बुधवार, 23 दिसंबर 2009

कांग्रेसी राज में ही क्यों बढ़ती है बेतहासा महंगाई ?

सन 1999 में गेहंू साढ़े सात रुपये प्रति किलो ग्राम की दर से बिक रहा था। सन 2004 में उसकी कीमत बढ़कर आठ रुपये प्रति किलो हो गई। आज लोग साढ़े 17 रुपये किलो गेहूं खरीदने को विवश हो रहे हैं।
साधारण चावल का दाम 1999 में साढ़े आठ रुपये किलो था। 2004 में बढ़कर दस रुपये किलो हो गया। अब कम से कम सोलह रुपये किलो चावल बिक रहा है। विभिन्न स्थानों में इनकी कीमतों में थोड़ी कमी -बेशी स्वाभाविक है। जिंसों के प्रकार के अनुसार भी दामों में कमी -बेशी स्वाभाविक है। इस विश्लेषण की मूल बात अभूतपूर्व मूल्य वद्धि की चर्चा है। मूंग दाल की हालत और भी खराब है। इस साल करीब सौ रुपये किलो बिकी। जबकि 1999 से 2004 तक इसकी कीमत 24 रुपये किलो पर स्थिर थी। चीनी और सरसों तेल की कीमतों में तो हाल के वर्षांे में अपेक्षा कत और भी अधिक बढ़ोतरी हुई है।

उपर्युक्त विवरण एनडीए के किसी आरोप पत्र से नहीं लिया गया है बल्कि दैनिक अखबारों के आर्थिक पन्नों से उतारा गया है।

आज जानकार लोग बता रहे हैं कि खाने पीने वाली सामग्री की कीमत मात्र गत एक साल में करीब 20 प्रतिशत बढ़ गई है। चीनी की कीमत तो एक साल पहले 18 रुपये प्रति किलो थी। इस साल क्यों वह 40 रुपये किलो बिकी ? जबकि किसानों को गन्ने के अलाभकर मूल्य निर्धारण के खिलाफ संसद भवन को घेरना पड़ा। क्यों गन्ने का समर्थन मूल्य तो दस साल में मात्र दुगुना किया जाता है, पर चीनी की कीमत मात्र एक साल में दुगुनी हो जाती है ? अन्य उपभोक्ता सामग्री का भी कमोवेश यही हाल है? आखिर इसमें केंद्र व राज्य सरकारों की कोई भूमिका रह भी गई है या नहीं ? या फिर आम निरीह जनता का खून चूसने के लिए विभिन्न सरकारोंने मुनाफाखार भेड़ियों को खुला छोड़ दिया है ? साफ -साफ लग रहा है कि केंद्र सरकार ने इस अभूतपूर्व महंगाई की समस्या के सामने न सिर्फ घुटने टेक दिये हैं, बल्कि संबंधित मंत्री शरद पवार ने यह कह कर मुनाफाखोरों व जमाखोरों का हौसला बढ़ा दिया है कि अगले तीन महीने तक महंगाई पर काबू नहीं पाया जा सकता है। इससे पहले कभी किसी सरकार को इतना निरीह नहीं पाया गया था। यह निरीहता है या मुनाफाखारों से सांठसांठ ?

अब तो केंद्रीय मंत्री महंगाई के लिए राज्यों को दोषी ठहरा कर अपनी राजनीतिक रोटी भी सेंक रहे हैं।

उधर विभिन्न राज्य सरकारों में व्याप्त भीषण भ्रष्टाचार के कारण सार्वजनिक जन वितरण प्रणलियां करीब करीब फेल कर गई हैं। इस विफलता ने मुनाफाखोरों व जमाखोरों की बांछें खिला दी हैं। केंद्र सरकार के अन्न भंडार भरे हुए हैं। पर उन्हें बाजारों में नहीं उतारा जा रहा है। ऐसा मुनाफाखोरों के हित को ध्यान में रख कर किया जा रहा है ? यानी जाहिरा तौर पर महंगाई के लिए केंद्र व राज्य दोनों सरकारें जिम्मेदार हैं। यह बात और है कि केंद्र सरकार अपेक्षाकत काफी अधिक जिम्मेदार है। क्योंकि उसने महंगाई बढ़ाने के लिए कुछ और कुकत्य किए हैं। विभिन्न राजनीतिक दल इसको लेकर एक दूसरे पर आरोप भले लगाएं, पर आम जनता सब कुछ जान रही है। इस पर इस गरीब देश में चर्चाएं जारी हैं। यदि सिर्फ गैर यू।पी.ए. राज्य सरकारें ही जिम्मेदार होतीं तो दिल्ली में महंगाई अन्य राज्यों की अपेक्षा कम होती क्योंकि यहां तो दोनों सरकारें एक ही दल की हैं।

यह भी कहा जा रहा है कि भीषण महंगाई के बावजूद जब कोई सत्ताधारी दल चुनाव जीतता ही चला जाए तो उसे इस पर काबू पाने की भला कौन सी मजबूरी रहेगी ? प्रतिपक्षी पार्टियां भी आधे मन से ही इसके खिलाफ आवाज उठा रही हंै। क्योंकि थोड़े बहुत उसके भी तो निहित स्वार्थ हैं ही। मर तो गरीब रहा है। लगता है कि राजनीतिक दलों का गरीबों से संबंध सिर्फ वोट का रहा गया है, भावना व सेवा गायब है। राजनीति में सांप्रदायिक, पारिवारिक व जातीय भावना जरूर मजबूती से उपस्थित है। अब तो इस देश के परंपरागत कम्युनिस्ट दलों को भी फाइव स्टार होटलों में अपने सम्मेलन करने और फाइव स्टार जीवन जीने में कोई शर्म नहीं आ रही है। कुछ अपवादों की बात और है। नई आर्थिक नीतियां आने के बाद बाजार की ताकतों को अर्थ व्यवस्था की बागडोर थमा दी गई है।

अर्थशास्त्री कमल नयन काबरा ने ठीक ही कहा है कि ‘आयात-निर्यात की मात्रा और कीमतों की अनिश्चितता तथा कीमत नियंत्रण के लिए आयात का जिम्मा मुनाफाखोर तबकों को देना, महंगाई को न्योतना है। सार्वजनिक वितरण प्रणाली की खामियों का कोई इलाज नहीं किया जाता है। नेताओं, पार्टियों और व्यवसायियों के गहराते निजी रिश्ते के परिप्रेक्ष्य में जनपक्षीय मूल्य नीति की उम्मीद करना बेमानी है।’

आज दिल्ली में किसी बहुमंजिली इमारत में तैनात जो गार्ड महीने भर काम करने के बाद मात्र 47 सौ रुपये पाता है, वह खुद क्या खाएगा और क्या गांव में अपने परिवार को भेजेगा ? वैसे भी इस देश के कितने लोगों को इतने पैसे भी हर महीने मिल पाते हैं ? इस देश के गरीबों के बारे में अर्थशास्त्री अर्जुन सेनगुप्त बताते हैं कि ‘84 करोड़ लोगों की रोजाना औसत आय मात्र बीस रुपये है।’ एक अन्य उदाहरण यहां पेश है। पी।एफ. से जुडी पेंशन राशि तो पांच सौ से हजार -डेढ़ हजार रुपये तक ही है। इस पंेशन राशि में भी किसी तरह की सालाना बढ़ोतरी का कानूनी प्रावधान तक नहीं है। ऐसे दरिद्र लोगों के लिए महंगाई का क्या मतलब है, यह बात अतुल्य भारत का सपना दिखाने वाले लोग नहीं समझ पा रहे हैं।

दूसरी ओर सरकार द्वारा इस देश में ऐसी अर्थ व्यवस्था जरूर बना दी गई है ताकि करोड़पतियों व अरबपतियों की संपत्ति सचिन तेंदुलकर की रन संख्या के अनुपात से भी अधिक बढ़ती जाए। ताजा आंकड़ों के अनुसार इस देश के अरबपतियों की संख्या मात्र गत एक साल में 27 से बढ़कर 54 हो गई है। एक सौ अमीरों के पास इस देश की 25 प्रतिशत संपत्ति है। जबकि संविधान के नीति निदेशक तत्व चैप्टर के अनुच्छेद 39/ग/में यह कहा गया है कि ‘राज्य ऐसी व्यवस्था करेगा ताकि उत्पादन के साधनों का अहितकारी संकेंद्रण नहीं हो।’

आर्थिक विशेषज्ञ, अखबारों व टी।वी.के टाॅक शो में यह बताते रहते हैं कि महंगाई बढ़ने के लिए किस तरह केंद्र सरकार अधिक और राज्य सरकारें कम जिम्मेदार रही हैं। उधर लोकसभा में महंगाई पर चर्चा होती है तो उस समय सदन में एक सौ सांसद भी उपस्थित नहीं रहते। आखिर उसकी उन्हें जरूरत ही कहां है ? उन्हें तो महंगाई छू भी नहीं गई है। सदन की बैठक के आखिरी दिन बिना बहस के संसद मत्रियों व सांसदों के वेतन भत्ते आये दिन सर्वसम्मति से बढ़ाती रहती है।ं 543 में से 316 सांसद करोड़पति हैं। उन्हें संसद की कैटीन में देश में सबसे सस्ता व स्तरीय खाना उपलब्ध ही है। वे क्यों महंगाई से तनिक भी दुःखी होंगे ?

