मंगलवार, 15 अप्रैल 2025

 जेपी-लोहिया पर सी.आई.ए.का एजेंट होने 

का आरोप लगाना दिमागी दिवालियापन

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सुरेंद्र किशोर

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एक किताब का सहारा लेकर एक व्यक्ति ने हाल में लिख दिया कि जेपी और लोहिया सी.आई.ए.के एजेंट थे।

 जहां तक मेरी जानकारी है, इससे बड़ा झूठ कुछ और नहीं हो सकता।

किसने लिखा ,उनका नाम मैं यहां जानबूझ कर नहीं लिख रहा हूं।क्योंकि मैं किसी के साथ किसी विवाद में नहीं पड़ना चाहता।हालांकि सोशल मीडिया पर उनका नाम तैर रहा है।

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जेपी के बारे में

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जिस इंदिरा गांधी को जेपी ने 1977 में सत्ताच्युत किया,उन्होंने भी जेपी को सी.ए.आई.का एजेंट नहीं कहा।हां,जेपी की ओर इशारा करते हुए प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी ने इतना जरूर कहा था कि जो लोग पूंजीपतियों (जाहिर है कि उनका इशारा भारतीय पूंजीपतियों की ओर था।)के पैसों पर पलते हैं,उन्हें हमारी सरकार पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाने का कोई नैतिक हक नहीं है।

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जेपी ने उसके जवाब में बताया था कि मेरा निजी खर्च कैसे चलता है।जेपी के निजी आय-व्यय का पूरा विवरण तब की साप्ताहिक पत्रिका ‘एवरीमैन’ में छपा था।

मेगासेेसे अवार्ड के पैसों के सूद से जेपी का खर्च चलता था।गांव से अनाज आता था।कपड़े वगैरह उनके दोस्त बनवा देते थे।आदि आदि 

जेपी के निजी सचिव को रामनाथ गोयनका वेतन देते थे--कागज पर एक्सप्रेस का उन्हें पत्रकार बना कर।मैंने जेपी का जीवन स्तर करीब देखा था।

उतना बड़ा नेता सी.आई.ए.का एजेंट होता तो उसके जीवन स्तर पर भी उसकी झलक साफ दिखाई पड़ती।

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डा.राममनोहर लोहिया

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सन 1967 के आम चुनाव के बाद प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी ने

आई.बी.से इस बात की जांच करवाई थी कि चुनावों में किन -किन दलों और नेताओं को विदेशी धन मिले।

इंदिरा जी को शक था कि प्रतिपक्षी नेताओं ने विदेशी पैसों के बल पर ही कांग्रेस को सात राज्यों में चुनाव में हरा कर सत्ता से बाहर कर दिया।(याद रहे कि कुछ ही समय बाद मध्य प्रदेश और यू.पी.में दल बदल से कांग्रेस सरकार हटी थी।)

उधर आई.बी.की रिपोर्ट आ गई।पर वह रिपोर्ट कांग्रेस के लिए भी असुविधाजनक थी।विदेशी पैसा लेने वालों में कांग्रेसी नेताओं के भी नाम थे।

इसलिए रिपोर्ट को दबा दिया गया।

पर,न्यूयार्क टाइम्स ने उस रिपोर्ट को छाप दिया।सन 1967 में संभवतः अप्रैल या मई में उस रिपोर्ट पर संसद में भारी हंगामा हुआ।

उस हंगामें के बाद गृह मंत्री वाई.बी.चव्हाण ने संसद में कहा था कि ‘‘खुफिया ब्यूरो की उस रपट को सार्वजनिक करना उचित नहीं होगा।क्योंकि उससे इस देश के उन विभिन्न राजनीतिक दलों की बदनामी होगी जिन पर चुनाव के दौरान विदेशों से पैसे लेने की सूचना मिली है।’’

 रिपोर्ट में यह लिखा हुआ था--सी.आई.ए. ने कुछ दलों के नेताओं को धन दिया।के.जी.बी.ने कुछ अन्य दलों के लोगों को धन दिया।

कांग्रेस के नेताओं में से कुछ ने सी.आई.ए. और कुछ अन्य लोगों ने के.जी.बी.से पैसे लिये।सिर्फ एक राजनीतिक दल के किसी नेता ने किसी देश से कोई पैसा नहीं लिया,वह दल डा.लोहिया का था--यानी संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी।

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दरअसल शीत युद्ध के जमाने में इस देश के जो नेता व अन्य सी.आई.ए.से पैसे लेते थे,वे अपने विरोधी नेताओं के बारे में प्रचार करते थे कि वे के.जी.बी.से लेते हैं।

के.जी.बी.(मित्रोखिन पेपर्स में सब दर्ज है)से पैसे लेने वाले अपने राजनीतिक विरोधियों के खिलाफ यह प्रचार करते थे कि वे सी.आई.ए. से लेते हैं।

अरे भई, हर नियम का अपवाद भी होता है।

डा.लोहिया वही अपवाद थे।लोहिया के जीवन काल में उनके दल के किसी नेता को भी चाहते हुए भी विदेश से कोई पैसा लेने की हिम्मत ही नहीं थी।

