शुक्रवार, 12 मार्च 2010

बिहार को मिला एक नया चुनावी मुद्दा

बिहार में विधान सभा का चुनाव इसी साल होना है। महिला आरक्षण एक प्रमुख चुनावी मुद्दा बन जाए तो यह कोई अजूबी बात नहीं होगी।

महिला आरक्षण के मौजूदा स्वरूप के सबसे बड़े विरोधी नेताआंें में से एक नेता लालू प्रसाद इसी प्रदेश से हैं। विधान सभा चुनाव में मतदाता अन्य बातों के साथ -साथ इस बात पर भी अपना मत देंगे कि महिला आरक्षण के मौजूदा स्वरूप का किस दल ने विरोध और किसने समर्थन किया।

लालू प्रसाद तथा अन्य विरोधियांे को तो यह लगता है कि चूंकि इस देश में पिछड़ों की आबादी अन्य समुदायों की अपेक्षा काफी अधिक है, इसलिए उन्हें इस आरक्षण के विरोध का चुनावी लाभ जरूर मिलेगा। पर क्या ऐसा हो पाएगा? इसका जवाब तो बिहार का अगला चुनाव नतीजा ही देगा।

हालांकि लालू-मुलायम से अलग राय रखने वाले लोग बताते हैं कि इस विरोध का नुकसान ही लालू प्रसाद को बिहार में होगा क्योंकि उनका विरोध पिछड़ी और अल्पसंख्यक महिलाओं के हितों को ध्यान में रख कर कम बल्कि अपने कुछ खास चुनाव क्षेत्रों को महिलाओं से बचाने की समस्या को ध्यान में रख कर अधिक है।

लालू प्रसाद ने कहा है कि दुनिया के किसी देश में महिलाओं के लिए संसद में आरक्षण नहीं हैं। फिर यहीं क्यों ? उन्होंने यह भी कहा है कि यह पुरुष प्रधान समाज है। इसमें पति जहां वोट देने को कहता है, पत्नी वहीं वोट देती है। इसलिए इस विधेयक के पास हो जाने से कांग्रेस या भाजपा को महिलाओं के वोट नहीं बढ़ जाएंगे।

लालू प्रसाद ने यह कह कर समाज में महिलाओं की दयनीय स्थिति का वर्णन खुद ही कर दिया है। इससे भी शीघ्र महिला आरक्षण की जरूरत बढ़ जाती है। ऐसे पुरुष प्रधान समाज में यदि आरक्षण देकर महिलाओं का सशक्तीकरण कर दिया जाए तो वे किसी को वोट देने के बारे में खुद निर्णय लेने की स्थिति में हो जाएंगी। लोकतंत्र के लिए यह जरूरी भी है। लोकतंत्र के लिए यह कोई अच्छी बात तो है नहीं कि एक बड़ी आबादी अपने पतियों के कहने पर ही मतदान किया करे !

महिला आरक्षण के मामले को गत 14 साल से लटका कर रखना कहां का लोकतंत्र है जबकि इस विधेयक के पक्षधर दलों व सांसदों की संख्या हमेशा ही विरोधियों की अपेक्षा अधिक रही है ? अब जब मौजूदा लोकसभा में महिला आरक्षण विधेयक के घोषित विरोधियों की संख्या और भी कम हो गई है तो लालू प्रसाद कहते हैं कि इस विधेयक के खिलाफ ‘युद्ध’ होगा। ऐसे ही युद्ध की घोषणा जब अल्पमत सवर्ण लोग सन 1990 में मंडल आरक्षण के खिलाफ कर रहे थे तो खुद लालू प्रसाद की उस पर कैसी प्रतिक्रिया थी ? यह भी याद रखने की जरूरत है कि वी.पी. सिंह की सरकार को जितने सांसद समर्थन कर रहे थे, उन सांसदों का बहुमत मंडल आरक्षण के खिलाफ ही था। फिर भी जरूरत समझ कर वी.पी. सिंह सरकार ने वह काम कर दिया था।

दरअसल लोकतंत्र का तकाजा यह है कि लालू प्रसाद और मुलायम सिंह यादव यह कहते कि अभी तो मौजूदा स्वरूप में भले कांग्रेस इस विधेयक को पारित करा ले ,पर जब हमारे मत के लोग बहुमत में आएंगे तो हम आरक्षण के भीतर आरक्षण का प्रावधान कर देंगे।

पर सवाल है कि पिछड़ा बहुल इस देश में लालू प्रसाद और मुलायम सिंह यादव जैसे नेताओं के दल संसद में बहुमत क्यों नहीं प्राप्त कर पा रहे हैं ताकि वे आरक्षण के भीतर आरक्षण का प्रावधान करा पाएं ? दरअसल वे इसलिए बहुमत नहीं कर पा रहे हैं क्योंकि पिछड़े और अल्पसंख्यकों को भी उनकी कथनी और करनी पर अब कम ही भरोसा हो रहा है। पिछड़े वर्ग के एक नेता जी ने गत लोकसभा चुनाव में अपने दल के एक निवर्तमान अल्पसंख्यक सांसद का टिकट काट कर उनकी जगह अपने एक करीबी रिश्तेदार को टिकट देकर वहां से लोकसभा में पहुंचा दिया। वे नेताजी आज गला फाड़ कर यह ़कह रहे हंै कि मौजूदा महिला आरक्षण विधेयक अल्पसंख्यक विरोधी है।

