बुधवार, 31 जनवरी 2024

 लोस टिकट के उम्मीदवारों से भाजपा इस बार लिखित आश्वासन ले ले कि ‘‘मुझे सांसद फंड नहीं चाहिए।’’

सांसद फंड की समाप्ति मोदी-नीत सरकार ही कर सकती है।

चाहें तो अन्य दल भी ले सकते हैं।पर,अन्य दलों के लिए यह काम मुश्किल है।

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सुरेंद्र किशोर

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अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार चाहते हुए भी यह काम नहीं कर सकी थी।

पी.एम.मनमोहन सिंह भी चाहते हुए इस फंड को खत्म नहीं कर सके।सांसद फंड के दुरुपयोग के कारण कुछ सांसद भी दुखी रहते हंै।

क्योंकि उनकी छवि पर इसका विपरीत असर पड़ रहा है।

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शासन के निचले स्तर पर भ्रष्टाचार को 

संस्थागत रूप प्रदान कर देने में सासंद फंड का बड़ा हाथ है।

अत्यंत थोड़े से अपवादों को छोड़कर खबर मिल रही है कि 

इस फंड का व्यापक दुरुपयोग हो

रहा है।

इस दुरुपयोग से कुछ सांसद भी चिंतित हैं।हालांकि

उनकी संख्या काफी कम है।

इस फंड के कारण सांसदों की नैतिक धाक कम हुई है।

इसका कुप्रभाव सामान्य प्रशासन पर भी पड़ रहा है।

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मोदी सरकार की जांच एजेंसियां उन बड़े -बड़े नेताओं तथा अन्य लोगों के खिलाफ जांच कर रही हैं और मुकदमे चला रही हैं जिनके खिलाफ जनता के अरबों -अरब रुपए लूटने के आरोप हैंे।

इससे अधिसंख्य आबादी खुश है।इसका चुनाव पर राजग के पक्ष में सकारात्मक असर पड़ेगा।

यानी, ऊपर से सफाई की प्रक्रिया तेज है।खबर है कि वह और भी तेज होने वाली है।

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पर,नीचे से भी सफाई जरूरी है।

अन्यथा पेड़ की डालियां तो कटंेगी,पर वृक्ष का तना बना रहेगा।

नतीजतन फिर डालियां उग आएंगी।

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नरेंद्र मोदी की भाजपा लोक सभा के टिकट के उम्मीदवारों से टिकट देने से पहले ही यह लिखवा ले कि मुझे सांसद फंड नहीं चाहिए।अभी तो सारे सांसद ऐसा लिख कर दे देंगे।

क्योंकि टिकट अधिक महत्वपूर्ण है।

सामान्य दिनों में यह काम नहीं हो सकता।

खबर है कि प्रधान मंत्री मोदी चाहते हुए भी यह काम नहीं कर पा रहे हंै।

 2024 के चुनाव के बाद गठित मोदी सरकार पहला निर्णय यही करे कि अब सांसद फंड की व्यवस्था समाप्त की जा रही है।

निचले स्तर पर प्रशासन से भ्रष्टाचार कम करने में उस निर्णय से भारी मदद मिलेगी।

निचले स्तर पर सफाई यानी जनता को राहत।

क्या यह खबर सही है कि अपवादों को छोड़कर सरकारी दफ्तरों में

नजराना-शुकराना-हड़काना के बिना जनता का कोई काम नहीं हो रहा है ?

लोगबाग नरेंद्र मोदी की ओर उम्मीद भरी नजरों से देख रहे हैं।सांसद फंड की यदि समाप्ति हुई तो विधायक फंड की भी देर-सबेर हो जाएगी।

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31 जनवरी 24  

  


रविवार, 14 जनवरी 2024

 न भूतो न भविष्यति !