लोहिया दो बार सांसद रहे--फिर भी अपनी निजी कार नहीं थी।

सी.आई.ए.अपने एजेंट को दिल्ली की सड़कों पर लोहिया की तरह पैदल चलने नहीं देता था।बल्कि साधन मुहैया करा देता था।

यहां तक कि साठ के दशक में इस देश के एक बडे़ औद्योगिक घराने के पे -रोल पर विभिन्न दलों के पंाच दर्जन 

सांसद थे।जाहिर है कि लोहिया उनमें भी शामिल नहीं थे।

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जिस सज्जन ने जेपी-लोहिया को बदनाम करने की कोशिश की है,उनसे एक आग्रह है--

अमेरिका के न्यूयार्क शहर में उनका कोई मित्र हो तो 1967 के उस न्यूयार्क टाइम्स की उस  खबर की फोटो काॅपी मंगवा लें।उसमें भारतीय एजेंट नेताओं के नाम मिल जाएंगे।

या फिर न्यूयार्क टाइम्स के नई दिल्ली ब्यूरो के प्रधान से संपर्क करें, शायद उनसे मदद मिले।

अस्सी के दशक में नई दिल्ली ब्यूरो के प्रमुख माइकल टी काॅफमैन पटना में मुझसे मिले थे।अब वे इस दुनिया में नहीं हैं।यदि होते तो मैं उनसे संपर्क कर सकता था।

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और अंत में 

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सही सूचनाओं के आधार पर कोई भी लेखक-पत्रकार किसी के खिलाफ सच बात लिखता है ,भले राजनीतिक दुराग्रह के तहत ही एकतरफा ही क्यों न लिखे, तो उसके लिए मेरे मन में आदर पैदा होता है।पर निराधार बातों से खुद लेखक की साख खराब होती है।उसकी किसी दूसरी सही बात पर भी शंका होने लगती है।

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सोमवार, 14 अप्रैल 2025

   एक शादी जिसकी चर्चा इतिहासकारों ने नहीं की

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बादशाह अकबर की पुत्री शहजादी खानम की शादी मेवाड़ के महाराणा प्रताप के पुत्र महाराजा अमर सिंह के साथ हुई थी।

ऐतिहासिक अभिलेखों में बहुत बारीकी से यह प्रसंग दर्ज है।

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आप इसे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस व वीकीपीडिया के जरिए भी आज भी जान सकते हैं।

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शुक्रवार, 11 अप्रैल 2025

 सरकारी दफ्तरों में लूट-भ्रष्टाचार-काहिली  के रहते

 निजी क्षेत्रों के विकास को रोका नहीं जा सकता।

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चीन  और रूस की कम्युनिस्ट सरकारें भी सरकारी 

भ्रष्टाचार को न रोक सकने के कारण आज निजी 

क्षेत्रों पर निर्भर हंै।

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सुरेंद्र किशोर

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भारत के पूर्व माओवादी यदि चाहें तो वे जनहित में अपने 

लिए एक अहिंसक रास्ता निकाल सकते हंै  

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अडाणी-अंबानी को लेकर मोदी सरकार के खिलाफ बहुत सारी बातें इन दिनों कही जाती हैं।

पर,वे तो कांग्रेसी शासन काल से ही फलते-फूलते रहे हैं।

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सन 2014 तक अडाणी समूह का व्यवसाय 44 हजार करोड़ रुपए का हो चुका था।स्वाभाविक है--‘मनी बीगेट्स मनी।’

 अंबानी समूह भी कांग्रेस शासन काल में हाईवे पर सिर्फ कोई ढाबा नहीं चला रहा था।

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जिस टाटा विमान सेवा का आजादी के तत्काल बाद नेहरू  सरकार ने राष्ट्रीयकरण किया था,उसे मौजूदा सरकार ने वापस कर दिया है।बल्कि वापस करना पड़ा।क्योंकि मनमोहन सरकार के दौर में अनावश्यक ढंग से बड़ी संख्या में विमानों की खरीद की गयी थी।ऐसी खरीद किस उद्देश्य से होती है,यह बात सब जानते हैं।नतीजतन सरकारी उपक्रम बैठ गया।

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कांग्रेसी सरकार ने कलकत्ता के ग्रेट ईस्टर्न होटल का राष्ट्रीयकरण किया था।दुनिया के 10 सबसे अच्छे होटलों में वह शुमार किया जाता था।

काहिली-कुप्रबंधन-भ्रष्टाचार के कारण वर्षों तक भारी घाटेे में रहने के कारण सी.पी.एम.सरकार ने उस होटल को निजी हाथों को बेच दिया।शासन में आने के बाद वाम मोर्चा सरकार ने बंगाल खासकर कलकत्ता के निजी उद्योगों को पहले बर्बाद किया।बाद में वाम मोर्चा सरकार ही निजी हाथों को देने के लिए नन्दी ग्राम आदि मेें किसानों से जमीन का अधिग्रहण करने लगी थी।

