शुक्रवार, 5 जनवरी 2024

 भूली-बिसरी यादें

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बिहार की चुनावी राजनीति मंे 

‘‘जोड़न’’ का महत्व

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जोड़न से ही तो दही जमता है

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सुरेंद्र किशोर

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जो इतिहास से नहीं सीखता,वह 

इतिहास दुहराने को अभिशप्त होता है।

‘भारत उदय’ के फील गुड में प्रधान मंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने

2004 में लोजपा और द्रमुक को अपने पास से भगा दिया था।

नतीजतन, केंद्र की सत्ता एक ऐसी सरकार के हाथों मेें चली गयी जिसने 

दस साल तक घोटालों -महा घोटालों की झरी लगा दी।

जेहादी-आतंकियों का भी मनोबल सातवें आसमान पर था।

(सीमावर्ती राज्य होने के कारण बिहार के बारे में भी कोई राजनीतिक या चुनावी फैसला फिलहाल आज की विशेष स्थिति में सोच-समझकर लेने की जरूरत है।) 

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तमिलनाडु

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सन 1999 लोस चनाव

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भाजपा और द्रमुक मिलकर चुनाव लड़े

राजग को कुल 39 में से 26 सीटें मिलीं।

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2004 लोस चुनाव

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भाजपा और अद्रमुक मिलकर लड़े।

राजग को कोई सीट नहीं मिली।

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भाजपा ने द्रमुक को क्यों छोड़ा ?

इसलिए कि जे.जयलालिता के नेतृत्व वाली 

अद्रमुक की राज्य सरकार ने सन 2002 में धर्मांतरण विरोधी कानून पास करा दिया।

(हालांकि बाद में उसे वापस भी कर लेना पड़ा था)

अतः भाजपा उस पर मोहित हो गयी।उसे साथी बना लिया।

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बिहार

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सन 1999 लोस चुनाव

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रामविलास पासवान तब राजग में थे।

राजग को बिहार में कुल 54 में से 41 सीटें मिलंीं। 

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रामविलास पासवान अटल सरकार में रेल मंत्री बने।

बाद में वाजपेयी ने पासवान को नाराज कर दिया।

वे राजग से अलग हो गये।

नतीजतन 2004 के लोक सभा चुनाव में राजग को बिहार में 40 में से सिर्फ 11 सीटें ही मिलीं।

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कारण--अटल बिहारी वाजपेयी ने पासवान से पहले रेल मंत्रालय ले लिया और संचार दे दिया।

फिर उनसे संचार लेकर प्रमोद महाजन को दे दिया।

पासवान ने नाराज होकर वाजपेयी मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया।

हालांकि पासवान ने अनुकूल राजनीतिक अवसर देख कर ही अपने इस्तीफे की तारीख तय की थी।

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पासवान को बिहार की राजनीति का ‘जोड़न’ कहा जाता था।

जोड़न के बिना दही नहीं जमता।

यह बिहार की राजनीति की विशेषता है।

सामाजिक समीकरण का ध्यान रखने की मजबूरी है।

अभी ‘जोड़न’ की भूमिका में कौन है ?

एक से अधिक हैं।

उम्मीद है कि प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी को बिहार के बाहर के किसी

जानकार व्यक्ति ने, जिसे बिहार की राजनीति की गहरी जानकारी हो,मौजूदा ‘जोड़न’के बारे में बता दिया होगा।

बिहार के किसी नेता से पूछिएगा तो वह अपनी सुविधानुसार कुछ भी बता दे सकता है।

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निष्कर्ष--

सन 2004 में यदि द्रमुक और लोजपा को अटल जी अपने साथ बनाए रखते तो कैसा रिजल्ट आता ?

आंकड़े खुद ही देख लीजिए।

याद रहे कि 2004 में भाजपा को लोक सभा की कुल 138 और कांग्रेेस को कुल 145 सीटें मिली थीं।

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लोजपा को भला कैसे साथ रखते ?