बिहार विधानसभा के अगले चुनाव में महिला आरक्षण मुद्दा इस रूप में भी चर्चित हो सकता है कि आरक्षण के भीतर आरक्षण के बहाने इस आरक्षण को अनंतकाल तक टाले रखना उचित है या फिर विधायिकाओं में महिलाओं को बड़ी संख्या में भेज कर उनका जल्द सशक्तीकरण जरूरी है ? यह मानी हुई बात है कि गाड़ी के दोनों पहिए यानी स्त्री-पुरुष समान रूप से मजबूत होंगे तो ही गाड़ी ठीक से चलेगी।

बिहार में पंचायतों व नगर निकायों में महिलाओं के लिए 50 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान नीतीश सरकार ने किया। इन निकायों के चुनावों का अनुभव यह रहा कि ऐसी कुछ सामान्य सीटों से भी पिछड़ी जातियों की महिलाएं विजयी हुई जो सीटें सामान्य महिलाओं के लिए आरक्षित हैं। संभवत इसी अनुभव के आधार पर नीतीश कुमार ने यह समझा है कि संसद में पेश महिला आरक्षण विधेयक के लागू हो जाने के बाद भी पिछड़े वर्ग की महिलाओं को कोई नुकसान नहीं होगा। यह जाहिर बात है कि जिस चुनाव क्षेत्र में जिस जाति की बहुलता होती है,उस क्षेत्र में उस जाति के उम्मीदवार की ही जीत की अधिक गुंजाइश रहती ही है चाहे उम्मीदवार महिला हो या पुरुष।

आजादी की लड़ाई के समय भी कुछ नेताओं ने ऐसे सवाल उठाए थे। कुछ दलित, अल्पसंख्यक व कमजोर वर्ग के नेतागण तब यह चाहते थे कि आजादी से पहले ही यह तय हो जाए कि आजाद भारत में उन समुदायों की स्थिति क्या होगी। उनकी बात सुनी जाती तो आज तक अंग्रेज यहीं रहते।

साभार: दैनिक जागरण पटना संस्करण (09 मार्च, 2010)

शनिवार, 20 फ़रवरी 2010

निंदक नियरे राखिए

चीन ने कहा है कि भारत, मिसाइल टैक्नोलाजी के मामले में, चीन से अभी दस साल पीछे है। संभव है कि यह बात चीन ने अपने लोगों का मनोबल बढ़ाने के लिए कही होगी! यह बात भी संभव है कि इसमें शायद सच्चाई भी हो। इस संबंध में अंतिम वाक्य तो कोई वैज्ञानिक ही बोल सकता है। याद रहे कि अग्नि -3 के सफल परीक्षण के बाद यह खबर आई थी कि चीन के सुदूर उत्तरी इलाके भी अब भारत के हमले की जद में हैं।

खैर जो हो, पर निंदक नियरे राखिए........वाली कबीर वाणी कम से कम कुछ मामलों में तो इस देश को माननी चाहिए। इससे पहले चीन ने यह भी कहा था कि ‘भारत में सरकारी भ्रष्टाचार इतना अधिक बढ़ चुका है कि विकास व कल्याण कार्यों के लिए आवंटित पैसों में से अधिकांश, वैसे ही जाया हो जाता है जिस तरह छेद वाले किसी लोटे में से उसका अधिकांश पानी नीचे गिर जाता है। ’याद रहे कि चीन में भ्रष्ट लोगों के लिए फांसी की व्यवस्था है जबकि भारत में जो जितना अधिक भ्रष्ट है, उस व्यक्ति के लिए उतना ही अधिक महत्वपूर्ण पद पर पहुंच जाने की गुंजाइश है।

चीन की इन बातों का मनन करके यदि भारत खुद को बेहतर बनाने की कोशिश करे तो यह कोई हेठी की बात नहीं होगी। हमारे बाद आजाद हुए चीन ने अनेक मामलों में हमसे बेहतर ढंग से अपने देश को बनाया है तो उसे उपदेश देने का नैतिक अधिकार भी है।

सरकारी भ्रष्टाचार को कम करने के मामले में हमारे देश का यदि खराब रिकार्ड है तो इसके लिए हमारे हुकमरान ही जिम्मेदार रहे हैं। पर यह भ्रष्टाचार रक्षा खरीद मामलों में भी अपना असर दिखा रहा है जो देश की सुरक्षा के लिए खतरनाक बात है। हाल में यह भी खबर आई थी कि मुम्बई के ताज होटल आदि पर हुए आतंकी हमले के समय हमारे पुलिस अफसरों ने जो बुलेट प्रूफ जैकेट पहन रखे थे, वे घटिया थे क्योंकि उसकी खरीद में घोटाला हुआ था। सोफमा जैसी बेहतर तोप को छोड़कर हमने बोफर्स तोप खरीदी थी, यह बात तो जगजाहिर है। पर इसके अलावा बहुत सी बातें जगजाहिर नहीं होतीं और बड़े बड़े घोटाले पलते रहते हैं। इससे हमारी रक्षा तैयारियां पीड़ित होती है।