वाम मोर्चा सरकार के पतन का वह बड़ा कारण बना।पर,असली कारण यह था कि पश्चिम बंगाल के मुस्लिम मतदाताओं ने वाम को छोड़कर एकमुश्त ममता को पकड़ लिया।क्योंकि ममता का तुष्टीकरण बिना शर्त है जबकि वाम सरकार चाहती थी कि और जो करना हो, वे करें, पर जेहादी तत्व शासन तंत्र को निरर्थक न बना दें।

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जवाहरलाल-इंदिरा शासन काल में मैं भी एक राजनीतिक कार्यकर्ता था।हम सोशलिस्टों-कम्युनिस्टों का नारा था--

‘‘टाटा-बिड़ला की सरकार, नहीं चलेगी--नहीं चलेगी।’’

 ‘‘तब तक देश कंगाल है,जब तक बिड़ला-जवाहरलाल है।’’

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दरअसल सार्वजनिक क्षेत्रों में जब तक भ्रष्टाचार-काहिली का राज रहेगा,तब तक निजी क्षेत्रों पर निर्भरता बनी रहेगी,बढ़ती जाएगी।

चीन और रूस की कम्युनिस्ट सरकारों का भी निजी क्षेत्रों पर निर्भरता देखने लायक है।जबकि चीन में भ्रष्टाचार के लिए फांसी की सजा का प्रविधान है।भारत में तो अपवादों को छोड़ कर जो जितना अधिक भ्रष्ट -जातिवादी-साम्प्रदायिक है,उसके उतना ही अधिक प्रमोशन के चांस हंै।

चीन-रूस के अनुभव के बावजूद भारत के कम्युनिस्ट पिछली ही दुनिया में अब भी जी हैं।इसीलिए अप्रासांगिक होते जा रहे हैं। 

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एक ताजा अनुभव मेरा भी  

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कुछ महीने पहले मैं पटना के बी एस एन एल आॅफिस गया था। अपने मोबाइल के सिम का के.वाई.सी.कराना था।

करीब ढाई-तीन घंटे तक काउंटर के पास प्रतीक्षा करता रहा।काउंटर क्लर्क अपनी सीट से लगातार गायब था।

बगल के क्लर्क से बार-बार पूछता रहा--कब आएंगे ?

वह कहता रहा--बैठिए न, आते ही होंगे।

कुछ देर के लिए तो उस दिन सी.टी.ओ. के प्रेस रूम में जाकर बैठा जहां मेरे पत्रकार मित्र महेश बाबू और शत्रुघ्न जी मिले।

  जब तीन घंटे के बाद भी क्लर्क नहीं आया तो मैं लौट आया। बी.एस.एन.के सिम को एक निजी कंपनी के सिम में बदलवा दिया।ऐसे में,आप ही बताइए, निजी व्यवसायियों को बढ़ाने में कौन मदद कर रहा है ?

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निष्कर्ष

टाटा-बिड़ला-अंबानी-अडाणी की आलोचना करने वाले राजनीतिक और गैर राजनीतिक लोग पहले सरकारी दफ्तरों के भीषण भ्रष्टाचार-काहिली-अनुशासनहीनता  के खिलाफ डायरेक्ट एक्शन के लिए तैयार हों।एक साहसी समूह यह काम कर सकता है--पर उसे पहले अहिंसा अपनानी पड़ेगी।

पूर्व माओवादी-नक्सली लोग सरकारी दफ्तरों के भ्रष्ट लोगों के खिलाफ ‘स्टिंग आॅपरेशन ग्रूप’  बनाएं।

(झारखंड के बगोदर से माले विधायक दिवंगत महेंद्र प्रसाद सिंह सरकारी कर्मियों से लोगों से वसूले गए रिश्वत के पैसे जबरन वापस करवाते थे।वे कभी चुनाव नहीं हारे।) 

क्योंकि आज हमारी सरकार तभी कार्रवाई करती है जब स्ंिटग में कोई घूस लेते पकड़ा जाता है।

हालांकि सरकार जानती है कि उसके शायद ही किसी  आॅफिस का काम नजराना -शुकराना के बिना होता है।अपवादों की बात और है।

जो -जो भी घूस लेता है,वह कहता है कि मैं क्या करूं ?

