शनिवार, 20 मई 2017

अंततः फायदे में नहीं रहते राजनीति में हिंसा का सहारा लेने वाले

 जयप्रकाश नारायण ने 14 जून 1974 को बिहार विधानसभा के स्पीकर हरिनाथ मिश्र को लिखा था कि ‘विधानसभा के सामने छात्रों के सत्याग्रह के सिलसिले में कुुछ विधायकों के साथ दुव्र्यवहार किये जाने और उनके विरूद्ध भद्दे नारे लगाये जाने की सूचना मुझे मिली है। रिपोर्ट परस्पर विरोधी है, पर यह लगता है कि कुछ भद्दे नारे तो सत्याग्रहियों ने भी दुहराये। पर कुर्ता फाड़़ना, रिक्शे से नीचे खींचना आदि दुष्कृत्य दर्शकों में से ही कुछ लोगों ने किये। पर चाहे जिन लोगों ने ऐसा किया हो, मुझे घटना के लिए बहुत खेद है। जिन विधायकों के साथ ऐसा दुव्र्यवहार किया गया, उनके प्रति मैं क्षमाप्रार्थी हूं। आप मेरी यह भावना उन सभी विधायकों तक पहुंचा दें और मेरा यह पत्र विधानसभा में पढ़कर सुना देने की कृपा करें। मैं आभार मानूंगा।’

  इस पत्र को आज के संदर्भ में देखें। बुधवार को पटना के वीरचंद पटेल पथ पर जो कुछ हुआ, उससे जेपी की आत्मा कराह रही होगी। इसलिए भी राजद और भाजपा के आज के शीर्ष नेतागण 1974 के उस आंदोलन में सकिय थे जिसका नेतृत्व जेपी ने किया था। कुछ लोग कह सकते हैं कि क्या राजनीति के सतयुग की बात आज के ‘कलियुग’ में लेकर बैठ गए! पर राजनीति के ‘कलियुग’ का एक उदाहरण यहां पेश है।

नब्बे के दशक की बात है। सी.बी.आई. चारा घोटाले की जांच कर रही थी। सी.बी.आई. के संयुक्त निदेशक डाॅ. यू.एन. विश्वास के खिलाफ राजद ने पटना राजभवन के सामने तलवार जुलूस निकाला था। विश्वास के पुतले को तलवार से काटा गया था। पर क्या ऐसे प्रदर्शन से राजद को कोई लाभ मिला? न तो कानूनी लाभ मिला और राजनीतिक लाभ।

चारा घोटाले के केस में क्या हो रहा है, यह सबको मालूम है। साथ ही जिस लालू प्रसाद ने अपने बल पर 1995 के चुनाव में विधानसभा में पूर्ण बहुमत लाया था, उनके दल ने सन 2000 के चुनाव में बहुमत खो दिया। कांग्रेस की मदद से राबड़ी देवी की सरकार बन सकी थी।

मंगलवार को आयकर महकमे ने लालू प्रसाद से जुड़े लोगों के ठिकानों पर छापे मारे। लोकतांत्रिक देश में अच्छा तो यह होता कि राजद के लोग उसका मुकाबला कानूनी तरीके से करते। लाठी-डंडे के साथ प्रतिबंधित क्षेत्र में शक्ति प्रदर्शन से न नब्बे के दशक में उन्हें लाभ मिला था और न ही अब मिलने की उम्मीद है। उधर भाजपा के लोगों ने बुधवार को राजद के प्रदर्शनकारियों के मुकाबले के सिलसिले में कोई आदर्श उपस्थित नहीं किया।

जेपी आंदोलन में यही लोग यह नारा लगा रहे थे कि ‘हमला चाहे जैसा होगा, हाथ हमारा नहीं उठेगा।’ पर वीरचंद पटेल पथ पर कुछ भाजपाइयों के हाथों में भी लाठियां और पत्थर देखे गये थे। यदि बिहार में सुशासन है तो वह एक बार फिर कसौटी पर है। यदि बुधवार को पटेल पथ पर अशोभनीय और हिंसंक दृश्य उपस्थिति करने वालों दोनों पक्षों के उपद्रवियों पर कार्रवाई करनी होगी। हालांकि यह बात छिपी नहीं रही कि पहल तो राजद से जुड़े लोगों ने ही की थी।   


हिंसक राजनीति की प्रयोगशाला का हाल

पश्चिम बंगाल हिंसक राजनीति की प्रयोगशाला रहा है। सन 1967 में नक्सलबाड़ी से हिंसक आंदोलन शुरू हुआ। उसे तत्कालीन सिद्धार्थ शंकर राय की सरकार ने पुलिस और बाहुबलियों के बल पर कुचला। 1977 में कांग्रेस चुनाव हार गयी।

वाम मोर्चा ने भी लंबे समय तक राज किया। पहले तो अपने कुछ गरीबपक्षी कामों से वाम मोर्चा सरकार ने जनता का समर्थन पाया।पर बाद के दिनों में जोर जबर्दस्ती से राज चलाया। राय सरकार के दौर के अनेक बाहुबली वाम में शामिल हो गये। ममता बनर्जी ने उनकी हिंसा का विरोध करके सत्ता पायी। पर अब वैसा ही आरोप बनर्जी सरकार पर भी लग रहा है। ममता बनर्जी पर मुस्लिम तुष्टिकरण का भी आरोप है। नतीजतन वहां भाजपा बढ़ रही है।

देखना है कि दीदीगिरी कब तक चलती है। बाहुबल और जातीय सांप्रदायिक वोट बैंक के जरिए चुनाव जीतने के बदले लोकतंत्र में लोगों का दिल जीतना अधिक लाभदायक तरीका है।


शिक्षकों की हो परीक्षा

मंगलवार को पटना में बिहार के कुलपतियों और प्रतिकुलपतियों का सम्मेलन हुआ। उच्च शिक्षा के क्षेत्र में बिहार की गरिमा को पुनस्र्थापित करने की जरूरत बताई गयी। पर सवाल है कि इस काम की शुरुआत कहां से हो? 

मुझे कम से कम एक बात समझ में आती है। विद्यालयों से लेकर विश्वविद्यालयों तक पहले ऐसे शिक्षक तो बहाल हों जिन्हें अपने विषय का ज्ञान हो। खबर आती रहती है कि सब तो नहीं ,पर अधिकतर शिक्षक अयोग्य हैं। हाल में एक वी.सी. ने सार्वजनिक रूप से कहा कि पटना के सबसे प्रतिष्ठित काॅलेज में ऐसे शिक्षक भी आ गए हैं जिन्हें ‘प्रिंसिपल’ तक लिखना नहीं आता।

नब्बे के दशक की एक खबर के अनुसार, एक काॅलेज शिक्षक ने छुट्टी के आवेदन पत्र में लिखा कि मेरे स्टाॅमक में हेडेक है। उन्हीं दिनों मैंेने पटना के एक प्रतिष्ठित हाई स्कूल के प्राचार्य का हस्तलिखित आवेदन पत्र पढ़ा था। दस लाइन के आवेदन पत्र में कोई लाइन भी शुद्ध नहीं थी।

इस पृष्ठभूमि में मौजूदा शिक्षकों की प्रतिभा-योग्यता की टुकड़ों में बारी -बारी से जांच होनी चाहिए। यानी छोटे सौ -दो सौ के समूहों में शिक्षकों को बारी-बारी से बुलाकर ईमानदार अफसरों व पुलिकर्मियों की कड़ी निगरानी में जांच परीक्षा होनी चाहिए। जो पास करें,वे शिक्षक रहें और जो फेल करें उन्हें किन्हीं अन्य सरकारी कामों में लगा दिया जाए।

जो काॅलेज शिक्षक प्रिंसिपल शब्द शुद्ध नहीं लिख सकता है, उसके हाथों नई पीढि़यों का भविष्य क्यों सौंपा जाए? पटना हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति अजय कुमार त्रिपाठी ने भी कहा है कि शैक्षिक मुद्दों को आयरन हैंड से हैंडल करना होगा। यानी यदि अयोग्य शिक्षकों से छात्रों को मुक्त करने का कोई कड़ा प्रयास राज्य सरकार करेगी तो अदालत से भी समर्थन मिल सकता है।  

सरकारी मकान से मोह

केंद्र सरकार की पहल अच्छी है। वह नाजयज तरीके से सरकारी मकानों में वर्षों से रह रहे प्रभावशाली लोगों को शीघ्र निकाल बाहर करने का फैसला किया है। इसके लिए संबंधित नियमों में बदलाव किया जा रहा है।

पहले के नियम के अनुसार मकान खाली के करने के लिए सरकार सात सप्ताह का समय देती थी। इसे घटाकर अब तीन दिन किया जा रहा है। साथ ही मकान में बने रहने के लिए कोई निचली अदालत की शरण नहीं ले सकता है।
  
