक्ट्रम की नीलामी शुरू होते ही सिब्बल की जीरो लाॅस थ्योरी तो फेल हो गयी। अब देखना है कि उनकी नयी थ्योरी पास होती है या फेल!

सिब्बल का आरोप है कि भाजपा के सत्ताधारी नेताओं के यहां आयकर और ईडी के छापे क्यों नहीं पड़ रहे हैं ? क्या वे सब के सब स्वच्छ हैं ? सिर्फ गैर राजग दलों के नेता ही दागी हैं ? कपिल साहब के सवाल में दम है। यदि जनहित याचिकाओें के मामलों में कपिल सिब्बल, डाॅ. सुब्रह्मण्यम स्वामी और प्रशांत भूषण की राह अपना लें तो उन्हें इसका रोना नहीं रोना पड़ेगा कि केंद्र सरकार एकतरफा कार्रवाई कर रही है।

डाॅ. स्वामी और प्रशांत भूषण ने मनमोहन सिंह के शासनकाल में सिर्फ कपिल सिब्बल की तरह रोना तो नहीं रोया था। उन्होंने जनहित याचिकाओं के जरिए जांच एजेंसियों को ऐसी हस्तियों के खिलाफ भी कार्रवाई करने को मजबूर कर दिया था  जिन्हें मनमोहन सरकार बचा रही थी। 

यदि सिब्बल के पास भाजपा नेताओं के खिलाफ वैसे ही ठोस सबूत हैं तो वह जनहित याचिकाओं का सहारा क्यों नहीं ले रहे हैं ? सिब्बल तो बड़े काबिल वकील हैं। क्या उनके लिए जनहित याचिकाओं का रास्ता बंद है ? या फिर उनके पास कोई सबूत ही नहीं है ? क्या सिर्फ राजनीतिक लाभ के लिए बयान देना इतने बड़े वकील को शोभा देता है ?

अपनी सरकार में शामिल लुटेरों के खिलाफ मनमोहन सिंह सरकार जब कार्रवाई नहीं कर सकी जिस सरकार के खुद सिब्बल भी मंत्री थे तो वह मोदी सरकार से ऐसी उम्मीद क्यों कर रहे हंै ? आम धारणा यह है कि लगभग सभी दलों में चोर और लुटेरे घुसे हुए हैं। हालांकि उन्हीं के बीच ईमानदार नेता भी हैं। सत्ताधारी दल अपने राजनीतिक विरोधियों के खिलाफ कार्रवाई करेगा ही।

पर राजग विरोधी दलों को भी चाहिए कि वे भी अपने बीच से ‘डाॅ. स्वामी’ और ‘प्रशांत भूषण’ तैयार करंे ताकि दोनों पक्षों के लुटेरों को उनके सही स्थान पर पहुंचाया जा सके।



और अंत में

एक राजनीतिक दल के प्रवक्ता ने गुरुवार को मीडिया से कहा कि सी.बी.आई.जितने मामलों की जांच करती है, उनमें से सिर्फ 30 प्रतिशत मामलों में ही वह आरोपितों को अदालतों से सजा दिलवा पाती है। पर सच्चाई यह है कि केंद्र सरकार ने गत अप्रैल में लोकसभा में बताया कि वह दर 66 दशमलव 8 प्रतिशत है। प्रवक्ता जी यह कहना चाहते थे कि बहुधा सी.बी.आई. झूठे केस तैयार करती है  जो अदालतों में नहीं टिकते। सी.बी.आई. की आलोचना से पहले अपने आंकड़े तो ठीक कर लीजिए प्रवक्ता जी ! 

(प्रभात खबर में 14 जुलाई 2017 को प्रकाशित मेरे काॅलम कानोंकान से)

इस गरीब बिहार में भ्रष्टाचार कोई मुद्दा है भी या नहीं ?

ऊपरी तौर पर तो अब यह लग रहा है कि बिहार का सत्ताधारी महागठबंधन बिखराव के कगार पर है, पर राजनीति में कभी भी कुछ भी संभव है। इस बीच कोई दूसरा मोड़ भी आ सकता है। अगले कुछ दिन  महत्वपूर्ण होंगे। तब सब कुछ साफ हो जाएगा।

ताजा टकराव उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव के इस्तीफे की मांग को लेकर है। पर क्या जदयू और राजद के बीच मतभेद का सिर्फ यही कारण है ? या फिर पहले से ही कुछ मुद्दों पर महागठबंधन के घटक दलों में भीतर -भीतर टकराव जारी था ? क्या वह राजनीतिक शैलियों का टकराव नहीं रहा है ?