ऐसा नहीं है कि इस मामले में गैर कांग्रेसी सरकारें व पार्टियां दूध की धुली हुई हैं। आम भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने के मामले में उनका रिकाॅर्ड भी लगभग कांग्रेस जैसा ही है। अब तो लगता है कि नेताओं के लिए भ्रष्टाचार कोई मुददा रहा ही नहीं। पर मुनाफाखोरों के प्रति कांग्रेस अपेक्षाकत अधिक उदार रही है। सरसों तेल की कीमत 1972 में 3 रुपये 95 पैसे प्रति लीटर थी। सन 1979 में वह घट कर 3 रुपये 50 पैसे हो गई। तब जनता पार्टी की सरकार केंद्र में थी। अन्य सामग्री की कीमतों का भी कमोवेश यही हाल था। पर सन 1980 में जब कांग्रेस सत्ता में वापस आ गई तो सरसों तेल की कीमत 1981 में बढ़कर साढ़े छह रुपये प्रति लीटर हो गई। मूंग दाल की कीमत सन 1972 में ढाई रुपये और 79 में सवा तीन रुपये थी, पर 81 में साढ़े छह रुपये हो गई। याद रहे कि यहां जो कीमतें दी जा रही हैं, उनमें से कई मद थोक कीमतों के हैं तो कुछ खुदरा के।कई साल के अखबारों की फाइलें देखने से यह लगता है कि 1999 से 2004 तक जिस रफतार से कीमतें बढ़ीं, उसकी अपेक्षा काफी अधिक गति से 2004 और 2009 के बीच में बढ़ी। मौजूदा केंद्र सरकार को इसका वाजिब जवाब देना चाहिए। क्या उसके पास जवाब है भी ? यदि नहीं है तो वह यह बात भी अच्छी तरह समझ ले कि इस मूल्य वद्धि की सर्वाधिक मार देश की 84 करोड़ आबादी पर पड़ रही है। माओवादियांे के खिलाफ किसी तरह के आपरेशन का कोई नतीजा सामने नहीं आएगा, यदि मूल्य वद्धि इसी तरह होती रहेगी।

मूल्य वद्धि की रफ्तार
(दर प्रति किलो रुपये में)

1947 --1972---1979 - 1981---1999--2004--2009
------------------------------------
गेहूं - 0.30 --1.25---1.80--- 2.20---7.50--8.00--17.50
मूंग दाल- 0.25 --2.50 --3.25 ---6.50-- 24.00--24.00--95.00
सरसों तेल-1.75--5.50---9.00----16.00- अनुपब्ध-33.00--91.00
चीनी--- 0.72 -3.95--3.50---- 6.50 -- 15.00--16.65--40.00
( इनमें से कुछ जिंसों का भाव थोक का है और कुछ का खुदरा का।)
------------------------------------------
इन आंकड़ों को देखने से यह साफ है कि किसके शासन काल में कीमतों के बढ़ने का अनुपात अधिक था और किसके शासन काल में कम।शरद पवार से पहले शायद ही किसी कषि मंत्री ने यह आधिकारिक घोषणा की थी कि अगले तीन महीने तक कीमतें बढ़ेंगी ही।इससे पहले संबंधित मंत्री यह कहते थे कि सरकार कीमतों पर काबू पाने की कोशिश व उपाय कर रही है।दोनों बयानों के मतलब व संदेश जाहिर है कि मुनाफाखारों के लिए अलग अलग हैं। भला लगातार चुनाव जीतते जाने वाले नेता क्यों इसकी चिता करंेगे कि उनके बयानों का क्या अर्थ लगेगा !

(साभार प्रभात खबर: 22 दिसंबर 2009)

शनिवार, 7 नवंबर 2009

एक ऋषितुल्य संपादक की विदाई

यदि कोई संपादक अपने किसी मामूली संवाददाता के लेखन की स्वतंत्रता की रक्षा के लिए भी अपनी खुद की नौकरी दांव पर लगा दे तो उसे आप क्या कहेंगे ? यदि वही संपादक अपने पुत्र के कैरियर को नुकसान पहुंचा कर भी अपने सहकर्मी पत्रकार की स्वतंत्रता की रक्षा करे तो आप क्या कहेंगे ?

आपको जो कहना है, वह कह लें, पर मैं तो कहूंगा कि वह यशस्वी संपादक प्रभाष जोशी एक पत्रकार और किसी प्राचीनकालीन ऋषि के बीच के प्राणी थे। गत 26 साल के उनसे संपर्क का मेरा तो यही अनुभव है। उपर्युक्त दोनों घटनाओं का मैं खुद पात्र रहा हूं। ऐसा अनुभव संभवतः मेरा अकेला का नहीं रहा होगा। इस देश में अनेक लोग हैं जो प्रभाष जी से खुद को सर्वाधिक करीबी मानते रहे क्योंकि प्रभाष जी ने उन्हें कुछ न कुछ दिया ही है जिस तरह उन्होंने अत्यंत विपरीत परिस्थितियों में भी मुझे लिखने की स्वतंत्रता दी।

मैं सन् 1983 से सन् 2001 तक जनसत्ता का पटना संवाददाता रहा। इन 18 वर्षों में से करीब 12 साल की कालावधि में मुझे प्रभाष जी के संपादकीय व प्रशासनिक नेतृत्व में काम करने का अवसर मिला। बाद के संपादक क्रमशः राहुल देव, अच्युतानंद मिश्र और ओम थानवी का व्यवहार भी मेरे साथ जनसत्ता की परंपरा के अनुकूल ही था जिस परंपरा की नींव प्रभाष जी ने डाली थी। पर प्रभाष जोशी के संपादकत्व का काल भारी राजनीतिक उथल-पुथल का काल था। ऐसा काल जिसमें संपादकों व संवाददाताओं की पहचान हो जाती है। जनसत्ता व उसके यशस्वी संपादक उस झंझावात में खरा उतरे।

मेरा व्यक्तिगत अनुभव यह रहा कि ‘जनसत्ता’ अपने शुरुआती काल से ही न तो किसी राजनीति व प्रशासनिक ताकत के दबाव में आया और न ही सरकारी विज्ञापन के मायामोह में फंसा। एक्सप्रेस समूह के मालिक राम नाथ गोयनका की परंपरा का यह असर था। एक्सप्रेस समूह द्वारा जनसत्ता का जब प्रकाशन शुरू हुआ, उस समय बिहार के मुख्यमंत्री पद पर बैठे थे चंद्र शेखर सिंह। वे खुद तो ठीकठाक व्यक्ति थे। कायदे से काम करने में विश्वास करते थे, पर उनकी सरकार भ्रष्ट थी। जनसत्ता का कर्तव्य था कि उनकी सरकार के बारे में पाठकों तक खबरें पहुंचाई जाएं। चंद्र शेखर सिंह खबरों के प्रति काफी संवेदनशील नेता थे।

चूंकि जनसत्ता दिल्ली से निकलता है और कांग्रेस हाईकमान दिल्ली में बसता है, इसलिए किसी कांग्रेसी मुख्यमंत्री के लिए दिल्ली के अखबार में छपने वाली खबर का काफी महत्व होता है। वैेसे भी चंद्रशेखर सिंह के खिलाफ कांग्रेस का विक्षुब्ध गुट काफी सक्रिय था और वह हाईकमान को उकसाता रहता था।

जनसत्ता में उनके तथा उनकी सरकार के बारे में छप रही खबरों से मुख्यमंत्री परेशान रहा करते थे। स्टेटसमैन के पटना स्थित तत्कालीन संवाददाता और मेरे मित्र मोहन सहाय, चंद्र शेखर सिंह की शालीनता व उनके काम काज के तरीके के प्रशंसक थे। वे मुझसे अक्सर यह कहा करते थे कि ‘आप एक अच्छे मुख्यमंत्री के साथ न्याय नहीं कर रहे हैं। आपकी खबर पढ़कर एक बार चंद्र शेखर सिंह की आंखों में दुःख के आंसू मेैंने देखे थे।’ मेरी गलती कहिए या सही, मैं चंद्रशेखरसिंह से मिलता नहीं था। मुझे डर था कि सत्ताधारी नेताओं से मेलजोल बढ़ाने से कहीं मेरे मन में उनके प्रति मोह पैदा न हो जाए और मैं अपने कर्तव्य से डिग न जाऊं। हार कर मुख्यमंत्री ने जन संपर्क विभाग के एक अफसर को प्रभाष जोशी से मिलने के लिए दिल्ली भेजा। उस अफसर के हाथ में एक पेज का सरकारी विज्ञापन भी था।

उस अफसर की प्रभाष जोशी से क्या बातचीत हुई, उसका विवरण बाद में मेरे एक सहयोगी ने बताया। अफसर ने जोशी जी से कहा कि आपके संवाददाता मुख्यमंत्री से नहीं मिलते और एकतरफा लेखन करते हैं।

जोशी जी ने उनसे कहा कि एकतरफा लेखन करते होंगे, पर क्या वे गलत भी लिखते हैं ? अफसर ने कहा कि गलत तो नहीं लिखते, पर पुरानी -पुरानी बातें लिखते हैं। जोशी जी ने कहा कि जिस पार्टी की प्रधानमंत्री यह कहती हंै कि एनटी रामा राव सरकार की बर्खास्तगी की खबर मैंेने टेलीप्रिंटर पर पढ़ी, उस दल के मुख्यमंत्री का बचाव करने आप आए हैं ? यह सुन कर बेचारे अफसर अपने एक पेजी विज्ञापन को समेटते हुए जोशी जी के कमरे से निकल गये।

चंद्र शेखर सिंह के कार्यकाल के बाद बिंदेश्वरी दुबे मुख्य मंत्री बने। वे स्थितप्रज्ञ व्यक्ति थे और अखबारों को अधिक महत्व नहीं देते थे। उन्हें जनसत्ता की परवाह करने की जरूरत भी नहीं थी क्योंकि कांग्रेस हाईकमान पर उनका असर अधिक था। पर भागवत झा आजाद का मुख्य मंत्रित्वकाल कई मामलों में तूफानी काल रहा। जनसत्ता ने भागवत झा आजाद के समय में एक सर्वेक्षण आयोजित किया था। कुछ चुनाव क्षेत्रों को नमूना बना कर हजारों लोगों से यह पूछा गया था कि आप किस नेता को मुख्यमंत्री के रूप में देखना चाहते हैं। बिहार के सर्वेक्षण का भार जाहिर है कि मुझ पर था। उस सर्वेक्षण में बिहार के करीब 75 प्रतिशत लोगों ने यह कहा था कि वे अगले चुनाव के बाद भी भागवत झा आजाद को ही मुख्यमंत्री के रूप में देखना चाहेंगे। जनसत्ता ने इस विवरण को भी छापा था।

कहा गया कि कांग्रेस चूंकि किसी मुख्यमंत्री को किसी राज्य में लोकप्रिय होना देखना नहीं चाहती, इसलिए आजाद जी को हटा दिया गया। आजाद ने कई चैंकाने वाले काम करके बिहार के निहितस्वार्थियों के हितों पर चोट पहुंचाई थी। इससे आम जनता आजाद से खुश थी, पर कांग्रेस के अनेक नेता उनसे नाराज थे। भागवत झा आजाद के खिलाफ नाराजगी को बल इसलिए भी मिलता था क्योंकि मुख्यमंत्री बनने के बाद वे अपने वैसे कुछ खास समर्थकों के प्रति भी नरम थे जो गलत कामों मंें संलग्न थे। भागलपुर के पापड़ी बोस अपहरण कांड के अभियुक्त के प्रति नरमी दिखाने का आजाद जी पर आरोप था। ऐसे में जनसत्ता जैसे अखबार से वे कैसे बच सकते थे! क्योंकि यह आजाद साहब को दोहरा मापदंड था। ऐसा नहीं था कि आजाद साहब के कुछ अच्छे कामों की तारीफ में जनसत्ता के पटना संवाददाता ने नहीं लिखा था।

