शुक्रवार, 2 दिसंबर 2016

एनडीए में जाने की कयासबाजी !

हकीकत है या फसाना ? किसी को हकीकत लग रहा है तो किसी को फसाना। जो बिहार की राजनीति को जानते हैं ,वे इसे पूरी तरह फसाना ही मान  रहे हैं। नोटबंदी पर नीतीश  का समर्थन देखकर अकारण  तरह-तरह के कयास लगाए जा रहे हैं।

 इसमें  अचरज  भी नहीं।क्योंकि कई बार नेता पाला बदलने से पहले अपने बयानों का रुख भी उसी दिशा में कर लेते हैं।पर इस कसौटी पर नीतीश कुमार को कसने पर धोखा ही मिलेगा।

 नीतीश  की राजनीतिक शैली के जानकार लोग राजग में उनके जाने की  संभावना को  हकीकत से कोसों दूर बता रहे हैं।यदि बीच में कोई राजनीतिक पहाड़ न टूट पड़े  तो  अगले  लोस चुनाव तक तो इसकी कोई संभावना नहीं।

 नीतीश कह चुके हैं कि वह प्रधान मंत्री पद की तमन्ना नहीं पालते।पर  अक्तूबर में जब उन्होंने जदयू  अध्यक्ष पद का कार्यभार संभाला तो जदयू के कुछ नेताओं ने कहा कि नीतीश कुमार पी.एम.मेटेरियल हैं।

 पूर्व मुख्य मंत्री बाबूलाल मरांडी भी यही मानते हैं।

  गत अप्रैल में तो लालू प्रसाद ने कह दिया था कि मैं प्रधानमंत्री पद के लिए नीतीश का समर्थन करूंगा।
 वैसे भी खुद नीतीश देश के कुछ राजग विरोधी दलों को एकत्र करने की कोशिश करते रहे हैं। यदि राजनीतिक संभावना और अवसरवादिता की दृष्टि से भी देखें तो नीतीश के राजग में जाने की संभावना अभी कहां बनती है ?

 अगले लोकसभा चुनाव का क्या नतीजा होगा, यह अनिश्चित है। वैसे तो अभी नरेंद्र मोदी की बढ़त लग रही है। पर अगले ढाई साल में राजनीति कैसी करवट लेगी, यह भला कौन जानता है !

 यदि तब राजग विरोधी दलों के लिए कोई संभावना बनती है तो नीतीश भी प्रधानमंत्री पद के एक उम्मीदवार बन सकते हैं। 

अपनी विनम्रता के तहत भले नीतीश आज कहें कि वह प्रधान मंत्री पद के उम्मीदवार नहीं हैं,पर उस संभावना को वह अभी से क्यों समाप्त करना चाहेंगे ? देश के  कई नेता कभी उम्मीदवार नहीं थे, पर प्रधान मंत्री बने।गुजराल और देवगौड़ा इसके उदाहरण हैं। मुलायम और ज्योति बसु के नाम भी कभी गंभीरता लिये गये थे।

  क्या राजग में जाने के बाद नीतीश की वह संभावना समाप्त नहीं हो जाएगी ? और राजग में जाने पर अभी नीतीश को अतिरिक्त मिल क्या जाएगा ?     

  राजग में जाने की अफवाह उड़ने के पीछे नीतीश का नोटबंदी समर्थक बयान है।इस पृष्ठभूमि में अमित शाह से उनकी मुलाकात और प्रधान मंत्री से उनकी बातचीत की अफवाहें भी उड़ने लगीं।जबकि राजग या जदयू के किसी सूत्र ने इस खबर की पुष्टि नहीं की।इससे दुःखी होकर नीतीश कुमार ने कहा कि  ‘मेरे राजनीतिक जीवन को खत्म करने की साजिश चल रही है।देश के राजनीतिक सवालों पर अपना नजरिया रखने पर अनर्गल राजनीतिक व्याख्या की जाती है। यह साजिश है जिसकी मैं चिंता नहीं करता हूं।’

  दरअसल यह पीड़ा नीतीश की खास राजनीतिक शैली का परिणाम है। यह शैली अन्य  अधिकतर नेताओं  से उन्हें अलग करती है। पर अफवाहें फैलाने का मौका भी दे देती है।

  नीतीश ने नोटबंदी के मोदी सरकार के फैसले का समर्थन क्या किया कि राजग में उनके शामिल होने की भविष्यवाणियां की जाने लगीं। नीतीश कुमार इसका कई बार खंडन कर चुके हैं।

 आम राजनीतिक चलन तो यही है कि अपने राजनीतिक विरोधियों  के हर काम का विरोध करना चाहिए।आम नेतागण अपने विरोध के दल का समर्थन तभी करते हैं जब उन्हें उस दल से साठगांठ करनी होती है। हालांकि आए दिन बदलते राजनीतिक समीकरणों के इस दौर में  किसी दल के अगले कदम के  बारे में कुछ भी निश्चित तौर पर नहीं कहा जा सकता है। खुद जदयू भी अपना समीकरण बदलता रहा है।पर जदयू के बारे में फिलहाल यह कहा जा सकता है कि  कोई अत्यंत मजबूरी नहीं हो गयी तो वह दलीय  समीकरण सन 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले कत्तई नहीं बदलेगा। 

 अपने विरोधी के भी अच्छे कामों का देशहित में समर्थन की शैली नीतीश की पहले से भी रही है।वह कभी-कभी सहयोग भी करते रहे।

विरोध करने वाली बातों का विरोध तो करते ही हैं। हालांकि कुल मिलाकर नीतीश कुमार कम बोलने वाले नेता हैं। हाल में नोटबंदी के मोदी सरकार फैसले का समर्थन कर दिया तो अनेक लोगों, नेताओं और राजनीतिक प्रेक्षकों को मौका मिल गया। अनुमान लगाया जाने लगा है कि जदयू राजग में शामिल होने वाला है।

 एक जदयू नेता ने कहा कि ऐसा यह सोचे बिना हो रहा है कि   ऐसी अपुष्ट खबरों यानी अफवाहों का कैसा असर राजद और कांग्रेस पर पड़ेगा जिनके समर्थन से नीतीश कुमार आज मुख्यमंत्री हैं।

 याद रहे कि न तो जदयू और न ही भाजपा के किसी जिम्मेदार नेता ने इस खबर या इसकी संभावना की पुष्टि की है।

 जहां तक नीतीश की अलग तरह की राजनीतिक शैली का सवाल है,सन 2012 में जदयू  ने राष्ट्रपति पद के चुनाव में यू.पी.ए. के उम्मीदवार प्रणव मुखर्जी को वोट दिए थे।नीतीश तब राजग में थे । 

 उन्हीं दिनों राजग में रहते हुए नीतीश कुमार ने जी.एस.टी. विधेयक का समर्थन किया जबकि भाजपा ने मनमोहन सरकार के जी.एस.टी. विधेयक को पास नहीं होने दिया।

  भारतीय सेना के सर्जिकल स्ट्राइक का भी नीतीश कुमार ने समर्थन किया था। कुछ अन्य विरोधी दल सर्जिकल स्ट्राइक का सबूत मांगते रहे।

संकेत हैं कि नोटबंदी के मूल फैसले का अधिकतर आम लोगों ने विरोध नहीं किया है। यदि विरोध किया होता तो भाजपा हाल के लोकसभा -विधानसभा उपचुनावांें में अपनी सीटें गंवा बैठती।

  महाराष्ट्र और गुजरात में नोटबंदी के बाद हुए निकाय चुनावों में भी भाजपा ने बड़ी जीत हासिल की है। यानी शहरों में भी जीत और गांवों में भी। नीतीश कुमार की राजनीतिक घ्राणशक्ति कमजोर नहीं मानी जाती। वह जनता के खिलाफ क्यों जाते ?