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20 लाख लोगों को नौकरी और रोजगार 

देने की प्रक्रिया बिहार में जारी

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सुरेंद्र किशोर

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मुख्य मंत्री नीतीश कुमार ने कहा है कि एक से डेढ साल के अंदर हमलोग 10 लाख नौकरी और 10 लाख लोगों को रोजगार देने का अपना वादा पूरा कर देंगे।

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उसी क्रम में कल बिहार में 96 823 नये शिक्षकों को नियुक्ति पत्र मिले। 

इस बार सत्ता संभालते ही उप मुख्य मंत्री तेजस्वी यादव ने जब ऐसी ही बात कही थी तो शायद ही किसी को भरोसा हुआ था।

पर,यह तो हो रहा है।

 नीतीश सरकार राज्य में बिगड़ती कानून -व्यवस्था और सरकारी कार्यालयों में बढ़ते भ्रष्टाचार पर भले काबू नहीं पा रही है, किंतु नौकरी-रोजगार देने के मामले में अभूतपूर्व काम हो रहे हंै।

यदि इन लाखों नव नियुक्त लोगों को समय पर वेतन देने के लिए राज्य सरकार पैसे का भी निरंतर बंदोबस्त करती रहे तो इससे राज्य की अर्थ-व्यवस्था भी बेहतर होगी।

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चूंकि चुनाव सिर पर है,इसलिए अपराधियों और भ्रष्टाचारियों की तो फिलहाल बल्ले-बल्ले ही रहेगी।

पुलिस का मनोबल आज बहुत गिरा हुआ है। 

 इसका सीधा चुनावी लाभ भाजपा को लोक सभा चुनाव में मिलेगा।

वैसे भी नरेंद्र मोदी के पक्ष में बिहार में भी हवा कमजोर नहीं है

जहां तक लोक सभा चुनाव का सवाल है।

बिहार विधान सभा के 2025 के चुनाव में चाहे जो नतीजा हो।

हालंाकि इस बीच यदि दलीय गठबंधन में परिवर्तन हो गया तो इन दो मामलों में भी स्थिति सन 2005-13 जैसी बन सकती है।

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अब जानिए कि सरकारी नौकरी से कैसे सामान्य परिवारों की भी अर्थ व्यवस्था सुधरती है।

मेरे परिवार में पहली सरकारी नौकरी सन 1976 में आई थी।

उसके बाद हमारी जमीन बिकनी बंद हो गयी।

उससे पहले किसी भी थोड़े से बड़े काम के लिए हम जमीन बेचते थे।

दरअसल सरकारी नौकर को जरूरत पड़ने पर पड़ोसी भी कर्ज देने में संकोच नहीं करते।

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हमारे गांवों में कहावत है--

‘‘खेती करो तो तरकारी और नौकरी करो तो सरकारी।’’

1976 में बिहार सरकार ने प्राप्तांक के आधार पर बड़े पैमाने पर सरकारी शिक्षकों की बहाली की।तब की बिहार सरकार बेरोजगारों को बड़े पैमाने पर नौकरी देकर जेपी आंदोलन को कमजोर करना चाहती थी।हालंाकि उस समय आपातकाल था।

मेरी पत्नी ने भी आवेदन दिया था।उससे पहले वह जेपी आंदोलन में तीन बार जेल जा चुकी थी।

सारण जिले में इंटरव्यू बोर्ड के अध्यक्ष थे--तत्कालीन सरकार के मंत्री रामजयपाल सिंह यादव।शालीन नेता थे।

उन्होंने मेरी पत्नी से पूछा--

नौकरी नहीं मिलेगी तो क्या कीजिएगा ?

इसने चट से कह दिया कि --फिर जेपी आंदोलन करने लगेंगे।

चूंकि जेपी आंदोलन को ही कमजोर करने के लिए बहाली हो रही थी,इसलिए मेरी पत्नी की नौकरी हो गयी।

याद रहे कि राम जयपाल सिंह यादव 1957 में उसी विधान सभा क्षेत्र से प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के विधायक थे जिस क्षेत्र में मेरा पुश्तैनी गांव पड़ता है।

1957 में जेपी का बयान छपा था--‘‘मैं अपना वोट प्रसोपा को दूंगा।’’

