सोमवार, 28 सितंबर 2026

 पितृ पक्ष (26 सितंबर--10 अक्तूबर) के 

अवसर पर पिता की यादें

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वह जमाना कब का गुजर गया जब इस देश के 

लोग अपने पिता के पैरों में 

स्वर्ग देखते थे !

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--सुरेंद्र किशोर--

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अपवादों को छोड़ दें तो इन दिनों अधिकतर मामलों 

में पुत्र का समय अपने पिता से 

यह कहते हुए बीतता है कि 

‘‘ आपने मेरे लिए किया ही क्या ? ’’

ऐसा कह कर एक तरफ पुत्र अपनी नाकामियों को छिपाता है तो दूसरी ओर कूढ़न में पिता की आयु कम होती जाती है।

पिता के गुजर जाने तक यह सब चलता रहता है।

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पुत्र यह कहना चाहता है कि जो भी उपलब्धि मैंने पाई,वह खुद अपने बल पर।

और, मेरे जीवन में जो भी कमी रह गई,

वह पिता के असहयोग कारण।

वैसे सच तो यह है कि सिर्फ एक पिता को ही अपने पुत्र की तरक्की से कभी ईष्र्या नहीं होती।बाकी सबको होती है।

(मैं खुद इस बात का गवाह हूं।)

यानी, पिता दिल से चाहता है कि उसका पुत्र उससे भी अधिक तरक्की करे।

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समय बीतते देर नहीं लगती।

तब तक पुत्र भी पिता बन चुका होता है ।

और, उसे भी अपने पुत्र से यही सब सुनना पड़ता है।

इस तरह इतिहास का पहिया न जाने कब से 

घर्र -घर्र करते आगे बढ़ता जा रहा है।

एक बार फिर कह दूं।

इस नियम के कुछ अपवाद भी होते हैं।

पर, कुछ ही होते हैं।

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जीवन काल में पिता की उपेक्षा करने वाले उनके निधन के बाद कुछ अधिक ही पितृपक्ष मनाने लगते हैं।

दाढ़ी के बाल बढ़ा लेंगे,

थोड़ा उदास दिखने की कोशिश करेंगे और उनमें से कुछ गया में पिंडदान करने भी चले जाएंगे।

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अंध विश्वास है या यथार्थ ?

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आप इसे मेरा अंध विश्वास मान सकते हैं।

पर,यह तो मेरे साथ घटित हुआ है !

जब तक मेरे परिवार ने गया में पिंडदान नहीं किया,

तब तक मेरे बाबू जी 

(शिव नन्दन सिंह,ग्राम-भरहापुर,अंचल-दरियापुर,जिला-सारण,बिहार।)

अक्सर मेरे सपनों में आते थे।

पिंडदान के बाद नहीं आते।कभी नहीं आये।

  गया (अब गयाजी)का बहुत महत्व रहा है ।बताते हैं कि राम-सीता ने अपने पूर्वज की आत्मा की शांति के लिए गया में ही पिंडदान किया था।

 खैर, इस अवसर पर कुछ दूसरी बातें भी।

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मेरे किसान पिता ने पिता की जिम्मेदारी 

बेहतर ढंग से निभाई।

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 जब मैंने सन 1963 में प्रथम श्रेणी में मैट्रिक(साइंस) पास किया ,उस पर बाबू जी मुझसे बहुत खुश थे।तब इक्के-दुक्के छात्र ही प्रथम श्रेणी में पास होते थे।

  बाबू जी मुझे जूनियर इंजीनियर बनाना चाहते थे।कहते थे कि पांच साल इंजीनियरिंग पढ़ाने का हमें धैर्य और साधन नहीं है।

पर, मेरी लाइन ही अलग थी।मैं सामाजिक -राजनीतिक क्षेत्र में जाना चाहता था।इसलिए बाद में मुझसे मेरे पिता काफी निराश हुए।