   नीतीश नोटबंदी का विरोध करके देश के कुछ अन्य विवादास्पद नेताओं की कतार में खुद को क्यों शामिल कर लेते जिनके खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोप लगते रहते हैं ?

भाजपा का यह आरोप रहा है कि नोटबंदी पर जनता की पीड़ा के बहाने कई नेता अपनी पीड़ा का एजहार कर रहे हैं। यानी  नीतीश के बयान को राजग से दोस्ती की संभावना से भला कैसे जोड़ा जा सकता है ?  

 (2 दिसंबर 2016 के राष्ट्रीय सहारा में प्रकाशित)

पदों के साथ-साथ पिछड़ों को चाहिए कल्याणकारी योजनाएं

केंद्र सरकार अगले कुछ वर्षों में पिछड़ों के कल्याण के लिए कितने ठोस काम करने वाली है ?

  यदि सचमुच कुछ चैंकाने वाले कल्याणकारी काम हुए तो उससे नवनियुक्त प्रदेश भाजपा अध्यक्ष नित्यानंद राय की पैठ पिछड़ों में बढ़ेगी।अन्यथा वह भी उसी तरह लालू प्रसाद के सामने प्रभावहीन रहेंगे जिस तरह उनके समुदाय से आने वाले पहले के दो प्रदेश अध्यक्ष रहे।

 हां, नित्यानंद राय की नियुक्ति के साथ एक बात जरूर हुई है। वह यह कि संघ प्रमुख मोहन भागवत के आरक्षण पर गत साल दिए बयान के कारण पिछड़ों के एक हिस्से में जो गुस्सा पैदा हुआ था,वह संभवतः थोड़ा कुंद होगा।

नित्यानंद राय की नियुक्ति के साथ डा.प्रेम कुमार और सुशील कुमार मोदी की नियुक्तियों को जोड़ कर देखा जाए तो बिहार भाजपा की अब एक भिन्न छवि उभरती है। यह छवि भाजपा की परंपरागत सवर्ण बहुल छवि से भिन्न है।

   छवि बनना एक बात है, पर पिछड़ों में पैठ बनाना दूसरी बात है। बिहार में भाजपा के लिए लालू-नीतीश की दमदार जोड़ी से मुकाबला करना आसान नहीं है। नीतीश कुमार की छवि तो समावेशी नेता की है। वह न्याय के साथ विकास के पक्षधर रहे हैं।

नीतीश की धारणा है कि जिस समुदाय की जितनी मदद की जरूरत है, उतनी मदद उसे मिलनी चाहिए। वह सवर्णों का भी ध्यान रखते रहे हैं।

 पर 1990 के मंडल आरक्षण आंदोलन के दौरान लालू प्रसाद  अपनी बेजोड, साहसी और ऐतिहासिक भूमिका के कारण पिछड़ों खास यादवों के डार्लिंंग बने हुए हैं।

लालू की ताकत को कमजोर करना टेढी खीर है।

हां, इन दिनों प्रधान मंत्री जिस तरह आक्रामक मुद्रा में हैं,जिस तरह वे भ्रष्टाचार व काला धन के दानव से लड़ रहे हैं,उससे यह उम्मीद बनती है कि वह देर सवेर एक दिन इस देश के उपेक्षित पिछड़ों के लिए भी कुछ ठोस काम कर देंगे।पिछड़ों के विकास के बिना देश का सम्यक विकास कैसे होगा ?  भागवत के बयान की वास्तविक क्षतिपूर्ति तभी होगी।

पिछड़ों के लिए पहला काम तो यह हो सकता है कि केंद्र सरकार पिछड़ा वर्ग आयोग की इस सिफारिश को मान ले कि 27 प्रतिशत आरक्षण को तीन भागों में बांट दिया जाए।उससे पिछड़ों के बीच के कमजोर तबकों को भी आरक्षण का लाभ मिलने लगेगा।

 आम पिछड़ों के व्यापक भले  के लिए भी कई काम हो सकते हैं ताकि वे समाज में आगे बढ़ चुके लोगों के समकक्ष आ सकें।



बिहार भाजपा के भीतर 
राज्य भाजपा के कई सवर्ण नेता प्रदेश अध्यक्ष पद के उम्मीदवार थे। पर उन्हें नजरअंदाज करके नित्यानंद को यह सम्मान मिला। हाईकमान का यह फैसला गलत नहीं है। पर सवाल है कि वैसे नेतागण नित्यानंद राय को सहयोग करेंगे? ऐसी उम्मीद करना जल्दीबाजी होगी।

पर राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार वैसे नेता नित्यानंद के साथ  पार्टी के भीतर जितना असहयोग करेंगे, पिछड़ों में नित्यानंद की पैठ उतनी ही बढ़ेगी नित्यानंद संघ पृष्ठभूमि के हैं। इसलिए वह संघ के बड़े नेताओं को यह बताने की बेहतर स्थिति में हैं कि भविष्य में आरक्षण पर बयान देने से पहले सोच विचार कर लिया जाए।

  बड़े कामों के लिए अधिक जन समर्थन जरूरी

 नरेंद्र मोदी ने कुछ बड़े काम करने का बीड़ा उठाया है। ऐसे काम जिनके बारे में किसी पिछली सरकार ने सोचा तक नहीं। वैसे कामों को अंजाम देने के लिए सरकार को जनता की ताकत चाहिए। पिछले लोक सभा चुनाव में देश के सिर्फ एक तिहाई मतदाताओं का ही समर्थन राजग को मिला था। पिछड़ गए समुदायों के बीच अपनी पैठ बनाये बिना मोदी का समर्थन नहीं बढ़ सकता। कम समर्थन वाली किसी सरकार को निहितस्वार्थी तत्व ऐसे  काम करने नहीं देंगे।

काम क्या हैं ? इस देश में आम तौर पर जो व्यापार होता हैं, उसके दो खाते होते हैं। एक सफेद खाता और दूसरा काला खाता। मोदी काले धन के, खाते को बंद करना चाहते हैं। क्या यह मामूली काम है ?

अधिकतर सरकारी दफ्तरों में अधिकतर सरकार निर्णय बिकाऊ हैं। मोदी जी इसे बंद करना चाहते हैं। यह आसान काम है ?

चुनावों में खर्च के दो हिसाब होते हैं। चुनाव आयोग को देने वाला  कागजी हिसाब और दूसरा काले धन का प्रयोग।

क्या चुनाव में काले धन का प्रयोग बंद करना आसान काम है? संपत्ति खरीद में कुछ पैसे चेक से दिया जाते हंै और अधिक पैसे नकद। क्या सारे पैसे चेक देने के लिए मजबूर किया जा सकता है?