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चूंकि सी.बी.आई. बड़ौदा डायनामाइट केस के सिलसिले में मुझे बेचैनी से खोज रही थी,इसलिए मैं मेघालय जाकर भूमिगत हो गया था।

तय हुआ था कि पति-पत्नी में से किसी एक को नौकरी करनी ही है।

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अब वह जमाना तो है नहीं।

पर, आज नीतीश सरकार जिन लाखों लोगों को रोजगार और नौकरी दे रही है,यदि वे बेरोजगार रह जाते तो संभव है कि उनमें से अनेक बेरोजगार ‘‘अंधेरे की दुनिया’’ में चले जाते।

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और अंत में 

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बिहार में उत्तर प्रदेश के अनेक उम्मीदवारों की शिक्षक की नौकरी मिल रही है।

यह एक मामले में बहुत अच्छा है।

उत्तर प्रदेश के सामान्य लोगों का भी हिन्दी का उच्चारण बिहार के लोगों से बेहतर है।

वैसे नव नियुक्त स्कूल शिक्षकों से उनका उच्चारण सुनकर बिहार के विद्यार्थियों का उच्चारण थोड़ा बेहतर होगा।

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दिल्ली के कुछ मित्र शिकायत करते हैं कि बिहार के छात्र प्रतिभा में तो आगे रहते हैं, किंतु उच्चारण में पीछे रह जाते हैं।

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14 जनवरी 24

  

 

 


गुरुवार, 11 जनवरी 2024

 मुझे गर्व है कि मैं 1972-75 में पी.यू.का छात्र था

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पटना विश्व विद्यालय का, जिसे कभी ‘‘पूर्व का आॅक्सफोर्ड’’ कहा 

जाता था, छात्र होना कभी गर्व की बात थी।

आज के हालात का पता चलता है तो दुख होता था

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सुरेंद्र किशोर 

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यही गौरव हासिल करने के लिए मैंने सन 1972 में पटना विश्व विद्यालय के लाॅ काॅलेज में नाम लिखवा लिया था।

जबकि, न तो मुझे वकालत करनी थी और न ही कोई नौकरी।

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अब जब इस विश्व विद्यालय के शिक्षण-परीक्षण के स्तर के बारे में सुनता हूं तो दुख होता है।

1963 में मैंने साइंस विषयों के साथ मैट्रिक पास किया था।फस्र्ट डिविजन मिला था।

किंतु साइंस काॅलेज में दाखिला लायक उच्च अंक नहीं थे।

इसलिए स्नातक तक बारी-बारी से मगध और बिहार विश्व विद्यालयों में पढ़ाई की।

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जब समाजवादी कार्यकर्ता के रूप में कर्पूरी ठाकुर का निजी सचिव बनकर छपरा से पटना आया तो सोचा कि देर से ही सही,वह गर्व हासिल कर लूं जिसके

अभाव में हीन भावना से ग्रस्त था।

---यानी, पटना विश्व विद्यालय जैसे गौरवशाली विश्व विद्यालय का छात्र नहीं बन सकने की हीन भावना।

याद रहे कि पटना आने के ठीक पहले मैं छपरा में सारण जिला संसोपा का कार्यालय सचिव था।

तय किया था कि कार्यकर्ता ही रहूंगा। शादी भी नहीं करूंगा।

(उन दिनों अनेक युवक सोशलिस्ट-कम्युनिस्ट पार्टी या अन्य दलों में  में विधायक-एम.पी.बनने के लिए नहीं शामिल होते थे बल्कि समाज के लिए कुछ करने के लिए शामिल होते थे।

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हालांकि राजनीति को करीब से देख लेने के बाद मैं इस नतीजे पर पहुंचा कि राजनीति मेरे वश की बात नहीं।इसलिए पत्रकारिता की राह पकड़ ली।

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पटना लाॅ कालेज का छात्र होने से यह सुविधा भी मिल गयी थी कि 

छात्रावासों में समाजवादी युवजन सभा का काम किया जा सके।

 हालंाकि तब के वहां के छात्र ,जो हमारे सयुस के सदस्य थे,शाम में स्टडी आॅवर शुरू होते ही मुझे अपने छात्रावास से चले जाने के लिए कह देते थे।