क्या ताजा विवाद ऊंट की पीठ पर अंतिम तिनके के रूप में सामने आया है? पता नहीं। आने वाले दिन इन सवालों का जवाब दे सकते हैं।

याद रहे कि गठबंधन में टूट के बाद आरोप-प्रत्यारोपांे का दौर शुरू होता है। उस दौरान बहुत सारी अनकही बातें सामने आती हैं। इस मामले में वह नौबत आएगी ही, ऐसा यहां नहीं कहा जा रहा है। पर नहीं ही आएंगी, यह भी तय नहीं है।

यदि जदयू और राजद के बीच टकराव ऐसे ही जारी रहा तो आने वाले दिनों में कुछ भीतरी बातें भी खुल कर सामने आ ही सकती हैं। लगता है कि मूलतः यह शैलियों के बीच के टकराव की समस्या है। राजद और जदयू की शैलियों पर क्रमशः लालू प्रसाद और नीतीश कुमार की छाप रही है। वैसे नीतीश सरकार के वरिष्ठ मंत्री और जदयू नेता बिजेंद्र प्रसाद यादव का यह सवाल एक हद तक सही है कि जब जदयू और राजद के बीच समझौता हुआ था तब नहीं जानते थे कि लालू चार्जशीटेड हैं?

पर सवाल सिर्फ लालू प्रसाद का ही नहीं है। अब तो नीतीश कुमार के बगल में बैठने वाले उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव का भी है। याद रहे कि लालू प्रसाद के दोनों पुत्र तेजस्वी और तेज प्रसाद नीतीश मंत्रिमंडल में हैं।
रेलवे के होटलों की नीलामी जिसके नाम हुई, उसी व्यापारी से पटना में जमीन लेने का आरोप लालू प्रसाद, राबड़ी देवी और तेजस्वी यादव पर लगा है। इस मामले में सी.बी.आई. ने इन तीनों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की है।

इस पर जब भाजपा ने तेजस्वी के इस्तीफे की मांग की तो जदयू ने कहा कि जिन पर आरोप है, वे अपने जवाब से जनता को संतुष्ट करें। जदयू का इशारा तेजस्वी की ओर है। तेजस्वी और राजद अपने ढंग से जवाब दे रहे हैं। राजद ने कहा है कि तेजस्वी निर्दोष हैं और वह इस्तीफा नहीं देंगे। अब देखना है कि तेजस्वी के बारे में राजद के इस जवाब से जदयू संतुष्ट होता भी है या नहीं। उम्मीद तो कम है।  

तेजस्वी के इस्तीेफे की संभावना से साफ इनकार के बाद अब मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पर यह निर्भर है कि वह तेजस्वी सहित राजद खेमे के मंत्रियों से खुद को अलग कर लेने के लिए मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देते हैं या तेजस्वी को बर्खास्त करने की राज्यपाल से सिफारिश करते हैं। वह घड़ी आने से पहले इस बीच जितने दिन दागी उपमुख्यमंत्री के साथ सरकार चलाएंगे, उतने ही दिन नीतीश की छवि पर प्रश्न चिह्न बना रहेगा।
वैसे राजद से नाता तोड़ने की स्थिति में भाजपा नीतीश की सरकार को बाहर से समर्थन देने को तैयार है। अब फैसला नीतीश को ही करना है। 

इस बीच महागठबंधन के नेताओं के बीच भ्रष्टाचार के सवाल पर बहस शुरू हो गयी है। एक लालू समर्थक नेता और पूर्व जदयू सांसद शिवानंद तिवारी ने सवाल किया है कि क्या नीतीश के साथ बैठने वाले नेता हरिश्चंद्र की औलाद हैं ?