मुझे तो ऊपर भी पहुंचाना पड़ता है।

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हथियारबंद माओवादियों से

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चीन में 1949 में और रूस में 1917 में कम्युनिस्ट इसलिए हथियारबंद क्रांति कर पाए क्योंकि तब वहां सरकारी तंत्र व सेना मजबूत नहीं थी।

आज भारतीय सेना -पुलिस-अर्ध सैनिक बल आपको सफल नहीं होेने देंगे।

इसलिए हिंसा छोड़ कर फिलहाल अहिंसक -आत्म बलिदानी स्टिंग दस्ते बनाइए।कोई आपको पीटता है तो मार खा लीजिए।पर उस भ्रष्ट का पीछा मत छोड़िए।

आपके कारण यदि सरकारी -गैर सरकारी भ्रष्टों की नानी मरने लगेगी तो आप जनता में यकायक बहुत लोकप्रिय हो जाएंगे।

(क्योंकि दूसरा कोई भी जनता की इस पीड़ा को आज नहीं समझ रहा है।उससे जजिया टैक्स की तरह वसूली हो रही है।)

स्टिंग वाले चुनाव जीत कर सत्ता भी पा सकते हैं।

यूं ही नौजवानों को बलि का बकरा बना देने से कोई लाभ नहीं होगा।

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अब माओवाद का पहले जैसा आकर्षण भी नहीं रहा।

कभी पश्चिम बंगाल के टाॅपर छात्र भी पढ़ाई छोड़ कर कम्युनिज्म लाने के लिए जान दे रहे थे।

अब वहां भी यह स्थिति नहीं है।

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एक बार बिहार के जंगल में माओवादी ट्रेंनिंग परेड को दिखाने के लिए पटना के कुछ संवाददाताओं को माओवादी बुिद्धजीवी  वहां ले गये थे।उनमें से एक संवाददाता ने लौट कर मुझे बताया कि यूनिफार्म पहन कर पटना का एक बड़ा पत्रकार वहां माओवादियों के साथ हथियार चलाने की ट्रेनिंग ले रहा था।

वह एक राष्ट्रीय अखबार का कार्यरत बिहार संवाददाता है।

उसके बारे में मैंने सोचा कि इतना बड़ा त्याग-खतरा देश के लिए !!

उसके प्रति सम्मान बढ़ गया।

वह मेरा भी दोस्त था।

मैं उसका विचार जानता था-पर, उसका ‘हथियार’ नहीं जानता था।

फिर सोचा--ना.. ना ।त्याग तो ठीक है,पर यह तो दिशा भ्रम है !

इतनी ताकतवर राज-शक्ति के सामने हथियारबंद कांति संभव नहीं।

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11 अप्रैल 25

       


गुरुवार, 10 अप्रैल 2025

 बिहार के एक गालीबाज नेता का शुक्र 

गुजार हूं जिसके कारण मैं अब टी.वी.

चैनल के लाइव डिबेट में शामिल नहीं होता।

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शुक्रगुजार इसलिए हूं क्योंकि उससे मेरा 

समय बचता है। उस समय में मैं कुछ अन्य

उपयोगी  काम कर पाता हूं।

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सुरेंद्र किशोर

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कुछ लोग कई बार मुझसे पूछते हैं कि आप टी.वी.

चैनलों के डिबेट्स में क्यों नहीं जाते ?

क्या चैनल वाले आपको नहीं पूछते ?

मैं उनसे कहता हंू कि चैनल वाले मुझ पर बहुत 

मेहरबान हैं।वे अक्सर पूछते रहते हैं।डिबेट में 

शामिल होने का आग्रह करते हैं।पर,मैं उनसे 

कह देता हूं कि मेरे पास समय नहीं है।

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पर,असली कारण कुछ और है।

कई साल पहले की बात है।एक चैनल के लाइव 

डिबेट में मैं शामिल हुआ था।

राजनीतिक चर्चा के दौरान बिहार के एक गाली बाज 

नेता ने मेरे खिलाफ ऐसी सड़क-छाप अशिष्ट टिप्पणी 

कर दी कि उसके बाद ही मैंने तय कर लिया कि मैं किसी डिबेट में शामिल 

नहीं होऊंगा।

दरअसल मेरे परिवार का एक सदस्य वह डिबेट देख रहा था।उसने मुझसे कहा कि आपके खिलाफ बोला तो हमें बहुत अपमान महसूस हुआ।जब आपकी कोई महत्वाकांक्षा नहीं है या किसी दल में आप नहीं हैं,कोई मजबूरी नहीं है तो क्यों अपनी और परिवार की प्रतिष्ठा दांव पर लगाने के लिए टी.वी.डिबेट में शामिल होते हैं ?

उसके बाद तो यह निश्चय करना ही था।

अब आप ही अनुमान लगाइए कि उस निश्चय से मुझे कितना लाभ हुआ होगा।दूसरे काम के लिए मेरा समय कितना बचता है।इसलिए मैं उस गालीबाज नेता का बहुत-बहुत शुक्रगुजार हूं।

उस नेता का नाम नहीं बताऊंगा अन्यथा वह मेरे घर में घुस कर भी मुझे अपमानित करने की ताकत रखता है।

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लगे हाथ राष्ट्रीय चैनलों पर इन दिनों  हो रहे डिबेट्स पर जरा ध्यान दीजिए।

आए दिन गाली-गलौज-,मारपीट की नौबत आ जाती है।

जो गेस्ट लोग उस जंगली व्यवहार में शामिल होते हैं,उन्हें शामिल होने की कोई मजबूरी होगी।या फिर उनके बाल-बच्चे उनसे यह नहीं कहते होंगे कि पापा,आपको जब टी.वी.डिबेट के दौरान कोई गाली देता है,अपमानित करता है या