अब मैं नहीं जानता कि पटना विश्व विद्यालय के छात्रावासों में स्टडी आॅवर में अनुशासन का पालन होता है या नहीं।

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लाॅ काॅलेज में मैं तीन साल तक पढ़ा। पर कोई परीक्षा नहीं दी।

  दरअसल सेकेंड ईयर में नाम लिखवाने के लिए फस्र्ट ईयर पास करना जरूरी नहीं होता था।

उसी तरह थर्ड ईयर में नाम लिखाने के लिए सेकेंड ईयर पास करना जरूरी नहीं होता था।

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वैसे पढ़ने -लिखने से अधिक बगल में चाय की दुकान पर अन्य छात्रों के साथ राजनीतिक चर्चाएं हम खूब करते थे।

हमारे बैच में कुमुद रंजन झा,जो बाद में मंत्री बने थे।

मशहूर वकील वासुदेव प्रसाद के परिवार से दो थे।

हालांकि वे हमारी जमात में नहीं बैठते थे।

हमारे मित्र थे दीनानाथ पांडेय, जो अभी कोलिगपांग में वकील हैं,प्रेम प्रकाश सिन्हा,जो बाद में बिहार शिक्षा सेवा में गये,महितोष मिश्र,आनंद भवन होटल के मैनेजर श्रीवास्तव जी,

मूट कोर्ट में ‘‘बिलायती’’ लहजे में अंग्रेजी बोलने वाले  अशोक कुमार

सिन्हा,कदमकुआं और ऐसे ही कुछ राजनीतिक रूप से जागरूक छात्र।

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9 जनवरी 24 



 


 

 

 


बुधवार, 10 जनवरी 2024

 ममता बनर्जी की राजनीतिक शैली

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सुरेंद्र किशोर

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          1

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मैं शपथ लेती हूं कि मैं मरूं या जीऊं,

लेकिन नरेंद्र मोदी को राजनीति से 

हटाकर दम लूंगी।

   ---- ममता बनर्जी

दैनिक आज,पटना

29 --11 --2016

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          2

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पी.एम.मोदी जब पश्चिम बंगाल जाते हैं और टोलाबाजी का बयान देते हैं तो मैं उन्हें लोकतंत्र का थप्पड़ लगाना चाहती हूं।

    ---ममता बनर्जी।

  दैनिक जागरण

  8 मई 2019

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     3

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ममता बनर्जी हर साल मुझे कुर्ते और मिठाई भेजती हैं।

     ----नरेंद्र मोदी

  --दैनिक हिन्दुस्तान

   25 अपै्रल, 2019

    पटना

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           4

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कोलकाता में रोड शो के दौरान हुई हिंसा पर चिंता प्रकट करते हुए 

भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने कहा कि सी.आर.पी.एफ.नहीं होती तो मेरा बचकर निकलना मुश्किल था।

शाह ने हिंसा के लिए तृणमूल कांग्रेस को दोषी ठहराया।

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---दैनिक जागरण

  16 मई 2019

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          5

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बांग्ला देश के शरणार्थी भारत के नागरिक हैं।

यदि उनके नाम वोटर लिस्ट में नहीं हैं तो वे नाम जुड़वाने के लिए आवेदन पत्र दें।

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---मुख्य मंत्री ममता बनर्जी

  दैनिक आज

  पटना

 24 नवंबर 2022

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     6

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सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यदि कोलकाता के पुलिस कमिश्नर सबूत मिटाने के दोषी होंगे तो पछताएंगे।

----दैनिक जागरण

5 फरवरी 2019

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         7

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दिल मेरा हिंदू और किडनी मुसलमान है।

मैं धर्म के आधार पर भेदभाव नहीं करती।

---ममता बनर्जी

23 फरवरी 2018

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        8

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हम मोदी का चेहरा नहीं देखना चाहते।

  --- ममता बनर्जी

     20 मार्च 2021

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(अपूर्ण)

