बुधवार, 21 जनवरी 2009

कंधार विमान अपहरण कांड से कोई सबक नहीं

आतंकवादी हमलों को लेकर भारत के राजनीतिक दलों में आम सहमति तैयार करना आज भी टेढ़ी खीर है।पर,जिस बात पर कभी विभिन्न दलों के बीच एक खास परिस्थिति में सहमति बन भी जाती है,उस बात को लेकर भी बाद में असहमति जताना और राजनीतिक फायदा उठाने की कोशिश करना, इस देश की राजनीति की फितरत बन चुकी है।यह बात लगभग सभी दलों पर लागू होती है।चिंताजनक बात यह है कि ऐसी राजनीति देश की रक्षा के मामलों में भी होती है। मुम्बई के ताजा आतंकी हमले की पृष्ठभूमि में कंधार विमान अपहरण प्रकरण को एक बार फिर याद करना मौजूं होगा।कंधार अपहरण कांड यह बताता है कि हमारे हुक्मरान अपनी गलतियों से सीखने के लिए कत्तई तैयार नहीं हैं। पाकिस्तान समर्थित कश्मीरी आतंकवादियों ने 24 दिसंबर,1999 को इंडियन एयर लाइंस के विमान 814 का अपहरण कर लिया।उसे वे कंधार यानी अफगानिस्तान ले गए।तब वह देश तालिबानियों के कब्जे में था।उस विमान के 152 यात्रियों कों आतंकियों ने बंधक बना लिया।कई दिनों के शर्मनाक ड्रामे के बाद हरकत उल अंसार के आतंकी मौलाना मसूद अजहर को रिहा करने के बदले अपहृत विमान के बंधक यात्रियों को छुड़ा लिया गया।आतंकीं को अपने साथ लेकर तत्कालीन विदेश मंत्री जसवंत सिंह कंधार गए थे। इससे पहले 27 दिसंबर 1999 को दिल्ली में प्रधान मंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने सर्वदलीय बैठक बुलाई थी।उस बैठक में यह सहमति बनी थी कि बंधक यात्रियों को किसी भी कीमत पर बचाना है।पर, जब कीमत दे दी गई तो उन्हीें दलों के नेतागण समय- समय पर भाजपा और जसवंत सिंह पर ताने मारते रहते हैं कि आप भी तो मसूद अजहर को साथ लेकर कंधार गए थे।याद रहे कि विचारक और लोगों को प्रेरित करने में माहिर आतंकवादी अजहर कश्मीर के अनंतनाग में 1994 में गिरफ्तार किया गया था।हाल में फिल्म अभिनेता आमिर खान ने कहा है कि ‘मुझे और मेरे बच्चों को कुछ आतंकवादी बंधक बना लें तो मैं अपनी सरकार से यह कहने के लिए मानसिक रूप से तैयार रहूंगा कि वह मेरी और मेरे बच्चों की परवाह न करें और और देश के व्यापक हित में आतंकवादियों को मार गिराए।’ काश,ऐसा ही साहस उन बंधकों के परिजनों ने दिखाया होता जो तब कंधार में बंधक थे।दुनिया के कई देश कभी ऐसे हालात में भी आतंकवादियों की शत्र्तें नहीं मानते,चाहे कुछ भी हो जाए।पर खुद अटल मंत्रिमंडल के सदस्य जसवंत सिंह और प्रमोद महाजन कंधार के सवाल पर आपस में तू तू मैं मैं कर रहे थे।महाजन की शिकायत थी कि जसवंत जल्दी मसूद अजहर को लेकर कंधार क्यों नहीं जा रहे हैं। उधर दिल्ली में बंधकों के परिजन समूह बना कर सरकार की ऐसी -तैसी कर रहे थे।वे चाहते थे कि जल्दी आतंकियों की शत्र्तें सरकार पूरी कर दे।सरकार ने कारगिल युद्ध के शहीदों की विधवाओं को बुलवा कर उन रिश्तेदारों से मुलाकात और बात कराई।विधवाएं कह रही थीं कि आतंकियों की शत्र्तें मानने पर इस देश की और महिलाएं विधवा बनेंगीं।पर उसका कोई असर उन पर नहीं पड़ा।टी.वी.चैनल उन रिश्तेदारों के हंगामे का दृश्य दुनिया भर को निरंतर दिखा रहे थे । एक बंधक के रिश्तेदार डा.राजीव छिब्बर ने जसवंत सिंह से तब रोष भरे शब्दों में कहा कि ‘तब अपहृत रूबैया के बदले आतंकवादी छोड़े गए थे तो अब क्यों नहीं ?’ अब जरा कंधार काल की प्रशासनिक गलतियों से हाल की गलतियों की तुलना की जाए तो पता चलेगा कि गत नौ वर्षों में इस मामले में हमारी सरकारेंं इस पुरानी राह पर कायम हैं कि ‘हम नहीं सुधरेंगे।’ मुम्बई पर आतंकी हमले के बाद जिस तरह की खुफिया,सुरक्षा और प्रशासनिक विफलताओं की खबरें आईं,वे लोगांे ंको अच्छी तरह याद ही होंगीं।अब जरा कंधार कांड के समय की विफलताओं की चर्चा की जाए।तब की केंद्र सरकार के कैबिनेट सचिव पर आरोप था कि अपहरण की खबर मिल जाने पर भी बैठक बुलाने में उन्होंने देरी की।पी.एम.ओ.के प्रधान सचिव पर आरोप लगा कि विमान जब अमृतसर के पास और फिर अमृतसर में था, तब उसे उन्होंने उलझावपूर्ण संकेत भेजे। फैसले में देरी की। राॅ के तत्कालीन प्रमुख पर आरोप लगा कि अपहरण की खबर पाते ही वे चैकन्ना नहीं हुए। एन.एस.जी. ने राॅ की टीम के इंतजार में वक्त गंवाया।वात्र्ताकारों के बगैर एन.एस.जी.को अमृसर रवाना होना चाहिए था।याद रहे कि अमृसर जाने के लिए विशेष विमान इंतजार करता रहा,पर वात्र्ताकार नहीं पहुंचे।याद रहे कि अपहरणकत्र्ता विमान को काठमांडो से लखनउ,दिल्ली होते हुए अमृतसर ले गए थे।अमृसर में इंधन के लिए विमान रूका।फिर वे उसे कंधार ले गए।सरकार की सबसे बड़ी विफलता यह थी कि वह उस विमान को अमृतसर में अपने कब्जे में नहीं कर सकी।क्या इन गलतियों से भारत सरकार ने इस बीच कोई शिक्षा ग्रहण की हैं ? मुम्बई की ताजा घटना इस सवाल का नकारात्मक उत्तर ही देती है। प्रभात खबर (०५-१२-2008)

रविवार, 18 जनवरी 2009

बंगाल का चुनावी फार्मूला बिहार में !