जानकार लोग बताते हैं कि इस तरह के कुछ और काम केंद्र सरकार की सूची में हैं। विमुद्रीकरण उसी सूची में था।

 इन सब कामों को करने के लिए सरकार को बड़ी ताकतों से टकराना होगा। इनमें से कुछ शक्तियां खुद मोदी सरकार के भीतर हैं। वे शक्तियां सरकार गिराने की भी कोशिश कर सकती हैं।उन काली शक्तियों का मुकाबला सरकार भारी जन समर्थन से ही कर सकती है। यह समर्थन मोदी सरकार को तभी मिलेगा जब वह सदियों से पिछड़ गए लोगों के भले के लिए कुछ चैंकाने वाले काम करके दिखाए। तभी नित्यानंद राय की नियुक्ति भी सार्थक मानी जाएगी।


ममता के गद्दार वाले बयान पर

 पूर्व केंद्रीय मंत्री डा. रघुवंश प्रसाद सिंह ने ममता बनर्जी के साथ नोटबंदी के खिलाफ पटना में धरना दिया। ठीक किया। लोकतंत्र में इसकी अनुमति है। पर ममता जी ने नोटबंदी के समर्थकों को गददार कह दिया। क्या यह उचित है ?

क्या रघुवंश जी उस बयान से खुद को अलग करेंगे? राजग के बाहर के कुछ राजनेता भी नोटबंदी का समर्थन कर रहे हैं।क्या उन्हें गददार कहा जाना चाहिए?


 कब तक चलेगी लर्नर लाइसेंस पर गाड़ी ! 

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने गत सितंबर में यह सही कहा था  कि दिल्ली सरकार एक कलम खरीदने में भी सक्षम नहीं है। वह और उनके कैबिनेट सहयोगी अधिकारों से पूरी तरह वंचित हैं।’

यह भी सही बात है कि दिल्ली की राजनीतिक कार्यपालिका को उतने अधिकार नहीं हैं जितने बिहार, पंजाब तथा इस तरह के पूर्ण दर्जा वाले राज्यों की राजनीतिक कार्यपालिकाओं को हंै।

 पर केंद्र की मोदी सरकार ने केजरीवाल सरकार को उतने अधिकारों का भी उपयोग नहीं करने दिया जितना शीला दीक्षित मुख्यमंत्री के रूप में करती थीं।

दिल्ली के अगले विधान सभा चुनाव में केजरीवाल की पार्टी जनता से यह कह सकती है कि हमें तो अधिकार ही नहीं दिया तो हम  काम कैसे कर पाते ? पर पंजाब में आप को यदि मौका मिला तो शायद वहां उनके हाथ नहीं रुकेंगे।

  पर सवाल है कि केजरीवाल साहब कब तक ‘लर्नर लाइसेंस’ के साथ गाड़ी चलाते रहेंगे? प्रौढ राजनीति करना कब सीखेंगे ? ताजा उदाहरण नोटबंदी पर उनका विरोध है। वह शारदा-नारदा के दागियों  और आय से अधिक संपत्ति जुटाने का आरोप झेल रहे नेताओं की कतार में खड़े नजर आए।


बड़ा  संकट आ गया तो क्या होगा ? 

साठ के दशक में अन्न संकट से उबरने के लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने रेडियो संदेश के जरिए देशवासियों से अपील की कि वे हर  सोमवार को एक वक्त का भोजन त्याग दें। लोगों ने इसे ‘शास्त्री व्रत’ कह कर उसका पालन किया।यहां तक कि तब रेस्त्रां और होटल भी सोमवार की शाम में बंद रहते थे।

पर अर्थ संकट से उबरने के लिए लागू नोटबंदी पर अनेक लोग अड़ंगे लगा रहे हैं। खुदा न करे, पर यदि भारत को कोई युद्ध लड़ना पड़ गया तो वैसे लोग क्या करेंगे ?


और अंत में
  नरेंद्र मोदी सरकार ने नोटबंदी के साथ ही राष्ट्रीय विमर्श का मुद्दा ही बदल दिया है। एक तरफ साक्षी महाराज, साध्वी प्राची तो दूसरी ओर असदुददीन ओवैसी और दिग्विजय सिंह जैसे नेता अभी बेरोजगार से हो गए लगते हैं। यह देशहित में होगा कि दोनों पक्षों के ऐसे नेतागण कम से कम अगले कुछ समय के लिए ‘शांति’ बनाए रखें।

(प्रभात खबर, बिहार संस्करण ः 2 दिसंबर 2016 से साभार)
     




शुक्रवार, 4 नवंबर 2016

पुलिस सुधार की जरूरत बता रहीं दिल्ली-भोपाल की घटनाएं

  नई दिल्ली की बुधवार की घटना पर कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने कहा कि ‘पूर्व सैनिक के परिजनों को हिरासत में क्यों रखा गया है? दिल्ली पुलिस की कार्रवाई मोदी सरकार की अलोकतांत्रिक मानसिकता का प्रतीक है।’

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंंत्री ममता बनर्जी ने भोपालकांड पर कहा कि ‘हमलोग कथित मुठभेड़ की कहानी से सहमत नहीं हैं। लोगों के मन में कई ऐसे सवाल उठ रहे हैं जिनका जवाब अब तक नहीं मिल पाया है।’

 ये दोनों बयान एक बार फिर पुलिस और जेल सुधार की जरूरत बता रहे हैं। पर सुधार करेगा कौन? क्या ममता बनर्जी के राज्य में पुलिस की ज्यादतियों का रोना रोने वाली भाजपा मध्य प्रदेश जैसे भाजपा शासित राज्यों में पुलिस सुधार करेगी ? क्या खुद ममता जी यही काम बंगाल में करेंगी जहां राजनीतिक व अन्य आधारों पर कार्रवाई करने या नहीं करने के ंगंभीर आरोप लगते रहते हैं? याद रहे कि जेल और पुलिस की स्थिति देश भर में कमोवेश एक ही तरह की है।

   कर्नाटका में कांग्रेस सरकार ऐसी कानूनी व्यवस्था करेगी ताकि वहां ‘भोपाल’ नहीं दुहराया जाए ? यहां मिलीजुली राज्य सरकारों की बात नहीं की जा रही है।

संकेत तो यही है कि ऐसा कोई राज्य नहीं करेगा। सब सिर्फ वोट बैंक की राजनीति करेंगे और एक दूसरे को सिर्फ नीचा दिखाने का काम करेंगे। अब तक तो यही होता भी रहा है।

पुलिस सुधार के लिए मोरारजी देसाई सरकार ने 1977 में धर्मवीर के नेतृत्व में राष्ट्रीय पुलिस आयोग का गठन किया था। उस  आयोग ने 1979 से 1981 तक अपनी कुल आठ रपटें सरकार को दी थी। साथ ही उसने माॅडल पुलिस एक्ट का मसविदा भी पेश किया था। रपट की मुख्य बात यही थी कि पुलिस व्यवस्था में व्यापक सुधार किया जाना चाहिए।

 आपातकाल में हुई पुलिस ज्यादतियों की पुनरावृत्ति रोकने के उपाय के तहत धर्मवीर आयोग का गठन किया गया था। पर उस आयोग की सिफारिशों को बाद की किसी भी सरकार ने लागू नहीं किया। जबकि इस बीच लगभग सभी प्रमुख राजनीतिक दल प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से केंद्र और राज्यों में सत्ता में रहे।