10 जनवरी 24



 


 अयोध्या से बिहार का अटूट संबंध

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तीनों प्रमुख चरणों में बिहार का योगदान

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सुरेंद्र किशोर

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1.-बिहार के मूल निवासी अभिराम दास ने सन 1949 में बाबरी ढांचे में रामलला की मूत्र्ति रखी थी।

उनके शिष्यों ने इस मामले में अभिराम दास की मदद की।

वे बिहार के मधुबनी जिले के मूल निवासी थे।

मधुबनी मिथिला में है।

मिथिला श्रीराम की ससुराल है।

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2.-नब्बे के दशक में बिहार के ही समस्तीपुर जिले के कामेश्वर चैपाल ने राम मंदिर के शिलान्यास की पहली ईंट रखी थी।

चैपाल अयोध्या ट्रस्ट के सदस्य हैं और अनुसूचित जाति से आते हैं।(उनकी जाति मैं जान बूझ कर लिख रहा हूं ताकि लोग जानें की यह सब ‘‘मनुवादी अभियान’’ नहीं है।)

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3.- विश्व हिन्दू परिषद के अध्यक्ष डा.आर.एन.सिंह 22 जनवरी को रामलला की प्राण प्रतिष्ठा के लिए पत्नी के साथ यजमान बनाए जाएंगे।

पद्मश्री से सम्मानित डा.सिंह बिहार में हड्डी रोग के सबसे बड़े चिकित्सक हैं।

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5 जनवरी 24  


 


बोफोर्स और 2-जी मामले 

अब भी जीवित !!

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सुरेंद्र किशोर

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जब -जब चुनाव करीब आता है तो 

कई कांग्रेसी नेता और कुछ पत्रकार गण भाजपा 

से यह सवाल पूछने लगते हंै कि आप 

लोग बहुत हल्ला कर रहे थे,पर बोफोर्स मामले 

में क्या हुआ ?

2- जी केस में क्या हुआ ?

एक बार फिर यह सवाल उठ रहा है क्योंकि 2024 का लोक सभा चुनाव बहुत नजदीक है।

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यह सवाल उठाकर वे यह साबित करना चाहते हैं कि इन दिनों जिन गैर भाजपा दलों के अनेक बड़े नेताओं के खिलाफ जो मुकदमे चल रहे हैं,उनमें भी अंततः कोई सबूत नहीं मिलेगा।

  इन मामलों का हश्र भी वही होगा जो बोफोर्स और 2 जी का हुआ।

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मैं बताता हूं कि बोफोर्स और 2 जी में क्या हुआ।

क्या -क्या नहीं हुआ ?

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(इन मुद्दों पर मैं 25 अक्तूबर, 2021 और 15 जुलाई, 2023 के दैनिक जागरण के संपादकीय पेज पर विस्तार से लिख चुका हंू।

पर,लगता है कि टी.वी.पर आने वाले भाजपा प्रवक्ता भी हिन्दी अखबार नहीं पढ़ते।)क्योंकि वे बोफोर्स और 2 -जी की चर्चा आते ही सकपका जाते हैं।

सटीक जवाब नहीं दे पाते।ं

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बोफोर्स तोप खरीद घोटाला कांड 

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2 नवंबर, 2018 को सुप्रीम कोर्ट ने बोफोर्स मुकदमे में

सी.बी.आई.की अपील को तमादी के आधार पर खारिज कर दिया।

पर, वकील अजय अग्रवाल की इस संबंध में दाखिल जनहित याचिका को सुनवाई के लिए मंजूर करते हुए अदालत ने कहा कि सी.बी.आई. के वकील, अग्रवाल की अपील की सुनवाई के दौरान अपना पक्ष प्रस्तुत कर सकते हंै। 

अब अजय अग्रवाल ही बता सकते हैं कि उनकी जनहित याचिका की अद्यतन  स्थिति क्या है।

इस बीच मैंने अब तक कहीं नहीं पढ़ा कि अग्रवाल की याचिका अस्वीकार कर दी गयी।

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टू जी घोटाला केस

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कम ही लोगों को यह मालूम है कि 2- जी का मामला अब भी दिल्ली हाईकोर्ट में विचाराधीन है।