तब यह चर्चा थी कि अटल जी, प्रमोद महाजन को अपना उत्तराधिकारी बनाना चाहते थे।

उधर प्रमोद महाजन संचार मंत्रालय ही चाहते थे।

उधर धर्मांतरण विरोधी कानून का तमिलनाडु के जन मानस पर कितना असर पड़ेगा,इसका पूर्वानुमान अटल जी नहीं कर सके।

फील गुड हावी जो था !!

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28 दिसंबर 23

   

  


 अयोध्या से बिहार का अटूट संबंध

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तीनों प्रमुख चरणों में बिहार का योगदान

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सुरेंद्र किशोर

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1.-बिहार के मूल निवासी अभिराम दास ने सन 1949 में बाबरी ढांचे में रामलला की मूत्र्ति रखी थी।

उनके शिष्यों ने इस मामले में अभिराम दास की मदद की।

वे बिहार के मधुबनी जिले के मूल निवासी थे।

मधुबनी मिथिला में है।

मिथिला श्रीराम की ससुराल है।

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2.-नब्बे के दशक में बिहार के ही समस्तीपुर जिले के कामेश्वर चैपाल ने राम मंदिर के शिलान्यास की पहली ईंट रखी थी।

चैपाल अयोध्या ट्रस्ट के सदस्य हैं और अनुसूचित जाति से आते हैं।(उनकी जाति मैं जान बूझ कर लिख रहा हूं ताकि लोग जानें की यह सब ‘‘मनुवादी अभियान’’ नहीं है।)

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3.- विश्व हिन्दू परिषद के अध्यक्ष डा.आर.एन.सिंह 22 जनवरी को रामलला की प्राण प्रतिष्ठा के लिए पत्नी के साथ यजमान बनाए जाएंगे।

पद्मश्री से सम्मानित डा.सिंह बिहार में हड्डी रोग के सबसे बड़े चिकित्सक हैं।

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5 जनवरी 24  


 लोकबंधु राजनारायण की पुण्य तिथि पर

(23 नवंबर 1917--31 दिसंबर 1986)

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राजनारायण की जिद्द ने देश की राजनीति 

में बदलाव की प्रक्रिया में तेजी ला दी थी 

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सुरेंद्र किशोर

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सन 1971 की बात है।

समाजवादी नेता राजनारायण, रायबरेली 

में प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी से लोस चुनाव हार गये थे।

वे चुनाव याचिका दायर करने की तैयारी कर 

रहे थे।

उस सवाल पर उनकी पार्टी में मतभेद था।

मधु लिमये ने कहा कि 

‘‘हम चुनाव में विश्वास करते हैं,

चुनाव याचिका में नहीं।’’

याद रहे कि डा.लोहिया सन 1962 में जब फूलपुर में प्रधान मंत्री 

जवाहरलाल नेहरू से लोस चुनाव हारे तो उन्होंने कोई याचिका 

दायर नहीं की।

संभवतः मधु लिमये के सामने लोहिया वाला उदाहरण था।

पर,राजनारायण नहीं माने।

जिद्द की।

याचिका दायर हो गयी।

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राजनारायण की याचिका पर इलाहाबाद हाईकोर्ट के

न्यायाधीश जगमोहनलाल सिन्हा ने 12 जून 1975 को 

 इंदिरा गांधी को जन प्रतिनिधित्व कानून, 1951 के तहत दोषी माना।

1.-प्रधान मंत्री की चुनाव सभा के लिए मंच बनाने और बिजली की 

व्यवस्था करने का काम सरकार ने किया था।

यह कानूनन गलत था।

2.-यशपाल कपूर प्रधान मंत्री के ओ.एस.डी.थे।

उस सरकारी पद पर रहते हुए वे इंदिरा गांधी के चुनाव एजेंट बन गए थे।

यह भी कानूनन गलत था।

इन दोनों बिन्दुओं पर कोर्ट ने इंदिरा गांधी को चुनाव कानून के उलंघन का दोषी माना था।