यानी राजद का यह तर्क है कि जब आपके साथ भी दागी लोग मौजूद ही हैं तो हमारे नेता पर प्राथमिकी दर्ज होने मात्र से इस्तीफा क्यों मांग रहे हैं? राजद का यह भी तर्क है कि भाजपा जब लालू परिवार को जेल भिजवा देगी तो नीतीश कुमार को मसलने में उसे कितना समय लगेगा।

पर जदयू का तर्क है कि खुद नीतीश कुमार पर कोई दाग नहीं है और वह अपनी सरकार की छवि साफ-सुथरी रखना चाहते हैं। इससे कोई समझौता नहीं होगा, चाहे सरकार रहे या जाए।

दरअसल राजनीतिक प्रेक्षकों के अनुसार भ्रष्टाचार के आरोपों के मामले में ‘गुण’ के साथ-साथ ‘मात्रा’ का भी अब सवाल है। भ्रष्टाचार के आरोपी को  सहने की क्षमता अलग -अलग नेताओं की अलग -अलग रही है। इस मामले में नीतीश की तो बहुत कम है। दरअसल हाल के दिनों में लालू परिवार के खिलाफ जितने घोटालों की खबरें सामने आती जा रही  हैं, उनको यदि जांच एजेंसियां तार्किक परिणति तक पहुंचाने लगंेगी तो लालू परिवार के अनेक सदस्य जांच के दायरे और न्याय के कठघरे में होंगे।

ऐसे में सवाल यह है कि एक ऐसी पार्टी के साथ मिलकर साफ छवि वाले नीतीश, सरकार चलाएंगे जिस दल के अधिकतर प्रमुख नेता जांच के घेरे में हो ? जदयू के सामने यह एक बड़ा सवाल है। यदि सरकार चलाएंगे तो नीतीश की छवि पर उसका प्रतिकूल असर पड़ेगा। यदि छवि बची रहेगी तो आगे भी नीतीश मुख्यमंत्री बन सकते हैं। यदि वही नहीं रहेगी तो फिर क्या होगा ?

पर इस राजद-जदयू मुठभेड़ में जदयू के ही दो वरिष्ठ नेता नीतीश से अलग राय रखते हैं। बिजेंद्र प्रसाद यादव के बयान का चुनावी राजनीति की नजर में भी खास महत्वपूर्ण है। उधर जदयू सांसद शरद यादव ने भी इस मामले में जदयू की लाइन से अलग राह पकड़ ली है। शरद-बिजेंद्र की लाइन पर जदयू के और कितने विधायक हैं ? यह देखना दिलचस्प होगा। क्या इन दोनों नेताओं पर अपने ‘खास’ मतदाताओं की ओर से कोई दबाव है? क्या उन मतदाताओं की सहानुभूति लालू परिवार के साथ है ?

यदि ऐसा है तब तो बिहारी समाज में उसकी प्रतिक्रिया भी संभव है। न्यूटन का सिद्धांत लागू हो सकता है। इसकी प्रतिक्रिया राजद और कांग्रेस विधायक दलों में भी हो सकती है। फिर इस राज्य की अगली राजनीति कुछ अलग ढंग की होगी।

इसी माहौल में इस बीच यदि बिहार विधानसभा के मध्यावधि चुनाव की नौबत आ जाए तो फिर कैसे नतीजे आएंगे ? मध्यावधि चुनाव की आशंका जाहिर करने का कारण मौजूद हैं। मौजूदा महागठबंधन यदि टूटेगा तो नया गठबंधन बन सकता है। इस बनने-बिगड़ने के क्रम में यह भी संभव है कि कुछ विधायक दलों में भी छोटी-मोटी टूट-फूट हो। फिर तो राजनीतिक अस्थिरता की स्थिति बन सकती है। वैसी स्थिति में विधानसभा के मध्यावधि चुनाव की संभावना को नकारा नहीं जा सकता है।

यदि चुनाव होगा तो उसके नतीजों से इस बात का पता चल जाएगा कि इस गरीब प्रदेश बिहार के आम मतदातागण भ्रष्टाचार और अपराध को कितना बुरा मानते हैं। या फिर इन दोनों तत्वों को वे राजनीति का अनिवार्य अंग मानते हैं। चुनाव नतीजे के जरिए इस सवाल का भी जवाब मिल जाएगा कि मतदातागण राजनीति और प्रशासन में भ्रष्टाचार को दाल में नमक के बराबर ही बर्दाश्त करेंगे या अतिशय भ्रष्टाचार से भी उन्हें कोई एतराज नहीं है। सामाजिक न्याय, धर्म निरपेक्षता, सुशासन और स्वच्छ छवि के भी सवाल उठंेगे। वे भी मतदाताओं की कसौटी पर होंगे। याद रहे कि इन सभी तत्वों का प्रतिनिधित्व करने वाले दल और नेतागण बिहार की राजनीति में अलग -अलग अपनी उपस्थिति बनाये हुए हैं।