और अंत में

खबर छपी है कि पटना के पांच सफाई निरीक्षक निलंबित कर दिये गए। इस खबर को पढ़कर किसी ने सवाल पूछा कि क्या पटना में ऐसा कोई पद भी है ? उस पद कुछ लोग बैठे हुए भी थे ? क्या इन पांच के अलावा भी ऐसे कुछ और निरीक्षक भी हैं? आखिर वे करते क्या हैं ? क्या वे सिर्फ प्रभावशाली लोगों के यहां ही सफाई करवाते हैं ? 
(प्रभात खबर में प्रकाशित)

बुधवार, 17 मई 2017

गैर राजग दलों के पास भी चाहिए एक डाॅ. सुब्रह्मण्यम स्वामी

कुछ गैर राजग दल इन दिनों परेशान हैं। उनकी शिकायत है कि नरंेद मोदी सरकार लालू प्रसाद और पी.चिदम्बरम सहित कई प्रतिपक्षी नेताओं को खामख्वाह परेशान कर रही है। एकतरफा कार्रवाइयां हो रही हैं। ऐसी ही कार्रवाइयांं विवादास्पद राजग नेताओं के खिलाफ नहीं हो रही हंै। जबकि गंभीर आरोप उन पर भी हैं।

पर जब केंद्र में मनमोहन सिंह के नेतृत्व में यू.पी.ए. की सरकार थी तो प्रतिपक्षी नेता डाॅ. सुब्रह्मण्यम स्वामी ने ऐसी शिकायत करने की जगह लोकहित याचिकाओं का सहारा लिया। उन्होंने एक नागरिक के रूप में भी भ्रष्टाचार के किसी मामले में केस करने की अनुमति भी अदालत से ले रखी थी।

टू जी घोटाले से लेकर जयललिता तथा नेशनल हेराल्ड जैसे कई मामलों में अदालतों के जरिए अनेक नेताओं को डाॅ. स्वामी ने कठघरे में खड़ा कर दिया।

 लालू प्रसाद से जुड़े लोगों ंके खिलाफ आयकर महकमे की छापेमारियों के बाद राजद के कुछ नेताओं ने  एकतरफा कार्रवाइयों का आरोप लगाया। एक राजद प्रवक्ता ने तो भाजपा विधायक दल के नेता सुशील कुमार मोदी के खिलाफ व्यक्तिगत आरोप को लेकर सबूत भी मीडिया को दिखाए। पर सवाल है कि उन्हें अदालत जाने से कौन रोक रहा है ? क्या उनके अधकचरे सबूत उन्हें रोक रहे हैं ?

सरकारों द्वारा दरअसल एकतरफा कार्रवाइयों का आरोप कोई नया नहीं है। यह आरोप दशकों पुराना है। लगभग सभी दलों के नेतागण यह बात जानते हैं। इसलिए यदि आपके पास सी.बी.आई., आयकर, ईडी या फिर पुलिस नहीं है तो आप कोर्ट का सहारा तो ले ही सकते हैं।

पर इसके लिए दो बातें होनी होंगी। एक तो आप जिस पर आरोप लगा रहे हैं, उस पर ऐसे ठोस सबूत एकत्र करने होंगे जो अदालत में टिक सकें। दूसरी बात यह भी कि अपने बीच से एक ‘डाॅ. सुब्रह्मण्यम स्वामी’ खड़ा करना होगा।

देश के कानूनप्रिय लोग तो यही चाहते हैं कि राजग का स्वामी गैर राजग दलों के भ्रष्ट नेताओं को उनकी सही जगह पर पहुंचाए। उधर गैर राजग दलों का कोई स्वामी ऐसा ही सलूक राजग के भ्रष्ट नेताओं के साथ करे। तभी सभी दलों के सभी भ्रष्ट नेताओं के होश ठिकाने आ सकेंगे। इससे राजनीति की सफाई होगी। राजनीति की जब तक सफाई नहीं होगी, तब तक सरकारी अफसरों के बीच के भ्रष्ट तत्व सही रास्ते पर नहीं आएंगे। अन्य क्षेत्रों में व्याप्त भ्रष्टाचार पर भी तभी काबू पाया जा सकेगा।
यदि दोनों पक्षों के भ्रष्ट नेता राजनीति की मुख्य धारा से बाहर होंगे तो सरकारी साधनों की लूट बंद होगी। फिर लूट से बचे उन साधनों के जरिए इस देश की गरीबी कम करने में मदद मिलेगी। यदि दोनों पक्षों में ‘स्वामी’ सक्रिय नहीं होंगे तो पहले की ही तरह एकतरफा कार्रवाइयां होती रहेंगी।  
गैर राजग दलों के पास एक से एक बेहतरीन वकील हैं। राम जेठमलानी से लेकर कपिल सिब्बल तक। अभिषेक मनु सिंघवी से लेकर प्रशांत भूषण तक। पर वहां कोई ‘डा.स्वामी’ नजर नहीं आ रहा  है।

एक ‘स्वामी’ खड़ा कीजिए और फिर देखिए कमाल! पर असली कमाल तो आपके पास का सबूत दिखाएगा। यदि है तो। यदि आप कोई स्वामी खड़ा नहीं कर पा रहे हैं तो इससे यह नतीजा निकाला जा सकता है कि आपके पास राजग नेताओं के खिलाफ भ्रष्टाचार के कोई ठोस सबूत नहीं हैं। ठोस सबूत नहीं रहने पर अदालतें उन्हें भी दोष मुक्त कर देती हैं जिन्हें सरकार कोर्ट में खड़ा करवाती है।

ऐसे कई उदाहरण हैं। मोरारजी देसाई के प्रधान मंत्रित्वकाल में सी.बी.आई. ने 3 अक्तूबर 1977 को इंदिरा गांधी को गिरफ्तार करके दिल्ली के कोर्ट में पेश कर दिया था। पर जब आरोपों के मामले में सी.बी.आई.कोर्ट को संतुष्ट नहीं कर सकी तो ंअदालत ने इंदिरा गांधी को तुरंत रिहा कर देने का आदेश दे दिया।

 इसी तरह राजीव गांधी के शासनकाल में कांग्रेस के कुछ लोगों ने वी.पी. सिंह के पुत्र अजेय सिंह का सेंट किट्स के एक बैंक में जाली खाता खोलकर उसमें अपनी तरफ से काफी पैसा जमा करवा दिया। वी.पी. सिंह को बदनाम करने के लिए उस खाते का खूब प्रचार किया गया। पर अजेय सिंह का कुछ नहीं बिगड़ा। जबकि सरकार कांग्रेस की थी। खाता जाली निकला।
बिहार में भी कई बार विभिन्न दलों की सरकारों ने बारी -बारी से एकतरफा कार्रवाइयां कीं। पर अपवादों को छोड़ दें तो फंसने ही वाले ही फंसे, पर जिनके खिलाफ पुख्ता सबूत नहीं थे, वे साफ बच गये। चारा घोटाले की सी.बी.आई. जांच लोकहित याचिका के कारण ही हुई थी। उस समय लालू प्रसाद के दल की सरकार केंद्र और बिहार में थी।

दोतरफा प्रयासों के अभाव में निष्पक्ष कार्रवाइयों के साथ -साथ इस देश में राजनीतिक कारणों से एकतरफा कार्रवाइयां भी चलती रहेंगी और अदालतें अपना काम भी करती रहेंगी। अदालतों की सक्रियता का लाभ यदि एक डाॅ. स्वामी उठा सकते हैं तो कोई अन्य ‘स्वामी’ क्यों नही ? यदि कोई नहीं उठा रहा है तो इसका लोगबाग यही मतलब लगाते हैं कि उनके पास सबूत नहीं हैं।

लालू परिजन के यहां आयकर महकमे ने छापे मारे हैं। यह मामला अंततः कोर्ट में भी जा सकता है। कुछ ठोस मिलेगा तो कार्रवाई होगी। राजद भाजपा नेता सुशील कुमार मोदी के खिलाफ आरोप लगा रहा है। बेहतर तो यह होगा कि आरोप लगाने वाले अदालत की शरण लें। अदालत दूध का दूध और पानी का पानी कर देगी। निष्पक्ष मतदाता तो यही चाहता है कि चाहे जिस पक्ष के नेता पर आरोप लगे, उसकी सही जांच होनी चाहिए। बेहतर तो यह होगा कि अदालत की निगरानी में सी.बी.आई. जांच करे।
जाहिर है कि परंपरा के अनुसार सत्ताधारी दल प्रतिपक्षी नेताओं के खिलाफ जांच कराएगा। पर अदालत का फैसला आने पर तो किसी सरकार को सत्ताधारी दल के नेताओं पर भी जांच करानी ही पड़ती है।

(इस विश्लेषण का संक्षिप्त अंश 17 मई 2017 के प्रभात खबर में प्रकाशित)



   

शुक्रवार, 12 मई 2017

कठिन हो गया है योग्य उम्मीदवारों का मेडिकल कालेजों में दाखिला !