मारने दौड़ता है तो हमें बहुुत अपमान महसूस होता है।

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और अंत में 

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लगता है कि अधिकतर टी.वी.चैनल वाले कई गाली बाज, असभ्य और अप्रासंगिक बातें करने के लिए कुख्यात गेस्ट को जानबूझ कर बुलाते हैं ताकि दर्शकों -श्रोताओं का मनोरंजन हो सके।चैनल की दर्शक-संख्या बढ़े।

पर,वे यह नहीं महसूस करते कि ऐसे अशिष्ट डिबेट्स से नई पीढ़ियों के मानस पर प्रतिकूल असर पड़ता है, ठीक उसी तरह जिस तरह अनेक सांसदों के सदन में लगातार असंसदीय व्यवहार से आम लोगों की राजनीति के प्रति घृणा बढ़ती जाती है।

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6 अप्रैल 25



मंगलवार, 8 अप्रैल 2025

 ऐसे मारी जाती है अपने

ही पैरों पर कुल्हाड़ी

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सुरेंद्र किशोर

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           1

 आरक्षण आंदोलन के दिनों मंडल आरक्षण के विरोधियों से मैं  कहा करता था कि आरक्षण का विरोध मत करो।

यह उनका संवैधानिक हक है।

‘‘गज नहीं फाड़ोगे तो थान हारना पड़ेगा।’’

नहीं माने।

थान हारना पड़ा।

 ‘थान-गज’ वाली मेरी उक्ति को कांग्रेस के पूर्व विधायक हरखू झा आज भी यदा कदा याद करते हैं।

मंडल आरक्षण के विरोध का नतीजा यह हुआ कि वर्षों तक 

बिहार को पटना हाईकोर्ट के अनुसार ‘जंगल राज ’ झेलना पड़ा।साथ ही,यह तर्क हावी रहा कि ‘‘विकास से वोट नहीं मिलते बल्कि सामाजिक समीकरण से वोट मिलते हंै।’’नतीजतन बिहार का विकास रुका।

इतना ही नहीं, बिहार में आज भी किसी सवर्ण के मुख्य मंत्री बनने का कोई चांस दूर -दूर तक दिखाई नहीं पड़ रहा।

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      2 

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नब्बे के दशक में मैं कम्युनिस्टों से सवाल पूछता था-

आप लोग खुद तो व्यक्तिगत रुप से ईमानदार हैं।फिर भी आप भ्रष्ट-जातिवादी राजनीतिक तत्वों का समर्थन क्यों करते हैं ?

 ऐसे में तो आपका एक दिन ‘‘धृतराष्ट्र आलिंगन’’ हो जाएगा।

उसके जवाब में कम्युनिस्ट कहा करते थे कि ‘‘हम साम्प्रदायिक तत्वों यानी भाजपा को सत्ता में आने से रोकने के लिए ऐसा कर रहे हैं।’’

क्या वे भाजपा को सत्ता में आने से रोक सके ?

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            3

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आज के कई राजनीतिक दल एक खास धर्म के

बीच के अतिवादी तत्वों की तो सख्त आलोचना करते हैं, किंतु दूसरे खास धर्म के बीच के अतिवादी तत्वों को बढ़ावा देते हैं।वोट के लिए उनसे साठगांठ करते हैं।

ऐसा क्यों करते हो भाई ?

वे जवाब देते हैं--एक खास धर्म की साम्प्रदायिकता दूसरे खास धर्म की साम्प्रदायिकता की अपेक्षा देश के लिए अधिक खतरनाक है।

 मेरा उनसे कहना होता है--सभी धर्मांे के बीच के अतिवादी तत्वों का एक साथ समान रूप से विरोध नहीं करोगे तो  एक दिन तुम्हारा दल खुद एक दिन बर्बाद हो जाएगा। अस्तित्व तक नहीं बचेगा।

पर,वे नहीं मानते।

नतीजतन कई तथाकथित धर्म निरपेक्ष राजनीतिक दल देश में धीरे -धीरे सिकुड़ते जा रहे हैं।अभी वे और भी सिकुड़ेंगे।

अब उनका अस्तित्व सिर्फ उन्हीं इलाकों में बना रहेगा जहां के मुस्लिम मतदाता उन्हें चुनाव जितवाने के लिए निर्णायक स्थिति में हैं।

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8 अप्रैल 25


सोमवार, 7 अप्रैल 2025

 बिहार के एक गालीबाज नेता का शुक्र 

गुजार हूं जिसके कारण मैं अब टी.वी.

चैनल के लाइव डिबेट में शामिल नहीं होता।

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शुक्रगुजार इसलिए हूं क्योंकि उससे मेरा 

समय बचता है। उस समय में मैं कुछ अन्य

उपयोगी  काम कर पाता हूं।

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सुरेंद्र किशोर

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कुछ लोग कई बार मुझसे पूछते हैं कि आप टी.वी.

चैनलों के डिबेट्स में क्यों नहीं जाते ?