  अंततः देश के दो पूर्व डी.जी.पी. ने सुप्रीम कोर्ट में लोकहित याचिका दायर की। उनकी मांग थी कि सरकारें धर्मवीर आयोग की सिफारिशें लागू करें। सुप्रीम कोर्ट ने 2006 में ऐसा करने का आदेश सरकार को दे दिया। पर आज तक किसी भी सरकार ने इसे लागू नहीं किया।

  इस बीच कहीं भी जब पुलिस ज्यादतियां करती है तो राजनीतिक दल अपनी राजनीतिक सुविधा के अनुसार बयान दे देते हैं। वे अपने वोट बैंक को ध्यान में रखकर तत्कालीन सरकारों को कोसते हैं। पर जब वे खुद सत्ता में होते हैं तो पुलिस सुधार की दिशा में कुछ नहीं करते।

 यदि धर्मवीर आयोग की सिफारिशों को लागू कर दिया गया होता तो पुलिसकर्मी निष्पक्ष ढंग से काम करने को मजबूर होते। अपवादों को छोड़ दें तो अभी तो देश भर की पुलिस मोटे तौर पर सत्ताधारी दल की इच्छा के अनुसार ही काम करती है। जैसा काम पुलिस भोपाल और दिल्ली में कर रही है, वैसा ही काम कर्नाटका और पश्चिम बंगाल में हो रहा है।


जेल मैनुअल भगोड़ों को मारने वालों के पक्ष में 

जिन पुलिसकर्मियों ने भोपाल जेल से भाग रहे कथित आतंकियों पर गोलियां चलाईं, जेल मैनुअल की एक धारा उनके बचाव में काम आ सकती है।

द प्रिजन एक्ट, 1894 की धारा -433 यह कहती है कि ‘जेल से भागे या भागने की कोशिश करने वालों पर सुरक्षा अधिकारी चेतावनी के बाद तलवार, संगीन, आग्नेयास्त्र या अन्य किसी हथियार से वार कर सकता है।’ वैसी स्थिति में कमर से ऊपर भी वार करने की छूट है। क्योंकि संगीन या तलवार से तो कमर के नीचे वार करना कठिन और अव्यावहारिक ही है।

 अब सवाल है कि ऐसे प्रावधान वाले जेल मैनुअल को आजादी के बाद बदला क्यों नहीं गया ? यह सवाल उन सभी दलों से है जो आज भोपाल कांड पर सवाल उठा रहे हैं। क्यों वे बारी-बारी से सत्ता में रहे हैं।

 आजादी के बाद जेल मैनुअल में संशोधन की मांग जरूर की गयी। कुछ राज्यों ने संभवत थोड़ा -बहुत संशोधन किये भी। पर मध्य प्रदेश सरकार की सेवा से हाल में रिटायर हुए एक बड़े जेल अधिकारी ने बताया कि वहां धारा-433 अब भी ज्यों की त्यों है।

 याद रहे कि मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने भोपाल कांड की न्यायिक जांच की मांग की है। श्री सिंह वहां लगातार दस साल तक पूर्ण बहुमत के साथ मुख्यमंत्री थे।

 यदि धारा -433 में कोई परिवर्तन नहीं हुआ है तो कोई भी न्यायिक जंाच आयोग भोपाल जेल के भगोड़े कैदियों को मारने वालों का भला क्या बिगाड़ लेगा ?


बिहार में भी उनका कुछ नहीं बिगड़ा 

1971 के जुलाई में हजारीबाग जेल में जेल अधिकारियों के कथित निदेश पर अपराधी कैदियों ने 15 नक्सलियों को पीट-पीट कर मार डाला। उस घटना में तो एक जेल अधिकारी ने खुद एक नक्सली को गोली मार दी थी। यानी कुल 16 मरे थे।

 मई, 1976 में भागलपुर जेल से भागने के प्रयास में चर्चित प्रशांत चैधरी सहित 4 नक्सलवादी कैदी मार डाले गए थे। वे भी विचाराधीन कैदी ही थे। उन घटनाओं में किसी जेल या पुलिस अधिकारी का कुछ बिगड़ा ? मुझे तो इस संबंध में अब तक कुछ पता नहीं चल सका है। संभवतः उन अधिकारियों के लिए जेल मैनुअल की धारा -433 ने ही कवच का काम किया होगा।


कितने स्वतंत्रता सेनानी जाली !

आजाद हिंद फौज के अंतिम सिपाही डैनियल काले का गत माह मुम्बई में निधन हो गया। वह 95 साल के थे। पर, इस देश के पेंशनधारी स्वतंत्रता सेनानियों और उनके आश्रितों की संख्या अब भी दसियों हजार में है।

2015 में सरकार ने राज्यसभा में बताया था कि स्टेेट बैंक ने तीन हजार से अधिक ऐसे स्वतंत्रता सेनानियोें को वर्षों तक पेंशन दिया जिनका निधन पहले ही हो चुका है।

 हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने मानवीय आधार पर महाराष्ट्र के 298 जाली स्वतंत्रता सेनानियों की पेंशन जारी रखने का आदेश दे दिया। क्योंकि अदालत ने यह महसूस किया कि पेंशन बंद होने पर उनके परिवारों में भुखमरी की नौबत आ जाएगी।

पर सुप्रीम कोर्ट के सामने ऐसी नौबत किसने लाई? जाहिर है कि शासन ने। भ्रष्ट व सड़ी-गली व्यवस्था ने। जहां रिश्वत देकर कुछ भी कराया जा सकता हे।

स्वतंत्रता सेनानी कभी पवित्र शब्द थे। पर भ्रष्ट अफसरों और कर्मचारियों ने लोभी लोगों से मिलकर उन शब्दों को दागदार बना दिया।


खेती की उपेक्षा का परिणाम

महाराष्ट्र के मराठा, गुजरात के पटेल और हरियाणा के जाट मुख्यतः खेती -बारी पर निर्भर समुदाय हैं। वे सरकारी नौकरियों में आरक्षण की मांग के लिए आंदोलित हैं।

चूंकि खेती अलाभकर पेशा बनती जा रही है, इसलिए उनका उद्वेलित होना स्वाभाविक है। देश के ऐसे कुछ अन्य समुदायों के भी सड़कों पर उतरने की संभावना है। खेतिहरों का यह संकट देश भर में राजनीतिक संकट का रूप ले ले, उससे पहले ही केंद्र सरकार को चेत जाना चाहिए। फिलहाल दो उपाय नजर आ रहे हैं। कृषि आधारित उद्योगों को अधिक बढ़ावा मिले और साठ साल से अधिक उम्र के खेतिहरों के लिए सरकार पेंशन का प्रावधान करे।


और अंत में

  हाल में भोपाल में जेल के भीतर और बाहर जो कुछ हुआ, वह सामान्य कानून-व्यवस्था का मामला है या फिर इस देश के खिलाफ युद्ध या जेहाद? या दोनों ?