बंगाल में 1977 में सत्ता में आने के बाद ज्योति बसु सरकार ने करीब 16 लाख बटाईदारों को कानूनी हक दिलवा दिया । वाम मोर्चा बाद के हर चुनाव में उन बटाइदारों को यह हिदायत देती रहती है कि कहीं कांग्रेस फिर सत्ता में आ गई तो वह आपको इस हक से वंचित कर देगी।अब भला बटाईदार क्यों कांग्रेस को वोट देंगे ? हाल में जदयू के प्रवक्ता शिवानंद तिवारी ने कहा है कि ‘राजद के आरोप पत्र के मुताबिक बिहार में नीतीश शासन काल में दो लाख 40 हजार शिक्षकों की बहालियां फर्जी डिग्रियों के आधार पर हुई हैं।श्री तिवारी ने कहा कि यदि लालू प्रसाद की चली तो इन शिक्षकों को वे बर्खास्त कर देंगे।’ ऐसा कह कर श्री तिवारी ने जोरदार तीर चलाया है।सन् 2010 तक कुल मिलाकर नीतीश सरकार करीब 5 लाख बेरोजगारों को नौकरियां देने की योजना बना रही है। श्री तिवारी के बयान से यह लगता है कि अगले विधान सभा चुनाव में एन।डी.ए.की ओर से मतदाताओं से यही कहा जाएगा कि राजद यदि फिर से सत्ता में आएगा तो वह इन पांंच लाख लोगों को फिर से बेरोजगार बना देगा।

पूर्वोत्तर के पीडि़त हिंदी भाषी
महाराष्ट्र के हिंदीभाषियों की पीड़ा को लेकर बिहार के नेताओं ने तो एकजुटता दिखाई,पर लगता है कि इसी देश के पूर्वोत्तर राज्यों के हिंदीभाषियों की सुध लेने वाला कोई नहीं है। भाजपा नेता हरेंद्र प्रताप हाल में पूर्वोत्तर के प्रवास पर थे।उन्होंने बताया कि वहां हर रोज चार- पांच हिंदी भाषी मारे जा रहे हैं।वे इसलिए मारे जा रहे हैं क्योंकि वे हिंदी भाषी हैं।असम सरकार ऐसी घटनाओं में मृतकों को तीन लाख रुपए सरकारी मुआवजा देती है।पर हिंदी भाषी मृतकों के परिजनों को वह भी मुआवजा नहीं मिल रहा है। पूर्वोंत्तर के हिंदीभाषियों की हत्याओं में कई मामलों में उन लोगों का हाथ रहता है जो बंगला देशी घुसपैठिए हैं।क्या बिहार के तथाकथित सेक्युलर नेता उन हिंदीभाषियों की सुध इसलिए नहीं ले रहे हैं,क्योंकि इससे उनके खास वोट बैंक के नाराज होने का खतरा है ?

संपादक नीतीश
कई साल पहले की बात है।एक विवाह समारोह में पटना के चर्चित पत्रकार, मंच से सांस्कृतिक कार्यक्रम पेश कर रहे थे।श्रोताओं में विधान परिषद तत्कालीन सभापति प्रो।जाबिर हुसेन भी थे।जाबिर साहब ने टिप्पणी की कि इस पत्रकार महोदय की यदि नौकरी छूट भी जाए तो भी इन्हें रोजी-रोटी की तकलीफ नहीं होगी। अब इसी तरह की बात मुख्य मंत्री नीतीश कुमार के बारे में भी कही जा सकती है।यदि नीतीश कुमार कभी राजनीति से उब जाएं तो वे एक सफल संपादक बन सकते हैं।अपनी सरकार के तीन साल पूरा होने से पहले ही जब उपलब्धियों के दस्तावेज इकट्ठे किए जा रहे थे तो यह खबर आई थी कि रिपोर्ट कार्ड का संपादन खुद नीतीश कुमार कर रहे हैं।रिपोर्ट कार्ड जब छप कर आ गया तो पता चला कि नीतीश कुमार एक अच्छे संपादक भी हैं। 48 पेज के रिपोर्ट कार्ड के विभिन्न पन्नों के ले आउट और छपाई मनोहारी हैं।फोटोग्राफ का प्रस्तुतीकरण शालीन और ग्राफ आसानी से समझ में आ जाने वाले हैं। मध्य प्रदेश में अस्सी के दशक में जब अर्जुन सिंह मुख्य मंत्री और अशोक वाजपेयी संस्कृति सचिव थे तो उस राज्य के सरकारी प्रकाशन भी ऐसे ही शालीन,सूचनाप्रद और मनोहारी हुआ करते थे।

भगत सिंह बनाम कायर
अमर शहीद सरदार भगत सिंह और आज के उन अन्य लोगों मंे कितना फर्क है जो आज के भगत सिंह बनना चाहते हैं ?बहुत फर्क है।भगत सिंह ने संेट्रल एसेम्बली में बम फेंका तो उन्होंने स्वीकार भी किया कि उन्होंने ऐसा किया। वे कायर नहीं थे।उन्होंने इस तरह का अन्य काम भी किया तो उसे स्वीकार किया। ंवे इसका कानूनी नतीजा भी भुगतने के लिए तैयार रहे।क्योंकि वे बहादुर थे।परिणाम स्वरूप उन्हें अमर शहीद का दर्जा मिला। पर आज तथाकथित शहीद बनने वाले कायर लोग क्या कर रहे हैं ? तरह- तरह की धार्मिक आस्थाओं व अनास्थाओं के नाम पर वे भारी हिंसा तो कर रहे हैं। वे छिप कर निर्दोष लोगों की जान तो ले रहे हैं,पर पकड़े जाने पर खुद को निर्दोष बता कर साफ रिहा हो जाने और अपनी जान बचा लेने का बहाना भी कर रहे हैं।दरअसल वे क्रांतिकारी नहीं बल्कि कायर हैं।उनके राजनीतिक मददगार तो और भी घटिया जीव हैं।