व्यापमं घोटाले को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने गत फरवरी में तीन सौ मेडिकल छात्रों के दाखिले को रद कर दिया। नाजायज तरीके से मध्य प्रदेश के मेडिकल कालेजों में दाखिला पाने का उनपर आरोप था।

इधर ‘नीट’ के प्रश्न पत्र आउट करने की कोशिश के आरोप में पटना में रविवार को परीक्षा माफिया  दस्ते के पांच  सदस्य पकड़े गये। माफिया का नेटवर्क पूरे देश मेें सक्रिय है। वे लोग 20 लाख रुपए में मेडिकल प्रतियोगिता परीक्षा पास कराने की गारंटी लेते हैं। करीब 10-15 साल पहले इस काम में 15 लाख रुपए लगते थे।

इस धंधे को उच्चस्तरीय संरक्षण हासिल है। इसीलिए यह लगातार जारी है। ऐसे धंधे को जिन सत्ताधारी नेताओं तथा अन्य लोगों का संरक्षण हासिल है, क्या उन्हें सजा नहीं मिलनी चाहिए ? अनेक सत्ताधीन नेताओं, बड़े अफसरों और धन पशुओं में अपनी संतानों को येन-केन प्रकारेण मेडिकल कालेजों में दाखिला कराने की होड़ मची रहती है। इसलिए भी माफियाओं को राजनीतिक और प्रशासनिक संरक्षण हासिल है।

अपार पैसों के बल पर देश भर में अयोग्य उम्मीदवारों का मेडिकल के डिग्री और पी.जी.पाठ्यक्रमों में दाखिला कराया जा रहा है। यानी अपवादों को छोड़ दें तो ऐसे-ऐसे डाक्टर तैयार किए जा रहे हैं, जो सामान्य मरीजों का भी ठीक से इलाज नहीं कर पाएंगे। विशेषज्ञता की तो बात ही और है।

कई मेडिकल कालेजों से खबर आती रहती है कि वार्षिक परीक्षाओं में भी बड़े पैमाने पर कदाचार हो रहे हैं। अयोग्य लोगों को दाखिला दिलाया जाएगा तो वे एम.बी.बी.एस. की वार्षिक परीक्षाएं भी चोरी करके ही तो पास कर पाएंगे।

भ्रष्ट तंत्र वाले इस देश में नेतागण और शासन तंत्र करोड़ों अभागे व गरीब मरीजों को साल दर साल अयोग्य डाक्टरों के हवाले कर रहे हैं। पर नेताओं व अफसरों में कुछ अपवाद भी हैं। पर अपवादों से देश नहीं चलता।
इस मारक स्थिति के लिए शासन व्यवस्था में व्याप्त भीषण भ्रष्टाचार जिम्मेदार है।

भ्रष्टाचारियों का नेटवर्क काफी ताकतवर बन चुका है। उन पर राजनीति के बीच के सारे ईमानदार लोगों को मिलकर पूरी ताकत से हमला करना होगा। क्योंकि मुख्यतः राजनीति के बीच के ही बेईमान लोग इस नेटवर्क के मुख्य संरक्षक हैं।

सरकारी भ्रष्टाचार का कुप्रभाव समाज व सत्ता के विभिन्न क्षेत्रों पर भी पड़ रहा है। इस बीच यदि किसी दल के किसी नेता पर भ्रष्टाचार के आरोप लगते हैं कि वह दल आरोप लगाने वाले दल के किसी अन्य नेता पर भी ऐसे ही आरोप लगाकर अपने कर्तव्यों की इतिश्री मान लेता है।

यानी वे कहते हैं कि आरोप मुझ पर है तो तुम भी कौन दूध के धोये हुए हो ! आरोप-प्रत्यारोप के दो पाटों के बीच आम जनता पिस रही है। डाक्टरों को ‘धरती का भगवान’ कहा जाता है। क्या इस देश की राजनीति कभी इस बात पर गंभीरतापूर्वक विचार करके आम सहमति बनाने की कोशिश करेगी कि कम से कम ‘धरती के नकली भगवानों’ का तो निर्माण किसी भी कीमत पर तत्काल रोक दिया जाना चाहिए ? यदि देश के शिक्षा-परीक्षा माफियाओं को पक्ष विपक्ष के नेताओं और बड़े अफसरों का संरक्षण मिलना बंद हो जाए तो यह काम कतई असंभव नहीं।  


कौन मिटाएगा भ्रष्टाचार ?

  भाजपा नेता अटल बिहारी वाजपेयी ने 21 दिसंबर 1997 को भुवनेश्वर में कहा था कि ‘नैतिकता की उम्मीद केवल भाजपा से ही क्यों की जा रही है ? आप हमसे क्या अपेक्षा रखते हैं ? राजनीति के खेल में क्या दूसरे लगातार ‘फाउल’ करे और हम नियमों पर चलें ?’ दरअसल तब उनसे यह सवाल पूछा गया था कि आपने यू.पी. के भाजपा मंत्रिमंडल को गिरने से बचाने के लिए वहां के तमाम माफिया विधायकों को सरकार में क्यों शामिल करा दिया ? 

करीब 20 साल बाद ऐसा ही तर्क पूर्व राज्यसभा सदस्य शिवानंद तिवारी ने दिया है। उन्होंने कहा कि भाजपा मानती है कि सिर्फ वही सदाचारी है। बाकी सब कदाचारी हैं। भाजपा को लगता है कि लालू समाप्त हो जाएं तो देश की राजनीति सदाचारी हो जाएगी।’

ऐसे ही तर्क-वितर्क-कुतर्क के सहारे दशकों से इस देश की राजनीति चल रही है। पर सवाल है कि क्या भ्रष्टाचार का मसला सिर्फ राजनीतिक दलों और नेताओं के बीच का ही मामला है ?

इस बहस में भ्रष्टाचार से रोज-रोज पीडि़त हो रही आम जनता कहां है ? आखिर उसे भ्रष्टाचार के राक्षसों से मुक्ति कौन दिलाएगा ? याद रहे कि भ्रष्टाचार आज लोगों के जीवन- मरण का प्रश्न बन चुका है। भ्रष्टाचार के कारण प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से आज देश में कहीं न कहीं किसी न किसी की जान जा रही हैं। अब यह तर्क भी दिया जाने लगा है कि जब जनता ही भ्रष्ट और अपराधी लोगों को चुन लेती है तो कोई क्या कर सकता है?
पर सवाल है कि ऐसी नौबत लाई किसने ? सवाल है कि लुटेरों, माफियाओं और डकैतों को चुनावी टिकट कौन देता है ? यदि सारे दल अच्छे उम्मीदवार ही खड़ा कराएंगे तो जनता के सामने भी मजबूरी हो जाएगी कि वह उन्हीं अच्छों में से किसी एक अच्छे को चुने। आज तो उल्टा ही हो रहा है। जिस तरह अपने वेतन-भत्तों और सुविधाओं की बढ़ोत्तरी के मामले में सांसद-विधायक तुरंत सर्वदलीय सहमति बना लेते हैं, उसी तरह यदि वे चाहते तो सिर्फ गैर विवादास्पद लोगों को ही टिकट देने के मामले में भी आम सहमति बना सकते थे। पर वे ऐसा कत्तई नहीं चाहते।  

साठ के दशक में एक अमेरिकन प्रोफेसर ने उत्तर प्रदेश में अपने गहन रिसर्च के बाद लिखा था कि अपने स्वार्थवश सत्ताधारी नेताओं ने ही राज्य स्तर से लेकर नीचे तक भ्रष्टाचार का बीजारोपण किया और फैलाया।
आम लोग तो भ्रष्टाचार के शिकार हैं। फिर भी कुछ नेता लोग यह चाहते हैं कि न तो स्कूटर पर सांड ढुलवाने वालों को कोई सजा हो और न ही यादव सिंह नामक महाभ्रष्ट इंजीनियर को संरक्षण देने वालों को।

इस देश में जैन हवाला घोटालेबाज भी बच जाते हैं और बोफर्स घोटालेबाज भी। भले बाजार से कर्ज लेकर केंद्र और राज्य सरकारें अपना खर्च चलाने को मजबूर हों, पर सार्वजनिक धन के अधिकतर लुटेरों पर कोई आंच नहीं आती है। आखिर यह सब कब तक चलेगा ?
अधिक दिनों तक नहीं।  


ऐसे शिकार बना रहा भ्रष्टाचार 

देश के अधिकतर नगर प्रदूषण और अतिक्रमण से कराह रहे हैं। प्रदूषण से कैंसर की बीमारी बढ़ रही है। वाहन और कल कारखाने प्रदूषण फैला रहे हैं। बाजार की अधिकतर सामग्री में मिलावट है। बटखरों का वजन कम है। पेट्रोल पंपों में चीप लगाकर कम तेल दिया जा रहा है। इस देश में इस तरह की अन्य अनेक गड़बडि़यां आए दिन सामने आती रहती हैं। पर इन पर निगरानी रखने वाले अधिकतर सरकारी अफसरों को सिर्फ रिश्वत चाहिए।
ऐसे भ्रष्ट निगरानी अफसरों को, उनसे पैसे लेकर, जो सत्ताधारी नेता-अफसर संरक्षण देते हैं, क्या उन्हें सजा नहीं होनी चाहिए ? उत्तर प्रदेश से यह खबर आई है कि यदि जिलों के एस.पी. थानेदारों से मासिक उगाही बंद कर दें तो अपराध काफी हद तक रुक जाएगा।

क्या ऐसी उगाही सिर्फ एक राज्य तक सीमित है ?