भले अब हम सन 1962 की स्थिति में नहीं हैं जब हमारी चीन से शर्मनाक हार हुई थी। पर हमें जो चीन तक पहुंचना चाहिए था, हम वह काम भी नहीं कर पा रहे हैं तो इसके पीछे विभिन्न सरकारी स्तरों पर व्याप्त भीषण भ्रष्टाचार ही है। इस समस्या के कोढ़ में खाज का काम करती है उस भीषण भ्रष्टाचार के प्रति हमारे यहां की विभिन्न सरकारों व नेताओं की भारी सहिष्णुता।

कई बार यह कहा जा चुका है कि रक्षा मामलों में हमारी बदतर तैयारियों ने इस देश को विदेशी हमलावरों के समक्ष लाचार भी बना दिया था।

मध्य युग में बाबर कीे फौज में तोप थी तो राणा सांगा के सैनिकों के पास महज तलवारें और भालें। युद्ध में बाबर की ओर से एक तोप चलती थी और अनेक राजपूत वीर , तत्काल वीर गति को प्राप्त कर जाते थे। एक बार फिर तोप के सामने तलवार लेकर खड़े हो जाने के लिए सैनिकों की जमात तैयार हो जाती थी।

बाद के दिनों में भी इस देश में शाहजहां ने ताज महल और विशाल किलों के निर्माण में समय, शक्ति व धन तो खूब लगाये जबकि उसे देश की हमलावरों से रक्षा के लिए नेवी पर भी खर्च करना चाहिए था। हमलावर समुद्री मार्ग से भारत आये थे।

आज जब भारत का अपने पड़ोस से अच्छा संबंध नहीं है तो हमारी तैयारी भी ऐसी होनी चाहिए ताकि दुश्मन हमारे खिलाफ कोई खिलवाड़ करने से पहले थोड़ा रुक कर सोंचें। परमाणु संपन्न देश बन जाने के कारण भारत की सैनिक धाक जरूर बढ़ी है। पर वही काफी नहीं है। हमें आर्थिक रूप से भी एक संपन्न देश बनना पड़ेगा। इसके लिए भ्रष्टाचार पर काफी हद तक काबू पाना होगा। भ्रष्टाचार कम होने से रक्षा तैयरियों में भी बेहतरी आएगी। साथ ही देश का आर्थिक स्वास्थ्य भी सुधरेगा। गांवों में भी जो व्यक्ति आर्थिक रूप से संपन्न होता है, उसे उसके विरोधी भी जल्दी उससे नहीं उलझते।

चीन का मन इसलिए भी बढ़ा रहता है क्योंकि भारत ने आजादी के बाद खुद को बुलंद नहीं बनाया। अब भी यहां 84 करोड़ लोग औसतन बीस रुपये रोज पर किसी तरह पेट को पीठ से अलग रखने के लिए प्रयत्नशील रहते हैं। दूसरी ओर इस देश में धनपशुओं, कालाबाजारियों, करोड़पति-अरबपति नेताओं की संख्या बढ़ती ही जा रही है। इस देश का भारी धन विदेशी बैंकों की शोभा बढ़ा रहे हैं। ऐसे में चीन की निंदा को कबीर तरह हम लें तो हमारा ही भला होगा।

(दैनिक ‘जागरण’ पटना संस्करण:16 फरवरी 2010 से साभार)

मंगलवार, 2 फ़रवरी 2010

राजनयज्ञों की उठती पीढ़ी

इस देश में नेता कई तरह के होते हैं। अत्यंत थोड़े से राजनयज्ञ यानी स्टेटसमैन होते हैं। कुछ अन्य नेता होते हैं। कुछ कबीलाई सरदार होते हैं। कुछ शुद्ध माफिया व हत्यारे होते हैं जो राजनीति भी करते हैं। कुछ जातीय व सांप्रदायिक वोट बैंकों के सौदागर होते हैं। कुछ अन्य कोटियां भी हैं जिनकी चर्चा यहां उचित नहीं।

जब देश की सत्ता राजनयज्ञों या कम से कम नेताओं के हाथों में आती है तो देश भरसक सुरक्षित माना जाता है। पर जब बाकी श्रेणियों के राजनीतिक कर्मियों के हाथों में प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से सत्ता आ जाती है तो देश या प्रदेश असुरक्षित माना जाने लगता है।

इस देश के साथ परेशानी यह पैदा हो रही है कि यहां एक-एक करके राजनयज्ञ यानी स्टेटसमैन उठते जा रहे हैं। ज्योति बसु अब हमारे बीच नहीं हैं। अटल बिहारी वाजपेयी और जार्ज फर्नांडीस बुरी तरह बीमार हैं और सक्रिय राजनीति से दूर जा चुके हैं। एल.के. आडवाणी को परिस्थितियों ने किनारे कर दिया। उनके अर्ध-संन्यास के लिए वे खुद कतई जिम्मेदार नहीं हैं। यदि पूरे देश के राजनीतिक नजारे को गौर से देखें तो स्टेटसमैन शायद ही कहीं नजर आएगा। यदि इक्के-दुक्के हैं भी तो उनकी संख्या इतनी कम है कि वे देश पर आने वाले किसी संकट में कोई निर्णायक भूमिका निभाने की स्थिति में नहीं हैं।