 पहले इन सवालों का जवाब तलाशना होगा।

जवाब मिल जाने के बाद यह तय करना होगा कि ऐसी घटनाओं को हमें लेकर कैसा रुख-रवैया अपनाना चाहिए।
( चार नवंबर 2016 के प्रभात खबर ,पटना में प्रकाशित)

ओसामा बिन लादेन को अपना आदर्श मानता है सिमी

 
‘इस्लाम का गाजी कुफ्र शिकन, मेरा शेर ओसामा बिन लादेन।’ 

2001 में पटना और लखनऊ में सिमी ने अपने समर्थकों के बीच एक मैगजीन बांटी थी। उसमें उपर्युक्त शेर लिखा हुआ था।

सिमी 1977 में अपने गठन के समय से ही लगातार विवादास्पद रहा। उसने कई बार यह घोषणा की कि वह हथियार के बल पर पूरी दुनिया में इस्लाम का शासन कायम करना चाहता है। आश्चर्य है कि इसके बावजूद इस देश के कई बुद्धिजीवी और अनेक नेता सिमी को छात्रों का निर्दोष संगठन बताते रहे।


‘कुरान हमारा संविधान’

सिमी के बिहार जोन के सचिव रियाजुल मुशाहिल ने 20 सितंबर 2001 को कहा था कि ‘कुरान हमारा संविधान है। यदि भारतीय संविधान का कुरान से टकराव होता है तो हम संविधान से बंधे हुए नहीं हैं। हम भारत सहित पूरी दुनिया में खलीफा का शासन चाहते हैं।’ इस बीच सिमी अपने उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए हिंसक गतिविधियों में शामिल रहा।

जब 1986 में सिमी ने ‘इस्लाम के जरिए भारत की मुक्ति’ का नारा दिया तो ‘जमात ए इस्लामी’ ने सिमी से अपना संबंध पूरी तरह तोड़ लिया। याद रहे कि सिमी का गठन ‘जमात ए इस्लामी’ हिंद के छात्र संगठन के रूप में हुआ था।

  2001 में सिमी पर प्रतिबंध लग जाने के बाद सिमी के कुछ प्रमुख लोगों ने मिलकर इंडियन मुजाहिद्दीन बना लिया। पर उसके कई सदस्यों के नाम के साथ सिमी जुड़ा रहा। क्योंकि उनके खिलाफ के मुकदमों में सिमी का नाम भी जुड़ा रहा।

प्रतिबंध के बाद भी बिहार और उत्तर प्रदेश के कुछ बड़े राजनीतिक नेतागण कई वर्षों तक सिमी को निर्दोष संगठन बताते रहे। आरोप लगा कि वोट के लिए वे नेता ऐसा करते रहे। इससे भी भाजपा को राजनीतिक लाभ मिला।


‘लोकतांत्रिक तरीके से इस्लामिक शासन संभव नहीं’

 अहमदाबाद धमाकों के बाद पकड़े गए सिमी सदस्य अबुल बशर ने बताया था कि ‘सिमी की इस नीति से प्रभावित हूं कि लोकतांत्रिक तरीके से इस्लामिक शासन संभव नहीं है। उसके लिए एकमात्र रास्ता जेहाद है।’
याद रहे कि 26 जुलाई 2008 को अहमदाबाद में एक साथ 21 बम विस्फोट हुए थे जिनमें 56 लोगों की जानें गयीं थीं। इंडियन मुजाहिदीन ने विस्फोट की जिम्मेदारी ली थी। याद रहे कि सिमी के सदस्य ही आई.एम. में सक्रिय हो गये थे।


‘मंदिरों को नष्ट कर वहां मस्जिद बना देंगे’

  सिमी के अहमदाबाद के जोनल सेके्रट्री साजिद मंसूरी ने 2001 में एक अखबार से बातचीत  में कहा था कि ‘जब हम सत्ता में आएंगे तो सभी मंदिरों को नष्ट कर देंगे और वहां मस्जिद बना देंगे।’ मंसूरी का बयान 30 सितंबर 2001 के उस अखबार में छपा था। उपर्यक्त तथ्य  सिमी और इंडियान मुजाहिददीन की कार्य शैली को समझने के लिए पर्याप्त होना चाहिए।

 भोपाल की जेल से भागे सिमी के सदस्यों की मौत असली मुठभेड़ में हुई या नकली ? यह एक अलग सवाल है। इस पर तरह -तरह की बातें आती रहेंगी और पहले की तरह ही ऐसे विवाद से राजनीतिक लाभ उठाने की कोशिश राजनीतिक दल करते रहेंगे।
एक नवंबर 2016 को प्रभात खबर में प्रकाशित  

रविवार, 30 अक्टूबर 2016

एम.पी.एस.-2 हंटर सिन्ड्रोम : सिर्फ सरकार के ही पास है ऐसी बीमारी का इलाज

 इन दिनों इस देश के कोई डेढ़ सौ बच्चे एक विरल और जटिल आनुवांशिक रोग से पीडि़त हैं। उस रोग का नाम है एम.पी.एस.-2 हंटर सिन्ड्रोम।

 बिहार और झारखंड में भी ऐसे मरीजों की पहचान हुई है। रांची का शौर्य सिंह उन मरीज बच्चों में से एक है। पर, पैसे के अभाव में देश के अन्य अनेक मरीजों के अभिभावकों के साथ-साथ शौर्य के अभिभावक सौरभ सिंह के लिए भी इलाज कराना संभव नहीं हो पा रहा है।

 इस जानलेवा रोग के इलाज का खर्च मरीज के वजन पर निर्भर करता है। यदि बच्चा दस किलोग्राम का है तो उस पर 50 लाख रुपए। बीस किलो का होने पर एक करोड़ रुपए। इस मर्ज की दवा ब्रिटेन की शायर फार्मास्यूटिकल कंपनी   बनाती है। वह काफी महंगी है।

 नरेंद्र मोदी जब गुजरात के मुख्यमंत्री थे तभी वह ऐसे मरीज से मिले भी थे। प्रधानमंत्री बनने के बाद उन्होंने इस संबंध में विशेषज्ञ चिकित्सकों की एक उच्चाधिकारप्राप्त समिति का गठन भी कराया है। सर गंगाराम अस्पताल के जेनटिक्स विभाग के अध्यक्ष  डा. आई.सी. वर्मा उस कमेटी के प्रधान हैं। पर कमेटी के काम में तेजी नहीं आ पा रही है।

  ऐसे मर्ज से पीडि़त बच्चों के अभिभावकगण बुरी तरह परेशान रहते हैं। एक तो अपने अबोध बच्चे की बीमारी का कष्ट और ऊपर से अपनी आर्थिक लाचारी की पीड़ा ! इतने रुपए इकट्ठा करना उनके वश में जो नहीं है! कुछ सरकारें बी.पी.एल. परिवार को ही इलाज का खर्च देती हैं। पर सवाल है कि इस देश के कितने मध्य वर्गीय परिवार एक करोड़ रुपए खर्च कर सकने की स्थिति हैं? इसलिए ऐसे मरीजों के अभिभावकगण  सरकारों की ओर उम्मीद भरी नजरों से देख रहे हैं।  विभिन्न सरकारों  मदद से अब तक करीब एक दर्जन मरीजों का ही इलाज संभव हो पाया है। ई.एस.आई.सी.  8 मरीजों और पब्लिक सेक्टर अंडरटेकिंग एक मरीज के इलाज पर खर्च उठा रहा है। दिल्ली और कर्नाटका उच्च न्यायालयों के आदेश पर वहां की राज्य सरकारों ने कुछ मरीजों का खर्च उठाया है।

 पर अधिकतर मरीजों का समुचित इलाज नहीं हो पा रहा है। मरीजों के अभिभावक  सरकार की ओर टकटकी लगाकर देख रहे हैं।