सी.बी.आई.ने लोअर कोर्ट के जजमेंट के खिलाफ अपील दायर कर रखी है।

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 2 जी. स्पैक्ट्रम घोटाला मुकदमे में ए.राजा और कनिमोझी को दोषमुक्त करते हुए दिल्ली स्थित विशेष सी.बी.आई. जज ओ.पी.सैनी ने 2017 में  कहा था कि कलाइनगर टी.वी.को कथित रिश्वत के रूप में शाहिद बलवा की कंपनी डी.बी.ग्रूप द्वारा 200 करोड़ रुपए देने के मामले में अभियोजन पक्ष ने किसी गवाह से जिरह तक नहीं की।

कोई सवाल नहीं किया।

याद रहे कि उस टीवी कंपनी का मालिकाना करूणानिधि परिवार से जुड़ा है।

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मान लिया कि कोई सवाल नहीं किया।

क्योंकि शायद मनमोहन सरकार के कार्यकाल में  सी.बी.आई. के वकील को ऐसा करने की अनुमति नहीं रही होगी।

पर, खुद जज साहब के लिए भारतीय साक्ष्य अधिनियम में ऐसे ही मौके के लिए  धारा -165 का प्रावधान किया गया है।

आश्चर्य है कि  धारा -165 में प्रदत्त अपने अधिकार का सैनी साहब ने इस्तेमाल क्यों नहीं किया।कारण अज्ञात है।

 इस सवाल पर अब हाईकोर्ट में विचार होगा। 

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बोफोर्स घोटाले पर दिल्ली 

हाईकोर्ट का विचित्र न्याय

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सन 2019 के नवंबर में आयकर विभाग ने मुम्बई स्थित बोफोर्स दलाल विन चड्ढ़ा के फ्लैट को 12 करोड ़2 लाख रुपए में नीलाम कर दिया।

विन चड्ढ़ा के परिजन ने इस नीलामी का विरोध तक नहीं किया।

मनमोहन सिंह के प्रधान मंत्रित्व काल में आयकर न्यायाधीकरण ने कह दिया था कि ‘‘बोफोर्स की दलाली के मद में 41 करोड़ रुपए क्वात्रोचि और विन चड्ढ़ा को मिले थे।

उस पर आयकर बनता है।’’

याद कीजिए,राजीव गांधी लगातार कहते रहे कि बोफोर्स सौदे में कोई दलाली नहीं ली गई।

 सी.बी.आई. ने स्विस बैंक की लंदन शाखा में बोफोर्स की दलाली के पैसे का पता लगा लिया था।वह पैसा क्वात्रोचि के खाते में था।(ठीक उसी खाता नंबर की चर्चा वी.पी.सिंह ने 4 नवंबर 1988 को पटना की एक जन सभा में की थी।)

उस खाते को गैर कांग्रेसी शासन काल में सी.बी.आई.ने जब्त करवा दिया था।

पर बाद में मन मोहन सरकार ने सरकारी वकील बी.दत्ता को  लंदन भेजकर उस जब्त खाते को खुलवा दिया।

   क्वात्रोचि को पहले भारत से भाग जाने दिया गया।

 बाद वह लंदन बैंक के अपने खाते से पैसे निकाल कर मलेशिया भाग गया।

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याद रहे कि बोफोर्स तोप अच्छी है।

फ्रांस की सोफ्मा तोप उससे बेहतर है।

सोफ्मा वाले दलाली नहीं देते थे।

बोफोर्स वाले देते थे।

इसीलिए भारत सरकार ने बोफोर्स खरीदा।

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अस्सी के दशक में बिहार राज्य पथ परिवहन निगम का एक अफसर मुझसे मिला था।

उसने कहा कि ‘‘मुझ पर ऊपर यह दबाव है कि मैं टाटा कंपनी के चेसिस ही खरीदूं।जबकि मैं एक दूसरी कंपनी के चेसिस खरीदना चाहता हूं।’’