पर अधिकतर सत्ताधारी नेता तो यही चाहते हंै कि अखबार उनके अच्छे कामों की तारीफ में तो लिखे ही, पर साथ ही उनके गलत कामों को नजरअंदाज भी करता जाए। नेता जब सत्ता में होता है तो वह जनसंपर्क विभाग के प्रकाशन और किसी पेशेवर अखबार के बीच फर्क नहीं कर पाता। वह यह भी समझने लगता है कि पत्रकार या तो मेरा दोस्त हो सकता है या फिर दुश्मन। बीच की कोई स्थिति वह स्वीकार ही नहीं कर पाता। यही हुआ और भागवत झा आजाद जनसत्ता पर नाराज हो गये। दिल्ली के एक चर्चित पत्रकार के घर पर प्रभाष जोशी से आजाद साहब की भेंट हुई। उन्होंने जोशी जी से मेरी शिकायत की। आजाद साहब को उम्मीद थी कि जोशी जी वहीं से फोन उठाएंगे और सुरेंद्र किशोर को कहेंगे कि तुम क्यों आजाद साहब के खिलाफ लिख रहे हो ? पर जोशी जी ने ऐसा कुछ नहीं किया। उन्होंने आजाद साहब से कह दिया कि ‘यह बात तो वहीं हो सकती है जहां सुरेंद्र किशोर भी रहें।’

जोशी जी ने यह बात इस बात के बावजूद कही कि कीर्ति आजाद दिल्ली क्रिकेट क्लब के अध्यक्ष थे और जोशी जी के पुत्र वहां खेलने जाते थे। यानी उनके पुत्र का कैरियर कीर्ति आजाद के रुख पर निर्भर करता था।

कई महीने बाद जब हमारे सहकर्मी कुमार आनंद पटना आए तो उन्होंने आजाद जी से जोशी की मुलाकात का यह प्रकरण मुझे सुनाया। मैंने समझा कि शायद संकोचवश जोशी जी मुझे कोई निदेश नहीं दे रहे हैं। इसलिए मुझे ही पहल करके उनसे पूछना चाहिए कि अपने लेखन में भागवत झा आजाद के प्रति कैसा रुख अपनाऊं। मैंने जोशी जी को फोन किया और पूछा कि मुझे क्या करना चाहिए। प्रभाष जी ने छूटते ही कहा कि ‘यह तो आपको खुद तय करना है। आप स्थल पर हैं। आपको तय करना है कि क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए। आई कान्ट लेट डाउन माइ्र्र रिपोर्टर फाॅर माई फ्रंेड।’

उन्होंने बड़ी आसानी से यह बात कह दी, पर इसका कुपरिणाम हुआ उनके पुत्र के क्रिकेट कैरियर पर जिसे कीर्ति आजाद ने आगे नहीं बढ़ाया। कीर्ति आजाद ने राजनीति के लिए पिता धर्म निभाया। पर प्रभाष जोशी ने पत्रकारिता की खातिर पुत्र धर्म नहीं निभाया। क्या किसी अन्य संपादक पिता ने अपने पुत्र के कैरियर को अपने ही हाथों अपने पत्रकारिता धर्म के पालन के लिए नुकसान पहुंचाया होगा ? मुझे तो कोई दूसरा उदाहरण नहीं मालूम।

शायद आम लोग नहीं जानते कि एक संपादक के लिए अपने अच्छे बुरे कामों के लिए अपने किसी संवाददाता को अनुशासित कर लेना कितना आसान है ? कोई संवाददाता, अपने संपादक की इच्छा के विपरीत एक रपट भी नहीं लिख सकता है। पर जोशी जी ने मुझे हर कदम पर लेखन की मेरी स्वतंत्रता की रक्षा की। क्योंकि वे जानते थे कि मेरा सुरंेद्र किशोर गलती कर सकता है, पर बेईमानी नहीं कर सकता।

यही बात जोशी जी ने देवीलाल से हरियाणा भवन में अस्सी के दशक में कही थी जब लालू प्रसाद मेरे खिलाफ देवीलाल को उकसा रहे थे। प्रभाष जोशी ने देवीलाल जी से कहा था कि ‘आपका लालू यादव गलत हो सकता है, पर मेरा सुरेंद्र किशोर गलत नहीं हो सकता है।’ यह तब की बात है जब एक्सप्रेस अखबार समूह राजीव गांधी की सरकार से कठिन संघर्ष कर रहा था। राजीव सरकार पत्रकारिता की स्वतंत्रता के प्रतीक एक्सप्रेस समूह को ही बर्बाद कर देने पर तुली हुई थी। उस कठिन लड़ाई में देवीलाल और आर।के हेडगे जैसे मुख्यमंत्री एक्सप्रेस समूह के बचाव में थे।

इसी पष्ठभूमि में एक दिन प्रभाष जोशी हरियाणा भवन देवीलाल से मिलने गये थे। तभी बिहार विधान सभा में प्रतिपक्ष के नेता लालू प्रसाद भी वहां पहुंच गये। उसी दिन लालू प्रसाद के बारे में जनसत्ता में मेरी एक खबर छपी थी। उस खबर से लालू प्रसाद मुझ पर सख्त नाराज थे। खबर यह थी कि लोकदल विधायक दल के नेता पद से लालू प्रसाद को हटाने के लिए अधिकतर विधायकों ने एक स्मारपत्र पर दस्तखत कर दिया है जिसे लोकदल हाईकमान को सौंपा जाना है। ऐसी खबरंे नेताओं के बारे में छपती रहती हंै। कई मामलों में ऐसी खबर अपुष्ट तथ्यों के आधार पर भी होती है और बाद में गलत साबित होती है। पर कई बार सही भी रहती है। ऐसी किसी खबर को लेकर आम तौर पर कोई नेता किसी अखबार या फिर संवाददाता पर उतना नाराज नहीं होता जितना लालू प्रसाद नाराज थे।

उन्होंने देवीलाल से कहा कि ‘बाबू जी, जोशी जी आपके पास यहां आकर तो बात करते रहते हैं, पर उनके अखबार में मेरे बारे में गलत -सलत खबर छपती रहती हैं। इन्हें रोकिए। अपने खास समर्थक को गुस्से में देखकर देवीलाल भी आपे से बाहर हो गये। उन्होंने भी नहले से दहला मारते हुए कहा कि हां, भाई यह तो हमारे खिलाफ भी लिखता रहता है। जरा मंगाओ इसकी फाइल। एक व्यक्ति ने जनसत्ता की कटिंगें लाकर रख दी। देवीलाल जनसत्ता के गपशप कालम की खबरों से खास तौर से नाराज थे।

उन्होंने अपनी नाराजगी अपने खास हरियाणवी लहजे में जाहिर की। सब जानते हैं कि उनका लहजा कैसा होता था। जोशी जी एक्सप्रेस ग्रूप से देवीलाल की करीबी भी जानते थे। फिर भी उन्होंने जनसत्ता का बचाव करते हुए कहा कि मेरा संबंध आपसे अलग है और जनसत्ता में जो कुछ आपलोगों के बारे में छपता है, उसका इस संबंध से कोई मतलब नहीं है। वह सब गुणदोष के आधार पर छपता है और छपेगा। उसे मैं नहीं रोक सकता। यह सब कह कर जोशी जी हरियाणा भवन से निकल गये।

इस तरह जोशी जी ने अखबार की स्वतंत्रता की रक्षा की। इस बात के बावजूद जोशी जी ने देवीलाल को खुश नहीं किया कि उस समय देवीलाल एक्सप्रेस ग्रूप के बचाव में चट्टान की तरह खड़े थे। इस प्रकरण में एक और आशंका थी। देवीलाल-प्रभाष जोशी संवाद की सूचना मिलने पर रामनाथ गोयनका नाराज भी हो सकते थे। पर उसकी भी परवाह जोशी जी ने नहीं की। हरियाणा भवन के इस संवाद का विवरण बाद में सुनने के बाद जनसत्ता में काम करने का एक बार फिर मुझे गर्व हुआ।

आज मैं पत्रकारिता में जो कुछ भी हूं, उसमें जनसत्ता, एक्सप्रेस समूह और प्रभाष जोशी का सबसे बड़ा योगदान है। ऐसा महसूस करने वाले जनसत्ता के अनेक अन्य स्टाफ भी हैं।

बिहार में लालू प्रसाद और राबड़ी देवी के मुख्यमंत्रित्व काल के दौरान जनसत्ता और उसके संपादक प्रभाष जोशी की एक अन्य तरह की उदारता भी देखने को मिली। ऐसा नहीं कि मैंने लालू प्रसाद के पक्ष में कभी नहीं लिखा। जब तक लालू प्रसाद बिहार के आरक्षणविरोधियों से लड़ते रहे, मैं लगातार उनके पक्ष को पाठकों तक पहुंचाता रहा। मैं आरक्षण समर्थक रहा हूं। पर मुझे लालू समर्थक मान लिया गया। पर जब लालू -राबड़ी सरकार के घोटाले एक-एक करके बाहर आने लगे तो मैंने जनसत्ता में अपनी पुरानी भूमिका निभाई।

दूसरी ओर लालू प्रसाद धर्मनिरपेक्षता के नाम पर भाजपा और संघ परिवार के खिलाफ कुछ अधिक ही अभियान चलाते रहे हैं। प्रभाष जोशी उनके इस पक्ष के समर्थक रहे हैं। जोशी जी को लगता था कि देश की एकता-अखंडता के लिए भाजपा के खिलाफ देश भर में सक्रिय शक्तियों को उनका समर्थन मिलना चाहिए। पर जनसत्ता का संपादक रहते हुए जोशी जी ने मुझसे कभी नहीं कहा कि तुम लालू प्रसाद के खिलाफ इतना क्यों लिखते हो। कोई संपादक अपने संवाददाता को इतनी स्वतंत्रता देता हो, यह संभवतः जनसत्ता में ही संभव रहा है।

ऐसे अखबार से इस्तीफा देने का निर्णय मेरे लिए दुःखद निर्णय था। दरअसल मैं जनसत्ता में रहता तो 2005 में ही रिटायर हो जाता। तब तक मेरी एक भी पारिवारिक जिम्मेदारी पूरी नहीं हो पाई थी। मैंने मनमसोस कर अजय उपाध्याय का दैनिक हिंदुस्तान ज्वाइन करने का आॅफर स्वीकार कर लिया। यह 2001 की बात है। अजय उपाध्याय तब हिंदुस्तान के प्रधान संपादक थे। मैंने जब हिंदुस्तान ज्वाइन किया तो प्रमोद जोशी ने एक बात कही। उन्होंने कहा कि अरे सुरेंद्र जी, अजय जी ने आप पर कौन सा जादू कर दिया कि जनसत्ता छुड़वाने का जो काम राजेंद्र माथुर आपसे नहीं करा सके, वह काम हमारे संपादक ने कर दिया। उनसे मैं क्या कहता कि मेरी पारिवारिक जिम्मेदारियों ने ही मुझे यहां खींच लाया है। मेरा दिल अब भी जनसत्ता में ही बसता है। राजेंद्र माथुर ने कई बार कोशिश की थी कि मैं नभाटा ज्वाइन करूं। तब प्रमोद जी नभाटा में ही थे। वे इस बात को जानते थे।