अभी तो भीषण भ्रष्टाचार से जनता पीडि़त और अधिकतर नेता लाभन्वित हो रहे हैं। हां,नेताओं की अगली पीढियां अन्य लोगों के साथ -साथ भ्रष्टाचार से अधिक पीडि़त हांेगी। तब उनके वंशज अपने पूर्वजों को ही गालियां देंगे। 


और अंत में

दुनिया के एक तिहाई गरीब भारत में रहते हैं। इस देश के 20 करोड़ लोग रोज भूखे पेट सो जाते हैं। 1985 में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने कहा था कि दिल्ली से हम जो सौ पैसे भेजते हैं, उनमें से 15 पैसे ही जनता तक पहुंच पाते हैं।

85 पैसे बिचैलिए लूट लेते हैं। इस मामले में 32 साल बाद भी कितना फर्क आया है ? 85 पैसे लूटने वालों और उन्हें सरंक्षण देने वाले कितने बड़े नेताओं और अफसरों को अब तक सजाएं मिल सकी हैं ?
( प्रभात खबर में 11 मई 2017 को प्रकाशित)

रविवार, 7 मई 2017

किसानों की आय बढ़ाए बिना कैसे बढ़ेंगे उद्योग-धंधे !

गत लोकसभा चुनाव के समय भाजपा ने यह वादा किया था कि सत्ता में आने पर  उसकी सरकार किसानों की आय डेढ़ गुनी कर देगी। किसान उस दिन की अभी प्रतीक्षा कर रहे हैं। मोदी सरकार के एक वरिष्ठ मंत्री ने यह भी कहा था कि सरकार 60 साल से अधिक उम्र के किसानों के लिए पेंशन योजना शुरू कर सकती है। वह भी नहीं हुआ।

इस साल के आर्थिक सर्वेक्षण में नरेंद्र मोदी सरकार से देश के प्रत्येक नागरिक को हर महीने एक तयशुदा आमदनी सुनिश्चित करने की सिफारिश की गयी है। पर सवाल है कि कर का दायरा बढ़ाये और टैक्स चोरी रोके बिना इसके लिए आर्थिक संसाधन कहां से आएंगे ?

इस बीच स्वामी रामदेव की पतंंजलि संस्था ने देश के कुछ किसानों की आमदनी जरूर बढ़ाई है। पर पतंजलि की अपनी सीमाएं हैं। पतंजलि का दावा है कि उसने देश के एक करोड़ किसानों को पतंजलि उद्योग से जोड़ा है। अगले कुछ समय में इस संख्या को बढ़ाकर पांच करोड़ करने की उनकी योजना है।

यानी कृषि उत्पाद को पतंजलि से जुड़े कारखानों में इस्तेमाल किया जा रहा है। पतंजलि दवाओं, खाद्य और पेय पदार्थों का बड़े पैमाने पर उत्पादन कर रही है। पतंजलि के उत्पादों की बढ़ती मांग को देखते हुए कृषकों के लिए थोड़ी उम्मीद बन रही है।

पतंजलि किसान और संबंधित राज्य सरकारों के बीच ईमानदार तालमेल हो सके तो बड़ी संख्या में किसानों को उनके उत्पाद का उचित दाम मिल सकेगा। इससे किसानों की आत्महत्याएं कम होंगी। पर इसमें एक कठिनाई सामने आ रही है। अन्य अनेक लोगों की तरह ही मेरे परिवार में भी पतंजलि के अनेक उत्पादों का इस्तेमाल होता है। उसमें मिलावट और खराब गुणवत्ता का खतरा बहुत कम है।

पर हाल के दिनों में पतंजलि उत्पादों को लेकर छिटपुट शिकायतें भी मिलने लगी हैं।

मैंने भी पतंजलि दफ्तर को इसकी शिकायत भेजी और गुणवत्ता पर निगरानी रखने  की सलाह दी। पर कोई जवाब नहीं आया। न ही किसी तरह की जांच की कोई खबर मिली। यदि अपनी भारी तरक्की से मुग्ध पतंजलि संगठन क्वालिटी कंट्रोल की उपेक्षा करता रहा तो न तो किसानों की उम्मीदें पूरी होंगी और न ही उपभोक्ताओं का उस पर विश्वास बना रहेगा। इस स्थिति में सबसे अधिक खुशी पतंजलि के प्रतिद्वंद्वी बहुराष्ट्रीय संगठनों को होगी।

याद रहे कि मिलावटखोरों के सामने इस देश की सरकारें लगभग लाचार बनी हुई हैं। परोक्ष रूप से पतंजलि उन मानवद्रोहियों का मुकाबला कर रही है। 


किसानों के हितैषी चैधरी चरण सिंह

पूर्व प्रधानमंत्री चैधरी चरण सिंह किसानों के हित में देश का हित देखते थे। उन्होंने अपने जीवनकाल में इस बात का लगातार प्रचार किया कि किसानों की आय बढ़ाये बिना कारखानों का विकास नहीं हो सकता। देश की अधिकतर आबादी गांवों में रहती है। वह खेती पर निर्भर है।

पर उनमें से अधिकतर किसानों की आय इतनी कम है कि वे अन्य जरूरी सामान के साथ-साथ अपने बच्चों के लिए भी न तो जरूरत के अनुसार कपड़े खरीद पाते हैं और न ही जूते। अधिकतर किसान परिवारों में स्कूली बैग और स्लेट-पेंसिल के भी लाले पड़े रहते हैं।

यदि उन किसानों और उनसे जुड़े लोगों की आय बढ़ेगी तभी जूते, छाते, स्कूली बैग, स्लेट -पेंसिल आदि के अधिक कारखाने लगेंगे। 

पर चरण सिंह से जुड़े नेताओं ने भी सत्ता में आने के बाद खेती की उपेक्षा की। नतीजतन अधिकतर किसानों के लिए आज भी खेती लाभ का पेशा नहीं है।  


आखिर क्यों बढ़ रही भाजपा !

भाजपा की लगातार चुनावी बढ़त से सेक्युलर दल चिंतित हैं। होना भी चाहिए। क्योंकि कोई दल यदि एकतरफा ढंग से बढ़ता जाएगा तो उसकी सरकार में तानाशाही की प्रवृत्ति पैदा हो सकती है। पर समस्या यह है कि तथाकथित सेक्युलर दलों को भाजपा की बढ़त के असली कारण समझ में नहीं आ रहे हैं। या फिर वे समझना नहीं चाहते ?