नेताओं की नई नई पीढ़ियां आंदोलनों की आंच से तप कर निकलती हैं। अब परिवारवाद के घरौदों से राजनीति में नई पीढ़ियां जबरन निकाली जा रही हैं। और इस अभागे व गरीब देश पर थोपी जा रही है। परिवारवाद की कल्पना ही स्वार्थ व जातिवाद पर आधारित है। इसलिए आम तौर पर परिवारवादी राजनीति का स्वरूप भी वैसा ही बनता जा रहा है। शायद ही किसी परिवारवादी नेता ने देश का भला किया हो। अपवादों की बात और है।

ब्रिटेन के प्रधान मंत्री विंस्टन चर्चिल को स्टटेसमैन कहा जाता है। स्टेटसमैन न सिर्फ देश व दुनिया के सामने मौजूद समस्याओं से मजबूती व होशियारी से लड़ता है बल्कि राजनीति का स्वरूप भविष्य में कैसा हो सकता है, इसका भी सही अनुमान रखता है। चर्चिल ने सफलतापूर्वक द्वितीय विश्व युद्ध का नेतृत्व किया था। साथ ही उसे यह भी पता था कि आजादी दे देने के बाद भारत के नेतागण उस देश के साथ क्या कर गुजरेंगे। उनकी यह भविष्यवाणी भारत में सही साबित हुुई है जिसकी यहां अक्सर चर्चा होती रहती है। हालांकि इससे यह साबित नहीं होता कि भारत को आजाद करना गलत था।ं

पर आज जब हम भारत में स्टटेसमैन की कमी की चर्चा करते हैं तो हमारे दिलोदिमाग में यह बात रहती है कि यदि देश के सामने कोई बहुत बड़ी व खतरनाक समस्या आ जाए तो हमारे नेतागण उससे कैसे निपटेंगे।

आज भारत के सामने सबसे बड़ी समस्या सरकारी भ्रष्टाचार है। इसी से लगभग अन्य सभी समस्याएं पैदा हो रही हैं। आज की भीषण महंगाई की समस्या भी सरकारी भ्रष्टाचार से ही पैदा हुई है। महंगाई से जूझने में हमारे देश व प्रदेश के नेतागण विफल हैं। जबकि निष्पक्ष विशेषज्ञ कह रहे हैं कि यदि ईमानदारी, दूरदर्शिता व कड़ाई से इस समस्या का समय पर समाधान कर दिया गया होता तो आज यह इतना भीषण रूप नहीं ले पाता। सरकारी भ्रष्टाचार की समस्या से सफलतापूर्वक जूझने के लिए ऐसे राजनयज्ञों की सख्त जरूरत है जो ईमानदारी से इस बीमारी पर हमला करे। इसके लिए यह जरूरी है कि वह राजनयज्ञ खुद भी ईमानदार हांे। वैसे भी व्यक्तिगत ईमानदारी के बिना कोई राजनयज्ञ का दर्जा पा ही नहीं सकता।

आज इस देश में कितने नेता बच गये हैं जिनकी व्यक्तिगत ईमानदारी ‘सीजर की पत्नी की तरह संदेह से परे’ है ? ऐसे माहौल में सरकारी भ्रष्टाचार के खिलाफ जरूरी कदम कौन उठाएगा ? यह एक बड़ी समस्या है जो समय के साथ इस देश में बढ़ती ही जा रही है। यह बात सही है कि अटल बिहारी वाजपेयी, जार्ज फर्नांडीस और ज्योति बसु ऐसी सरकारों में रहे जो भ्रष्टाचार से मुक्त नहीं थी। पर ये तीन नेता कम से कम ऐसे तो माने ही गये जो सरकारी भ्रष्टाचार को बढ़ावा देकर अपने तथा अपने परिवार के घर नहीं भरते थे। ये नेता जिन पदों पर रहे, उन पदें को तो कम से कम पैसे कमाने की मशीन बनाने से उन्होंने रोके रखा। पर आज अधिकतर सत्ताधारी व प्रतिपक्षी नेताओं की हालत कैसी है? एम.पी.-विधायक फंड ने तो अधिकतर नेताओं की बखिया उधेड़ कर रख ही दी है।

इस माहौल में ज्योति बसु जैसे राज नेताओं का जाना अखरता है। राजनयज्ञों की दिनानुदिन घटती संख्या और भी अखरने वाली बात है। यह देश व इसके लोकतंत्र के भविष्य के लिए कतई शुभ नहीं है। आगे- आगे देखिए होता है क्या !

साभार दैनिक जागरण पटना

शनिवार, 30 जनवरी 2010

तीन-तीन बार उनके दरवाजे पर आकर लौट गया था प्रधान मंत्री का पद

प्रधान मंत्री का पद तीन-तीन बार ज्योति बसु के दरवाजे पर आकर लौट गया था। एक बार तो सी.पी.एम. की केंद्रीय कमेटी ने उन्हें प्रधान मंत्री पद स्वीकारने ही नहीं दिया। यह 1996 की बात है। अन्य दो अवसरों पर खुद ज्योति बसु ने यह पद ठुकरा दिया। 1996 से पहले उन्हंे ऐसा आफर 1989 और 1990 में भी मिला था।