मैंने उस मामले का पता लगया।

एक ईमानदार अफसर ने मुझे बताया कि जो अफसर आपसे मिला था,वह रिश्वत कमाना चाहता है। 

इसीलिए वह दूसरी कंपनी का पक्ष ले रहा है।

टाटा कंपनी रिश्वत नहीं देती।यह उसका नियम है।

चाहे आप उसके चेसिस खरीदें या मत खरीदें।

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   2 जी केस में अदालती विचित्रता

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 जिस मामले में सुप्रीम कोर्ट प्रथम द्रष्ट्वा घोटाला मान कर 122 लाइसेंस रद कर दे और जुर्माना भी लगा दे ,उस केस में लोअर कोर्ट की ऐसी हिमाकत ????

यह अपने ही देश में संभव है।

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10 जनवरी 24


   

 



 यदाकदा

सुरेंद्र किशोर

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देश की विधायिकाओं का एजेंडा प्रतिपक्ष भी तय करे

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क्यों न इस देश में भी विधायिकाओं के हर सत्र के कुछ खास दिनों के एजेंडा प्रतिपक्ष तय करे ?

ब्रिटेन और कनाडा में यह परंपरा जारी है।

यदि यहां भी वैसा हो जाए तो शायद सदन के संचालन में उससे फर्क पड़े।

शोरगुल कम हो !

पता नहीं, हमारे संविधान निर्माताओं ने इस पर सोच-विचार किया था या नहीं।

पर,अब तो इसकी जरूरत लग रही है।

इस देश में संसद सहित विधान सभाओं और विधान परिषदों  में शांति बहाल रखना दिन प्रति दिन मुश्किल होता जा रहा है।

ऐसे में इस फार्मूले को अपनाने में क्या हर्ज है !

शायद उससे प्रतिपक्षी दलों को कुछ संतुष्टि मिले।

याद रहे कि ब्रिटिश संसद के हर सत्र के 20 दिन वहां के प्रतिपक्षी दल सदन की कार्यवाही का एजेंडा तय करते थे।

कनाडा में 22 दिन ऐसा होता है।

यदि एक से अधिक दल प्रतिपक्ष में हैं तो उतना समय उन दलों के बीच उनकी सदस्य संख्या के अनुपात बांट दिया जाता है।

हां,यदि प्रतिपक्ष के किसी मुद्दे पर सदन में मतदान होता है तो उसके नतीजों को स्वीकार करने के लिए सरकार बाध्य नहीं हेाती।

हाल में भी कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ने कहा है कि असली मुद्दों पर सदन में चर्चा नहीं हो रही है।

यदि उन्हें कुछ दिन मिल जाएं तो वे ‘‘असली मुद्दों’’ को एजेंडा बना सकंेगे।

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भाजपा पहल करे

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प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने भाजपा सांसदों से कहा है कि वे संयम बरतें और लोकतांत्रिक मानदंड के अनुसार व्यवहार करें।

अभी तो उनका इशारा संसद में शालीनता और संयम बरतने को लेकर हैं।

किंतु ऐसे निदेशों को विधान सभाओं और परिषदों में मौजूद भाजपा सदस्यों तक भी पहुंचाया जाना चाहिए।

यदि ऐसे निदेश का पालन हो सका तो देश की विधायिकाओं में अच्छी परंपरा की शुरूआत होगी।

जिन राज्यों में गैर भाजपा दलों की सरकारें हैं,क्या उन राज्यों की विधायिकाओं में भाजपा सदस्यगण अपने आचरण से आदर्श उपस्थित करेंगे ?

यदि ऐसा हुआ तो संसद के प्रतिपक्षी दलों से भी आदर्श पेश करने के लिए कहने का नैतिक हक भाजपा को हासिल होगा।

चूंकि भाजपा एक अनुशासित दल है,इसलिए वह इसकी शुरूआत कर सकती है।

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कैसे सुधरेगी बिहार की शिक्षा ! 