सेक्युलर दलों के लिए तथाकथित शब्द का इस्तेमाल जानबूझकर कर रहा हूं। क्योंकि अधिकतर सेक्युलर दल और नेता सांप्रदायिक सवालों और समस्याओं पर एकतरफा रवैया अपनाते हैं। इस रवैये से भी भाजपा को बढ़त मिलती है।

एक पुरानी राजनीतिक कथा याद आती है। वह कथा एक पत्रकार कामरेड ने 1977 में ही सुनाई थी। 1977 में लोकसभा का चुनाव प्रचार चल रहा था। जयप्रकाश नारायण और जनता पार्टी के नेताओं ने आपातकाल की ज्यादतियों को चुनाव का मुख्य मुद्दा बनाया था। तत्कालीन सरकार के भ्रष्टाचार और वंशवाद अधिकतर लोगों के लिए अहम मुद्दे थे।

पर इस देश के कम्युनिस्टों की एक जमात के नेतागण अपनी पार्टी की चुनाव सभाओं में कहते थे कि दियो गार्सिया द्वीप में अमेरिका अपना फौजी अड्डा बना रहा है। इससे भारी खतरा है। यानी जो मुद्दे अधिकतर भारतीय जनता को उद्वेलित कर रहे थे, उनको कम्युनिस्टों ने महत्व नहीं दिया था।

नतीजतन 1977 में मतदाताओं ने जनता पार्टी को केंद्र की सत्ता सौंप दी। कांग्रेस के साथ-साथ अधिकतर कम्युनिस्टों की पराजय हुई। चुनाव के बाद कम्युनिस्ट नेताओं की बैठक में एक कामरेड ने चिढ़ाने के लिए अपने नेताओं से सवाल किया कि ‘कामरेड आजकल दियो गार्सिया का क्या हाल है?’ नेता चुप रहे। यानी कम्युनिस्टों ने एक ऐसे मुद्दे को चुनावी मुद्दा बना रखा था जिससे आम जनता का कुछ लेना-देना नहीं था।
कतिपय राजनीतिक प्रेक्षक बताते हैं कि यही हाल आज के अधिकतर सेक्युलर दलों का है। उनके नेता यह समझ ही नहीं पा रहे हैं कि 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा क्यों जीत गयी। यह भी नहीं कि उसके बाद के अधिकतर चुनावों में वह क्यों विजयी होती जा रही है।

कुछ साल पहले पूर्व कंेद्रीय मंत्री शशि थरूर की मृत पत्नी सुनंदा पुष्कर के वेसरा को जांच के लिए भारत सरकार ने अमेरिका भेजा था। कोई हर्ज नहीं यदि सेक्युलर दल किन्हीं निष्पक्ष विदेशी एजेंसी से इस बात की जांच करा लें कि आखिर भाजपा लगातार चुनाव क्यों जीत रही है। यदि सेक्युलर दल सही नतीजे पर नहीं पहुंचना चाहते तब तो कोई बात नहीं।

यह भी कहा जाता है कि अनेक सेक्युलर नेताओं को अपनी हार के असली कारणों का पता है। पर वे अपनी ‘आदतों’ से लाचार हैं। स्वार्थवश उन ‘आदतों’ को बदलने को वे तैयार नहीं हैं। अब वे गैर राजग दलों की महाएकता में अपने लिए राजनीतिक संजीवनी खोज रहे हैं।

प्रेक्षकों के अनुसार इस देश का पिछला राजनीतिक इतिहास यह बताता है कि अपनी आदतों और कमजोरियों को दूर किए बिना सिर्फ दलीय, जातीय और सांप्रदायिक एकता की संजीवनी राजनीतिक दलों को अधिक दिनों तक काम नहीं आती।


गलती मानना बड़प्पन

‘आप’ नेता अरविंद केजरीवाल ने पहले तो कहा कि ‘आप’ इवीएम के कारण हारी। पर अब वह कह रहे हैं कि हार के लिए हमारी गलतियां जिम्मेदार हैं। आज के जमाने में अपनी गलतियां स्वीकारना किसी नेता के लिए अजूबी बात है।

शायद ही कोई नेता अपनी गलती स्वीकारता है। यदि कभी किसी ने स्वीकारा भी तो उसे सुधारा नहीं। केजरीवाल ने अपनी गलती स्वीकार कर राजनीति को एक संदेश दिया है।

उम्मीद है कि अन्य नेतागण भी समय-समय पर अपनी गलतियां स्वीकारेंगे और उन्हें सुधारेंगे भी। यदि ऐसा हुआ तो लोकतंत्र के लिए अच्छा होगा।


और अंत में

भारतीय भाषाओं के लिए एक अच्छी खबर है। खासकर हिंदी भाषा भाषियों के लिए। सन 2021 तक अंग्रेजी में इंटरनेट का इस्तेमाल करने वालों की संख्या से अधिक संख्या उनकी होगी जो हिंदी में इंटरनेट का इस्तेमाल करेंगे।

एक ताजा आकलन के अनुसार अन्य भारतीय भाषाएं भी इस मामले में अगले चार साल में बढ़ेंगी। अगले चार साल में जितने लोग इंटरनेट का इस्तेमाल करेंगे, उनमें से 75 प्रतिशत लोग भारतीय भाषाओं के होंगे।

(प्रभात खबर में 5 मई 2017 को प्रकाशित)

शुक्रवार, 28 अप्रैल 2017

नरेंद्र मोदी के किए से अधिक का भरोसा दे पाएगा प्रतिपक्ष !

लोकतंत्र के लिए यह अच्छी बात है कि भाजपा विरोधी दल गोलबंद होने की कोशिश कर रहे हैं। पर क्या सिर्फ गोलबंदी ही काफी होगी? या फिर गोलबंदी मुद्दा आधारित भी होगी ? सिर्फ गोलबंदी का नतीजा यह देश देख चुका है।

सिर्फ गोलबंदी से मधु कोड़ा (झारखंड) और मनमोहन सिंह (केंद्र) जैसी सरकारें बनती हैं।

भाजपा वैसी राजनीति को पराजित कर चुकी है। गोलबंदी की कोशिश में लगे राजनीतिक दलों के नेताओं को अपनी पिछली हार के असली कारणों को पहले समझना होगा। उनसे शिक्षा लेनी होगी। इसके साथ ही जो काम नरेंद्र मोदी की सरकार भी नहीं कर पा रही है, उसे करने का पक्का भरोसा जनता को देना होगा ?

हालांकि अधिकतर भाजपा विरोधी नेताओं की साख इतनी खराब हो चुकी है कि सवाल उठेगा कि कितने लोग उन पर भरोसा करेंगे ? खैर जो हो, कोशिश करने में क्या दिक्कत है ?

नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री सचिवालय और अपने मंत्रिमंडल तक भ्रष्टाचार को अब तक फटकने नहीं दिया है।
पर सरकारी आॅफिसों में फिर भी भ्रष्टाचार का बोलबाला है। जनता उससे तंग -ओ- तबाह है। क्या उस स्तर से भी प्रतिपक्ष भ्रष्टाचार को दूर करने का वायदा करेगा? केंद्र और कुछ भाजपा शासित राज्य सरकारें गोरक्षक गिरोहों की गुंडागर्दी खत्म नहीं कर पा रही हंै।

प्रतिपक्ष से यह उम्मीद की ही जा सकती है कि वह उसे खत्म कर देगा। पर सवाल है कि गो हत्या के समर्थकों पर भी समान रूप से कार्रवाई करने का प्रतिपक्ष वादा करेगा? क्या प्रतिपक्ष अपनी पिछली गलतियों के लिए माफी मांगते हुए जनता से यह वादा करेगा कि वह अगली बार भ्रष्टाचार मुक्त सरकार देगा? क्या प्रतिपक्ष ढांेगी, असंतुलित और एकतरफा ‘धर्म निरपेक्षता’ की नीति पर अब नहीं चलने का भरोसा देगा ?

यदि प्रतिपक्ष सिर्फ सामाजिक समीकरण, दलीय गठबंधन और सांप्रदायिक वोट बैंक के बल पर
सरकार बनाएगा तो वह मनमोहन सरकार की सिर्फ कार्बन काॅपी होगी। वैसा शायद अब नहीं चलेगा। क्योंकि अनेक लोगों को एक अलग ढंग की मोदी सरकार देखने की आदत हो बन  है।



कुंवर सिंह को जरूरत नहीं ‘भारत रत्न’ की

 
 ‘भारत में अंग्रेजी राज’ नामक अपनी चर्चित पुस्तक में पंडित सुंदर लाल ने लिखा है कि ‘कंुवर सिह का व्यक्तिगत चरित्र अत्यंत पवित्र था। उसका जीवन परहेजकारी का था।उसके राज में कोई मनुष्य इस डर से कि कहीं कुंवर सिंह देख न ले ,खुले तौर पर तम्बाकू तक न पीता था।उसकी सारी प्रजा उसका बड़ा आदर करती थी और उससे प्रेम करती थी। युद्ध कौशल में वह अपने समय में अद्वितीय था।’

सुंदर लाल ने यह भी विस्तार से लिखा है कि ‘कंुवर सिंह ने किस तरह बारी -बारी से छह युद्धों में अंग्रेजों को हराया था। अंग्रेजों को छह-छह युद्धों में हराने वाले किसी अन्य योद्धा के बारे में मैंने कहीं नहीं पढ़ा है। वीर कुंवर सिंह से हारने के बाद एक अंग्रेज अफसर ने युद्ध में अपनी दुर्दशा का मार्मिक विवरण लिखा था। उसने लिखा  कि ‘जो कुछ हुआ, उसे लिखते हुए मुझे अत्यंत लज्जा आती है। लड़ाई का मैदान छोड़कर हमने जंगल में भागना शुरू कर दिया। शत्रु हमें बराबर पीछे से पीटता रहा। हमारे सिपाही प्यास से मर रहे थे। एक निकृष्ट गंदे छोटे से पोखर को देखकर वे उसकी तरफ लपके। इतने में कुंवर सिंह के सवारों ने हमें पीछे से आ दबोचा। इसके बाद हमारी जिल्लत की कोई हद न रही।