संभवतः ऐसा इस देश में सिर्फ ज्योति बसु के ही साथ हुआ। इस बारे में खुद ज्योति बसु ने कहा था कि ‘भारत का प्रधान मंत्री बनने का प्रस्ताव मेरे सामने पिछले कई वर्षों से विभिन्न स्त्रोतों से आता रहा है। 1996 में जब वी.पी. सिंह ने प्रस्ताव दिया तब मुझे लगा कि इसे स्वीकार करने का समय आ गया है।’ इस बात का पता तो पूरे देश को तभी चल गया था कि किस तरह सी.पी.एम. ने ज्योति बसु को प्रधान मंत्री नहीं बनने दिया था। पर यह बात कम ही लोग जानते हैं कि 1989 में भी प्रधान मंत्री बनने का प्रस्ताव अरुण नेहरू ने ज्योति बसु को दिया था। यह प्रस्ताव राजीव गांधी की ओर से अरुण नेहरू ने ज्योति बाबू तक पहुंचाया था।

ज्योति बसु के जीवन पर लिखित अरुण पांडेय की पुस्तक में इस बात का जिक्र है। पुस्तक 1997 में राज कमल प्रकाशन ने प्रकाशित की थी। ज्योति बसु ने बताया था कि ‘मैंने तब अरुण नेहरू का आॅफर अस्वीकार कर दिया था।’

अरूण पांडेय लिखते हैं कि ‘उनके स्वीकारों व अस्वीकारों का अर्थ समझा जा सकता है। यदि वे 1989 में प्रधान मंत्री पद का ख्वाब देखने लगे होते तो भारतीय मतदाता उन्हें खलनायक मानते। क्योंकि 1989 के नायक तो विश्वनाथ प्रताप सिंह थे। ठीक उसी तरह यदि वे 1990 में राजीव गांधी से हाथ मिला कर प्रधान मंत्री बनते तो उन्हें विश्वासघाती कहा जाता। इससे अलग 1996 का प्रस्ताव उन्हें नायक बनाता लग रहा था। क्योंकि वे समूचे तीसरे मोर्चे की आखिरी पसंद थे। चुनौतियां विकट थीं, पर उनसे टकराने का पर्याप्त अनुभव उनके पास था। इसीलिए ज्योति बसु ने माकपा के इस निर्णय को भयंकर ऐतिहासिक भूल घोषित किया। याद रहे कि उनकी पार्टी ने ही उन्हें 1996 में प्रधान मंत्री नहीं बनने दिया था।’

इस संबंध में ज्योति बसु ने कहा था कि ‘सरकार में शामिल होने के सवाल पर पार्टी ने जैसा अड़ियल और अनम्य रूख अख्तियार किया, उसका कारण था मेरे अपने पाॅलिट ब्यूरो और केंद्रीय कमेटी के साथियों में उपयुक्त राजनीतिक समझ का अभाव। इसीलिए वे स्थिति का सामना सकारात्मक रूप से नहीं कर सके। अधिकतर के विचार युक्तियुक्त नहीं थे। उन्होंने भयंकर भूल की। इस बात का हमें दिली अफसोस है कि सरकार में शामिल न होने का निर्णय करके हमारी पार्टी के साथियों ने मेरे सुझाव को महत्वहीन माना और एक प्रकार से मेरे विवेक को अपमानित किया। लोग हमें इस निर्णय के लिए उसी प्रकार दोषी ठहराएंगे जिस प्रकार उन्होंने तब दोषी ठहराया था जब हमने मोरारजी सरकार को समर्थन नहीं दिया था।’

1979 में चैधरी चरण सिंह मोरारजी की सरकार गिराने पर अमादा थे। ज्योति बसु उसी समय की चर्चा कर रहे थे। तब ज्योति बसु विदेश में थे। बसु ने इस संबंध में कहा था कि ‘तत्कालीन प्रधान मंत्री मोरारजी देसाई ने अपनी सरकार बचाने के लिए समर्थन की मांग मुझसे तब की थी, जब मैं बुखारेस्ट में छुटिटयां मना रहा था। उन्होंने मुझे फौरन भारत लौटने को कहा था। मैंने स्थिति का अध्ययन कर मन ही मन फैसला कर लिया कि मोरारजी देसाई को पद पर बैठाए रखने के लिए हमारी पार्टी को उनका समर्थन करना चाहिए। लेकिन इससे पहले कि मैं भारत पहुंचता, हमारी पार्टी उन्हें समर्थन नहीं देने का फैसला कर चुकी थी। मैं कुछ नहीं कर पाया। क्योंकि मैं पार्टी के भीतर अल्पमत में था। मेरी दृष्टि में यह भी भारी भूल थी। इंदिरा गांधी ने राजनीतिक निर्णय लेते समय राजनीतिक नैतिकता की कतई परवाह नहीं की। हमारी पार्टी पर मोरारजी देसाई सरकार को गिराने का आरेाप लगा। हमारी गलती ही इंदिरा गांधी की सत्ता में वापसी का कारण बनी। याद रहे कि इंदिरा गांधी ने समर्थन देकर चरण सिंह को प्रधान मंत्री बनवा दिया था और लोकसभा का कार्यकाल पूरा होने से पहले समर्थन भी वापस ले लिया था।