इंदिरा जी का लोस चुनाव रद कर दिया गया। (उस निर्णय पर मशहूर वकील ननी पालकीवाला ने कहा था कि यह मामूली ट्रैफिक नियमों को भंग करने जैसा अपराध है।)

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एकाधिकारवादी प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी ने देखा कि चुनाव कानून में संशोधन के बिना सुप्रीम कोर्ट में भी उनकी जीत संभव नहीं।

कानून में बदलाव इमरजेंसी लगाकर किया जा सकता है।

साथ ही, सारे प्रतिपक्षी नेताओं को जेलों में बंद करना पड़ेगा।

वही सब हुआ भी।

इंदिरा जी फायदे के लिए कानून बदल गया।

उसे पिछली तारीख से लागू करके इंदिरा गांधी मुकदमा सुप्रीम कोर्ट से 

जीत गयीं।

सबसे बड़ी अदालत पर भी आपातकाल का इतना आतंक था कि सुप्रीम कोर्ट ने यह नहीं पूछा कि पिछली तारीख से लागू क्यों हो ?

यहां तक कि एक अन्य मामले में सुप्रीम कोर्ट ने इंदिरा सरकार के कहने पर आम लोगों के जीने तक का अधिकार स्थगित कर दिया था।

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आपातकाल (1975--77)में पूरे देश को जेल में तब्दील कर दिया गया था।

लोगों में भारी गुस्सा था।

1977 में लोस चुनाव हुआ तो इंदिरा गांधी की पार्टी केंद्र की सत्ता से बाहर हो गयी।इंदिरा -संजय दोनों लोक सभा चुनाव हार गये।राजनारायण ने इंदिरा गांधी को हराया।राजनारायण मोरारजी सरकार में स्वास्थ्य मंत्री बने।

रवींद्र प्रताप सिंह ने संजय गांधी को अमेठी में हराया।

उन दिनों दैनिक ‘आज’ के पहले पेज पर फोल्ड से ऊपर पूरे साइज में छपा कांजीलाल का एक कार्टून बहुत चर्चित हुआ था।

कार्टून में यह दिखाया गया था कि एक किसान अपने खेत से गाय और बछड़े को लाठी से भगा रहा है।

कांग्रेस का चुनाव चिन्ह गाय-बछड़ा था।

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उससे पहले जयप्रकाश नारायण जैसे साख वाले बड़े नेता के नेतृत्व में जारी आंदोलन के कारण देश में इंदिरा 

 शासन के प्रति असंतोष की आग लगी हुई थी।

इमरजेंसी के सरकारी जुल्म ओ सितम ने आग में घी का काम

किया।

इंदिरा जी का चुनाव रद नहीं होता तो इमरजेंसी भी नहीं लगती।

नतीजतन 1977 में देश की राजनीति बदल गयी।

पहली बार गैर कांग्रेसी सरकार देश में बन गयी।

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31 दिसंबर 23

 


 


 खेतों के भी नाम होते हैं।

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सुरेंद्र किशोर

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खेतों के भी नाम होते हैं।

मेरे खेतों के भी अलग अलग नाम हैं।

मेरे जन्म के समय हमारे परिवार के पास जितनी 

जमीन थी,अब उसकी आधी भी नहीं रह गयी है।

फिर भी जो बची है,उनके नाम

1.-दालान पर

2.-तरी का खेत

3.-बड़का खेत

4.-गाछी 

5.-डीह 

5.-बड़ (पेड़ )वाली जमीन

6.-बांसवाड़ी आदि आदि 

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जो जमीन बिक गई,उनमें से दो जमीनों की चर्चा करूंगा।

एक का नाम था-लिलही खेत 

उसमें अंग्रेजों के जमाने में नील की खेती होती थी।

नीलही खेत से लिलही हो गया।

अंग्रेज किसानों से जबरन नील की खेती करवाते थे।

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दूसरी जमीन जो सबसे बड़ी थी--