फिर भी कहते थे कि ‘‘जो मन में आए,करो।पर कभी -कभी गांव आ जाया करो--मुझे देखने के लिए नहीं तो खुद को मुझे दिखाने के लिए।’’

उनकी इच्छा के अनुसार मेरे छोटे भाई नागेंद्र ने पटना विश्व विद्यालय के लाॅॅ कालेज से   

कानून की डिग्री ली।

बड़े भाई को मुजफ्फर पुर में राष्ट्रपति पुरस्कार प्राप्त हेड मास्टर पृथ्वीनाथ त्रिपाठी (बी बी काॅलेजिएट स्कूल)के घर रखकर पढ़ाने की कोशिश की।

पर उनके लगातार अस्वस्थ रहने के कारण उनकी पढ़ाई अधूरी रह गई।

त्रिपाठी जी बहुत ही अच्छे शिक्षक थे।बी.बी.काॅलेजिएट स्कूल के प्राचार्य थे।

मेरे ही गांव के थे।मेरे बाबू जी के देास्त थे।

  यानी अपनी संतान को शिक्षित बनाने की एक किसान की तीव्र इच्छा तो देखिए।

मेरे पिता ने अपनी जमीन बेच कर शिक्षा पर खर्च किया।आने वाले जमाने का उन्हें पूर्वानुमान था।

जमींदारी जा चुकी थी।समय बदल रहा था।

आजाद भारत में शिक्षा का महत्व बढ़ा रहा था।

बाबू जी लंबे-चैड़े कसरती शरीर के स्वामी थे।बातचीत में दबंग थे।

लघुत्तम जमींदार थे।एक बड़े जमींदार के तहसीलदार भी थे।

उनका जन्म 1898 और निधन 1986 में हुआ।

 मेरे जन्म के समय बाबू जी  22 बीघा जमीन के मालिक थे।

स्कूल में पढ़ने लगा तो देखा कि घर में दो नौकर

दो गाय,दो या तीन बैल ,एक भैंस रहते थे।

सघन आबादी वाले सारण जिले में इतनी जमीन-जायदाद  होने पर हमारे आसपास के गांवों के अन्य किसान संतुष्ट थे।

खेत बेच कर अपने बच्चों को पढ़ाने के बारे में उन लोगों ने सोचा भी नहीं।

उल्टे वे मेरे बाबू जी के इस काम को अदूरदर्शी मानते थे।

पर,अब जब कभी गांव जाता हूं तो देखता हूं कि हमारे बराबर जमीन के मालिक की  हम उम्र संतान  आज भी किसानी करती  है और अच्छी हालत में नहीं हैं।

 एक बार मेरे एक स्कूल सहपाठी गया राय (रामपुर जैंती)ने कहा कि तू लोग त पहले भी जमींदार थे और पढ़ाई -लिखाई के कारण अब भी जमींदार हो।

इस तुलनात्मक अध्ययन से लगता है कि मेरे बाबू जी कितने दूरदर्शी थे।

यदि वैसा नहीं होते तो हम भी आज गांव में किसानी ही कर रहे होते।

किसानी की हालत यह है कि हमारे सामूहिक परिवार का एक सदस्य यानी मेरा भतीजा जो गांव पर रहता है,वह सारी जमीन में खेती नहीं कर पाता।क्योंकि अधिक खेती यानी अधिक घाटा।

अब भी हमारे संयुक्त परिवार के पास बेच -बाच कर नौ-दस बीघा जमीन बची है।

पर जो हैं,सब पक्की सड़क पर है।हालांकि अब हमलोग बेच रहे हैं।अन्यत्र पूंजी निवेश कर रहे हैं।

  यानी बाबू जी की अन्य बातों के साथ -साथ शिक्षा के प्रति उनकी तीव्र लालसा की याद आती है।

इस कहानी का मेारल यह है कि अभिभावकों को चाहिए कि वे तकलीफ उठाकर भी अपने बच्चों को शिक्षित जरुर करें।