मौत का सौदागर कौन ?
एक नेता ने कुछ माह पहले नरेंद्र मोदी को मौत का सौदागर कहा था। तब सोहराबुद्दीन नामक एक अभियुक्त की कथित पुलिस मुंठभेड़ में मौत हो गई थी।सोहराबुद्दीन, अब्दुल लतीफ का ड्रायवर था।लतीफ कभी गुजरात का अंडर वल्र्ड किंग था और वह दाउद इब्राहिम का गुजरात में बिजनेस मैनेजर था। लतीफ 1997 में गुजरात पुलिस की गिरफ्त से भागने की कथित कोशिश में पुलिस की गोली से मारा था।दाउद और लतीफ के हथियारों का जखीरा सहराबुदद्ीन ने उज्जैन के पास अपने गांव के कुएं में छिपा दिया था। कुएं से मिले हथियारों का यह जखीरा 1993 में मुम्बई बम ब्लास्ट के पहले विदेश से भारी मात्रा में लाए गए कुल हथियारों का एक छोटा हिस्सा था।सोहराबुद्दीन की कथित फर्जी मुंठभेड़ में कथित हत्या के खिलाफ मशहूर गीतकार जावेद ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर रखी है।यह अकारण नहीं है कि उनकी अभिनेत्री पत्नी शबाना आजमी यह आरोप लगाती हैं कि मुम्बई में उन्हें मकान नहीं मिलता। अब जरा लतीफ और सहराबुद्दीन की कथित पुलिस मुंठभेड़ ‘हत्याओं’ की तुलना कर लें।इससे इस देश के नेताओं की ढांेगी धर्मनिरपेक्षता और आतंकवाद के प्रति उनके रवैए का पता चल जाएगा। लतीफ जब मारा गया था तब गुजरात में राष्ट्रीय जनता पार्टी के दिलीप पारीख मुख्य मंत्री थे और वह सरकार कांग्रेस के समर्थन से चल रही थी।तब की गुजरात सरकार,सत्ताधारी राजपा और कांग्रेसी नेताओं ने लतीफ की मौत को गुजरात पुलिस की भारी उपलब्धि माना था। तब के अखबारों मेंे उनके बयान सबूत के रूप में मौजूद हैं। संभव है कि इसके लिए तब संबंधित पुलिस अफसरों को सरकार ने इनाम भी दिया हो।पर जब सहाराबुद्दीन की मौत हुई तो गुजरात की सरकार नरेंद्र मोदी के हाथों में आ चुकी थी।सहराबुद्दीन की मौत पर कांगे्रस के शीर्ष नेताओं ने गुजरात सरकार व मोदी को मौत का सौदागर कहा।इस कांड में कई आई।पी.एस.अफसर जेल भिजवा दिए गए।वे मुकदमा झेल रहे हैं।धर्मनिरपेक्षता के झंडावरदार जावेद साहब अदालत तक पहुंच गए।अच्छा होता यदि इस देश के किसी राष्ट्रभक्त हिंदू या मुसलमान के साथ हुए पुलिस जुल्म पर जावेद कोर्ट जाते।

तिवारी प्रकरण एक चेतावनी
एन.डी. तिवारी-उज्वला प्रकरण वैसे नेताओं के लिए एक चेतावनी है जो ‘ बिन फेरे हम तेरे ’ फार्मूला में विश्वास रखते हैं। याद रहे कि उज्ज्वला सिंह के पुत्र रोहित शेखर ने यह दावा किया है कि आंध्र प्रदेश के राज्यपाल एन.डी.तिवारी ही उनके पिता हैं। यदि यह दावा सही है तो यह तिवारी जी के प्रति उज्ज्वला का विश्वासघात ही माना जाएगा।क्योंकि उन्होंने तिवारी जी से शादी तो नहीं की थी।यूं ही सह जीवन के लिए तैयार हो गई हांेगी। यदि शादी की भी होंगी तो उसकी सूचना आम लोगों को नहीं थी।देश भर से छन -छन कर अक्सर यह खबर आती रहती है कि कई मशहूर नेता ‘बिन फेरे हम तेरे’ बने हुए हैं। क्या तिवारी प्रकरण ऐसे दिलफेंक नेताओं को यह सीख दे पाएगा कि उज्ज्वलाओं पर अब विश्वास करने में नुकसान है।आर्थिक भी और राजनीतिक भी।
तापमान (दिसंबर, 2008)

‘स्टिंग’ से भयभीत क्यों बासा ?