हमारी विपत्ति चरम सीमा को पहुंच गयी। हम में से किसी को शर्म तक न रही। जहां जिसकी कुशल दिखाई दी, वह उसी ओर भागा। चारों ओर आहांे, श्रापों और रोने के सिवा कुछ सुनाई न देता था। मार्ग में अंग्रेजों के गिरोह के गिरोह मारे गए। हमारे अस्पताल पर कुंवर सिंह ने पहले ही कब्जा कर लिया था।इसलिए किसी को दवा मिल सकना भी असंभव था। कुछ वहीं गिर कर मर गये, बाकी को शत्रु ने काट डाला। हमारे कहार डोलियां रख-रख कर भाग गए। सोलह हाथियों पर केवल हमारे घायल साथी लदे हुए थे।

स्वयं जनरल लीग्रैंड की छाती में एक गोली लगी और वह मर गया। हमारे सिपाही अपनी जान लेकर पांच मील से ऊपर दौड़ चुके थे। उनमें बंदूक उठाने तक की शक्ति नहीं बची थी। सिखों ने हमसे हाथी छीन लिये और वे हमसे आगे भाग गये। (अंग्रेजी फौज में सिख सैनिक भी थे।)

गोरों का किसी ने साथ नहीं दिया। 199 गोरों में से 80 ही इस संहार में जिंदा बच सके। हमारा इस जंगल में जाना ऐसा ही हुआ जैसा पशुओं का कसाईखाने में जाना। हम वहां केवल बध के लिए गए थे।’

भले वीर कुंवर सिंह की बहादुरी के ऐसे किस्से आजादी के बाद जन -जन तक नहीं पहुंचाए गए, पर एक बड़े इलाकों में ऐसी गाथाएं पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही हैं।

वीर कुंवर सिंह को याद करने वालों की इस मांग का मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने समर्थन किया कि उन्हें ‘भारत रत्न’ मिलना चाहिए। पर क्या ऐसा वीर ‘भारत रत्न’ का मोहताज है ? इस देश में भारत रत्न तथा पद्म पुरस्कारों का अवमूल्यन तथा राजनीतिकरण हो चुका है।

1942 का भारत छोड़ो आंदोलन देश की आजादी का सबसे बड़ा आंदोलन था। उस आंदोलन का विरोध करने वाले को भी ‘भारत रत्न’ मिल चुका है !

 
एक संपादक की पठनीय पुस्तक 

नामी संपादक एस.के. राव की संस्मरणात्मक पुस्तक ‘अ जर्नलिस्ट रिफ्लेक्ट्स’ पढ़ने का अवसर मिला। पत्रकारिता और राजनीति के इतिहास के विद्यार्थियों के लिए यह उपयोगी किताब लगी। राव ने अपने समकालीन नेताओं और संपादकों के बारे में लिखा है। पटना में दैनिक सर्चलाइट के संपादक रह चुके राव साहब ने लखनऊ, कराची और मद्रास में भी पत्रकार के रूप में काम किया था।

राव साहब पत्रकारों के संगठन एन.यू.जे. के संस्थापक महासचिव भी थे। अब वह इस दुनिया में नहीं हैं। पटना के राजनीतिक और पत्रकारिता जगत के पुराने लोग राव साहब को याद करते हैं।

मुख्यमंत्री डाॅ. श्रीकृष्ण सिन्हा के कार्यकाल में सर्चलाइट के एक चर्चित संपादक हुआ करते थे -‘एम. एस. एम. सरमा’। राव साहब ने उनके बारे में लिखा है कि ‘शालीन पत्रकारिता के जमाने में भी सरमा जी स्टंट में विश्वास करते थे।’ वैसे मैंने अलग से सरमा जी के बारे में बुजुर्गों से सुन रखा था। सरमा जी तत्कालीन मुख्यमंत्री के बारे में अक्सर आपत्तिजनक बातें लिखा करते थे।

श्रीबाबू के समर्थकों ने एक बार उनसे कहा कि इस संपादक के खिलाफ आपको सख्त कार्रवाई करनी चाहिए। इसपर मुख्यमंत्री ने कहा कि मैंने तो सर्वाधिक सख्त कार्रवाई कर दी है। मैंने तो उनका अखबार पढ़ना ही छोड़ दिया है।



हार के अपने-अपने बहाने 
आधुनिक राजनीति की एक पुरानी कहावत है। चुनाव जीतने वाला सीटें गिनता है और हारने वाला अपना वोट परसेंटेज। हारने वाले नेताओं की एक और प्रजाति भी है। सन 1971 की हार के बाद जनसंघ नेता बलराज मधोक ने कहा था कि इंदिरा गांधी ने सोवियत संघ से एक खास तरह की अदृश्य स्याही मंगाकर उसे मत पत्रों पर अपने पक्ष में पहले ही लगवा दिया था। कुछ घंटों बाद अदृश्य स्याही उग जाती थी।
मुहरों पर जो दृश्य स्याही गैर कांग्रेसी दलों के उम्मीदवारों के नाम के आगे लगायी जाती थी, वह कुछ घंटांे के बाद स्वतः गायब हो जाती थी। अरविंद केजरीवाल अपनी हार का बहाना  इ.वी.एम. मशीनों में ढूंढ़ लिया है।


और अंत में


राजनीति पहले सेवा थी। आजादी की लड़ाई के दौरान और आजादी के कुछ साल बाद तक भी अधिकतर नेता सेवाभाव से ओतप्रोत थे। पर सन 1976 में जब सासंदों के लिए पेंशन की व्यवस्था हुई तो राजनीति नौकरी हो गयी।

सन 1993 में जब सांसद क्षेत्र विकास फंड का प्रावधान किया गया तो राजनीति व्यापार बन  गयी। जब इस देश में महाघोटालों का दौर चला तो वह उद्योग हो गयी।

अब जब पैसे लेकर चुनावी टिकट बांटे जाने लगे तो राजनीति ने खुदरा व्यापार के क्षेत्र में भी अपने पांव जमा दिये। हालांकि सेवा वाले जमाने में भी कुछ नेता अपवाद थे और आज ‘मेवा’ वाले दौर में भी अपवाद हैं।
पर अपवादों से तो किसी देश का काम नहीं चलता !

( 28 अप्रैल 2017 के प्रभात खबर के बिहार संस्करण में इस कालम का संशोधित अंश प्रकाशित)

शुक्रवार, 7 अप्रैल 2017

सक्रिय सरकारी सहयोग के बिना पटना का नियोजित विकास असंभव

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने शहरों के अनियोजित विकास पर नाराजगी जाहिर की है। पटना सहित राज्य के अनेक शहरों का अनियोजित विकास दरअसल नाराजगी के साथ -साथ चिंता का कारण भी बनता जा रहा है। आने वाले दिनों में इसके कई नुकसान सामने आएंगे।

शहरों को विकसित करने का काम सिर्फ निजी हाथों में छोडा़ नहीं जा सकता है। बड़े बिल्डर्स व डेवलपर्स तो अभी यहां आने से रहे। मझोले और छोटे बिल्डर्स की अपनी सीमाएं हैं। उनमें से कुछ में कमजोरियां भी हैं। शिकायतें भी आती रहती हैं।

ऐसे व्यापारियों से आम लोगों को राहत दिलाने की जिम्मेदारी सरकार पर है। पर बिहार सरकार ने दशकों से अपनी यह जिम्मेदारी छोड़ रखी है। राजेंद्र नगर और लोहिया नगर जैसे कई नियोजित मुहल्ले राज्य सरकार की एजेंसी ने ही बसाए थे। कुछ मकान बनाये गये तो कुछ भूखंड विकसित कर लोगों के बीच बांटे गए।

पर राज्य सरकार अपनी ही गलती से दीघा में जाकर फंस गयी। आवास बोर्ड ने व्यवस्थित ढंग से लोगों को बसाने के लिए सत्तर के दशक में पटना के दीघा में 1024 एकड़ जमीन का अधिग्रहण किया था। पर उच्च स्तरीय दबाव में आकर शासन ने उस में से एक पूर्व मुख्य सचिव की 4 एकड़ जमीन को अधिग्रहण से मुक्त कर दिया। इस पर दीघा के जमीन  मालिकों और अन्य लोगों ने मिलकर उस सरकारी योजना को लगभग विफल कर दिया। यानी करीब आधी जमीन पर अवैध कब्जा हो गया।