    दो से चार साल के शिशु के शरीर को यह जानलेवा रोग अपनी गिरफ्त में ले लेता है।  इस रोग के कारण बच्चे के सिर का आकार असामान्य रूप से बढ़ जाता है। धीरे -धीरे हड्डियों के जोड़ों में अकड़न आ जाती है। श्रवण शक्ति कम होने लगती है। आंखों की रोशनी धीमी पड़ने लगती है। लीवर का आकार बढ़ जाता है। शरीर में कुछ अन्य विकार भी पैदा होने लगते हैं। यदि समय पर इलाज नहीं हुआ तो ऐसे रोगग्रस्त बच्चे की आयु सिर्फ दस से पंद्रह साल की ही होती है।

  पैसे के अभाव में अपने अबोध बच्चे को तिल -तिल कर मरते देखना किसी मां-बाप के लिए कितना दुःखदायी होता है, इसका अनुमान कठिन नहीं है।

  इस रोग से संबंधित सर्वाधिक दुःखदायी बात यही है कि इलाज अत्यंत महंगा है। हाल ही में कर्नाटका सरकार ने नेशनल हेल्थ मिशन के फंड से एक मरीज के लिए एक करोड़ रुपए मंजूर किए हैं। वहां के हाईकोर्ट के हस्तक्षेप के बाद राज्य सरकार ने ऐसा किया। याद रहे कि इस संबंध में कर्नाटका हाईकोर्ट में एक याचिका दायर की गयी थी।

 दिल्ली हाईकोर्ट ने भी याचिकाकर्ता की मदद की है। क्या इस देश की अन्य सरकारें कर्नाटका सरकार की तरह ही नेशनल हेल्थ मिशन के फंड से इस मर्ज के इलाज के लिए राशि खर्च करेगी? क्योंकि हाईकोर्ट में मुकदमे का खर्च उठाने की आर्थिक स्थिति भी अधिकतर अभिभावकों की नहीं है। याद रहे कि नेशनल हेल्थ मिशन में राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम भी शामिल है।

 झारखंड के मरीज शौर्य के लिए भाजपा सांसद राम टहल चैधरी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखा है। श्री चैधरी ने शौर्य के इलाज का खर्च उठाने का आग्रह करते हुए लिखा है कि सरकार ऐसे अन्य मरीजों की आर्थिक मदद के लिए विशेष कोष बनाये।

  इस बीच एक राज्य सरकार ने यह कह दिया कि हंटर सिंड्रोम असाध्य रोग नहीं है। साथ ही, मरीज के अभिभावक गरीबी रेखा के नीचे नहीं आते। यानी इस मानवीय समस्या को लेकर सभी राज्यों का रवैया एक तरह का नहीं है। ऐसे में केंद्रीय सरकार का हस्तक्षेप जरूरी हो गया है।

इसी साल के प्रारंभ में दिल्ली के मौलाना आजाद मेडिकल काॅलेज में विशेषज्ञ चिकित्सकों की तत्संबंधी उच्चाधिकारप्राप्त समिति की बैठक हुई। डा. वर्मा उस समिति के प्रधान हैं। बैठक में इस गंभीर बीमारी के इलाज के खर्च को लेकर  अदालत के 2015 के एक निर्णय की विस्तार से चर्चा हुई।

उपर्युक्त समिति में कुछ अन्य विशेषज्ञों को शामिल करने का फैसला हुआ। मरीजों के अभिभावक उस समिति की सिफारिशों की बेचैनी से प्रतीक्षा कर रहे हैं। याद रहे कि सांसद राम टहल चैधरी ने प्रधानमंत्री से यह भी आग्रह किया है कि वह उपर्युक्त उच्चाधिकारप्राप्त कमेटी के काम में तेजी लाने का निदेश दें। उम्मीद की जानी चाहिए कि केंद्र सरकार बीमार अबोध बच्चों की जल्द ही सुध लेगी।

बुधवार, 12 अक्टूबर 2016

राम एकबाल बरसी जैसे नेता अब पैदा नहीं होते

डाॅ. राम मनोहर लोहिया ने कभी राम एकबाल सिंह को ‘पीरो का गांधी’ कहा था। डाॅ. लोहिया ऐसे नेता थे जो न तो अपनी चापलूसी सुनना चाहते थे और न ही किसी को महज खुश करने के लिए ऐसा कोई नाम देते थे।

 जो लोग लोहिया को जानते रहे हैं, उन लोगों ने यह मान लिया था कि यदि लोहिया ने राम एकबाल जी को ‘पीरो का गांधी’ कहा था तो जरूर राम एकबाल जी में ऐसी कोई विशेष बात होगी। बात थी भी। राम एकबाल जी एक अनोखे नेता थे। समाजवादी आंदोलन के लोग राम एक बाल जी को आदर की दृष्टि से देखते थे। वैसे इसके कुछ लोग अपवाद भी थे।

 यह अकारण नहीं था कि हाल में जब पटना के अस्पताल में इलाज के लिए राम एकबाल जी को लाया गया तो लालू प्रसाद और नीतीश कुमार दोनों उन्हें देखने के लिए वहां गये। ऐसा कम होता है।

  यह भी संयोग ही रहा कि राम एकबाल जी का निधन उसी महीने में हुआ जिस अक्तूबर में राम मनोहर लोहिया का 1967 में निधन हुआ था।

 समाजवादी नेता राम एकबाल सिंह 1969 में पीरो से संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के टिकट पर विधायक चुने गये थे।  1972 में भी वह पीरो से ही चुनाव लड़े, पर उनका तीसरा स्थान रहा। उसके बाद उन्होंने कोई चुनाव नहीं लड़ा।

 1977 में उन्हें जनता पार्टी का टिकट आॅफर किया गया था। पर उन्होंने चुनाव लड़ने से इनकार कर दिया था। उनकी जगह रघुपति गोप को टिकट मिला और वह जीते भी। जनता पार्टी का टिकट उन दिनों जीत की गारंटी माना जाता था। इसके बावजूद राम एकबाल ने तब कह दिया था कि एक ही व्यक्ति बार -बार चुनाव क्यों लड़ेगा ? कोई और लड़े।

 1977 में ही बिहार विधानसभा से पहले लोकसभा का चुनाव हो चुका था। बिहार की सभी 54 लोस सीटें जनता पार्टी को मिल चुकी थीं। इसके बावजूद जनता पार्टी का टिकट अस्वीकार करने का काम कोई आदर्शवादी व्यक्ति ही कर सकता था। राम एकबाल जी आदर्शवादी थे भी।

बाद के दिनों में राम एकबाल जी ने अपने नाम के आगे से सिंह शब्द हटाकर उसकी जगह बरसी जोड़ लिया था। बरसी उनके गांव का नाम है। यह नाम उनके साथ अंत तक रहा।

 आदर्शवादी तो ऐसे थे कि एक समाजवादी मित्र की लड़की की शादी में हसुआ और खुरपी लेकर चले गये थे। नब्बे के दशक की बात है। उनके मित्र पटना के लोहिया नगर में रहते हैं। राम एकबाल जी के पास वर-बधू को देने के लिए यही उपहार था। मित्र से कहा कि नवजीवन शुरू करने वाले दंपत्ति थोड़ा खेती भी करें।

 वह कभी -कभी थोड़ा कटु भी बोलते थे। पर उनकी बोली का उनके परिचित मित्र बुरा नहीं मानते थे। साठ के दशक में मैं उनसे मिला था। संसोपा के सम्मेलनों में उन्हें देखता था। विधायक के रूप में भी उनकी भूमिका करीब से देखी।