‘बासा’ ने स्टिंग आपरेशन के लिए मुख्य मंत्री के सुझाव का सार्वजनिक रूप से विरोध कर दिया है।मुख्य मंत्री नीतीश कुमार ने सोमवार को प्रखंड प्रमुखों को यह सुझाव दिया था कि वे भ्रष्ट अफसरों के कारनामों का भंडाफोड़ करने के लिए आधुनिक तकनीकी का इस्तेमाल करें।जो जन प्रतिनिधि बी.डी.ओ.पर दबाव डाल कर सिर्फ लेन -देन का रिश्ता नहीं बनाना चाहते होंगे, वे स्टिंग आपरेशन चला या चलवा सकते हैं। मुख्य मंत्री के सुझाव के बाद अब यह काम कुछ दूसरे लोग भी कर सकते हैं। इस ‘आपरेशन’ के शिकार कभी कुछ प्रखंड प्रमुख भी हो सकते हैं। बिहार प्रशासनिक सेवा संघ यानी बासा के अध्यक्ष अरूण चंद्र मिश्र ने कहा है कि मुख्य मंत्री के इस सुझाव से अफसरगण मानसिक रूप से परेशान हो जाएंगे। उनकी यह राय है कि भ्रष्ट अफसरों के खिलाफ पहले से निर्धारित प्रक्रियाओं के तहत ही कार्रवाई होनी चाहिए। सवाल है कि कोई ईमानदार अफसर किसी स्टिंग आपरेशन की आशंका मात्र से ही मानसिक रूप से क्यों परेशान हो जाएगा ? जो अफसर ईमानदारी पूर्वक अपनी ड्यूटी निभाता है और बिना रिश्वत लिए सरकारी काम करता रहता है,उसे किसी भी संभावित स्टिंग आपरेशन से क्यों परेशान हो जाना चाहिए ? पुराने तरीके से बिहार में सरकारी भ्रष्टाचार पर काबू पाने में मदद नहीं मिल रही है। याद रहे कि सरकारी भ्रष्टाचार ही इस देश की भीषण गरीबी व अन्य अधिकतर समस्याओं का जनक है।चीन में भ्रष्ट लोगों के लिए फांसी की सजा की व्यवस्था है,इसीलिए वह देश आज अमेरिका से भी अधिक स्वर्ण पदक ओलम्पिक में जीत जा रहा है। पर, हम अपनी अधिकतर जनता को भूखे पेट सोने को मजबूर कर देते हैं।हालांकि इस देश की संसद व विधान सभाएं इतना अधिक पैसे का बजट हर साल जरूर पास कर देती हैं जिससे कोई भूखा पेट नहीं सोए।पर बिचैलिए लूट लेते हैं। हालांकि नीतीश कुमार ने भी इस बारे में जरूर अधूरी बात कही है।उन्हें साथ- साथ यह भी कहना चाहिए था कि राज्य के राजनीतिक कार्यकत्र्ता,जन प्रतिनिधि व जनता को चाहिए कि वे मंत्रियों तथा दूसरे अफसरों तथा अन्य क्षेत्रों के भ्रष्ट लोगों के खिलाफ भी स्टिंग आपरेशन चलाएं।हां,यदि स्टिंग आपरेशन के जरिए कोई बड़े घोटाले का भंडाफोड़ होता है तो आपरेशन में लगे लोगों को राज्य सरकार भरपूर इनाम दे।साथ ही,ऐसे राजनीतिक कार्यकत्र्ताओं को चुनावी टिकट में तरजीह मिले। स्टिंग आपरेशन कितना जरूरी है,यह बात बासा के अध्यक्ष के बयान के बाद और भी साफ हो गया है। क्योंकि स्टिंग आपरेशन की आशंका से ही मानसिक रूप से परेशान होने वाले अफसर मौजूद हैं। क्या स्टिंग आपरेशन के बिना दिल्ली के आर.के.आनंद जैसे बड़े वकील को बेनकाब करना संभव था ? संसद में सवाल पूछने के लिए जिन दर्जन भर सांसदों ने रिश्वत ली थी,उन्हें स्टिंग आपरेशन के बिना बेनकाब करके संसद से बाहर करवाना संभव था ? एक केंद्रीय मंत्री दिलीप सिंह जू देव के खिलाफ का एक सफल स्टिंग आपरेशन कौन भूल सकता है ? इस देश में गलत उद्देश्य से चलाए गए कुछ स्टिंग आपरेशनों की कोर्ट ने निंदा की है तो कुछ आपरेशनों की अदालत ने जरूरी भी बताया है। बिहार में ही हाल के वर्षों में बड़ी संख्या में परंपरागत तरीके से भ्रष्ट अफसरों के खिलाफ कार्रवाई हुई है। क्या बासा अध्यक्ष दावा कर सकते हैं कि इससे राज्य के सरकारी दफ्तरों में भ्रष्टाचार कम हुआ है ?शायद स्टिंग के भय से भ्रष्टाचार कम हो ! क्या बासा अध्यक्ष यह बता सकते हैं कि बिहार के किस प्रखंड कार्यालय में रिश्वत के बिना जनता का कोई जायज काम भी होता है ? क्या उनके सदस्य ने बासा या राज्य सरकार को कभी यह लिख कर दिया है कि उनकी इच्छा के बिना भी उनके मातहत क्लर्क या अफसर जनता से रिश्वत ले रहे है ? जाहिर है कि सभी प्रखंड प्रमुख शुद्ध मन से ही भ्रष्ट बी.डी.ओ.या सी.ओ. के खिलाफ कार्रवाई की मांग नहीं करते। कई के अपने निजी एजेंडे होते हैं।शिक्षा नियुक्ति घोटालों ने बिहार के अनेक जन प्रतिनिधियों को भी बेनकाब कर दिया है।पर यदि बासा सभी तरह के भ्रष्टों के खिलाफ नई -नई तकनीकी के जरिए कार्रवाई नहीं करने देगा तो न तो उनके सदस्य खुद आने वाले दिनों में सुरक्षित रहेंगे और न ही अन्य लोगों के साथ साथ उनकी भी आने वाली पीढि़यां महफूज रहेंगीं।क्योंकि सरकारी भ्रष्टाचार के कारण विकास नहीं हो रहा है और विकास नहीं होने का सर्वाधिक लाभ बिहार में माओवादियों को मिल रहा है जो अपनी ताकत बढ़ाते जा रहे हैं। राष्ट्रीय सहारा, पटना (२८-०८-2008)