बिहार में यह सवाल भी उठता रहा है कि आजादी के तत्काल बाद के कुछ सत्ताधारी नेतागण जब लूट रहे थे तो इतना हंगामा क्यों नहीं हुआ ? मीडिया तथा सवर्ण शक्तियां तब क्यों चुप थीं ? अब क्यों हंगामा हो रहा है? पर मौजूदा भ्रष्टाचार पर तो एतराज जदयू को भी है जो पिछड़ा नेतृत्व वाली पार्टी है। पिछड़ा नेतृत्व जरूर है, पर जदयू में विभिन्न सामाजिक जमातें अन्य दलों की अपेक्षा बेहतर अनुपात में उपस्थित हैं।


( 15 जुलाई 2017 के राष्ट्रीय सहारा के ‘हस्तक्षेप’ में प्रकाशित)

रविवार, 9 जुलाई 2017

कहां से चले थे कहां पहुंच गए लालू!

लोकसभा में 2013 में लोकपाल विधेयक पर चर्चा के दौरान उस विधेयक का विरोध करते हुए लालू प्रसाद ने कहा था कि यदि राजनीतिक दलों ने व्हीप जारी नहीं किया होता तो लोकपाल बिल के पक्ष में पांच प्रतिशत सांसद भी वोट नहीं देते। लोकपाल को नेताओं के लिए फांसीघर मानने वाले लालू प्रसाद ने संभवतः अनेक सांसदों से व्यक्तिगत बातचीत के आधार पर ही ऐसा कहा था। इसीलिए तब सदन में उपस्थित किसी सदस्य ने खड़ा होकर लालू की बात का खंडन नहीं किया। लोकपाल विधेयक के खिलाफ लालू प्रसाद जब बोल रहे थे तो सदन में उपस्थित अधिकतर सांसदों के हाव भाव व प्रतिक्रियाओं से भी यह लग रहा था कि लालू प्रसाद को उन लोगों का भीतरी समर्थन प्राप्त है।

  यानी 1990 में मुख्यमंत्री बनने के बाद भ्रष्टाचार के प्रति लालू प्रसाद ने जो अपना कठोर रुख प्रदर्शित किया था, 2013 आते आते वह लालू पूरी तरह बदल चुके थे।


    1992 में तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद ने इन पंक्तियों के लेखक से बातचीत में कहा था कि ‘भ्रष्ट और माफिया तत्वों के ऊपर मैंने प्रहार किया है। वे तत्व चूं भी नहीं कर सके। वे मेरे सामने भी नहीं आए। कोई पैरवी भी नहीं आई। पहले के राज में मजाल था कि किसी पर आप एक्शन कर लेते ? वे तत्व पिछले मुख्यमंत्रियों की छाती पर चढ़ जाते थे। जब चीफ मिनिस्टर ही उसमें संलग्न रहेगा तो वह आंख कैसे तरेरेगा ?’


  अपने मुख्य मंत्रित्वकाल के प्रारंभिक दिनों में लालू प्रसाद न सिर्फ सामाजिक अन्याय के मामले में, बल्कि भ्रष्टाचार के मामले में भी कठोर दिखाई पड़ते थे। 1990 के मंडल आरक्षण आंदोलन के दौरान तो लालू ‘मंडल मसीहा’ भी कहलाए। तब बिहार के पिछड़ा वर्ग के अधिकतर लोग उन्हें अपना नेता मानने लगे थे।


पर आज क्या हो रहा है ? आज लालू प्रसाद करीब- करीब हर मामले में यथास्थितिवादी नजर आ रहे हैं। लगता है कि मसीहा भटक गया है। उसी भटकाव की सजा उन्हें आज मिल रही है।