(पर देश -प्रदेश का दुर्भाग्य है कि शिक्षण-परीक्षण का स्तर बिलकुल नीचे गिर चुका है।)

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बाबू जी की याद में

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पंडित ओम व्यास ओम ने ठीक ही लिखा है कि 

‘पिता भय से चलने वाला प्रेम का प्रशासन है।’

मुझे याद नहीं कि बाबू जी ने कभी हमें बचपन में एक थपड़ भी मारा हो।

दरअसल उनकी उपस्थिति मात्र से हम सब भाई अनुशासित रहते थे।

वैसी कद-काठी का शायद ही कोई व्यक्ति जवार में हो !

मेरे परमानंद मामा उनके बारे में कहते हैं कि मेरे बहनाई शेर हैं।परमा मामा मुम्बई में पुत्र के साथ रहते हैं।

  स्वाभाविक ही है कि मेरे पिता के जीवनकाल में तो हमें उनके महत्व का उतना पता नहीं चल सका।

पर, न रहने पर हम सोचते रहे कि शायद हम लोग उनसे परंपरागत विवेक को लेकर कुछ अधिक सीख सकते थे।

उनकी स्कूली शिक्षा तो नहीं थी,

किंतु वे रामायण पढ़ते थे,

कैथी लिखते थे।

जमींदारी की रसीद काटते थे।

गांव- जवार में पंचायती करने जाते थे।

हां,वे मुकदमे के सिलसिले में अक्सर पटना-छपरा 

जाते रहते थे।अच्छे किसान है तो मुकदमा तो रहेगा ही।

कहा करते थे कि पटना हाईकोर्ट भवन के आसपास पहले धान की खेती होती थी जिसेे उन्होंने देखा था।

विधायक काॅलोनी तो बाद में बनी।

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  ओम व्यास ओम की कविता के जरिए हमें पिता के पूरे महत्व का एहसास हुआ।

आपके साथ साझा कर रहा हूं।

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पिता

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पिता  जीवन है, संबल है, शक्ति है।

पिता सृष्टि के निर्माण की अभिव्यक्ति है।

पिता अंगुली पकड़े बच्चे का सहारा है।

पिता कभी खारा तो कभी मीठा है।

पिता पालन पोषण है,परिवार का अनुशासन है।

पिता भय से चलने वाला प्रेम का प्रशासन है।

पिता रोटी है, कपड़ा है,मकान है।

पिता छोटे से परिंदे का बड़ा आसमान है।

पिता अप्रदर्शित अनंत प्यार है।

पिता है तो बच्चों को इंतजार है।

पिता से ही बच्चों के ढेर सारे सपने हैं।

पिता है तो बाजार के सब खिलौने अपने हैं।

पिता से प्रतिपल राग है।

पिता से ही मां की बिंदी और सुहाग है।

पिता परमात्मा की जगत के प्रति आसक्ति है।

पिता गृहस्थाश्रम में उच्च स्थिति की भक्ति है।

पिता अपनी इच्छाओं का हनन परिवार की पूत्र्ति है।

पिता रक्त में दिए हुए संस्कारों की मूत्र्ति है।

पिता एक जीवन को जीवन का दान है।

पिता दुनिया दिखाने का अहसास है।

पिता सुरक्षा है, अगर सिर पर हाथ है।

पिता नहीं तो बचपन अनाथ है।

पिता  से बड़ा अपना नाम करो।

पिता  का अपमान नहीं, अभिमान करो।

क्योंकि मां-बाप की कमी कोई पूरी नहीं कर सकता।

ईश्वर भी इनके आशीषों को काट नहीं सकता।

दुनिया में किसी भी देवता का स्थान दूजा है।

मां-बाप की सबसे बड़ी पूजा है।

वो खुशनसीब होते हैं, मां-बाप जिनके साथ होते हैं।

       --  पंडित ओम व्यास ओम

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28 सितंबर 26

  



  



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