एकमुश्त मतदान की जरूरत

यदि दलीय नेता ही अवसर आने पर अपने दल के सभी सदस्यों की ओर से सदन में एकमुश्त मतदान कर दिया करें ं,तो ‘नोट के बदले वोट’ की नौबत शायद नहीं आएगी। यह बात अलग है कि दलीय नेता ही बिक जाएं।पर, ऐसी नौबत कम ही आती है।लोक सभा में गत 22 जुलाई को जो कुछ हुआ,उसे देखते हुए क्या इस सुझाव पर विचार करने का समय नहीं आ गया है ? पर, सदस्यों की ओर से संसदीय व विधायक दलों के नेताओं को ऐसा अधिकार दिया जाए, इसके लिए संबंधित नियम में परिवत्र्तन करना पड़ेगा। क्या लोकतंत्र मेंं पनपी एक शर्मनाक बुराई को रोकने के लिए नियमों में एक और परिवत्र्तन नहीं किया जाना चाहिए ? अधिक दिन नहीं हुए जब राज्य सभा चुनावों में अपने दलीय नेता या उनके प्रतिनिधि को मत पत्र दिखाकर वोट देने की बाध्यता कायम की गई।यानी सदस्यों को उनके मनोनुकूल मतदान करने का उनका अधिकार छीन लिया गया। उससे पहले बड़े पैमाने पर ऐसी शिकायत आ रही थी कि अनेक विधायक पैसे लेकर राज्य सभा के उम्मीदवारों को वोट दे रहे हैं। कल्पना कीजिए कि पहले से संसदीय दल के नेताओं को ही विश्वास प्रस्ताव पर अपने पूरे दल की ओर से एकमुश्त वोट देने का अधिकार होता तो कम से कम संगठित व बड़े दलों से तो कोई दल -बदल या पक्ष परिवत्र्तन नहीं होता।हां,निर्दलीय सदस्यों के बारे में भी अलग से विचार किया जा सकता है। निर्दलीय सदस्य जब चुन कर जाते हैं,उसी समय उनसे यह लिखवा कर स्पीकर रख लें कि वे पूरे पांच साल वे किस पक्ष में रहेंगे ? उन्हें पहले ही यह लिख कर दे देना चाहिए कि वे सत्ता दल के साथ रहेंगे या विपक्ष के साथ ? या फिर वे कभी भी किसी पक्ष की ओर से मतदान ही नहीं करेंगे।जब वे यह लिख कर दे देंगे तो उनके द्वारा किसी भी हालत में पक्ष बदलने की स्थिति में स्पीकर उनकी सदस्यता तत्काल समाप्त घोषित कर देंगे। ऐसा ही नियम बनाया जा सकता है। दलीय व निर्दलीय जन प्रतिनिधियों के लिए ऐसे नियम बन जाएं तो बिकने के लिए कोई जन प्रतिनिधि घोड़ामंडी में उपलब्ध ही नहीं रहेगा।यदि उपलब्ध ही नहीं रहेगा तो खरीदने वाले कैसे व कहां से खरीदेंगे ? यदि नहीं खरीद पाएंगे तेा लोकतंत्र शर्मसार होने से बच जाएगा।यानी भविष्य में कभी किसी मंत्रिमंडल के बारे में यह नहीं कहा जा सकेगा कि फलां मंत्रिमंडल तो खरीदे हुए सांसदों के ही बल पर वर्षो तक चला। इससे लोकतंत्र बदनाम होने से बचेगा और जनतंत्र मंंें आम जनता की आस्था समाप्त नहीं होगी।आस्था बनी रहेगी तो माओवादी जैसी जो शक्तियां इन दिनों मौजूदा लोकतंत्र को समाप्त करने की कोशिश में लगी हुई हैं,उन्हें जनता से अधिक ताकत नहीं मिलेगी। एक बार 1993 में सरकार बचाने के लिए कुछ सांसद बिके थे। इस बार भी सांसदों को खरीद कर ही मन मोहन सरकार बचाई गई, इस आरोप की जांच संसदीय समिति कर रही है।जांच का नतीजा जो भी आए , पर पूरे देश ने यह दृश्य कई बार अपने टी.वी.स्क्रीन पर देखा कि किस तरह सांसदों की घोड़ामंडी सजी।इस घृणित प्रकरण की चर्चा अभी चलती ही रहेगी।ऐसी शर्मनाक चर्चाओं पर विराम लगाने के उपाय किए जाने में यदि इस देश के प्रमुख दल रूचि रखते होंगे तो जरूर उपर दिए गए सुझाव या फिर इससे भी किसी बेहतर सुझाव पर अमल करेंगे।पर क्या इस देश के पक्ष विपक्ष की राजनीति के दिग्गज नेता लोग सचमुच चाहते हैं कि नोट के बदले वोट जैसे प्रकरणों से भारत का लोकतंत्र दुनिया भर में बदनाम होने से बचे ? या फिर इस घृणित व्यापार की सहूलियत उपलब्ध रहने पर उसका समय आने पर सभी दल सिर्फ लाभ ही उठाना चाहते हैं ? अभी लाभ यू.पीए. ने उठाया,कल होकर एन.डी.ए. उठाएगा। यह बात इसलिए कही जा रही है कि झामुमो रिश्वत कांड मुकदमे में सुप्रीम कोर्ट ने 1998 में ही यह कहा था कि यदि कोई सांसद घूस लेकर सदन में वोट देता है तो उसे सजा देने का अधिकार संसद को ही है,कोर्ट को नहीं।पर इस फैसले के दस साल बीत जाने के बावजूद ऐसे घूसखोर सांसदों को सजा देने के लिए संविधान के संबंधित अनुच्छेद में संशोधन करने का कोई उपाय न तो एन.डी.ए.ने किया और न ही यू.पी.ए. ने जबकि दोनों इस बीच लंबे समय तक बारी-बारी से सत्ता में रहे। राष्ट्रीय सहारा, पटना (१४-०८-2008)

आलोचना हो, पर कैसी ?