आखिर जनसत्ता में ऐसा क्या रहा है कि कोई व्यक्ति कम पैसे में भी उसकी नौकरी स्वीकार करे ? इसका जवाब जनसत्ता व प्रभाष जोशी तथा उसके परिवर्ती संपादकों के व्यक्तित्व में खोजना होगा। हालांकि जनसत्ता और उसके पूरे परिवार का व्यक्तित्व गढ़ने में प्रभाष जोशी का ही तो हाथ रहा है।

(प्रभात खबर: 7 नवंबर 2009: से साभार)

रविवार, 11 अक्टूबर 2009

नेहरू परिवार बनाम शास्त्री परिवार

सरकार के आश्वासन के बावजूद लाल बहादुर शास्त्री की विधवा ललिता शास्त्री को इलाहाबाद में कोई भूखंड नहीं मिल सका। इलाहाबाद में ललिता शास्त्री की एक छोटे घर की आस भी पूरी नहीं हो सकी। यह आस लिए वे 1993 में वे सिधार गईं।
पर दूसरी ओर नेहरू -इंदिरा परिवार के सिर्फ एक सदस्य राहुल गांधी की घोषित संपत्ति की एक हल्की झलक देखिए। उन्होंने गत लोस चुनाव में नामांकन पत्र दाखिल करते समय यह विवरण पेश किया था। याद रहे कि यहां सोनिया गांधी और प्रियंका गांधी की घोषित संपत्ति का विवरण नहीं दिया जा रहा है न ही मेनका गांधी और वरुण गांधी की संपत्ति अभी यहां बताई जा रही है।
राहुल गांधी की नई दिल्ली के साकेत में एक माॅल मंे दो दुकानें हंै जिनकी कीमत क्रमशः एक करोड़ आठ लाख और 55 लाख 80 हजार रुपये हैं। फरीदाबाद में एक फार्म हाउस है जिसकी कीमत 18 लाख 22 हजार रुपये है। सुलतान गंज और मेहरौली में स्थित संपत्ति की कीमत 9 लाख 86 हजार रुपये है। इंदिरा गांधी फार्म हाउस में भी उनका हिस्सा है।
इसके अलावा भी उनके पास संपत्ति है। बीमा है, बचत है और आभूषण भी है। उनकी संपत्ति की एक झलक इस तथ्य से भी मिलती है कि उन्होंने गत वित्तीय वर्ष में करीब 11 लाख 20 हजार रुपये आयकर दिया। उन्होंने करीब 5 लाख 32 हजार रुपये सेवा कर और और 97,115 रुपये संपत्ति कर के रूप में जमा कराया।
नेहरू परिवार ने आजादी की लड़ाई के दौरान इलाहाबाद का अपना आनंद भवन जरूर कांग्रेस को दे दिया था। शास्त्री जी के पास ऐसा कुछ देने के लिए था ही नहीं। शास्त्री और नेहरू के बीच यह फर्क जरूर रहा। याद रहे कि करीब 62 साल की आजादी के बाद भी इस देश के 84 करोड़ लोगों की रोज की औसत आय मात्र बीस रुपये ही है। गत 62 साल में से कितने साल नेहरू-इंदिरा परिवार ने इस देश पर प्रत्यक्ष व परोक्ष रूप से शासन किया, इसकी गणना आप खुद कर लीजिए। आज यदि माओवादी देश के लिए सबसे बड़ा खतरा बन गए हैं तो विशेषज्ञों के अनुसार उसका सबसे बड़ा कारण गरीबी ही है।
दलित और राहुल
कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी इन दिनों दलित बस्तियों में जा रहे हैं। अपने आप में यह कोई गलत काम नहीं है। इस बात की कुछ लोग सराहना कर रहे हैं तो ठीक ही कर रहे हैं।
पर क्या दलितों के लिए इतना ही काफी है ? क्या यह सिर्फ प्रतीकवाद नहीं है ? इससे दलितों को अंततः क्या मिलने वाला है ? उनके जीवन में कितना फर्क आने वाला है ? बेहतर तो यह होता कि राहुल गांधी दलितों के यहां खुद पहंुच जाने से पहले उनके यहां वे सरकारी धन भिजवाने का समुचित प्रबंध करवाते जो धन बिचैलिये खा जाते हैं।
उनके पिता राजीव गांधी ने सन् 1984 में ही कहा था कि दिल्ली से गरीबों के लिए जो सौ पैसे चलते हैं, उनमें से 15 पैसे ही उन तक पहुंच पाते हैं। यानी बाकी के 85 पैसे बिचैलिये ही खा जाते हैं। वे बिचैलिये कौन हैं, यह बात सब जानते हैं। राहुल गांधी भी आज 25 साल बाद यही बात दुहराते फिर रहे हैं। पर सिर्फ कहने से क्या होगा ? ऐसी स्थिति को कौन बदलेगा ? राहुल गांधी चाहें तो इस दिशा में कुछ ठोस कदम उठाए जा सकते हैं जिस तरह उन्होंने बुंदेलखंड के लिए हाल में सफल पहल की है।
राहुल और बुंदेलखंड
बुंदेलखंड की गरीबी से पसीज कर राहुल गांधी ने 28 जुलाई, 2009 को प्रधानमंत्री मनमोेहन सिंह से भेंट की। मनमोहन सिंह पहले ही सार्वजनिक रूप से यह कह चुके हैं कि ‘राहुल गांधी देश के भविष्य हैं।’ फिर क्या था, इस मुलाकात के दो महीने के भीतर ही केंद्र सरकार ने बुंदेलखंड में 4000 मेगावाट के पावर प्लांट लगाने की योजना को मंजूरी दे दी। बुंदेलखंड विकास प्राधिकार का गठन किया जा रहा है और वहां के विकास के लिए हजारों करोड़ रुपये खर्च करने की योजना बन रही है। इस से यह साबित होता है कि राहुल गांधी की केंद्र सरकार पर कितनी अधिक पकड़ है और वे चाहें तो और भी अनेक ऐसे काम हो सकते हैं। पर सवाल है कि क्या राहुल गांधी को देश की मूल समस्या की समझ भी है ? क्या वे अब तक यह बात समझ पाए हैं कि मूल समस्या भीषण सरकारी भ्रष्टाचार ही है ?
याद रहे कि हाल के लोकसभा चुनाव में चुनाव प्रचार के लिए कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व ने उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी को जो भारी धनराशि भेजी थी, उसमें से तीन करोड़ रुपये का कोई हिसाब ही नहीं मिल रहा है। इस आरोप में राज्य कांग्रेस के कोषाध्यक्ष दीपक गुप्त को उनके पद से हटा दिया गया है। हालांकि वे खुद को निर्दोष बता रहे हैं। इस घोटाले से भी राहुल की आंखें खुलनी चाहिए। अब सवाल है कि जो पैसे बुंदेलखंड के विकास के लिए दिल्ली से जाएंगे, उनमें से कितने पैसे अफसर, ठेकेदार और नेतागण गरीब जनता के लाभ के लिए खर्च होने देंगे ? वे पैसे वास्तव में गरीबों के विकास व कल्याण पर ही खर्च हांे, पहले तो ऐसी व्यवस्था करनी चाहिए। उसके बाद ही राहुल गांधी या किसी अन्य नेता को दलितों केा अपना मुंह दिखाने उनके घर जाना चाहिए।
भ्रष्टाचार पर गौर करें राहुल
गरीब जनता तक सौ में से 15 पैसे ही इसलिए पहुंच पा रहे हैं क्योंकि पूरे देश में फैली उच्चस्तरीय ब्यूरोक्रेसी का अधिकांश भी अब भ्रष्ट हो चुका है। हिंदी प्रदेशों की हालत इस मामले में और भी खराब है। अधिकतर राजनीतिक कार्यपालिकाएं तो पहले से ही भ्रष्ट हो चुकी हंै। चूंकि बड़े भ्रष्ट सरकारी अफसरों को सजा देने की प्रक्रिया काफी जटिल बना कर रखी गई है, इसलिए उनका अंततः आम तौर पर कुछ नहीं बिगड़ता। इसलिए वे एक कांड में रिश्वत लेते पकड़े जाने के बावजूद जल्दी ही येन केन प्रकारेण कानून की गिरत फ्त से छूट जाते हैं और दुबारा जनता के धन की लूटपाट में कुछ नेताओं से मिलकर वीरप्पन की तरह लग जाते हैं।
यदि ऐसे भ्रष्ट अफसरों के खिलाफ दर्ज भ्रष्टाचार के मामलों की त्वरित अदालतों के जरिए सुनवाई हो और सुनवाई के दौरान उनकी भ्रष्टाचार से कमाई गई भारी निजी संपत्ति त्त को जब्त करने का कानूनी प्रावधान हो जाए तो वे लूट नहीं पाएंगे। और फिर गरीबों, पिछड़ों, दलितों व अन्य जरूरतमंद लोगों के पास सौ में से पंद्रह की जगह 85 पैसे पहुंच सकेंगे। यदि उसके बाद ही राहुल गंांधी दलितों की बस्ती में जाएंगे तो वे उनके चेहरों पर वास्तविक खुशी देखेंगे।
बिहार विधान मंडल ने भ्रष्ट लोक सेवकों की संपत्ति जब्त करने और उनके मामलों की सुनवाई त्वरित अदालतों के जरिए करवाने के लिए एक विधेयक मार्च में ही पास करके राष्ट्रपति की मंजूरी के लिए केंद्र सरकार को भिजवा दिया है। पर लगता है कि भ्रष्ट लोग उस पर राष्ट्रपति की मंजूरी नहींे लेने दे रहे हैं। बुंदेलखंड की तरह राहुल गांधी अपने प्रभाव का उपयोग करके पहले तो बिहार विधेयक को मंजूरी दिलवाएं और बाद में ऐसा ही कानून पूरे देश के लिए बनवाएं तो दलितों तक पैसे जरूर पहुंच जाएंगे। अन्यथा एक तरफ राहुल दलित की झोपड़ी से निकलेंगे और दूसरी ओर माओवादी उस झोपड़ी में जाकर अपनी जगह बना लेंगे।
भ्रष्टाचार पर उपन्यास
भ्रष्टाचार की समस्या पर रमेश चंद्र सिन्हा का उपन्यास आया है जिसमें कुछ जगबीती है तो कुछ आपबीती हैं। उपन्यास का नाम है ‘अभय कथा।’ जिस समस्या से यह देश व प्रदेश सर्वाधिक पीड़ित रहा है, उस पर कोई उपन्यास आए तो वह स्वागतयोग्य है। अब तो भ्रष्टाचार पर चर्चा भी करने वालों का, भ्रष्टाचार में आकंठ डूबा प्रभु वर्ग, आज मजाक ही उड़ाता है।
‘अभय कथा’ के लेखक ने आजादी से पहले और उसके बाद के भारतीय समाज में घटित बदलावों का तलस्पर्शी अध्ययन प्रस्तुत किया है। उपन्यास में भ्रष्टाचार के विविध आयामों को गहराई से देखने- परखने की कोशिश की गई है। लेखक पटना विश्वविद्यालय के अंग्रेजी प्रोफेसर रह चुके हैं।
और अंत में
बार -बार इस देश में एक सवाल पूछा जाता है कि चीन कैसे आगे बढ़ गया और हमारा देश क्यों पीछे रह गया ? इसका एकमात्र सही जवाब यही है कि चीन ने सरकारी खजाने के लुटेरों के लिए फांसी का प्रावधान किया और दूसरी ओर हमारे देश में जिस नेता या अफसर ने जितना अधिक सार्वजनिक धन लूटा, वह उतने ही अधिक ऊंचे पद पर पहुंचने के लायक समझा गया।
साभार प्रभात खबर