उनकी यथास्थितिवादिता लोकपाल विधेयक पर उनकी टिप्पणी से साफ हो गयी थी। कई कारणों से समय के साथ लालू प्रसाद पूरे पिछड़ोंं के नेता भी अब नहीं रहे।


आज जो कुछ उनके साथ हो रहा है, उसके लिए कोई और जिम्मेदार नहीं है। खुद  और अपने पूरे परिवार के चारों ओर येन केन प्रकारेण आर्थिक सुरक्षा की ऊंची  और मजबूत दिवाल खड़ी करने के लोभ में उनका राजनीतिक भविष्य खतरे में पड़ गया है। इससे उनके अनेक समर्थकों में भी उदासी है।


 लालू प्रसाद कभी कहा करते थे कि विषमताओं और सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ कोई आंदोलन इसलिए नहीं हो पा रहा है क्योंकि पोथी -पतरा उसमें बाधक है। पोथी - पतरा वाले गरीबोंं को समझा देते हैं कि भगवान की वजह से ही तुम गरीब हो।


पर, अब लालू प्रसाद ही नहीं, बल्कि  उनके परिजन भी जब मुकदमों में फंसे तो पोथी-पतरा का विरोध छोड़कर खुद मंदिरों के चक्कर लगाने लगे हैं। पर उन्हें न तो कोर्ट से राहत मिल रही है और न ही मंदिरों से।


खुद लालू प्रसाद नब्बे के दशक में कहा करते थे कि ‘लाख करो चतुराई करम गति टारत नाहीं टरै’ यह सब अब चलने वाला नहीं है। पर अब खुद लालू परिवार पर यह कहावत लागू हो रही है।


लालू प्रसाद ने 1990 में मंडल आरक्षण के विरोधियों के खिलाफ बड़ी हिम्मत से संघर्ष किया था। याद रहे कि आरक्षण एक संवैधानिक प्रावधान था जिसका तब नाहक विरोध हो रहा था। उस संघर्ष में जीत के बाद पूरे पिछड़े वर्ग में लालू प्रसाद की प्रतिष्ठा काफी बढ़ी थी। उतना समर्थन बिहार में किसी अन्य नेता को नहीं मिला था। अनेक लोंगों का यह मानना है कि बाद के वर्षों में यदि लालू प्रसाद अपने परिवार की ‘आर्थिक सुरक्षा के इंतजाम’ के काम में नहीं लग गए होते तो गांव -गांव में उनकी मूर्तियां लगतीं। हालांकि अब भी उनके समर्थकों की कमी नहीं हैं। पर पहले जैसी बात नहीं है।


भ्रष्टाचार के मामले में किसी नेता के खिलाफ जब कोई कानूनी कार्रवाई होती है तो वह आरोप लगा देता है कि राजनीतिक बदले की भावना से ऐसा हो रहा है। लालू प्रसाद इसके साथ यह भी कह रहे हैं कि यह पिछड़ों पर हमला है।


पर यह तर्क शायद ही चले। पहले भी नहीं चला था। चारा घोटाले में जब 1997 में पहली बार लालू प्रसाद जेल गए तो भी यही तर्क उनकी ओर से दिया गया था। पर 2000 के बिहार विधानसभा चुनाव में लालू के दल का बहुमत समाप्त हो गया था। जबकि 1995 में उन्हें बहुमत मिला था।


अब तो उन्हें कोर्ट का ही सहारा होगा। इसलिए कि लालू परिवार को राजनीतिक मदद मिलती नहीं दिख रही है जैसी मदद मुलायम सिंह यादव तथा इस देश के  कुछ दूसरे नेताओं को मिलती रही। देखना होगा कि कोर्ट से लालू प्रसाद और उनके परिजनों को किस तरह का न्याय मिलता है।


वैसे लालू परिवार पर आरोपों की लंबी सूची देखकर यह जरूर कहा जा सकता है कि परिवार का राजनीतिक भविष्य अभी तो अनिश्चित नजर आ रहा है। बाद में भले जो हो!


हां, यदि इसी तरह के आरोपों से घिरे देश के किन्हीं भाजपा नेताओं पर भी जब केंद्रीय एजेंसियां इसी तरह की कार्रवाई नहीं करंेगी तो वह दोहरा मापदंड भाजपा के लिए राजनीतिक रूप से जरूर महंगा पड़ सकता है।