क्या चैनल वाले आपको नहीं पूछते ?

मैं उनसे कहता हंू कि चैनल वाले मुझ पर बहुत 

मेहरबान हैं।वे अक्सर पूछते रहते हैं।डिबेट में 

शामिल होने का आग्रह करते हैं।पर,मैं उनसे 

कह देता हूं कि मेरे पास समय नहीं है।

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पर,असली कारण कुछ और है।

कई साल पहले की बात है।एक चैनल के लाइव 

डिबेट में मैं शामिल हुआ था।

राजनीतिक चर्चा के दौरान बिहार के एक गाली बाज 

नेता ने मेरे खिलाफ ऐसी सड़क-छाप अशिष्ट टिप्पणी 

कर दी कि उसके बाद ही मैंने तय कर लिया कि मैं किसी डिबेट में शामिल 

नहीं होऊंगा।

दरअसल मेरे परिवार का एक सदस्य वह डिबेट देख रहा था।उसने मुझसे कहा कि आपके खिलाफ बोला तो हमें बहुत अपमान महसूस हुआ।जब आपकी कोई महत्वाकांक्षा नहीं है या किसी दल में आप नहीं हैं,कोई मजबूरी नहीं है तो क्यों अपनी और परिवार की प्रतिष्ठा दांव पर लगाने के लिए टी.वी.डिबेट में शामिल होते हैं ?

उसके बाद तो यह निश्चय करना ही था।

अब आप ही अनुमान लगाइए कि उस निश्चय से मुझे कितना लाभ हुआ होगा।दूसरे काम के लिए मेरा समय कितना बचता है।इसलिए मैं उस गालीबाज नेता का बहुत-बहुत शुक्रगुजार हूं।

उस नेता का नाम नहीं बताऊंगा अन्यथा वह मेरे घर में घुस कर भी मुझे अपमानित करने की ताकत रखता है।

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लगे हाथ राष्ट्रीय चैनलों पर इन दिनों  हो रहे डिबेट्स पर जरा ध्यान दीजिए।

आए दिन गाली-गलौज-,मारपीट की नौबत आ जाती है।

जो गेस्ट लोग उस जंगली व्यवहार में शामिल होते हैं,उन्हें शामिल होने की कोई मजबूरी होगी।या फिर उनके बाल-बच्चे उनसे यह नहीं कहते होंगे कि पापा,आपको जब टी.वी.डिबेट के दौरान कोई गाली देता है,अपमानित करता है या

मारने दौड़ता है तो हमें बहुुत अपमान महसूस होता है।

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और अंत में 

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लगता है कि अधिकतर टी.वी.चैनल वाले कई गाली बाज, असभ्य और अप्रासंगिक बातें करने के लिए कुख्यात गेस्ट को जानबूझ कर बुलाते हैं ताकि दर्शकों -श्रोताओं का मनोरंजन हो सके।चैनल की दर्शक-संख्या बढ़े।

पर,वे यह नहीं महसूस करते कि ऐसे अशिष्ट डिबेट्स से नई पीढ़ियों के मानस पर प्रतिकूल असर पड़ता है, ठीक उसी तरह जिस तरह अनेक सांसदों के सदन में लगातार असंसदीय व्यवहार से आम लोगों की राजनीति के प्रति घृणा बढ़ती जाती है।

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6 अप्रैल 25



शनिवार, 5 अप्रैल 2025

 रामानन्द तिवारी की पुण्य तिथि पर

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(1906--1980)

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बिहार के गृह मंत्री रहे रामानन्द तिवारी दूध 

बेच कर परिवार चलाते थे

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‘द हिन्दू’ के पटना स्थित विशेष संवाददाता रमेश उपाध्याय ने अपने अखबार में लिखा था कि पूर्व कैबिनेट मंत्री रामानन्द तिवारी दूध बेच कर परिवार चला रहे हैं। 

खैर,इन पंक्तियों का लेखक तो इस बात का खुद गवाह ही है कि तिवारी जी की गाय के दूध का एक हिस्सा उनके पड़ोसी(आर.ब्लाॅक,पटना)व कांग्रेस एम.एल.सी.कुमार झा के घर जाता था।

मैं अक्सर तिवारी के आवास के बरामदे में बैठकर उनकी बातें सुना करता था।

  उन्हीं दिनों एक दिन जो बातें मैंने सुनीं ,उसके बाद तिवारी जी के प्रति मेरा आदर काफी बढ़ गया।

वह बातचीत तब के संसोपा विधायक वीर सिंह (चनपटिया-1969-72)और तिवारी जी के बीच हो रही थी।