माकपा में मौजूद उनके विरोधियों ने इस तरह के मामलों में ज्योति बसु के तर्कों को खारिज कर दिया था। उनके विरोधियों का मानना था कि पार्टी ऐसी किसी सरकार में शामिल नहीं हो सकती, जिसकी नीतियों को प्रभावित करने की स्थिति में वह नहीं हो। दूसरा तर्क यह था कि कांग्रेस के समर्थन से सरकार चलाने का हर अभियान पार्टी के विस्तार में बाधक होगा। तीसरा तर्क यह था कि सरकार से बाहर रहते हुए पार्टी सरकार पर अपना दबाव भी बना सकती हेै। साथ ही पार्टी मोर्चे के विभिन्न धड़ों के बीच सामंजस्य स्थापित करने में अधिक सक्षम हो सकती है। ज्योति बसु को गम इस बात का नहीं था कि वे प्रधान मंत्री नहीं बन सके, बल्कि उन्हें इस बात का गम रहा कि उनकी पार्टी ने राष्ट्रीय राजनीति में सशक्त हस्तक्षेप करने का एक सुनहरा अवसर खो दिया।

सुरभि बनर्जी ज्योति बसु की अधिकृत जीवनीकार रही हैं। उन्होंने लिखा है कि ज्योति बसु किसी भी पद को स्वीकार करने में सदा संकोची रहे। उन्होंने यानी ज्योति बसु ने हंसते हुए जीवनीकार से कहा था कि ‘सरकार में शामिल नहीं होने का निर्णय लेकर केंद्रीय कमेटी के बहुमत ने मुझे बचा लिया। क्योंकि प्रधान मंत्री बनने के बाद मेरे उपर बोझ बढ़ जाता। स्वास्थ्य खराब होने के कारण मुझे तकलीफ होती।’ इस पर सुरभि बनर्जी ने लिखा है कि ‘केंद्रीय कमेटी के फैसले के बाद मैंेने माकपा के ढेर सारे सदस्यों और कई अन्य राजनीतिक विश्लेषकों से बात की। लगभग सभी ने कहा कि यह फैसला देशहित को ध्यान में रख कर किया गया फैसला नहीं था बल्कि पार्टी में मौजूद परंपरागत द्वंद्व का परिणाम था। ज्योति बसु से अपनी व्यक्तिगत दुश्मनी और विचारधारात्मक विरोधों के चलते केंद्रीय कमेटी के अधिकतर सदस्यों ने बैठक में आने से पहले ही यह तय कर लिया था कि किसी भी कीमत पर उन्हें प्रधान मंत्री नहीं बने देना है।’

इस मसले पर बंगाल बनाम केरल वाला पुराना निष्कर्ष निकालने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता है। क्योंकि उनकी व्यक्तिगत दुश्मनी किससे थी और विचारधारात्मक मतभेद किससे था, इस सवाल का किसी महत्वपूर्ण नेता की तरफ से कोई अधिकारिक बयान नहीं आया है।

साभार

बुधवार, 23 दिसंबर 2009

दूरगामी परिणामों वाला एक कदम

गुजरात विधानसभा ने स्थानीय निकायों के चुनाव में मतदान को अनिवार्य बनाने वाला विधेयक पास कर दिया। यह एक ऐसा कदम है जिसे देर सवेर सभी चुनावों में लागू कर दिया जाए तो उसका दूरगामी राजनीतिक परिणाम हो सकता है। जातीय व सांप्रदायिक वोट बैंक की बुराई को कम करने के लिए ऐसी मांग पिछले कई वर्षों से की जाती रही है। पर गुजरात की नरेंद्र मोदी सरकार ने स्थानीय निकायों से इसकी शुरुआत कर दी।

इस विधेयक में यह व्यवस्था जरूर रखी गई है कि यदि कोई मतदाता अपनी अनुपस्थिति का कोई उचित कारण बता देता है तो उसके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं होगी अन्यथा उसे अयोग्य मतदाता घोषित कर दिया जाएगा। संविधान निर्माताओं ने जब आजादी के बाद प्रत्येक बालिग नागरिक को मत देने का अधिकार दिया, तो उनसे यह उम्मीद की गई थी कि वे उस अधिकार समुचित उपयोग करके देश व प्रदशों के लिए जनसेवी सरकार बनवाएंगे। पर कई कारणों से ऐसा नहीं हो सका। उल्टे मतदाताओं की संख्या कम होने के कारण इस देश की राजनीति में कई तरह की बुराइयां पैदा होने लगीं।

कई साल पहले पटना जिले के एक विधानसभा क्षेत्र में एक बाहुबली सिर्फ इसलिए चुनाव जीत गया क्योंकि अधिकतर मतदाता मतदान के दिन अपने घरों में ही रहे। उस बाहुबली ने दो सौ मतदान केदं्रों में सिर्फ 30 मतदान केंद्रों पर कब्जा करवा कर जीत हासिल कर ली। उन दिनों मतदान केंद्रों पर कब्जा आम बात थी। यदि उस क्षेत्र के सारे नहीं तो कम से कम अधिकतर मतदाताओं ने मतदान में भाग लिया होता तो ऐसा रिजल्ट कतई नहीं होता।

पर कम मतदान का लाभ कई राजनीतिक दलों ने उठाकर इस देश की राजनीति का कचड़ा कर रखा है। पिछले दसियों साल का चुनावी अनुभव यह बताता है कि किसी दल या दलीय समूह को केंद्र की सत्ता पर कब्जा कर लेना हो तो उसे सिर्फ तीन या चार समुदाय या जाति समूहों का वोट बैंक बनाना होगा। यदि किसी प्रदेश की सत्ता हासिल करनी हो, तब तो किसी दो मजबूत समूहों से ही काम चल जाएगा।