पचास के दशक की बात है। एक बार अनुग्रह बाबू के एक खास करीबी नेता एक खास उद्देश्य से लाल बहादुर शास्त्री से मिले।उन्होंने शास्त्री जी से कहा कि आप जेपी से कहें कि वे सार्वजनिक रूप से जवाहर लाल नेहरू की आलोचना नहीं करें।इससे होता यह है कि कांग्रेस के अंदर डा.अनुग्रह नारायण सिंह की स्थिति उलझनपूर्ण हो जाती है। याद रहे कि जेपी, अनुग्रह बाबू के काफी करीबी माने जाते थे। शास्त्री जी ने जवाब दिया कि ‘ऐसा मैं जेपी को नहीं कह सकता।दरअसल जेपी ही ऐसे एक व्यक्ति हैं जो किसी राग-द्वेष या लाभ-लोभ के बिना नेहरू जी की जनहित में सार्वजनिक रूप से आलोचना कर सकते हैं।ऐसी आलोचनाएं सत्ताधारी नेता को एकाधिकारवादी व निरंकुश होने से रोकती हैं। नेहरू की अपार लोकप्रियता के कारण उनमें एकाधिकार की प्रवृति पनपने का खतरा मौजूद है। तुलना तो थोड़ी बेमेल हो रही है,पर नीतीश कुमार के खिलाफ भाजपा नेता हरेंद्र प्रताप की हाल की सार्वजनिक आलोचना से वह प्रकरण याद आता है।नीतीश कुमार के जिस तरह जन समर्थन बढ़ने की खबर दी जा रही है, ऐसे में उनमें एकाधिकारवादी प्रवृति के पनपने के खतरे से इनकार नहीं किया जा सकता।डी.एन.गौतम को डी.जी.पी.बनाने के पीछे भी संभवतः मुख्य मंत्री की यही आत्म विश्वासपूर्ण मानसिकता काम कर रही है कि अगले किसी चुनाव में उन्हें मतदाताओं को मतदान केंद्रों पर जाने से रोकने की जरूरत नहीं है बल्कि पुलिस की मदद से स्वच्छ मतदान कराने की जरूरत है। लोकतंत्र में राग-द्वेष व लोभ-लाभ से मुक्त होकर जन हित में सत्ता की जरूरत पड़ने पर कभी स्वस्थ आलोचना या फिर कभी तारीफ जरूरी भी है।एन.डी.ए.के भीतर से हरेंद्र प्रताप की ओर से संभवतः अब तक की सबसे कड़ी आलोचना सामने आई है। हरेंद्र प्रताप की ताजा आलोचना कैसी है ?इस पर मिली जुली प्रतिक्रियाएं हैं।इसके तरह-तरह के मतलब भी लगाए जा सकते हैं।ऐसे समय में जब कि इस देश के पक्ष- विपक्ष के नेताओं द्वारा आए दिन हो रही राजनीतिक बयानबाजियों से तथ्यपरकता व जन कल्याण की भावना लुप्त होती जा रही है,वहां हरेंद्र प्रताप के बयान में भी ऐसा कुछ तलाश करना अस्वाभाविक नहीं है।पर, हरेंद्र प्रताप की कुछ बातें तो गौर करने लायक हैं। बिहार के विश्व विद्यालय कर्मियों की हड़ताल से उपजी समस्या के प्रति हरेंद्र जी की चिंता सराहनीय है। इस सरकार के पीछे सरकारी विफलता भी है।पोटा के खिलाफ मुख्य मंत्री नीतीश कुमार के बयान पर हरेंद्र प्रताप की आलोचना में भी दम लगता है।क्योंकि आतंकवाद की समस्या को गैर राजनीतिक व पेशेवर ढंग से देखने वाले तमाम विशेषज्ञ कड़े कानून की जरूरत महसूस करते रहे हैं।दुनिया के अन्य अनेक देशों ने इस संदर्भ में हाल के वर्षों में अपने कानून कड़े कर दिए हैं। पर भागल पुर दंंगे के मुकदमों की फिर से सुनवाई के नीतीश सरकार के फैसले पर उंगुली नहीं उठाई जानी चाहिए।हरेंद्र प्रताप ने उंगुली उठाई है।यदि दंगाइयों को सजा नहीं मिलेगी तो भविष्य में दंगा करने वालों के हाथ रुकंेगे कैसे ? दंगा- फसाद नहीं रुकेगा तो दरिद्र बिहार का विकास कैसे होगा ? वैसे भी सांप्रदायिक मसलों पर भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व का रूख समय के साथ बदल रहा है। पर, हरेंद्रजी, इस बीच बंगलादेशी घुसपैठियों की समस्या को आप कैसे भूल गए ? आप तो इस समस्या के विशेषज्ञ जानकार रहे हैं।यह समस्या बिहार सहित देश भर में अब भी बरकरार है।बल्कि बढ़ रही है।लोक सभा के पूर्व स्पीकार पी.ए.संगमा ने हाल ही मेंे कहा है कि ‘बंगला देश से और डेढ़ करोड़ शरणार्थियों @कुछ लोग उन्हें घुसपैठी कहते हैं।@के जल्दी ही भारत में प्रवेश करने की आशंका है।’एक अनुमान के अनुसार दो करोड़ बंगला देशी घुसपैठी पहले से ही भारत में अवैध ढंग से रह रहे हैं।इस देश में इन दिनों जारी आतंकवादी वारदातों में बंगला देश में सक्रिय जेहादियों का ही अधिक नाम लिया जा रहा है।इस देश में जहां तहां बसे बंगला देशियों की गैर कानूनी बस्तियों में उन जेहादियों के शरण मिलने की आशंका रहती है। जहां तक छोटे पार्टनर को भी प्रधान मंत्री और मुख्य मंत्री पद देने का सवाल है तो इस देश में ऐसे अनेक उदाहरण है। केंद्र में मोरारजी देसाई और राज्यों में चरण सिंह,महामाया प्रसाद सिंहा,अजय मुखर्जी,गोविंद नारायण सिंह तथा इस तरह कई नेताओं ने जब सरकार बनाई थी तो वे गठबंधन में शामिल दलों में सबसे बड़े घटक के नेता नहीं थे।यदि केंद्र में भाजपा को प्रधान मंत्री पद चाहिए तो राज्यों में उसे अपने सहयोगी दलों को तरजीह देनी ही पड़ेगी। राष्ट्रीय सहारा, पटना (०७-०८-2008)