सब जगह निर्भीक, स्पष्टवादी और अपने विचारों पर अडिग।

कमजोर वर्ग उनकी राजनीति के कंेद्र में होता था। मेरे जानते उनमें निजी स्वार्थ की भावना कतई नहीं थी। संभवतः इसलिए भी किसी भी बड़ी हस्ती से बहस करने और लड़ लेने की ताकत थी उनमें। अपने दल के अंदर और पार्टी के बाहर भी।

डाॅ. लोहिया कहा करते थे कि सोशलिस्ट कार्यकर्ताओं की वाणी स्वतंत्र रहनी चाहिए, पर उनमें कर्म की प्रतिबद्धता भी होनी चाहिए। लोहिया के नहीं रहने बाद भी लोहियावादी राम एकबाल जी इसका पालन करते थे। उन्होंने एक बार मुझसे कहा था कि मैं दो सौ साल जीना चाहता हूं। बहुत काम करने हैं। इसके लिए वह प्रयत्नशील भी रहते थे।

दो सौ साल जीना तो असंभव है। पर उन्होंने ऊंचा लक्ष्य रखा तो 94 साल जीए।

राजनीतिक कार्यकर्ता के जीवन में दौड़-धूप काफी रहती है। संयम और उचित खानपान के लिए जो साधन, समय और स्थान चाहिए, उसका अभाव ही रहा होगा। फिर भी इतना जीना बड़ी बात है।

  एक बार उन्होंने निश्चय किया था कि एक खास कालावधि में वह पक्की सड़क पर पांव तक नहीं रखेंगे।
इसका उन्होंने लंबे समय तक भी पालन किया। पिता की सेवा के लिए वह लंबे समय तक गांव में ही रहे। इस तरह के कई असामान्य काम थे जो उन्होंने किए।

राम एकबाल बरसी जैसे राजनीतिक-सामाजिक कार्यकर्ता-नेता शायद उसी युग में पैदा होते थे जब राम एकबाल पैदा हुए थे। अब इस मामले में यह भूमि बंजर सी हो चुकी है। इसलिए भी वे अनेक लोगों को याद आते रहेंगे।

शुक्रवार, 1 जुलाई 2016

आपातकाल में फरारी के मेरे वे दिन !













आपातकाल में बड़ौदा डायनामाइट केस के सिलसिले में सी.बी.आई. की विशेष टीम मेरी तलाश कर रही थी। पर, समय रहते पूर्व सूचना मिल गई और मैं किसी तरह उस टीम की गिरफ्त में आने से बच गया। मैं फरार हो गया।

 पर फरारी के महीनों में मुझे इतना अधिक परेशानी, अभाव और कष्ट से गुजरना पड़ा जिसका वर्णन मुश्किल है। मेरा काफी समय मेघालय के एक छोटे बाजार में बीता। वहां तब आॅल पार्टी हिल लीडर्स कांफे्रंस की सरकार थी। इसलिए आपातकाल का अत्याचार नहीं था।

 भूमिगत जीवन के कष्टों को देखकर कई बार मैं यह सोचता था कि बेहतर होता कि मैं गिरफ्तार ही हो जाता। पर,दूसरे ही क्षण यह डर समा जाता कि मुझे मार-मार कर सी.बी.आई. डायनामाइट केस में मुखबिर बना देगी। जिस रेवतीकांत सिन्हा को सी.बी.आई. ने मुखबिर बनाया, उन्हें मेरी अपेक्षा फर्नांडिस की गतिविधियों के बारे में कम ही जानकारियां थीं।

 मेरे जैसे दुबले-पतले और कमजोर से दिखने वाले व्यक्ति को धमका कर मुखबिर बनाने की कोशिश जांच एजेंसियां करती रही हैं।

  17 फरवरी, 1977 को मुखबिर रेवतीकांत सिन्हा का इकबालिया बयान देश के सभी अखबारों में छपा था। वह बयान उन्होंने दिल्ली के चीफ मेट्रोपोलिटन मजिस्टेªट मोहम्मद शमीम की अदालत में दिया था। उस बयान में अन्य बातों के अलावा सिन्हा ने यह भी कहा था कि ‘मेरे पटना स्थित आवास पर चार लोगों की बैठक हुई।

जुलाई, 1975 के पहले हफ्ते में हुई उस बैठक में मेरे अलावा जार्ज फर्नांडिस, महेंद्र नारायण वाजपेयी और सुरेंद्र अकेला थे। बैठक में जार्ज ने घोषणा की कि वह इंदिरा सरकार को उखाड़ फेंकने की योजना बना रहे हैं।

इसके लिए उन्हें कुछ विश्वस्त कार्यकर्ताओं की आवश्यकता है।’

याद रहे कि उन दिनों मैं सुरेंद्र अकेला के नाम से लिखता था।

 जार्ज फर्नांडिस प्रतिपक्ष के प्रधान संपादक थे। मैं उसका बिहार संवाददाता था। इस लिहाज से जार्ज से मेरी निकटता थी। याद रहे कि लाइसेंस घोटाले से संबंधित ‘प्रतिपक्ष’ की एक रिपोर्ट पर लोकसभा मंे लगातार पांच दिनों तक गर्मागर्म चर्चा हुई थी। यह बात सितंबर, 1974 की है। सदन में पांच दिनों तक कोई दूसरा कामकाज नहीं हुआ था।  

 बड़ौदा डायनामाइट केस के सिलसिले में 24 सितंबर 1976 को अदालत में आरोेप पत्र दाखिल कर दिया गया था। केस की सुनवाई चल रही थी। सी.बी.आई. ने इस केस के सिलसिले मेंे जिन्हें गिरफ्तार किया, उन्हें बड़ा कष्ट दिया।

दिल्ली विश्वविश्वविद्यालय के व्याख्याता विनोदानंद सिंह को तो कुर्सी से बांध कर रखा गया था। विनोद जी को बाद में सी.बी.आई. ने छोड़ दिया था।

वह 1977 में बिहार के गायघाट से जनता पार्टी के विधायक बने थे।

 सी.बी.आई. को इस केस के सिलसिले में कई झूठी जानकारियां भी मिली थीं। उनमें एक गलत जानकारी यह भी थी कि मैं जार्ज के लिए नेपाल से पैसे लाता था। सी.बी.आई. के अनुसार काठमांडु स्थित चीनी दूतावास से मैं संपर्क में था।

सी.बी.आई. के एक जांच अधिकारी ने मेरे एक मित्र को बताया था कि यदि सुरेंद्र अकेला गिरफ्तार हो जाता तो हमें जार्ज से चीन के रिश्ते का पता चल जाता।

 पर, सच्चाई यह है कि मैं आज तक नेपाल नहीं गया हूं। चीनी दूतावास से किसी तरह के संपर्क का सवाल ही नहीं उठता।

 पर, यह तब की जांच एजेंसी की ‘कार्य कुशलता’ का एक नमूना था।

 खैर मुझे गिरफ्तारी से बचाया था मुख्य मंत्रीसचिवालय के एक अफसर ने। समाजवादी पृष्ठभूमि के शिवनंदन पासवान तत्कालीन मुख्यमंत्री डा. जगन्नाथ मिश्र के सचिवालय में तैनात थे।