सोमवार, 5 अक्टूबर 2009

ऐसे विफल कर दी गई एक गांधीवादी की भूमि सुधार योजना

जय प्रकाश नारायण का सपना था कि कोशी क्षेत्र में माॅडल भूमि सुधार कार्यक्रम चलाया जाए। यह सन 1978 की बात है। तब कर्पूरी ठाकुर की सरकार थी। स्वाभाविक ही था कि कर्पूरी ठाकुर इस काम के लिए तत्काल राजी हो जाएं। इस काम के लिए गांधी शांति प्रतिष्ठान से गांधीवादी बी।जी. वर्गीस पटना आये थे।

इस भूमि सुधार कार्यक्रम के तहत भूमि समस्याग्रस्त पूर्णिया जिले के पांच प्रखंडों में भूमि के रिकाॅर्ड को अद्यतन करना था। हदबंदी से फालतू घोषित जमीन का अधिग्रहण व भूमिहीनों में उनका वितरण करना था। साथ ही बटाईदारों के अधिकारों को स्वीकृति दिलानी थी। फिर उन चुने हुए पांच प्रखंडों के सर्वांगीण विकास का काम करना था। इसका नाम दिया गया कोशी क्रांति योजना।

इस महत्वाकांक्षी योजना के लिए जेपी की सलाह पर बिहार सरकार ने तत्काल अलग से एक सरकारी कोषांग का गठन भी कर दिया और उसमें एक उपायुक्त व कई स्तरों के 119 अन्य लोक सेवक तैनात कर दिये गये। पर जैसे ही बनमनखी, भवानीपुर, बरहरा कोठी, धमदाहा और रुपौली में इस काम की शुरुआत करने की प्रक्रिया शुरू हुई कि भूस्वामियों और सामंती प्रवत्ति के लोगों व उनके संरक्षक नेताओं ने तगड़ा विरोध शुरू कर दिया। उस इलाके के सत्ताधारी जनता पार्टी के अनेक दबंग जन प्रतिनिधियों ने कर्पूरी सरकार के खिलाफ हल्ला बोल दिया। पटना में भी गोलबंदी शुरू हो गई। कर्पूरी सरकार के गिरने की नौबत आ गई। कर्पूरी ठाकुर दबाव में आ गए। जेपी मन मसोस कर रह गये। और बी।जी. वर्गीस अपनी आंखों में आंसू लिए दिल्ली लौट गये। कोशी क्रांति योजना निष्क्रिय हो गई।

भूमिपतियों का दबाव इतना बढ़ा कि इस संबंध में वर्गीस ने जो लम्बा लेख लिखा था, उसकी एक ही किस्त एक अखबार में छप सकी। दूसरी किस्त छापने की हिम्मत उस अखबार ने भी नहीं की। इस प्रकरण ने यह बात साबित कर दी कि बिहार में भूमि संबंधों को बदलने का मुद्दा कितना नाजुक है और यह काम कितना कठिन है।

अब उस कोशी क्रांति योजना के बारे में प्रेस ट्रस्ट आॅफ इंडिया द्वारा 2 अप्रैल, 1981 को जारी एक खबर का एक हिस्सा पढ़िए, ‘पूर्णिया, 2 अप्रैल (प्रे)। पूर्णिया जिले के पांच प्रखंडों में तीन वर्ष पूर्व शुरू की गई कोशी क्रांति योजना भूस्वामियों और भूमिहीनों के बीच सीधा टकराव उत्पन्न कर अपने ही भार से दबी जा रही है।

यहां अधिकारियों ने स्वीकार किया कि इस योजना की सफलता की उम्मीद नगण्य है। क्योंकि राजनीतिक संरक्षणप्राप्त कुछ भूस्वामी इस योजना के प्रत्येक स्तर पर अवरोध उत्पन्न कर रहे हैं। स्थानीय नेताओं ने चेतावनी दी है कि यदि भूमि सुधार के काम बंद नहीं किए गए तो परसबिगहा कांड की पुनरावत्ति हो सकती है। याद रहे कि मध्य बिहार के परसबिगहा में एक जमीन विवाद के चलते कई लोगों को उनके घर में बाहर से बंद कर उन्हें जिंदा जला दिया गया था।

प्रेस ट्रस्ट के अनुसार गांधी शांति प्रतिष्ठान के श्री बीजी।वर्गीस की कोशी क्रांति योजना को तत्कालीन जनता पार्टी सरकार ने 1978 में पूर्णिया जिले में माडल भूमि सुधार कार्यक्रम के रूप में शुरू किया था। भूमि सुधार के उपायुक्त के अनुसार दोषपूर्ण भूमि पद्धति और उपज में हिस्सा बंटाने की शोषणात्मक प्रवृत्ति आदि को देखते हुए इस योजना की आवश्यकता महसूस की गई थी। एक अधिकारी के अनुसार दो वर्षों में कार्य का केवल पहला भाग ही पूरा किया जा सका। अधिकारी ने प्रेस ट्रस्ट से बातचीत में यह स्वीकार किया कि इस गति से समस्या के समाधान में एक दशक लग जाएगा। आधिकारिक सूत्रों के अनुसार पूर्णिया जिले में लगभग 10 हजार ऐसे भूस्वामी हैं जिनके पास एक सौ एकड़ से अधिक भूमि है। इस क्षेत्र की भूमि समस्या 50 साल पुरानी है। उस समय यह पूरा क्षेत्र घना जंगल था।’

कोशी क्रांति योजना ही नहीं, बाद के वर्षों में भी जब -जब भूमि सुधार की कोशिश हुई, भूस्वामियों ने तगड़ा विरोध कर दिया। दरअसल रोजगार के अन्य साधन विकसित नहीं होने के कारण भी भूस्वामी अपनी जमीन के प्रति अधिक संवेदनशील हो गए हैं और वे अपनी जमीन पर उनके स्वामित्व के मामले में किसी तरह के हल्के खतरे का भी पूरी जी-जान से विरोध कर देते हैं। आजादी के बाद राज्य का आम विकास हुआ होता तो जमीन मोह कम होता। पर सरकारी भ्रष्टाचार के कारण विकास नहीं हुआ।

इसी तरह 1992 में जब तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद ने भूमि सुधार खास कर बंटाईदार कानून को सख्त करने की कोशिश की तो उनके ही वोट बैंक के तबके से भी इसका तगड़ा विरोध हो गया। भारी दबाव के बीच तब ही लालू प्रसाद ने कह दिया था कि मैं बर्र के छत्ते में हाथ नहीं डालूंगा। भ्ूमि सुधार के प्रति अपनी 1992 की नीति पर लालू प्रसाद तब तक कायम रहे जबतक वे और राबड़ी देवी सत्ता में थे।

(प्रभात खबर: 2 अक्तूबर, 2009 से साभार)

शनिवार, 26 सितंबर 2009

कैसे बदला तीन ही महीने में मतदाताओं का मूड !

मात्र तीन महीने में ही बिहार की राजनीति में क्या कुछ घट गया कि मतदाताओं का मूड ही बदल गया ? क्यों बिहार विधानसभा के इस सितंबर के उप चुनाव में 18 सीटों में से 13 सीटों पर राजग हार गया ? क्या यह बदला हुआ मूड एक बार फिर बदलेगा या यह मूड अगले साल तक कायम रहेगा ? हाल के ही लोक सभा चुनाव में बड़े बहुमत से बिहार में चुनाव जीतने वाला एन।डी.ए. बिहार विधान सभा के उपचुनावों में क्यों बुरी तरह पराजित होे गया ? क्या अगले साल होने बिहार विधान सभा के आम चुनाव में मतदाताओं का यही मूड कायम रहेगा या फिर बदलेगा ? तीन ही महीने में यह बदला हुआ मूड स्थानीय व तात्कालिक कारणों से बदला है या इसका स्थायी भाव है ?