‘जालियांवाला बाग’ ने बदली नेहरू परिवार की जीवन शैली


जालियांवाला बाग के नर संहार ने नेहरू परिवार की जीवन-शैली बदल दी और वह परिवार अंग्रेजों के खिलाफ अभियान में शामिल हो गया। रौलट एक्ट के विरोध में गांधी के उठ खड़ा होने की खबर समाचार पत्रों में पढ़ कर युवा जवाहर लाल नेहरू जरूर राष्ट्रीय आंदोलन में शामिल होना चाहते थे।पर, उनके पिता मोती लाल नेहरू का तब इस बात पर विश्वास नहीं था कि मुट्ठी भर लोगों के जेल चले जाने से देश का कोई भला हो सकता है। उधर जवाहर लाल, गांधी के साथ जुड़ने को उतावले थे।इस सवाल पर मोती लाल नेहरू और जवाहर लाल नेहरू के बीच अक्सर बहस होती थी।जवाहर लाल की बहन कृष्णा हठी सिंग ने लिखा है कि ‘इससे हमारे घर की शांति ही भंग हो गई थी।’ अपनी पुस्तक ‘इंदु से प्रधान मंत्री’ में कृष्णा ने लिखा है कि ‘हर स्थिति में से रास्ता निकालने में कुशल मेरे पिता जी ने आखिर इसका हल भी खोज ही लिया।उन्होंने गांधी जी को ही इलाहाबाद बुलाया। इस तरह गांधी जी हमारे यहां पहली बार आए,और तब उनका और नेहरू परिवार का पारस्परिक स्नेह क्रमशः गाढ़ा होता गया।’ ‘लंबी चर्चाओं के दौरान पिता जी और गांधी जी ने भारत की समस्याओं के अपने -अपने हल प्रस्तुत किए।लेकिन उनकी चर्चा जवाहर पर केंद्रित हो गई।क्योंकि पिता जी किसी ऐसे अकाट्य तर्क की खोज में थे जिससे जवाहर को सत्याग्रह सभा में शामिल होने से रोका जा सके।इसलिए तो गांधी को उन्होंने अपने यहां बुलाया था। गांधी जी बिलकुल ही नहीं चाहते थे कि इस सवाल को लेकर पिता-पुत्र में मन मुटाव हो, इसलिए वह पिता जी की इस राय से सहमत हो गए कि जवाहर लाल को जल्दीबाजी में कोई फैसला नहीं करना चाहिए। लेकिन गांधी जी की यह सलाह बेकार ही साबित हुई। क्योंकि घटनाक्रम ने ऐसा मोड़ लिया जिससे सब कुछ गड़बड़ा गया। वह लोम हर्षक घटना थी पंजाब के एक शहर अमृतसर में निहत्थे लोगों पर गोरी हुकूमत का खूनी हमला।’ कृष्णा हठी सिंग ने उन दिनों के घटनाक्रम को विस्तार से लिखा है,‘ गांधी जी अपने आंदोलन को वेग देने के लिए इलाहाबाद से दिल्ली चले गए। वहां उन्होंने रौलट एक्ट को रद करने की मांग के समर्थन में 31 मार्च 1919 को देश व्यापी आम हड़ताल की घोषणा की।भारी संख्या में लोग उनकी सभा में शरीक हुए। ब्रिटिश हुकुमत घबरा गई और उसने गांधी जी को गिरफ्तार कर लिया।गांधी जी के गिरफ्तार किए जाते ही दिल्ली और दूसरे शहरों में उपद्रव शुरू हो गए।सभा व जुलूस पर पाबंदी लगा दी गई। लेकिन इससे लोगों के गुस्से और जोश में कोई फर्क नहीं पड़ा और न उन्हें यही पता चला कि गांधी फौरन छोड़ भी दिए गए। 13 अप्रैल को कई हजार स्त्री,पुरूष और बच्चे अमृत सर के जालियांवाला बाग में इकट्ठे हुए। यह चारों ओर उंची -उंची इमारतों से घिरा एक खुला मैदान था।जनरल डायर ने, जिसे इस सभा को भंग करने के लिए भेजा गया था, रास्ते की नाकेबंदी कर अपने सैनिकों को गोली चलाने का हुक्म दे दिया। गोलीबारी में सैकड़ों लोग मारे गए और हजारों घायल हुए।’ ‘निहत्थी और निरीह जनता के इस कत्लेआम ने पिता जी के विचारों में आमूल परिवत्र्तन कर दिया। वह गांधी जी के प्रबल प्रशंसक और जवाहर के मत के अनुकूल हो गए। उनका विचार परिवत्र्तन इतने नाटकीय ढंग से हुआ कि वह अच्छी चलती वकालत को लात मार कर जी जान से राजनीति में कूद पड़े। घटना क्रम ने हमारे परिवार के जीवन प्रवाह ही बदल दिया। कहां तो हमारे खाने के टेबुलों पर बढि़या किस्म के देशी-विदेशी खानों के दौर चलते थे और कहां अब बहुत ही सादगीपूर्ण भारतीय भोजन थालियों में परोसा जाने लगा। चार - छह कटोरियों में सालन, दाल ,एक दो सब्जियां, दही, अचार और चटनी के साथ चपातियां या पराठे, चावल और अंत में एक मिठाई बस यही भोजन था।’ ‘अब न वह गपशप होती और न ही हंसी मजाक। वकालत छोड़ देने से पिता जी की भारी आय भी बंद हो गई। नौकरों की तादाद एकदम घटा दी गई। बिल्लौरी कांंच और चीनी मिट्टी के बढि़या बरतन, अस्तबल के उम्दा घोड़े और कुत्ते तथा तरह- तरह की उत्तम शराबें आदि सभी विलासिता सामग्री बेच दी गईं। अम्मा और कमला के पास बहुत से कीमती गहने थे-अंगुठियां, बालियां और कर्णफूल, हार, कंगन, कांटे और ब्रूच, सभी सोने और हीरे मोती, माणिक पन्ना जड़े हुए। अपने लिए मामूली गहने रखकर अम्मा और कमला बाकी सब बेचने के लिए राजी हो गर्इं। पिता जी ने अपना मकान कांग्रेस को भेंट कर दिया। वह स्वराज्य भवन कहलाया। हमलोगों के लिए बना नया और छोटा मकान आनंद भवन कहलाया। शुरू में तो मुझे हाथ से कती बुनी मोटी खादी पहनना जरा भी नहीं सुहाता था और मैं नाक भौं सिकोड़ती थी। मगर धीरे -धीरे अभ्यस्त हो गई।’ प्रभात खबर (03-10-2008)