यानी पांच बिगहा का एक ही प्लाॅट, 

बचपन में मैं उस खेत में जाता था।

एक साथ कई हल चलते थे।

कुछ दशक पहले वह खेत पास के गांव खजौता के

 एक व्यक्ति को बेचा गया।

खजौता के हमारे एक मित्र ने,जो पटना में ही रहते हैं, हाल में मुझे बताया कि उस खेत का अब नाम है--शिनन सिंह वाला खेतवा।

नये मालिक उसी नाम से उस खेत को इंगित करते हैं।

याद रहे कि मेरे पिता का नाम शिवनंन्दन सिंह (दिवंगत)है।

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4 जनवरी 24


 चर्चित पत्रकार मनीष कश्यप में साहस भी और कौशल भी।

पर,मेरे आकलन के अनुसार उनमें धीरज की कमी लगती है।

यदि वे धैर्य और संयम के साथ काम करें तो उनके लिए 

संभावनाएं अपार हैं।


गुरुवार, 4 जनवरी 2024

 पार्ट--1

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उसने कहा था

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सुरेंद्र किशोर

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बाबरी मस्जिद-राम जन्मभूमि विवाद पर 9 नवंबर,

2019 को सुप्रीम कोर्ट का निर्णय आने के बाद

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‘‘मुझे लोगों के एक समूह ने खूब भला-बुरा कहा।

यह निर्णय ठीक उसी तरह का है, जैसा हम सभी चाहते थे।’’

   ---के.के.मुहम्मद ,

पूर्व क्षेत्रीय निदेशक ,

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण

10 नवंबर 2019

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       2 

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‘‘कोर्ट के फैसले का सम्मान होना चाहिए।’’

       --राहुल गांधी 

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           3

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 ‘‘अतीत की बातों को भुलाकर सभी को भव्य राम ंमंदिर 

का निर्माण करना है।’’

 -----आर एस एस प्रमुख मोहन भागवत

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         4

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‘‘मेरे रुख की पुष्टि हुई है।मैं खुद को धन्य मानता हूं।’’

    ---एल.के. आडवाणी 

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        5

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‘‘आज के दिन का संदेश जुड़ने का,

जोड़ने का और मिलकर जीने का है।

नये भारत में भय,कटुता और नकारात्मकता का कोई स्थान नहीं है।’’

    --  प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी

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        6

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‘‘सुप्रीम कोर्ट के आदेश को सबको स्वीकार करना चाहिए।’’

    ----  मुख्य मंत्री नीतीश कुमार

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        7

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‘‘आपसी सद्भाव बनाए रखें’’ं

--आशुतोष चतुर्वेदी

प्रधान संपादक

प्रभात खबर

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      8

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‘‘बाबरी मस्जिद तोड़ने वालों को भी सजा मिले,तब होगा

सही फैसला।’’

  ---दीपंकर भट्टाचार्य,

राष्ट्रीय महा सचिव

माले

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     9

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‘‘फैसला मन मुताबिक नहीं,पर निर्णय मानते हैं।’’

   ----मौलाना अरशद मदनी

  प्रमुख,जमीयत उलेमा ए हिन्द

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     10

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‘‘अब अयोध्या मामले को आगे नहीं बढ़ाया

जाना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ पुनर्विचार याचिका दायर 

करने की जरूरत नहीं।’’ 

-----दिल्ली स्थित जामा मस्जिद के शाही इमाम

सैयद अहमद बुखारी

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     11

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‘‘तथ्यों पर आस्था की जीत।’’

 --असदुद्दीन ओवैसी

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(जारी )

   

 


बुधवार, 3 जनवरी 2024

     जेल जाने से नेता का 

    जन समर्थन घटता है ?

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   जस करनी तस भोगहूं ताता,

   नरक जात में क्यों पछताता ?