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बिहार के अतिरिक्त मुख्य सचिव के.के.पाठक राज्य के शिक्षा क्षेत्र में सुधारात्मक कार्य कर रहे हैं।

 उसका सकारात्मक असर है।

 आम जनता के.के.पाठक की इस पहल की सराहना कर रही है।मुख्य मंत्री नीतीश कुमार का भी संरक्षण श्री पाठक

को हासिल है।  

पर,कुछ खास हलकों में के.के.पाठक की पहल का तीखा विरोध हो रहा है।

ऐसे में क्या पाठक जी अभियान अधिक दिनों तक जारी रख पाएंगे ?

अपवादों को छोड़कर बिहार में शिक्षा-परीक्षा की आज जो दुर्दशा है,उसमें सुधार का काम अगली पीढ़ियों के लिए नहीं टाला जा सकता है।

 इन पंक्तियों का लेखक दशकों से देख रहा है कि किस तरह यहां की अच्छी शिक्षा व्यवस्था को धीरे धीरे बर्बाद कर दिया गया।

 कई तत्व जिम्मेदार रहे हैं।एक उच्चस्तरीय न्यायिक आयोग   

बने।दुर्दशा के कारणों को चिन्हित करे।सुधार के उपाय सुझाये।सरकार उन उपायों को लागू करे।

अन्यथा, अधिकतर शिक्षण संस्थान सिर्फ सर्टिफिकेट

बांटने के काउंटर भर बनकर रह जाएंगे।     

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तब और अब की कहानी

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साठ के दशक की बात है।

बिहार के औरंगाबाद जिले के एक क्षेत्र से विधायक ब्रजमोहन सिंह राज्यस्तरीय नेता से बातचीत कर रहे थे।

ब्रजमोहन सिंह ने कहा कि मैं इन दिनों क्षेत्र के विकास के काम में लगा था,इसलिए आपसे बीच में मिल नहीं सका था।

दिवंगत ब्रजमोहन बाबू ने इन पंक्तियों के लेखक से कहा था कि मुझे उम्मीद थी कि नेता जी मेरी तारीफ करेंगे।

पर,उल्टे उन्होंने कहा कि ज्यादा विकास वगैरह के काम में लगोगे तो अगली बार चुनाव नहीं जीत पाओगे।

क्योंकि सरकार से कितने गांवों का विकास करवा पाओगे ?

साधन इतना कम है कि कुछ ही गांव का करा पाओगे।

नतीजतन जिन गावों का नहीं होगा, उन गांवों के लोग तुमको अगली बार वोट नहीं देंगे।

आज यानी सन 2023 में स्थिति बदल चुकी है।

हर तरफ विकास व कल्याण के थोड़ा-बहुत काम हो रहे हैं।केंद्र और राज्य सरकारों के बीच होड़ है।

अन्य गांवों का भी यही हाल है।पर व्यक्तिगत अनुभव के आधार पर मैं अपने गांव का हाल बताता हूं।

गांव के दक्षिण से उत्तर की ओर पक्की सड़क बन रही है।

पूरब से पश्चिम ओर सीमेंटी सड़क की योजना है।नदी में घाट बन रहा है।

कई साल पहले मेरे प्रयास से वहां कुछ विकासात्मक काम हुए थे।

पर,इन दिनों राज्य के सामान्य विकास के क्रम में मेरे पुश्तैनी गांव का भी विकास हो रहा है।

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और अंत में

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मध्य प्रदेश विधान सभा भवन से जवाहरलाल नेहरू का चि़त्र हटा दिया गया।

कुछ साल पहले जब कमलनाथ ने मुख्य मंत्री पद संभाला तो उन्होंने जेपी सेनानी पेंशन योजना बंद कर दी थी।यह सब चलता रहता है।

बिहार में ,जहां आंदोलन सर्वाधिक सघन था,जेपी सेनानी को अधिकत्तम हर माह 15 हजार रुपए मिलते हैं।मध्य प्रदेश में तब 25 हजार रुपए मिलते थे।

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21 दिसंबर 23