स्थानीय पुलिस की मदद से आज भी यह गलत काम हो रहा है।

अब जबकि पटना वास्तव में महानगर बनने की प्रक्रिया में है तो राज्य सरकार को चाहिए कि वह खुद भी जहां-तहां जमीन का अधिग्रहण  करे। उसे विकसित करे फिर भू खंडों को जरूररतमंद लोगों में वितरित करे।
कुछ अन्य राज्यों में ऐसा अब भी होता है।

निजी बिल्डर्स और डेवलपर्स तो आम तौर से अधिक से अधिक पांच-दस-बीस एकड़ जमीन का इंतजाम कर सकते हैं। पर सरकार चाहे तो मुख्य पटना के आसपास के इलाकों में सौ-पचास एकड़ जमीन के टुकड़ों का अधिग्रहण कर सकती है। इसके बिना पटना का सुव्यवस्थित विकास नहीं हो पाएगा। पर साथ ही ऐसे मामलों में सरकार को दीघा जैसी लापरवाही नहीं बरतनी होगी।

किसी भी जमीन के अधिग्रहण के व्यय के साथ-साथ उस जमीन पर चहारदीवारी बनाने का खर्च का भी पहले से ही इंतजाम कर लेना होगा।

 इस बीच यदि राज्य सरकार अपने प्रस्तावित रिंग रोड पर काम भी शुरू कर दे तो शहर को व्यवस्थित ढंग से बसाने में सुविधा होगी।

याद रहे कि नये मास्टर प्लान के तहत दीघा-शाहपुर -सरारी-भुसौला-नेवा-सरैया-फतेह पुर-सोनवां रिंग रोड का प्रस्ताव है।

इस प्रस्तावित रोड के आसपास भी बड़े पैमाने पर जमीन अधिग्रहण की गुंजाइश बनेगी। अन्य स्थानों में भी सरकार जमीन की तलाश कर सकती है।


अदालती फैसले को विफल करने की कोशिश

सुप्रीम कोर्ट ने इसी 31 मार्च को यह आदेश दिया कि नेशनल और स्टेट हाईवे पर 500 मीटर के दायरे में शराब की दुकानें नहीं होंगी। याद रहे कि खुद केंद्र सरकार दशकों से इस बात पर चिंता जाहिर करती रही है कि हाईवे पर शराब पीकर गाड़ियां चलाने से दुर्घटनाएं बढ़ रही हैं। और मौतों की संख्या भी।

पर जब सुप्रीम कोर्ट ने यह आदेश दिया तो देश की 11 राज्य सरकारें इस आदेश को विफल करने पर अड़ गयीं। राज्य सरकारों ने नेशनल हाईवे को स्टेट हाईवे और स्टेट हाईवे को जिला सड़क बनाने की प्रक्रिया शुरू कर दी है ताकि वे सुप्रीम कोर्ट के ताजा आदेश से बच सकें।

संभव है कि केंद्र सरकार भी राज्यों के दबाव में आ जाए। पर सवाल है कि क्या सुप्रीम कोर्ट अपने फैसले से पीछे हटेगा? या फिर कायम रहेगा? इस तरह के कई दूसरे मामलों में सुप्रीम कोर्ट अपने फैसलों पर कायम रहा है।

राज्य सरकारें शराब की बिक्री बंद होने से राजस्व घटने को लेकर चिंतित हैं। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जिंदगी शराब से अधिक कीमती है। सवाल है कि सरकारों की आबकारी कर पर इतनी अधिक निर्भरता क्यों है?  इस देश में आयकर, बिक्री कर, सेवाकर तथा इस तरह के दूसरे टैक्सों की वसूली की हालत लचर है।

बिहार में भी जितने व्यापारी बिक्री कर देते हैं, उनकी अपेक्षा कई गुणा अधिक व्यापारी टैक्स की खुलेआम चोरी करते हैं। यही हाल आयकर, सर्विस टैक्स तथा दूसरे करों की है।

केंद्र और राज्य सरकारों को चाहिए कि वे टैक्स के दायरे से बाहर वाले कर चोरों पर कार्रवाई करें और आमदनी बढ़ाएं न कि सुप्रीम कोर्ट के एक अच्छे फैसले को विफल करने की कोशिश करें।  

कसूर किसका और सजा किसे ? 

इस वैज्ञानिक युग में कन्या का जन्म देने के कारण कोई पत्नी को तलाक दे देता है तो कोई उसकी हत्या तक कर देता है। यह काम एक वैज्ञानिक सत्य को दरकिनार करके हो रहा है। डॉक्टर बताते हैं कि शिशु कन्या के लिए पत्नी नहीं बल्कि पति जिम्मेदार होता है। इस बात का वैज्ञानिक आधार है।

इस तथ्य का प्रचार सरकारी और गैर सरकार संचार माध्यमों के जरिए सरकारों को करना चाहिए। कम से कम इस तथ्य से अनजान लोग तो अपनी पत्नियों को इसके लिए जिम्मेदार नहीं ठहराएंगे !

लालू सही हकदार

राजद अध्यक्ष लालू प्रसाद 11 जून को दीघा-पहलेजा सड़क पुल का समारंभ करेंगे। इस काम के लिए लालू प्रसाद सही हकदार भी हैं। इस पुल को मौजूदा स्थल पर ही बनवाने में लालू प्रसाद की महत्वपूर्ण भूमिका थी। हालांकि प्रो. रामानुज प्रसाद के नेतृत्व में हुए आंदोलन का भी योगदान है।

उस समय आंदोलनकारियों पर पुलिस फायरिंग में अभिषेक नामक छात्र मारा गया था। यह घटना जुलाई 1996 की है। तत्कालीन प्रधानमंत्री एच.डी. देवगौड़ा ने सोनपुर में 22 दिसंबर 1996 को इस पुल के निर्माण के लिए सर्वेक्षण कार्य का शिलान्यास किया।

हालांकि इस पुल के निर्माण का वास्तविक कार्यारम्भ तीन फरवरी 2002 को तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने किया।

पर प्रारंभिक दिनों में तत्कालीन रेलमंत्री रामविलास पासवान गांधी सेतु से पूरब इस रेल पुल को बनवाना चाहते थे ताकि वैशाली जिला को इसका अधिक लाभ मिले।

पर तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद की जिद से मौजूदा स्थल पर उसका निर्माण हुआ। इसलिए यदि वह सड़क पुल का समारंभ करेंगे तो यह उनका स्वाभाविक हक बनता है।

अन्य दल लें नसीहत 

भाजपा ने महिला विधायक से अभद्र व्यवहार करने के आरोप में अपने विधान पार्षद लालबाबू प्रसाद को पार्टी के निलंबित कर दिया। हाल ही में  जब जदयू के पूर्व विधायक सूर्यदेव सिंह पर हत्या का आरोप लगा तो पार्टी ने उन्हें दल से बर्खास्त कर दिया है।

इससे पहले भी इस तरह के मामलों में राजनीतिक दलों में मतभेद रहा है। कुछ दल कहते हैं कि हम तभी कार्रवाई करेंगे जब हमारे किसी सदस्य को सुप्रीम कोर्ट से सजा हो जाए।

 काश ! अन्य दल भी भाजपा-जदयू की तरह अपने-अपने दलों के ऐसे ही नेताओं के खिलाफ ऐसी ही कार्रवाई करते।

और अंत में

दशकों के लगन, तपस्या और त्याग का जीवन अपनाने के बाद ही किसी नेता की छवि बनती है। पर उसे बिगड़ने में अधिक समय नहीं लगता।

दूसरी ओर बिगड़ी हुई छवि वाले नेता चाहते हुए भी अपनी छवि नहीं सुधार पाते। आधुनिक राजनीति में लुटेरा रत्नाकर से ऋषि वाल्मीकि बनते शायद ही किसी ने कहीं देखा हो।

अच्छी छवि वाले कुछ नेताओं को भी अधेड़पन में बिगड़ते हुए जरूर देखा जाता है। इसलिए लोगबाग यही उम्मीद रखते हैं कि जिन नेताओं के लिए उनके दिल में सम्मान है, वैसे नेता किसी भी कीमत पर अपनी अच्छी छवि को बनाये रखें।

( 7 अप्रैल 2017 के प्रभात खबर, बिहार में प्रकाशित)

गुरुवार, 6 अप्रैल 2017

महागठबंधन की राह के कांटें

बिहार जैसा महागठबंधन राष्ट्रीय स्तर पर बनाने की मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की सलाह मौजूं है। उत्तर प्रदेश की चुनावी हार के बाद प्रतिपक्ष इन दिनों पस्तहिम्मत है। इस पृष्ठभूमि में यदि महागठबंधन बनाने का गंभीर प्रयास भी शुरू हो जाए तो उससे गैर राजग दलों में एक नयी ऊर्जा का संचार हो सकता है।