 पहले इसकी पृष्ठभूमि बता दूं।

सन् 1970 के सितंबर की घटना है।रामानन्द तिवारी के नेतृत्व में समाजवादियों ने भूमि संघर्ष के सिलसिले में चंपारण जिले के लालगढ़ फार्म पर सत्याग्रह किया था। पर, पुलिस बल की मौजूदगी में लठैतों की क्रूर जमात ने सत्याग्रहियों पर हमला कर दिया। मझौलिया चीनी मिल के मालिक की इस (हदबंदी से फाजिल)जमीन पर अहिंसक सत्याग्रह के सिलसिले में रामानन्द तिवारी पर जानलेवा हमला किया गया। कुछ सत्याग्रहियों ने यदि तिवारी जी को अपने शरीर से ढंक नहीं लिया होता तो उनकी मौत निश्चित थी। उनको बचाने के सिलसिले में रोगी महतो की जान चली गई और कई कार्यकर्ता घायल हो गये। खुद रामानन्द तिवारी को विमान से बेतिया अस्पताल से पटना पहंुचाया गया जहां उन्हें इलाज के लिए लंबे समय तक अस्पताल में रहना पड़ा।

   वीर सिंह, रोगी महतो हत्याकांड के मुकदमे में समझौता कर लेने का आग्रह तिवारी जी से उस दिन कर रहे थे। वीर सिंह की बातें सुनकर तिवारी जी की आंखों में आंसू आ गये। उन्होंने रुंधे गले से भोजपुरी में कहा कि ‘हम रोगी महतो के लास पर सउदा ना करब।’ वीर सिंह मन मसोस कर चले गये।

   उस सत्याग्रह पर क्रूर हिंसा का वर्णन साप्ताहिक ‘दिनमान’ ने तब बड़े मार्मिक ढंग से किया था। बुरी तरह घायल तिवारी जी ने अस्पताल में कराहती आवाज में संवाददाता से कहा था, ‘सात तारीख के सात बजे सुबह लालगढ़ फारम में पहुंचली। करीब पांच -छह हजार आदमी साथ में रहन। तीन गो हल, 10-15 कुदाल, 25-30 खुरपी आउर दू अढ़ाई सौ महिला। लोग के समझा देनी कि पत्थर -ढेला लेके ना चले के चाहीं। हिनसा न करे के होई। नहीं तो हम अपन पथ से भटक जायब। हिनसा से समाज बदली ना। अगर बदली भी तो जे हिंसा के नेता होला ओकर कलपना हिंसा से पूरा ना होला। गांधी जी इहे चंपारण में सत्याग्रह किये थे और गांधी जी के रास्ता से ही समाज बदली।’

   तिवारी जी ने कहा कि ‘फार्म पूर्व-पश्चिम लंबा था। पूर्व में भी ईंख और पश्चिम में भी ईंख लगी थी। बीचों-बीच कोई 50-60 बीघा जमीन परती थी। हम हल ले के खेत में चले। हमारे पीछे दो हल और था। अन्य सत्याग्रही मर्द - औरत कुदाल -खुरपी से खेत कोड़ने लगे। हमसे दक्षिण उत्तर की तरफ बीस -पच्चीस आदमी करीब दो सौ गज की दूरी पर लाठी, भाला और गंड़ासा लेकर खड़े थे। पुलिस के लोग भी थे।

हल चलने लगा तो पुलिस कोई बीस कदम की दूरी पर आकर खड़ी हो गई और तभी सीटी की आवाज आई। ईंख के खेत से चालीस- पचास आदमी मारो-मारो कहते हुए निकले। हम लोग अपने लोगों को न भागने को कहते हुए और आगे बढ़ गये। मुझको पहली लाठी दायें कंधे पर, दूसरी दायें पैर पर और तीसरी बायें हाथ पर लगी। मैं बेहोश होकर गिर पड़ा। मुझको नंद लाल, लक्ष्मण कलीम हुदा आदि कार्यकर्ताओं ने ढांप लिया। और बाद में पता चला कि एक फरसा मेरे सिर पर भी मारा था।’

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 तिवारी जी का जन्म उन्हीं के शब्दों में ‘एक कंगाल द्विज’ के घर हुआ था।

वे बिहार के अविभाजित शाहाबाद जिले के मूल निवासी थे।

  उनके होश सम्भालने से पहले ही उन पर से पिता का साया उठ गया।

  उनकी मां ने किसी तरह उन्हें बड़ा किया।

  पहले तो तिवारी जी रोजी-रोटी की तलाश में कलकत्ता गये।

   पर, उन्हें वहां काफी कष्ट उठाना पड़ा तो  वे लौट आये। 

  उन्हें हाॅकर, पानी पांड़े और कूक के भी काम करने पड़े। 

  वे पुलिस में भर्ती हो गये।

  सन 1942 में महात्मा गांधी के आह्वान पर आजादी की लड़ाई में शामिल हो गये।

  उन्होंने अपने कुछ साथी सिपाहियों को संगठित किया और आजादी के सिपाहियों पर गोली चलाने से इनकार कर दिया।

  तिवारी जी गिरफ्तार कर लिये गये।

  हजारीबाग जेल भेज दिये गये।

   जेल में उनकी जयप्रकाश नारायण से मुलाकात  हुई।

  जेपी से प्रभावित होने की घटना के बारे में तिवारी जी ने एक बार इन पंक्तियों के लेखक को बताया था। उन्होंने कहा कि दूसरे बड़े नेता जेल में अलग खाना बनवाते थे।