कई मामलों में होता यह रहा है कि इस रीति से सत्ता में आया दल या नेता सिर्फ अपने समुदाय या जाति की थोड़ा बहुत जरूरतों को पूरी करता है और बाकी जनता को अपने हाल पर छोड़ देता है। इसके बावजूद उसे चुनावी जीत मिलती जाती है। क्योंकि उसके पास एक ठोस वोट बैंक जो है।

इस देश में किसी समुदाय या जाति की आबादी पूरी आबादी के 10 -15 प्रतिशत से अधिक नहीं है। यदि सौ या नब्बे प्रतिशत मतदाता मतदान केंद्रों पर जाने लगें तो फिर इन जातीय वोट बैंकों की करामात लगभग समाप्त हो जाएगी। जब वोट बैंक के कारण किसी दल या नेता के पास चुनावी निश्चिंतता नहीं रहेगी तो उसे आम जनता के लिए ईमानदारी व मेहनत से काम करना पड़ेगा, तभी वह कोई चुनाव जीत पाएगा।

अब तक के अनेक चुनावों में इस देश में जातीय व सांप्रदायिक भावनाएं भड़का कर ऐसे ऐसे नेता, दल और दलीय समूह सत्ता में आते रहे हैं,जिन्हें शाय तब सत्ता नहीं मिलती जब 90 से सौ प्रतिशत लोग मतदान करते।

ऐसा नहीं होना चाहिए कि चूंकि एक विवादास्पद मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने ऐसा विधेयक पास कराया है तो उस विधेयक पर खराब विधेयक करार दे दिया जाए। ऐसे दूरगामी परिणाम वाले कदम पर देश में ंखुले दिलो दिमाग से विचार होना चाहिए और उसे लोकसभा व विधानसभाओं के चुनावों में भी लागू करने का प्रयास होना चाहिए।इससे यह भी होगा कि उन गरीबों को भी मत देने का अवसर मिलेगा जिन लोगों को ऐसा अवसर कम ही मिलता है। चूंकि देश के 84 करोड़ लोगों की रोज की औसत आय मात्र बीस रुपये रोजाना है, इसलिए उनके बीच के मतदाता अपने लिए सही उम्मीदवारों को ही चुनेंगे, ऐसी उम्मीद की जानी चाहिए।

(साभार दैनिक जागरण:पटना संस्करण: 22 दिसंबर 09)

कांग्रेसी राज में ही क्यों बढ़ती है बेतहासा महंगाई ?

सन 1999 में गेहंू साढ़े सात रुपये प्रति किलो ग्राम की दर से बिक रहा था। सन 2004 में उसकी कीमत बढ़कर आठ रुपये प्रति किलो हो गई। आज लोग साढ़े 17 रुपये किलो गेहूं खरीदने को विवश हो रहे हैं।
साधारण चावल का दाम 1999 में साढ़े आठ रुपये किलो था। 2004 में बढ़कर दस रुपये किलो हो गया। अब कम से कम सोलह रुपये किलो चावल बिक रहा है। विभिन्न स्थानों में इनकी कीमतों में थोड़ी कमी -बेशी स्वाभाविक है। जिंसों के प्रकार के अनुसार भी दामों में कमी -बेशी स्वाभाविक है। इस विश्लेषण की मूल बात अभूतपूर्व मूल्य वद्धि की चर्चा है। मूंग दाल की हालत और भी खराब है। इस साल करीब सौ रुपये किलो बिकी। जबकि 1999 से 2004 तक इसकी कीमत 24 रुपये किलो पर स्थिर थी। चीनी और सरसों तेल की कीमतों में तो हाल के वर्षांे में अपेक्षा कत और भी अधिक बढ़ोतरी हुई है।

उपर्युक्त विवरण एनडीए के किसी आरोप पत्र से नहीं लिया गया है बल्कि दैनिक अखबारों के आर्थिक पन्नों से उतारा गया है।

आज जानकार लोग बता रहे हैं कि खाने पीने वाली सामग्री की कीमत मात्र गत एक साल में करीब 20 प्रतिशत बढ़ गई है। चीनी की कीमत तो एक साल पहले 18 रुपये प्रति किलो थी। इस साल क्यों वह 40 रुपये किलो बिकी ? जबकि किसानों को गन्ने के अलाभकर मूल्य निर्धारण के खिलाफ संसद भवन को घेरना पड़ा। क्यों गन्ने का समर्थन मूल्य तो दस साल में मात्र दुगुना किया जाता है, पर चीनी की कीमत मात्र एक साल में दुगुनी हो जाती है ? अन्य उपभोक्ता सामग्री का भी कमोवेश यही हाल है? आखिर इसमें केंद्र व राज्य सरकारों की कोई भूमिका रह भी गई है या नहीं ? या फिर आम निरीह जनता का खून चूसने के लिए विभिन्न सरकारोंने मुनाफाखार भेड़ियों को खुला छोड़ दिया है ? साफ -साफ लग रहा है कि केंद्र सरकार ने इस अभूतपूर्व महंगाई की समस्या के सामने न सिर्फ घुटने टेक दिये हैं, बल्कि संबंधित मंत्री शरद पवार ने यह कह कर मुनाफाखोरों व जमाखोरों का हौसला बढ़ा दिया है कि अगले तीन महीने तक महंगाई पर काबू नहीं पाया जा सकता है। इससे पहले कभी किसी सरकार को इतना निरीह नहीं पाया गया था। यह निरीहता है या मुनाफाखारों से सांठसांठ ?