आपातकाल में जेपी की नजरबंदी के दिन


आपातकाल के दौरान जय प्रकाश नारायण नजरबंद थे। वे नजरबंदी के दौरान अपनी डायरी लिखते थे। आज से ठीक 33 साल पहले यानी 26 सितंबर 1975 को जेपी ने अपनी डायरी में लिखा, ‘आज मेरी नजरबंदी के तीन महीने पूरे हो गए। अब लगता है, दिन काफी तेजी से बीत रहे हैं। फिर भी साथी के अभाव में समय पहाड़ बन गया है। किंतु ऐसा प्रतीत होता है कि तानाशाही के गत्र्त की ओर पतन की प्रक्रिया रुक गई है। वह स्थायी या अस्थायी रूप से रुकी है, यह बताना अभी संभव नहीं। सुगत @दासगुप्त@कल कह रहे थे कि जिन क्षेत्रों में जाते-आते हैं,वहां सामान्य रूप से यह आशा बनी है कि संसदीय चुनाव अगले साल होने वाले हैं।अगर ऐसा होता है तो लोकतंत्र की ओर वापसी निश्चित है। यद्यपि आपातकाल की समाप्ति तो नहीं होगी और समाचार पत्र भी पूरी तरह स्वतंत्र नहीं होंगे, परंतु जेलों से आम रिहाई निश्चित रूप से होगी और भाषण तथा संगठन करने की स्वतंत्रता पहले की अपेक्षा अधिक रहेगी।’ याद रहे कि 25 और 26 जून 1975 के बीच की रात में तत्कालीन इंदिरा गांधी की सरकार ने आपातकाल लगा कर जेपी सहित देश के करीब एक लाख नेताओं व राजनीतिक कार्यकत्र्ताओं को जेलों में डाल दिया था।जेपी को दिल्ली में गिरफ्तार करके पहले तो हरियाणा के सोहना में रखा गया,बाद में वहां से उन्हें 29 जून 1975 को चंडीगढ़ पहुंचा दिया गया।उन्हें सशस्त्र पुलिस की पहरेदारी में वहां के बड़े अस्पताल में रखा गया।जेपी जब आजादी की लड़ाई के दौरान जेल में थे तो उनकी यह मांग अंगे्रजांे ने मान ली थी कि उनके साथ सह कैदी के रूप में डा.राम मनोहर लोहिया को रखा जाए। पर इंदिरा गांधी की सरकार ने किसी सह कैदी के उनके साथ रहने की जेपी की मांग ठुकरा दी थी। जेपी की जेल डायरी भारतीय इतिहास की त्रासदी का एक जीवंत दस्तावेज है।उनकी जेल डायरी में उनके अकेलापन की पीड़ा भी झलकती है। 28 सितंबर को अपनी डायरी में 73 वर्षीय जेपी ने लिखा,‘कल शनिवार को मेरे लिए बुरा दिन था।सुबह ज्यों ही मैं शौचालय में बैठा,मेरे पेट में भयानक दर्द महसूस हुआ।पहले तो मैंने सोचा कि दर्द खत्म हो जाएगा।परंतु वह जारी रहा,बल्कि और भी गंभीर हो गया।मैं पसीने से तर-बतर होने लगा।बेहोशी और बहुत कमजोरी महसूस हुई।यहां तक कि उठन,े हाथ धोने और बिछावन तक जाने में कठिनाई हो रही थी।मैंने डा.कालरा को बुलाने और डा.चुट्टानी को भी खबर करने को कहा।दर्द घंटों तक जारी रहा।डाक्टरों ने दवाएं दीं।घंटों तक बिछावन पर पड़ा रहा।’ 29 सितंबर को जेपी ने लिखा,‘ आज के ‘ट्रिब्यून’ में तीन कालम के शीर्षक के साथ श्री जग जीवन राम का भाषण प्रकाशित हुआ है।भाषण में उन्होंने बड़े जोर देकर कहा है कि प्रधान मंत्री का नेतृत्व बीस सूत्री योजना की क्रियान्विति के लिए महत्वपूर्ण है।आश्चर्य है कि वफादारी की यह घोषणा ऐसे उंचे स्वर में क्यों की जा रही है।क्या इसके पीछे कोई छिपा हुआ कारण है या समय- समय पर की जाने वाली वफादारी की अभिव्यक्ति मात्र है ? विश्वास नहीं होता कि ऐसी चापलूसी का जोरदार प्रदर्शन जगजीवन बाबू जैसे लोग भी कर रहे हैं।कैसा पतन है !’ ‘अफसोस यह कि किसी ने श्री राम से यह नहीं पूछा कि क्यों उनकी प्रिय प्रधान मंत्री का नेतृत्व दस सूत्री योजना की क्रियान्विति के मामले में विफल हुआ।शायद विरोधी पक्ष का विश्वासघात इसके लिए भी दोषी होगा।’ ‘आज सुबह का ट्रिब्यून घोषणा करता है कि संपूर्ण नशाबंदी संभव है।क्या खूब ! इसमें जो राजनीतिक चालबाजी निहित है,उसके बावजूद यह एक अत्यंत अभिनंदनीय निष्पति है।अवश्यमेव,इसमें राजनीतिक चाल यह है कि बिनोवा जी तथा सर्वोदय आंदोलन को अपने पक्ष में कर लें और यह दिखा दें कि श्रीमती गांधी जैसी सच्ची गांधीवादिनी के प्रति जय प्रकाश तथा उनके मित्रों का विरोध कितना गलत एवं दुष्टतापूर्ण है।इससे आने वाले चुनाव में भी मदद मिलेगी।अस्तु मुझे तो इसकी चिंता बिल्कुल नहीं है।श्रीमती गांधी की प्रशंसा और जय प्रकाश की निंदा होती है तो हो।जहां तक मेरा संबंध है,लोकतंत्र के पक्ष में तथा भ्रष्टाचार के विरूद्ध संघर्ष जारी रहेगा।संपूर्ण क्रांति अब भी मेरा लक्ष्य है।’ 2 अक्तूबर को अपनी जेल डायरी में जय प्रकाश नारायण लिखते हैं,‘बापू,आपके चरणों में श्रद्धापूर्वक नमन।बापू का नाम तो बहुत लिया गया,लेकिन उनका काम बहुत थोड़ा हुआ।पिछले कुछ वर्षों से देश के विद्वान यह अनुभव करने लगे हैं कि बापू का बताया हुआ मार्ग छोड़ कर भारत ने बहुत बड़ी गलती की।जवाहर लाल के जमाने में इन्हीं विद्वानांे ने या इनके ही जैसे विद्वानों ने गांधी के मार्ग को दकियानूस माना और जवाहरलाल जी की माडर्न दृष्टि के वे प्रशंसक बने रहे।’ प्रभात खबर (26-09-2008)