ये कुछ सवाल हैं जिनके ठोस जवाब आने वाले दिनों में तलाशे जाएंगे और आएंगे भी। पर फिलहाल सरसरी तौर पर देखने से दो बातें सामने आती हैं। ये बातें लोक सभा चुनाव के बाद ही घटित हुई हैं। एक तो नीतीश कुमार के नेतृत्व वाले बिहार राजग ने यह तय किया कि इस बार भी किसी नेता के परिजन को वह टिकट नहीं देगा। और नहीं दिया भी। इस अभियान के पीछे नीतीश कुमार की मुख्य भूमिका थी। पर इस काम में जदयू अध्यक्ष शरद यादव ने भी उनका दिल से समर्थन किया। इससे लोहियावादी समाजवादियों की छवि सुधरी। नीतीश कुमार की इस पहल की देश भर में सराहना हुई। नीतीश कुमार ने ऐसे समय में यह काम किया जबकि भाजपा भी परिवारवाद की कीचड़ में बुरी तरह धंसती जा रही है। जदयू के इस कदम को देश व प्रदेश की राजनीति के सुधारीकरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना गया। कम्युनिस्ट पार्टियों के अलावा जदयू ही देश में अब एक ऐसा प्रमुख दल है जिसमें परिवारवाद नहीं है।

पर खुद राजग यानी एन।डी.ए. के परिवारवादी नेताओं ने इसे अपने राजनीतिक भविष्य के लिए ‘घातक’ माना। जदयू सांसद पूर्णमासी राम और जदयू डा. जगदीश शर्मा ने इसपर विद्रोह भी कर दिया। इन दोनों के परिजन उम्मीदवार बने। डा.शर्मा की पत्नी जीत गई, पर पूर्णमासी राम के पुत्र हार गये।

पर यह मामला सिर्फ इन दो नेताओं को ही प्रभावित नहीं करता है। बल्कि बिहार राजग के उन अनेक नेताओं को भी प्रभावित करता हैं जो अपने परिजन के लिए भविष्य में राजग से विधायिका के टिकट व मंत्री पद चाहते हैं। कई लोगों को परिवारवाद के आधार पर पहले भी टिकट मिलते भी रहे हैं। पर अब मिलने बंद हो गये। पूरी तरह बंद हो गये। जाहिर है कि ऐसे लोग यह चाहेंगे कि नीतीश कुमार का यह परिवारवाद विरोधी अभियान फेल हो जाए। इनमें से संभव है कि कुछ लोग इस प्रयोग को फेल करने के लिए इन उप चुनावों में सक्रिय भी हुए होंगे। कुछ नेता लोग निष्क्रिय रहे होेंगे। पर राजग के कुछ लोगों की इस उप चुनाव में निष्क्रियता का भी विपरीत असर राजग उम्मीदवारों पर पड़ा होगा तो यह स्वाभाविक ही है। जहां चुनावी मुकाबला कड़ा हो वहां थोड़ा कम प्रभाव डालने वाला चुनावी तत्व भी मतदान में निर्णायक हो जाता है। इस बार हुआ भी।

सवाल उन परिवारवादी नेताओं के राजनीतिक पारिवारिक कैरियर का जो है। इसी पारिवारिक राजनीतिक कैरियर को कायम रखने के लिए तो जदयू सांसद पूर्णमासी राम ने अपने पुत्र को राजद से बगहा में उम्मीदवार बनवा दिया था। उन्होंने पहले ही कह दिया था कि मेरा पुत्र कह रहा है कि उसे उम्मीदवार नहीं बनाया जाएगा तो वह जहर खा लेगा।

राजनीति में परिवारवाद के खात्मे का काम राजनीतिक सुधार का आज मौलिक काम हो चुका है। यह सती प्रथा व बलि प्रथा की कानूनी समाप्ति से भी अधिक कठिन काम लगता है। सुधार के काम करने वाले सुधारकगण इस दुनिया में कई बार गोलियां भी खाते रहे हैं। यहां तो मात्र गद्दी जाने का खतरा नीतीश कुमार के सामने है। पर ऐसे ही सुधारक लोग इतिहास पुरूष हुआ करते हैं। अब भला बताइए कि परिवारवाद के आधार पर ही हर जगह टिकट मिलने लगे तो वाजिब राजनीतिक कार्यकर्ताओं की बलि हुई या नहीं ? किसी चुनावी सीट को किसी राजनीतिक परिवार के साथ सती क्यों हो जाने दिया जाना चाहिए ? यह लोकतंत्र है या राजतंत्र ? अब यह नीतीश कुमार पर निर्भर करता है कि वे अगले किसी चुनाव में ‘इस सुधार कार्यक्रम की गलती को सुधार कर’ अपनी गद्दी बचाने की कोशिश करते हैं या फिर इतिहास में अपना गौरवशाली नाम को दर्ज करा देना चाहते हैं। याद रहे कि पूरे देश की राजनीति में इन दिनों परिवारवाद की बुराई इतनी व्यापक और गंभीर होती जा रही है कि इसके खिलाफ भारी विद्रोह एक न एक दिन होना ही होना है। यदि आज नीतीश कुमार अपने कदम पीछे कर लेंगे तो कोई अन्य सुधारक इसका श्रेय ले लेगा। आज नहीं तो कल यह होने ही वाला है। इसलिए सवाल यह बनता जा रहा है कि एक नेता के बेटा, बेटी या पत्नी को टिकट मिलेगा तो कोई दूसरा नेता इससे वंचित क्यों होना चाहेगा ? इस तरह इस बुराई की श्रृखंला पूरी राजनीति को निगल लेगी।

जिस तरह करोड़पतियों व अरबपतियों का इस देश की संसद पर कब्जा होता जा रहा है। अभी इस साल 543 में से 360 करोड़पति लोक सभा सदस्य चुने गये। इस गरीब देश में यह भी एक खतरनाक बुराई है जिससे किसी व्यक्ति या संगठन को एक दिन लड़ना ही है। क्यांेकि जिस देश में 84 करोड़ लोगों की रोज की औसत आय मात्र बीस रुपये है उस देश की संसद पर सिर्फ करोड़पतियों का ही कब्जा कैसे होने दिया सकता है ? यदि होगा तो उस सरकार के मंत्री कैबिनेट की बैठक में इस बात को लेकर झगड़ा करते रहेंगे कि उन्हें ऐसे होटल में रहने दिया जाए जिस के एक कमरे का एक रात का किराया एक लाख रुपये ही क्यों न हो।

यह बहुत अच्छी बात है कि ताजा उप चुनाव में झटके खाने के बावजूद शरद यादव व नीतीश कुमार ने कह दिया है कि वे परिवारवाद का विरोध जारी रखेंगे। जाहिर है कि शरद-नीतीश के इस ऐतिहासिक कदम से डा। राम मनोहर लोहिया की आत्मा को शांति मिल रही होगी। शायद यह कदम आगे कभी इस देश के लिए निदेशक भी साबित हो !

कारण और भी हो सकते हैं, पर विधान सभा उप चुनावों में राजग की हार का एक दूसरा तात्कालिक कारण यह समझ में आता है कि राज्य सरकार के राजस्व व भूमि सुधार विभाग के सूत्रों के हवाले से अखबारों में इस जुलाई में ही यह खबर छप गई थी कि राज्य सरकार बटाईदारी कानून में सुधार सहित भूमि सुधार आयोग की कुछ सिफारिशों को जल्दी ही लागू करेगी। इस खबर के मीडिया में आते ही राज्य भर में छोटे -बड़े किसानों में खलबली मच गई। उन किसानों में से अनेक लोग राजग के ठोस मतदाता रहे हैं। आशंकित बटाईदारी कानून से नाराज होने वालों में हर जाति के किसान हैं जिनके पास बंटाई पर देने के लिए जमीन है। राज्य सरकार को अपनी ‘गलती’ का एहसास हुआ। इसके बाद राज्य सरकार ने 5 अगस्त 2009 को यह घोषणा कर दी कि अभी पुराने ही सीलिंग व बटाईदारी कानून लागू रहेंगे। उनमें कोई बदलाव नहीं होगा। राज्य सरकार ने यह भी कहा कि बंदोपाध्याय आयोग की रपट समग्रता में नहीं है। इसलिए उसे लागू नहीं किया जाएगा। पर राज्य सरकार की इस सफाई पर अनेक किसानों ने भरोसा नहीं किया।

जहां उप चुनाव हुए,उनमें एक चुनाव क्षेत्र फुलवारी शरीफ के एक सवर्ण बहुल गांव के एक किसान ने मतदान के दिन ही यानी 15 सितंबर, 2009 को ही इन पंक्तियों के लेखक को बताया कि रामाश्रय प्रसाद सिंह (बिहार सरकार के मंत्री) की इज्जत रखने के लिए कुछ मतदाताओं ने जरूर जदयू को वोट दे दिया अन्यथा हमारा पूरा गांव बटाईदारी कानून लागू होने की आशंका से पीड़ित होकर राजग से नाराज हो गया है। इस गांव के अधिकतर वोट इस बार कांग्रेसी उमीदवार को पड़े। ऐसी ही खबर सारण जिले के एक राजपूत बहुल गांव से भी मिली थी जिस गांव के किसान बटाईदारी कानून नहीं चाहते। हालांकि यह आशंका सिर्फ इन दो गांवों व जातियों मंे ही नहीं है।

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने हाल में एक अन्य संदर्भ में कहा था कि मैं कई तरह की बीमारियों का इलाज करने के लिए मुख्यमंत्री बना हूं। वैसे भी उन्होंने अब तक अनेक ऐसे सराहनीय व ऐतिहासिक काम किए हैं जिनकी तारीफ उनके कुछ राजनीतिक प्रतिद्धंद्धी दलों ने भी समय -समय पर की। उनके कई कामों को अन्य राज्यों ने बाद में अपने यहां भी किया। पर हाल के उनके कुछ कदमों के नतीजों से ऐसा लगा कि सारी बुराइयों से एक साथ नहीं लड़ा जा सकता। बिहार में तो बिलकुल ही नहीं जहां के प्रशासन व राजनीति को हाल के कुछ दशकों में नेताओं ने बिगाड़ कर रख दिया। क्योंकि कई बुराइयों की काई तो इतनी गहरी बैठ चुकी है कि उन्हें छुड़ाना यहां एक बड़ा दुरूह काम है। बटाईदारी की समस्या भी ऐसी एक समस्या है जिसे हाथ लगा कर लालू प्रसाद जैसे महाबली भी पीछे हट गये थे। सन् 1992 में कुछ वामपंथी दलों व बुद्धिजीवियों ने तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद को सलाह दी कि वे भूमि सुधार लागू कर दें। लालू प्रसाद ने फरवरी, 1992 में यह घोषणा कर दी कि उनकी सरकार भूहदबंदी की सीमा घटाएगी और बटाईदारी कानून में संशोधन करके बटाईदारों को उनका वाजिब हक दिलाएगी। इसके लिए कानून में संशोधन का प्रारूप तैयार करने के लिए अफसरों की टीम को यह काम सौंप दिया गया है। लालू प्रसाद ने सार्वजनिक रूप से यह भी कह दिया था कि मेरी सरकार यह भी चाहती है कि कोई एक व्यक्ति नौकरी, व्यापार व खेती तीनों पर एक साथ काबिज नहीं हो। उसके पास इनमें से एक ही रोजगार रहे।

पर इस घोषणा का सबसे कड़ा विरोध तत्कालीन निर्दल विधायक राजेश रंजन उर्फ पप्पू यादव ने किया। बाद में चर्चित पप्पू यादव सांसद भी बने थे। तब उन्होंने जेल से जारी बयान में कहा कि राज्य सरकार छोटे किसानों की जमीन बटाईदारों व खेतिहर मजदूरों में बांटना चाहती है। मैं तो कहूंगा कि पहले अट्टालिकाओं में रहने वाले उद्योगपतियों की संपत्ति बंटे। पप्पू यादव की आवाज एक खास दबंग पिछड़ी जाति यानी यादव की आवाज मानी गई जो जाति लालू प्रसाद का मजबूत वोट बैंक माना जाती है।