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         सुरेंद्र किशोर 

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अरविंद केजरीवाल और हेमंत सोरेन भ्रष्टाचार के आरोप में यदि जेल जाएंगे तो क्या उनके दल के वोट घटेंगे ?

   पिछले कुछ दशकों के उदाहरण कुछ संकेत दे देते हैं।

यदि आरोप ऐसे हों,जिनके तहत कठोर सजा का प्रावधान है,तब तो वोट घटेंगे।

(कोर्ट से कुछ भ्रष्टाचार छिपा भी सकते हो,पर जनता से नहीं।

यह जनता है,सब जानती है।)

यदि आरोप हल्का हो तो वोट बढ़ सकते हैं।आरोप कठोर सजा के काबिल हो तो घटेंगे।

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एक उदाहरण 1977 का है।

 इंदिरा गांधी पर भ्रष्टाचार के आरोप थे।

गिरफ्तार किया गया।पर,आरोप हल्के थे।

नतीजतन उनके वोट बढ़े।

दूसरा मामला 1997 का है।

एक दल के शीर्ष नेता की गिरफ्तारी हुई।

आरोप गंभीर थे।

बाद में सजा भी हुई।

उस शीर्ष नेता के दल को उसके बाद कभी बहुमत नंहीं मिला।

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किसी नेता को सजा तो बहुत बाद में मिलती है।

क्योंकि हमारे देश की न्यायिक प्रक्रिया बहुत धीमी है।

(नये कानून प्रक्रिया को काफी तेज करेंगे।वे कानून इस साल के अंत तक लागू हो जाएंगे।)

पर मुकदमे की सुनवाई के शुरूआती दौर में ही आम लोगों को यह पता चल जाता है कि आरोप मंे कितना दम है।

जनता का न्याय, अदालती न्याय से अधिक सटीक होता है।

राजीव गांधी भले कोर्ट से बच गये,पर लोगों ने उन्हें बाफोर्स तथा अन्य में दोषी माना।उसके बाद कांग्रेस को कभी लोस में पूर्ण बहुमत नहीं मिला।(एक प्रतिपक्षी केंद्र सरकार ने भी उन्हें 2004 में बचाया।)

जनता की ‘गिरफ्त’ से वही नेता व दल एक हद तक बच पाता है जिसके पास अपने जातीय व धार्मिक वोट बैंक होता है।

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यदि मतदान सबके लिए अनिवार्य कर दिया जाए तो कोई वोट बैंक किसी के काम नहीं आएगा। 

 अपवादों को छोड़ दें तो कोई भी वोट बैंक सामान्यतः 10 से 15 प्रतिशत का ही होता है।

100 प्रतिशत या 90 प्रतिशत वोट पड़ने लगे तो 10-15 प्रतिशत यहां तक कि 20 प्रतिशत वोट बैंक भी 100 प्रतिशत में बिला जाएगा।

यदि नरेंद्र मोदी 2024 में पुनः सत्ता में आ जाएं तो वे मतदान अनिवार्य करें।हां, उम्रदराज लोगों को घर से वोट करने की सुविधा दो।

फिर भी कोई वोट न करे तो उसे मिलने वाली सरकारी सुविधाएं तत्काल बंद करो।

 दो बार लगातार वोट न दे तो उसके नाम मतदाता सूची से बाहर कर दो।

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पुनश्चः

सिर्फ दिल्ली के मुख्य मंत्री अरविंद केजरीवाल और झारखंड के मुख्य मंत्री हेमंत सोरेन ही नहीं,

करीब एक दर्जन शीर्ष नेता जल्दी ही जेल जाएंगे,ऐसी खबर मिल रही है।

 यदि मोदी 2024 में फिर सत्ता में आ गये तो तब तो उनके लिए जेल से निकलने का चांस काफी कम हो जाएगा।

सुप्रीम कोर्ट भी कहने लगा है कि ‘‘भ्रष्ट लोग देश को तबाह कर रहे हैं।’’

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3 जनवरी 24