वैसे भी स्वस्थ लोकतंत्र के लिए यह ठीक नहीं है कि छितराये प्रतिपक्षी दल अधिक दिनों तक पस्तहिम्मत बने रहें। प्रतिपक्ष की पस्तहिम्मती के माहौल में सत्ताधारी जमात द्वारा मनमानी किए जाने का खतरा बढ़ जाता है।

  नीतीश कुमार की यह सलाह भी सही है कि कांग्रेस और कम्युनिस्ट महागठबंधन बनाने की दिशा में पहल करें। इससे पहले मणि श्ांकर अय्यर तथा कुछ अन्य नेताओं ने भी ऐसी ही सलाह दी है।

पर नीतीश कुमार की सलाह का महत्व अधिक इसलिए भी है क्योंकि उनके नेतृत्व वाली महागठबंधन सरकार कुछ कठिनाइयों और शिकायतों के बावजूद आराम से चल रही है। इस चर्चा के बीच कि नीतीश राजग में ंजा सकते हैं, बिहार के मुख्यमंत्री की ताजा सलाह प्रतिपक्ष का हौसला बढ़ाने वाली है।

पर अब सवाल यह है कि क्या राष्ट्रीय स्तर पर बिहार जैसा कोई महागठबंधन बनाना आज की स्थिति में संभव भी है ? अभी तो असंभव जरूर लगता है। पर यदि इसके लिए गंभीर और ईमानदार प्रयास अभी से शुरू हो जाएं तो आने वाले दिनों में शायद एक हद तक यह कल्पना साकार रूप ग्रहण कर ले।

यह नरेंद्र मोदी की सरकार अपने लोकलुभावन कामों के जरिए अपनी लोकप्रियता बढ़ाती जा रही है। उसे देशव्यापी दलीय गठजोड़ के जरिए पराजित करने के विचार को एक ठोस राजनीतिक पहल की संज्ञा दी जा सकती है। पर सवाल यह भी है कि क्या मोदी सरकार अगले दो साल में नोटबंदी और बेनामी संपत्ति पर हमला जैसे अपने अन्य चौंकाने वाले कामों से आगे निकल जाती है या प्रतिपक्ष महागठबंधन बना कर 2019 के लोकसभा चुनाव में राजग को मात दे देता है।  

पर, किसी भी महागठबंधन के निर्माण में मुख्यतः तीन कठिनाइयां सामने आ सकती हैं। महागठबंधन का नेता कौन होगा? कुछ दल चाहेंगे कि यह बात पहले ही तय हो जाए।

महागठबंधन को नीति -रीति कैसी होगी? राज्यों के परस्पर विरोधी क्षत्रपों को एक मंच पर कैसे लाया जा सकेगा? प्रतिपक्ष के लिए एक और कठिनाई नरेंद्र मोदी सरकार इस बीच पैदा कर सकती है।

संभव है कि अगले लोकसभा चुनाव के पहले तक मोदी सरकार कुछ ऐसे चौंकाने वाले काम कर दे ताकि महागठबंधन के निर्माण के बावजूद राजग  अपराजेय रहे।

याद रहे कि हाल के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में राजग को 325 सीटें मिलीं। जबकि उसे 2014 के लोकसभा चुनाव में विधानसभा की 328 सीटों पर बढ़त मिली थी। यानी उसकी 3 सीटें ही घटीं। आम तौर पर लोकसभा चुनाव के बाद हुए विधानसभा चुनावों में विजयी दलों की सीटें काफी घट जाती हैं।

1977 में उत्तर प्रदेश में जनता पार्टी को 425 में से 352 सीटें मिल सकी थीं जबकि उससे तीन ही महीने पहले हुए लोकसभा चुनाव में जनता पार्टी को लोकसभा की सभी 85 सीटें मिल गयी थीं।

यानी अनेक मतदाताओं के अनुसार नरेंद्र मोदी सरकार ने अपने पौने तीन साल के कार्यकाल में अच्छे काम किये। उतने काम 2015 के बिहार विधानसभा चुनाव के समय तक लोगों को नजर नहीं आए थे। दूसरी बात वहां महागठबंधन का भी कमाल था।

वैसे आरक्षण की समीक्षा की मांग करते हुए चुनाव की पूर्व संध्या पर संघ प्रमुख मोहन भागवत के आए तीन बयानों ने भी बिहार में महागठबंधन के काम और भी आसान कर दिया था। आरक्षण पर खतरे का शोर तो उत्तर प्रदेश चुनाव प्रचार के दौरान भी राजग विरोधी दलों ने किया था। पर उसका असर नहीं हुआ। क्योंकि मतदाताओं के दिलो दिमाग पर वहां अन्य तत्व अधिक हावी थे।

क्योंकि एक तो मोदी सरकार के काम और मंशा लोगों को पसंद आए, दूसरी बात यह भी हुई कि सांप्रदायिक तत्व भी चुनाव प्रचार के साथ जुड़ गये। अब गैर राजग दलों को इस बात भी विचार करना होगा कि वे नरेंद्र मोदी के लोकलुभावन कामों का मुकाबला कैसे करेंगे ?

क्या जहां-जहां गैर राजग दलों की सरकारें बची हुई हैं, वहां वे सुशासन व विकास की रफ्तार को तेज करेंगे ? क्या बिहार में भी सुशासन की ढीली होती लगाम को ठीक ढंग से कसा जा सकेगा ?

क्योंकि सिर्फ दलीय या फिर जातीय समीकरण ही हर जगह राजग का मुकाबला नहीं कर पाएगा।

महागठबंधन के निर्माण में सबसे बड़ी समस्या यह होगी कि उत्तर प्रदेश में मायावती और मुलायम को एक मंच पर कैसे लाया जाए ? क्या मायावती 1995 में हुए लखनऊ गेस्ट हाउस का कांड भूल जाएंगी ? तब सपा के बाहुबलियों ने उनके कमरे में जबरन घुस कर उस मायावती के साथ काफी बदतमीजी की थी।

मायावती भूल सकती हैं यदि उन्हें अपनी ताजा चुनावी हार उस कांड की अपेक्षा अधिक पीड़ादायक लग रही हो।
याद रहे कि उत्तर प्रदेश के ताजा चुनाव में राजग की अपेक्षा कांग्रेस-सपा- बसपा को कुल मिलाकर दस प्रतिशत अधिक वोट मिले।

लगभग यही समस्या पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी और कम्युनिस्टों के बीच आएगी। इन दोनों के कार्यकर्ताओं के बीच यदाकदा खूनी झड़पें होती  रही हैं। क्या ममता वह कांड भूल जाएगी जिसमें उनपर वाम मोर्चे की सरकार की पुलिस ने निर्मम प्रहार किया था और ममता को लंबे समय तक अस्पताल में रहना पड़ा था ?

तमिलनाडु में क्या होगा ? क्या अन्नाद्रमुक और द्रमुक को कभी एक मंच पर लाना संभव होगा? 1989 में जयललिता तमिलनाडु विधानसभा में प्रतिपक्ष की नेता थीं। के. करूणानिधि मुख्य मंत्री थे। एक सवाल पूछने पर कुछ द्रमुक सदस्यों ने जयललिता को सदन के अंदर ही इस कदर अपमानित किया जैसा अपमान शायद ही किसी महिला नेत्री का कभी किसी सदन में हुआ हो।

जयललिता अंत-अंत तक वह अपमान भूल नहीं पायी थीं। क्या उनके उत्तराधिकारी उस घटना को भुला कर द्रमुक से समझौता कर लेंगे?

ऐसी  समस्याएं कुछ अन्य राज्यों में भी है।

इस तरह सारे गैर राजग दलों को एक मंच पर लाना असंभव नहीं तो  अत्यंत कठिन जरूर है। इस महती काम को संभव बनाने के लिए कुशल मध्यस्थों की जरूरत पड़ेगी। फिर भी इस काम में काफी समय लग सकता है।
लोकसभा के अगले चुनाव के सिर्फ दो साल बाकी हैं। यह समय देखते -देखते बीत जाएंगे। इसलिए गैर राजग दल इस काम में यदि अभी से लग जाएं तो पूर्ण नहीं तो कम से कम शायद आंशिक सफलता मिल जाए!
एक मजबूत विकल्प तैयार करने में यदि प्रतिपक्ष विफल रहता है तो वह उसकी विफलता है। जनता की नहीं। गत 2014 के लोकसभा चुनाव में जनता के तो करीब 61 प्रतिशत वोट राजग के खिलाफ पड़े थे।

(इस लेख का संपादित अंश ‘प्रभात खबर’ के 6 अप्रैल 2017 के अंक में प्रकाशित)