बाद में इस तरह राज्य में व्याप्त लालू के अनेक वोटरों में भारी असंतोष को देखते हुए लालू प्रसाद ने अपनी घोषणा वापस ले ली। जब उनकी समर्थक पार्टी सी।पी.आई.ने इस बारे में उनसे पूछा तो लालू प्रसाद ने कहा कि हम बंटाईदारी कानून लागू करके बर्रे के छत्ते में हाथ नहीं डालना चाहते हैं।

वैसे भी लालू प्रसाद-राबड़ी देवी के 15 साल के कार्यकाल में भूमि संबंधों में सरकारी प्रयासों से कोई खास बदलाव नहीं आया। अब जब नीतीश सरकार ने इस पर कुछ कहा तो कई राजग समर्थकों को लालू प्रसाद ही बेहतर लगने लग रहे हैं।

दरअसल व्यावहारिक राजनीति करने वाले कुछ लोग कह रहे हैं कि बंटाईदारी जैसे विवादास्पद मामलों में हाथ डालने के बदले नीतीश सरकार को चाहिए कि वे गांवों के विकास की गति को और तेज करें। बिजली, पानी और सड़क की बेहतर व्यवस्था की अपनी कोशिश को और तेज करें। कृषि आधारित उद्योग गांवों में लगें। जब कुछ अन्य विकसित राज्यों की तरह छोटे -बड़े किसानों की माली हालत इस राज्य में भी सुधरेगी तो वे बटाईदारों की स्थिति सुधारने में सरकार का सहयोग करेंगे। कुल मिलाकर यही कहा जा सकता है कि होम करते हाथ जलाने से बेहतर है कि होम की ज्वाला को अधिक तेज नहंीं होने दिया जाए। पुराने माॅडल की जर्जर एम्बसेडर कार की गति को अचानक अधिक बढ़ा देने के अपने खतरे हैं। हालांकि नीतीश कुमार कह रहे हैं कि बंटाईदारी कानून तो बिहार में पहले से ही है। इसमें संशोधन करने का अभी हमने कोई फैसला ही नहीं किया है।दरअसल पूरे मामले में गलतफहमी फैल गई।कौआ कान ले गया, यह चर्चा इस बात को देखे बिना हो गई कि कान अपनी जगह पर है भी या नहीं।

( 20 सितंबर, 2009)

बटाईदारी विवाद व उप चुनाव

अपनी जमीन बटाई पर देकर खेती कराने वालों की ताजा नाराजगी के समक्ष लगता है कि नीतीश सरकार सहम सी गई है।इस नाराजगी ने तो हाल के बिहार विधान सभा उप चुनावों में राजग को बड़ा झटका दे दिया है। आगे के लिए भी खतरा मौजूद है। जानकार सूत्र बताते हैं कि किसानों की इस नाराजगी को जल्द से जल्द दूर करने के उपाय भी बिहार सरकार द्वारा खोजे जा हैं। पर इस सिलसिले में इस बात का भी ध्यान रखा जा रहा है कि एक नाराजगी को दूर करने के क्रम में दूसरी नाराजगी न पैदा हो जाए। यानी बटाईदार उधर नाराज न हो जाएं। उनकी खेती भी चलती रहे और कुल मिलाकर राज्य का कृषि उत्पादन भी बढ़े।

ऐसा कोई रास्ता नीतीश कुमार जैसे कल्पनाशील नेता के लिए खोज लेना कोई कठिन काम भी नहीं है। जल्दी ही इस संबंध में कोई ठोस सरकारी फैसला सामने आ सकता है।


जमीन वाले नाराज क्यों ?
कई जमीन वाले आखिर राजग सरकार से नाराज क्यों हुए? नाराजगी का मुख्य कारण जमीन से बेदखली का खतरा रहा। यह खतरा गत जुलाई में प्रकाशित एक अपुष्ट खबर के कारण पैदा हुआ था। खबर यह थी कि बिहार सरकार बटाईदारी कानून में इस तरह संशोधन करने जा रही है जिससे जमीन वालों का उनकी उस जमीन पर हक ही नहीं रहेगा जो जमीन वे बटाईदार को जोतने के लिए देंगे। कई लोगों के मन में इस बात का खतरा अब भी है। पर धीरे -धीरे वह कम होता जा रहा है। इस आशंका को पूरी तरह निर्मूल करने के लिए बिहार की राजग सरकार अत्यंत सक्रिय हो गई है।

हालांकि बिहार सरकार ने गत अगस्त में ही यह कह दिया था कि वह बटाईदारी कानून में ऐसा कोई संशोघन नहीं करने जा रही है जिससे जमीन वाले अपनी जमीन को लेकर कोई असुरक्षा महसूस करें।पर जमीन वाले अभी पूरी तरह निश्चिंत नहीं हो पाए हैं। इस नाराजगी को बातों व बयानों के बदले अब किसी ठोस प्रशासनिक कदम से ही दूर करना होगा। जानकार लोग बताते हैं कि नीतीश कुमार इसी ठोस कदम की ओर आगे बढ़ रहे हैं।


बटाईदारी का 12 साला बंधन
यह बात कम ही लोग जानते हैं कि मौजूदा बटाईदारी कानून में भी एक बारह साला प्रावधान है। वह प्रावधान भी जमीन वालों के लिए सुखद नहीं है। प्रावधान यह है कि यदि किसी बटाईदार के पास किसी जमीन वाले का कोई भूखंड लगातार बारह साल तब बटाई में रह जाए तो उस जमीन पर उस बटाईदार का कानूनी हक हो जाता है।

पता चला है कि नीतीश सरकार इस बारह साला प्रावधान को समाप्त करने की जरूरत पर गंभीरता से विचार कर रही है। इस प्रावधान की समाप्ति से जमीन वालों में निश्चिंतता का भाव पैदा होगा। उन्हें यह लगेगा कि उनकी जमीन कहीं नहीं जाएगी। बटाई पर देने के बावजूद उस जमीन के मालिक वही रहेंगे जो पहले से मालिक हैं। फिर जमीन मालिक किसी बटाईदार को एक साल या तीन साल के आपसी निजी समझौते के आधार पर जमीन बटाई पर दे सकते हैं। इस समझौते के आधार पर राज्य सरकार उस बटाईदार को सरकारी मदद देगी ताकि वह बेहतर ढंग से खेती करके उपज को और भी बढ़ा सके। उपज बढ़ेगी तभी उस जमीन वालों को मिलने वाला लाभ भी बढ़ेगा।यह द्विपक्षीय समझौता किसी तरह के कानूनी दावे का आधार नहीं बनेगा। समझौते की अवधि पूरी होते ही जमीन वाले अगली बार किसी अन्य बटाईदार को जोतने के लिए अपनी जमीन दे सकते हैं।

ये कुछ उपाय डैमेज कंट्रोल उपाय माने जा रहे हैं जिन पर राज्य सरकार सोच विचार कर रही है। अंततः क्या उभर कर सामने आता है, यह आने वाला समय बताएगा। पर ध्यान इसी बात का रखा जा रहा है जमीन वाले और बटाईदार में से किसी के हक को क्षति नहीं पहंचे और साथ ही राज्य का कृषि उत्पादन भी बढ़े। जमीन बटाईदारों को जोतने के लिए देने वालों में अब सिर्फ बड़े किसान ही नहीं हैं।एक दो एकड़ जमीन वालों को भी बटाई पर अपनी जमीन दे देनी पड़ रही है। यानी बटाई पर जमीन देने और लेने वालों दोनों की संख्या काफी है।


लालू प्रसाद का कदम सराहनीय
गत उप चुनाव में सफलता पाने के बाद लालू प्रसाद ने एक अच्छी बात कही है। उन्होंने जनता से अपील की है कि वह राजद शासन काल के दौरान उनके कार्यकर्ताओं की गलतियों को माफ कर दे। उन्होंने कार्यकर्ताओं को अपनी जुबान पर लगाम लगाने की भी नसीहत दी।

लालू प्रसाद के कद का कोई बड़ा नेता अपने दल की गलती को सार्वजनिक रूप से स्वीकार करे और उसके लिए जनता से माफी मांगे, यह लोकतंत्र के लिए अच्छी बात है। कम ही नेता इस तरह अपनी गलती मानते हैं। इससे पहले कई बार चुनाव हारने के बाद भले लालू जी ने अपनी, सरकार व अपने कार्यकर्ताओं की गलती का बयान किया था, पर इस बार उन्होंने जीतने के बाद गलती मानी है। यह और भी अच्छी बात है।

पर इससे पहले तो लालू जी कई बार अपनी बात पर कायम नहीं रह सके थे। इसका कारण जो भी रहा हो। संभव है कि उसके लिए वे खुद जिम्मेदार नहीं हों।देखना है कि वे इस बार अपने कार्यकर्ताओं को संयमित करने की अपनी बात पर कायम रह पाते हैं या नहीं। कायम रहेंगे तो उनकी ही राजनीतिक सेहत के लिए अच्छा होगा।

सन् 1990 में मंडल आंदोलन की लहर पर सवार होकर लालू प्रसाद राजनीति के महाबली बने थे। वे जिन करोड़ों लोगों के मसीहा बने थे, वे गरीब व पीड़ित लोग ही थे। वे गरीब लोग अपनी उदंडता के लिए नहीं जाने जाते रहे हैं बल्कि वे पुराने सामंतों की उदंडता के शिकार के रूप में जाने जाते थे। पर लालू प्रसाद सत्ता के शिखर पर चढ़े तो उनके इर्दगिर्द पार्टी नेता व कार्यकर्ता के नाम पर अनेक ऐसे अराजक तत्व एकत्र हो गये जो उदंडता के लिए जाने जाते रहे। नया सामंतवाद पैदा हुआ जिसका नुकसान अंततः लालू जी को ही हुआ। इससे उस कमजोर वर्ग को भी नुकसान हुआ जिनको मंडल आरक्षण से कुछ फायदा हुआ था। उन्हें लालू जी ने सीना तान कर चलना सिखाया भी था।
लोकतंत्र में तो एक दल सत्ता में आता है तो दूसरा दल सत्ता की प्रतीक्षा करता है। इससे किसी नेता या दल को कोई फर्क नहीं पड़ना चाहिए। समाज को फर्क तब पड़ता है जब कोई नेता राजनीतिक संस्कृति बनाता है या उसे बिगाड़ देता है।

यह अच्छी बात है कि लालू जी की अंतरात्मा ने अपने कार्यकर्ताओं को शालीन रहने की नसीहत दी है। हालांकि यह काम बड़ा कठिन है,पर लालू जी को इसकी कोशिश तो करनी ही चाहिए। ऐसा नहीं होना चाहिए कि हनुमान जी को खुद के शाकाहार होने के बारे में सपने में दिए गए अपने वचन से जिस तरह लालू जी बाद में पलट गए,उसी तरह इस मामले में भी वे पलट जाएं। लालू प्रसाद अपने काय्रकर्ताओं को काबू में रखेंगे तो उससे उनके राजनीतिक विरोधी भी उनसे प्रभावित हुए बिना नहीं रहेगा।जो कोई नेता एक कठिन काम करता है तो लोगबाग उसकी वाहवाही करते ही हैं।