 दिल्ली से सी.बी.आई. की टीम आई हुई थी। उसने मुख्यमंत्री सचिवालय से संपर्क करके पटना का मेरा पता-ठिकाना पूछा। पासवान के अलावा किसी को मेरे बारे में कोई बात मालूम नहीं थी।

 पासवान ने हमारे परिचित लक्ष्मी साहु को इस बात की सूचना देते हुए कहा कि अकेला जी को शीघ्र खबर कर दीजिए कि वे फरार हो जाएं।

कर्पूरी ठाकुर के निजी सचिव रहे लक्ष्मी साहु ने किसी तरह पटना के जक्कनपुर स्थित मेरा घर खोजा। वहां मैं किराए के मकान में रहता था। मुझे छिप जाने को कहकर लक्ष्मी जी तुरंत वहां से चल दिए।

आपातकाल का इतना आतंक ही था कि किसी ऐसे व्यक्ति के पास फटकना भी कोई नहीं चाहता था जिसे सी.बी.आई. कौन कहे पुलिस भी खोज रही हो।

मैं फरार हो गया। प्रतिपक्ष के संवाददाता के रूप में मुझे हर माह दो सौ रुपए मिलते थे। जार्ज ने आपातकाल लागू हो जाने के बाद भी वह राशि मुझे भिजवानी जारी रखी। हालांकि प्रतिपक्ष का प्रकाशन 25 जून, 1975 के बाद बंद हो गया था।

फिर भी पैसे भिजवाने का बड़ा कारण यह था कि आपातकालीन भूमिगत गतिविधियों में मैं जार्ज का सहयोग कर रहा था।

 मेरा असल कष्ट शुरू हुआ 1976 के मार्च में। तब बड़ौदा में डायनामाइट पकड़ा गया था। उससे जोड़कर जार्ज फर्नांडिस के साथियों की गिरफ्तारियां शुरू हुईं।

 फरारी समय में कोई मुझे शरण देने को तैयार ही नहीं था। रिश्तेदार भी भला नाहक क्यों संकट मोल लेते !
 मेरे मित्र और पटना सचिवालय में सहायक रामबिहारी सिंह ने एक अन्य सरकारी कर्मचारी श्रीवास्तव के पटना स्थित आवास में मुझे रखवा दिया।

पटना के बांसघाट के पास की उस घनी आबादी वाले मोहल्ले में कुछ दिन तो बीत गए, पर एक जगह अधिक दिनों तक रहा भी नहीं जा सकता था। पैसों की भारी दिक्कत थी। मेरे जैसे मामूली अभियानी पत्रकार को आपातकाल में कोई पैसे क्यों देता ?

राजनीतिक लोग या तो जेल में थे या काफी डरे हुए थे। इस बीच जार्ज से मिलना भी बंद हो गया। उनके पत्र जरूर आ रहे थे।

आपातकाल लागू होने के बाद मैं जार्ज से बंगलुरू, कोलकाता और दिल्ली में बारी -बारी से मिला था।
 जार्ज की गिरफ्तारी के बाद मैंने बिहार छोड़ देना ही बेहतर समझा।

मेरे बहनोई मेघालय के गारो हिल्स जिले के फुलबाड़ी बाजार में अपना छोटा व्यापार करते थे। मेरी बहन भी वहीं थीं।

 मैं जाकर वहीं रहने लगा। वहां चूंकि आपातकाल का कोई अत्याचार था ही नहीं, इसलिए मेरे रिश्तेदार यह समझ ही नहीं सके कि सी.बी.आई. को मेरी कितनी तलाश है। उनके यहां कोई अखबार भी नहीं आता था।
 पर मैं यह समझ रहा था कि मुझे यहां बैठकर रहने के बदले किसी काम में लग जाना चाहिए। मैं अपने बहनोई की दुकान पर ही बैठना चाहता था। बहनोई राजी थे। पर मेरी दीदी ने साफ मना कर दिया। उसने कहा कि आपको जो करना हो करिए, पर बबुआ दुकान नहीं चलाएगा। बाबू जी सुनेंगे तो उन्हें इस बात का बुरा लगेगा कि राजपूत का लड़का दुकान चला रहा है।

  जीजा जी भी मान गए।

 नतीजतन मैं बहन के घर खाता और सोता था। शाम को बाजार जाता था। एक बंगाली की चाय की दुकान में बैठकर चाय पीता था और ‘असम ट्रिब्यून’ पढ़ता था।

कुछ दिनों तक तो यह ठीक ठाक चलता रहा। फुलबाड़ी तब एक छोटी जगह थी। बंगलादेश की सीमा के पास है। वहां सब एक दूसरे को जानते थे। समय बीतने के साथ इस बात की चर्चा शुरू होने लग गयी कि अंग्रेजी पढ़ने वाला यह व्यक्ति यहां निट्ठला क्यों बैठा हुआ है ? क्या इंदिरा गांधी का सी.आई.डी. है ? क्या स्थानीय सरकार पर नजर रखने के लिए इसकी तैनाती हुई है ?

 जब यह चर्चा मुझ तक भी पहुंची तो मैं चिंतित हो गया। आशंका हुई कि यदि स्थानीय पुलिस मुझसे पूछताछ करने लगेगी तो मैं क्या जवाब दूंगा ? जल्दी-जल्दी मैं वहां से भागकर पटना पहुंचा। क्योंकि इस बीच नवंबर, 1976 में मेघालय के मुख्यमंत्री विलियमसन ए. संगमा कांग्रेस में शामिल हो चुके थे। मेघालय की राजनीतिक स्थिति बदल चुकी थी।

हालांकि तब तक पूरे देश में आपातकाल की कठोरता कम होने लगी थी। बड़े नेतागण जेलों से रिहा होने लगे थे। चुनाव होने वाले थे। हालांकि बड़ौदा डायनामाइट केस की सुनवाई चल ही रही थी। जब 1977 में मोरारजी देसाई की सरकार बनी तभी वह केस वापस हुआ।

लोकसभा चुनाव की घोषणा के साथ ही यह लगने लगा था कि कांग्रेस हार जाएगी। फिर तो मैंने ‘आज’ अखबार के पटना दफ्तर में नौकरी शुरू कर दी।

 मंत्री बनने के बाद जार्ज ने मुझसे कहा कि ‘दिल्ली चलकर प्रतिपक्ष निकालो।’

मेरे कुछ ‘शुभचिंतकों’ ने भी कहा कि ‘चले जाओ, उद्योगमंत्री से कुछ व्यापारियों की मुलाकात भी करवा दोगे तो जीवन संवर जाएगा। कई उद्योगपतियों के जायज बड़े काम भी मंत्री से मुलाकात नहीं होने के कारण रुका रहता है।’

इस पर मैंने कहा कि मुझे ऐसा जीवन मंजूर नहीं है। मैंने साफ मना कर दिया। क्योंकि संघर्षशील  जार्ज मुझे जरूर प्रभावित करते थे, पर मंत्री जार्ज कत्तई नहीं। वैसे भी मैं राजनीतिक गतिविधियांे से अलग हो जाने का पहले ही मन बना चुका था। आपातकाल के विशेष कालखंड में आपात धर्म ही निभा रहा था। उससे पहले किसी पेशेवर अखबार में नौकरी पाने की प्रतीक्षा में प्रतिपक्ष और जनता जैसे अभियानी और सोद्देश्य पत्रिकाओं में काम कर रहा था।
(दैनिक नया इंडिया में प्रकाशित)