  पर, जेपी जेल में अपने साथियों के साथ ही खाते और रहते थे।

  इसी बात ने तिवारी जी को जेपी की ओर मुखातिब किया और वे भी समाजवादी बन गये।जेपी कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के संस्थापकों में थे।

  आजादी के बाद सन 1952 के चुनाव में ही तिवारी जी शाह पुर से समाजवादी पार्टी के विधायक बन गये।वे लगातार सन 1972 के प्रारंभ तक विधायक रहे।

सन 1972 में वे हार गये। सन 1977 में वे बक्सर से 

जनता पार्टी के सांसद बने ।

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  जेपी आंदोलन के समय का एक प्रेस कांफ्रेंस मुझे याद है।रामानंद तिवारी ने पटना के मजहरूल हक पथ स्थित पिं्रस होटल में संवाददाता सम्मेलन बुलाया था।

मैं भी उस प्रेस सम्मेलन में शामिल था।

  उसमें एक बड़े दैनिक अखबार के संवाददाता ने,जो जाति से ब्राह्मण था,तिवारी जी से एक असामान्य सवाल कर दिया।

  उसने कहा कि ‘‘तिवारी जी, आप भी ब्राह्मण हैं,इंदिरा जी भी ब्राह्मण हैं।आप अपनी ही जाति के प्रधान मंत्री के खिलाफ आंदोलन क्यों कर रहे हैं ?’’

तिवारी जी देर किए बिना जवाब दिया, ‘‘बाचा, तू पत्तरकारिता करत बाड़, खाली उहे कर।रजनीति मत कर।’’

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 तिवारी जी छोटे- छोटे समाजवादी कार्यकर्ताओं को भी चिट्ठियां लिखा करते थे।

साठ-सत्तर के दशकों में मैं भी संसोपा कार्यकर्ता था।

उन दिनों सारण जिला स्थित अपने गांव में ही आम तौर पर मैं रहता था।

कभी -कभी पटना भी आया करता था।

पार्टी के राष्ट्रीय और प्रादेशिक सम्मेलनों में जरूर जाया करता था।

मासिक पत्रिका ‘जन’ और साप्ताहिक ‘दिनमान’ आदि में मेरी चिट्ठियां प्रकाशित हुआ करती थीं।दिनमान में पत्र छप जाना भी तब बड़ी बात मानी जाती थी।

उन दिनों के समाजवादी नेताओं  और कार्यकर्ताओं में पढ़ने -लिखने वाले लोग अधिक होते थे।

इसलिए देश-प्रदेश  के अनेक नेता व कार्यकर्ता मुझे जानते थे।

इस पृष्ठभूमि में रामानंद तिवारी जी ने मुझे मेरे गांव के पते पर एक चिट्ठी लिखी।वह पोस्टकार्ड था।

 उसमें तिवारी जी ने मुझे अन्य बातों के अलावा यह भी लिख दिया था कि ‘‘सुरेंद्र,मैं तुम्हें शिवानंद से भी अधिक प्यार करता हूं।’’

मेरे बाबू जी ने वह चिट्ठी पढ़ ली।

बाबू जी ने मेरी मां से भोजपुरी में कहा,‘‘ देखीं, इ कतना करम जरू बा।

तेवारी जी एकरा के बेटा अइसन मानलन।

इ उनका से कहीत त एकरा के चपरासियो में नौकरी ने लगवा देतन !’’

दरअसल तिवारी जी कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ाने तथा उनसे अपनापन बनाये रखने के लिए वैसा पत्र लिखते रहते थे।

मैं तब जिस स्तर का कार्यकर्ता था,उस स्तर के आज के कार्यकर्ताओं को आज के बड़े नेता चिट्ठियां भी लिखते हैं,यह मुझे नहीं मालूम।    

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और अंत में

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  सन 1972-73 में मैं कर्पूरी ठाकुर का निजी सचिव था।पर,मैं पत्रकारिता में जाना चाहता था।(कर्पूरी जी मेरी कोई नाराजगी नहीं हुई थी।न उनकी मुझसे हुई थी।बस मैं अपना काम बदलना चाहता था।)

मुख्य धारा की पत्रकारिता में मेरा सीधा प्रवेश कई कारणों से तब एकबारगी संभव नहीं था।इसलिए समाजवादी आंदोलन से जुड़ी पत्रिकाओं के जरिए मुख्य धारा में जाना चाहता था।उन्हीं दिनों तिवारी जी ने पटना के नया टोला से साप्ताहिक ‘जनता’ का प्रकाशन फिर से  करवाया।उसमें तिवारी जी ने मुझे बुलाकर सहायक संपादक बनाया।

बाद में जब संपादक ने मुझे हटाने की कोशिश की तो तिवारी जी उस बात के लिए राजी नहीं हुए।यानी तिवारी जी के कारण मेरी नौकरी बच गई थी।

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5 अप्रैल 25