और अंत में
अब सवाल हवाई जहाज के ‘पशु क्लास’ और ‘मनुष्य क्लास’ का ही नहीं है। इस गरीब देश के तो कई अमीर नेता अब सेवा विमान से चलना ही अपनी तौहीन मानने लगे हैं। कई बार वे विशेष विमान से वैसी जगह भी जाते हैं जहां के लिए सेवा विमान की अनेक उड़ानें रोज ही उपलब्ध हैं।

(प्रभात खबर से साभार: 21 सितंबर, 2009)

शनिवार, 22 अगस्त 2009

बंटवारे के लिए मौलाना आजाद की नजर में नेहरू जिम्मेदार

मिस्टर जिन्ना सन् 1946 के आरंभ में अखंड भारत के लिए तैयार हो गये थे, पर उसी साल के मध्य में जवाहर लाल नेहरू ने एक ऐसा बयान दे दिया कि जिन्ना ने डायरेक्ट एक्शन का नारा देकर पाकिस्तान बनवा लिया। यह बात आजाद भारत के पहले शिक्षा मंत्री अबुल कलाम आजाद ने लिखी है। अपनी आत्मकथा ‘आजादी की कहानी’ में आजाद ने लिखा कि ब्रिटिश सरकार के कैबिनेट मिशन, कांग्रेस महासमिति और मुस्लिम लीग परिषद के बीच इस बात पर आपसी सहमति बन चुकी थी कि अखंड आजाद भारत की केंद्रीय सरकार के अधीन तीन विषय होंगे-रक्षा, विदेश और संचार। राज्यों को तीन श्रेणियों में बांट दिया जाएगा। उन्हें स्वायतता रहेगी। ‘बी’ श्रेणी के राज्यों में पंजाब, सिंध, उत्तर पश्चिम सीमा प्रांत व ब्रिटिश बलोचिस्तान शामिल किए जाएंगे। ‘सी’ श्रेणी के राज्यों में बंगाल और असम शामिल थे। बाकी राज्य ‘ए’ श्रेणी में रखे गये थे। कैबिनेट मिशन का ख्याल था कि इस भावी व्यवस्था से मुसलमान अल्पसंख्यक वर्ग को पूरी तरह से इतमिनान हो जाएगा।

याद रहे कि आजादी के लिए हिंदुस्तान के प्रतिनिधियों से विचार-विमर्श की खातिर ब्रिटिश सरकार ने कैबिनेट मिशन भारत भेजा था। मौलाना आजाद ने लिखा कि ‘मिशन ने मेरी यह बात भी मान ली थी कि अधिकतर विषय प्रांतीय धरातल पर संभाले जाएंगे। इसलिए बहुमत वाले राज्यों में मुसलमानों को प्रायः पूरी स्वायत्तता प्राप्त होगी। बी और सी श्रेणियों के राज्यों में मुसलमानों का बहुमत था। इस तरह वे अपनी सारी औचित्यपूर्ण आशाओं को सफल बना सकते थे।’

‘शुरू- शुरू में मि. जिन्ना ने इस योजना का घोर विरोध किया। मुस्लिम लीग स्वतंत्र देश की अपनी मांग को लेकर इतना आगे बढ़ चुकी थी कि उसके लिए कदम वापस लौटाना मुश्किल था। पर कैबिनेट मिशन ने बहुत ही साफ -साफ और असंदिग्ध शब्दों में कह दिया कि वह देश के बंटवारे का सुझाव कभी नहीं दे सकता। मिशन के सदस्य लाॅर्ड पेथिक लारेंस और सर स्टैफर्ड क्रिप्स ने बार- बार कहा कि हमारी समझ में नहीं आता कि मुस्लिम लीग जिस पाकिस्तान सरीखे राज्य की कल्पना कर रही है, वह कैसे जियेगा, कैसे बढ़ेगा और कैसे स्थायी होगा? उनका ख्याल था कि मैंने जो सूत्र दिया है, वही समस्या का हल है। मंत्रिमंडलीय मिशन का ख्याल था कि इसमें कोई हर्ज नहीं है ।’

मौलाना आजाद ने लिखा कि ‘मुस्लिम लीग परिषद की तीन दिन तक बैठक हुई। तब कहीं जाकर वह किसी फैसले पर पहुंच सकी। आखिरी दिन जिन्ना को यह तसलीम करना पड़ा कि मिशन की योजना में जो हल प्रस्तुत किया गया है, अल्पसंख्यकों की समस्या का उससे अधिक न्यायपूर्ण हल और कोई नहीं हो सकता। और उन्हें इससे अच्छी शर्तें मिल ही नहीं सकतीं। उन्होंने परिषद को बताया कि मंत्रिमंडल मिशन ने जो योजना प्रस्तुत की है, उससे और कुछ भी ज्यादा मैं नहीं कर सकता। इसलिए उन्होंने मुस्लिम लीग को योजना मान लेने की सलाह दी और लीग परिषद ने सर्वसम्मति से उसके पक्ष में वोट दिया।’

इस संबंध में कांग्रेस के फैसले के बारे में मौलाना आजाद ने लिखा कि ‘कांग्रेस कार्य समिति में जो विचार विमर्श हुआ, उसमें मैंने कहा कि कैबिनेट मिशन की योजना मूलतः वही है जो कांग्रेस पहले स्वीकार कर चुकी है। ऐसी हालत में योजना में जो प्रमुख राजनीतिक हल प्रस्तुत किया गया था, उसे मान लेने में कार्यसमिति को कोई मुश्किल नहीं हुई। 26 जून, 1946 के अपने प्रस्ताव में कांग्रेस कार्य समिति ने भविष्य के संबंध में कैबिनेट मिशन की योजना स्वीकार कर ली-यद्यपि उसने अंतरिम सरकार का सुझाव मानने में अपनी असमर्थता प्रकट की। कैबिनेट मिशन योजना का कांग्रेस व मुस्लिम लीग दोनों के द्वारा स्वीकार कर लिया जाना हिंदुस्तान के स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास की एक गौरवमय घटना थी। यह भी लगा मानो हम आखिरकार सांप्रदायिक कठिनाइयों को भी पीछे छोड़ आए हैं। मि. जिन्ना बहुत खुश न थे, लेकिन और कोई रास्ता न था, इसलिए योजना मानने के लिए उन्होंने खुद को तैयार कर लिया था।’

पर इस पूरी योजना को पलीता लगाने वाली घटना की चर्चा करते हुए मौलाना अबुल कलाम आजाद ने लिखा कि ‘तभी एक ऐसी दुःखद घटना घटी जिसने इतिहास का क्रम ही बदल दिया। दस जुलाई को कांग्रेस अध्यक्ष जवाहर लाल नेहरू ने बम्बई में एक संवाददाता सम्मेलन बुलाया। वहां उन्होंने एक बयान दिया जिस पर शायद सामान्य परिस्थितियों में कोई ध्यान भी न देता। पर उस बयान ने शंका और घृणा के तत्कालीन वातावरण में बड़े ही दुर्भाग्यपूर्ण परिणामों के एक क्रम को जन्म दिया।’

‘कुछ पत्र प्रतिनिधियों ने उनसे सवाल किया, ‘क्या कांग्रेस कार्य समिति के प्रस्ताव पास कर देने का मतलब यह है कि कांग्रेस ने योजना को पूर्ण रूप से स्वीकार कर लिया है जिसमें अंतरिम सरकार के गठन का सवाल भी निहित है ?’

जवाब में जवाहर लाल ने कहा कि कांग्रेस करारों की बेड़ियों से बिलकुल मुक्त रह कर और जब जैसी स्थिति पैदा होगी, उसका मुकाबला करने के लिए स्वतंत्र रहते हुए, संविधान सभा में जाएगी।’ पत्र प्रतिनिधियों ने फिर पूछा कि क्या इसका मतलब यह है कि कैबिनेट मिशन योजना में संशोधन किए जा सकते हैं?

जवाहर लाल बड़ा जोर देकर जवाब दिया कि कांग्रेस ने सिर्फ संविधान सभा में भाग लेना स्वीकार किया है और वह मिशन योजना में जैसा उचित समझे, वैसा संशोधन-परिवर्तन करने के लिए अपने आपको स्वतंत्र समझती है।मौलाना आजाद ने लिखा कि ‘मैं यह कह दूं कि जवाहर लाल का बयान गलत था।

यह कहना सही न था कि कांग्रेस योजना में जो चाहे संशोधन करने के लिए स्वतंत्र है। असल में यह तो हम मान चुके थे कि केंद्रीय सरकार संघीय होगी ।’ (आजादी की कहानी:मौलाना अबुल कलाम आजाद की आत्म कथा-पृष्ठ-173)

आजाद के शब्दों में ‘जवाहर लाल नेहरू के इस बयान से मि. जिन्ना भौंचक रह गये। उन्होंने तुरंत एक बयान जारी किया कि कांग्रेस अध्यक्ष के इस वक्तव्य से सारी स्थिति पर फिर से विचार करना जरूरी हो गया है। जिन्ना ने लियाकत अली खान से लीग परिषद की बैठक बुलाने के लिए कहा और अपने बयान में कहा कि मुस्लिम लीग परिषद ने दिल्ली में कैबिनेट मिशन की योजना इसलिए स्वीकार कर ली थी कि यह आश्वासन दिया गया था कि कांग्रेस ने भी उसे स्वीकार कर लिया है और यह योजना हिंदुस्तान के भावी संविधान का आधार होगी। अब चूंकि कांग्रेस अध्यक्ष ने यह एलान किया है कि कांग्रेस संविधान सभा में अपने बहुमत से योजना को बदल सकती है, इसलिए इसका मतलब यह हुआ कि अल्पसंख्यक वर्ग बहुसंख्यक की दया पर जियेगा।

उसके बाद मुस्लिम लीग की बैठक 27 जुलाई को बम्बई में हुई। अपने उद्घाटन भाषण में मिस्टर जिन्ना ने फिर से पाकिस्तान की मांग की और कहा कि मुस्लिम लीग के सामने यही एक रास्ता रह गया है। तीन दिनों की बहस के बाद लीग परिषद ने मिशन योजना को अस्वीकार करते हुए एक प्रस्ताव पास कर दिया। उसने पाकिस्तान की मांग पूरी कराने के लिए ‘सीधी कार्रवाई’ करने का भी फैसला किया।’

(प्रभात खबर, 20 अगस्त 2009 से साभार)