अब तो केंद्रीय मंत्री महंगाई के लिए राज्यों को दोषी ठहरा कर अपनी राजनीतिक रोटी भी सेंक रहे हैं।

उधर विभिन्न राज्य सरकारों में व्याप्त भीषण भ्रष्टाचार के कारण सार्वजनिक जन वितरण प्रणलियां करीब करीब फेल कर गई हैं। इस विफलता ने मुनाफाखोरों व जमाखोरों की बांछें खिला दी हैं। केंद्र सरकार के अन्न भंडार भरे हुए हैं। पर उन्हें बाजारों में नहीं उतारा जा रहा है। ऐसा मुनाफाखोरों के हित को ध्यान में रख कर किया जा रहा है ? यानी जाहिरा तौर पर महंगाई के लिए केंद्र व राज्य दोनों सरकारें जिम्मेदार हैं। यह बात और है कि केंद्र सरकार अपेक्षाकत काफी अधिक जिम्मेदार है। क्योंकि उसने महंगाई बढ़ाने के लिए कुछ और कुकत्य किए हैं। विभिन्न राजनीतिक दल इसको लेकर एक दूसरे पर आरोप भले लगाएं, पर आम जनता सब कुछ जान रही है। इस पर इस गरीब देश में चर्चाएं जारी हैं। यदि सिर्फ गैर यू।पी.ए. राज्य सरकारें ही जिम्मेदार होतीं तो दिल्ली में महंगाई अन्य राज्यों की अपेक्षा कम होती क्योंकि यहां तो दोनों सरकारें एक ही दल की हैं।

यह भी कहा जा रहा है कि भीषण महंगाई के बावजूद जब कोई सत्ताधारी दल चुनाव जीतता ही चला जाए तो उसे इस पर काबू पाने की भला कौन सी मजबूरी रहेगी ? प्रतिपक्षी पार्टियां भी आधे मन से ही इसके खिलाफ आवाज उठा रही हंै। क्योंकि थोड़े बहुत उसके भी तो निहित स्वार्थ हैं ही। मर तो गरीब रहा है। लगता है कि राजनीतिक दलों का गरीबों से संबंध सिर्फ वोट का रहा गया है, भावना व सेवा गायब है। राजनीति में सांप्रदायिक, पारिवारिक व जातीय भावना जरूर मजबूती से उपस्थित है। अब तो इस देश के परंपरागत कम्युनिस्ट दलों को भी फाइव स्टार होटलों में अपने सम्मेलन करने और फाइव स्टार जीवन जीने में कोई शर्म नहीं आ रही है। कुछ अपवादों की बात और है। नई आर्थिक नीतियां आने के बाद बाजार की ताकतों को अर्थ व्यवस्था की बागडोर थमा दी गई है।

अर्थशास्त्री कमल नयन काबरा ने ठीक ही कहा है कि ‘आयात-निर्यात की मात्रा और कीमतों की अनिश्चितता तथा कीमत नियंत्रण के लिए आयात का जिम्मा मुनाफाखोर तबकों को देना, महंगाई को न्योतना है। सार्वजनिक वितरण प्रणाली की खामियों का कोई इलाज नहीं किया जाता है। नेताओं, पार्टियों और व्यवसायियों के गहराते निजी रिश्ते के परिप्रेक्ष्य में जनपक्षीय मूल्य नीति की उम्मीद करना बेमानी है।’

आज दिल्ली में किसी बहुमंजिली इमारत में तैनात जो गार्ड महीने भर काम करने के बाद मात्र 47 सौ रुपये पाता है, वह खुद क्या खाएगा और क्या गांव में अपने परिवार को भेजेगा ? वैसे भी इस देश के कितने लोगों को इतने पैसे भी हर महीने मिल पाते हैं ? इस देश के गरीबों के बारे में अर्थशास्त्री अर्जुन सेनगुप्त बताते हैं कि ‘84 करोड़ लोगों की रोजाना औसत आय मात्र बीस रुपये है।’ एक अन्य उदाहरण यहां पेश है। पी।एफ. से जुडी पेंशन राशि तो पांच सौ से हजार -डेढ़ हजार रुपये तक ही है। इस पंेशन राशि में भी किसी तरह की सालाना बढ़ोतरी का कानूनी प्रावधान तक नहीं है। ऐसे दरिद्र लोगों के लिए महंगाई का क्या मतलब है, यह बात अतुल्य भारत का सपना दिखाने वाले लोग नहीं समझ पा रहे हैं।

दूसरी ओर सरकार द्वारा इस देश में ऐसी अर्थ व्यवस्था जरूर बना दी गई है ताकि करोड़पतियों व अरबपतियों की संपत्ति सचिन तेंदुलकर की रन संख्या के अनुपात से भी अधिक बढ़ती जाए। ताजा आंकड़ों के अनुसार इस देश के अरबपतियों की संख्या मात्र गत एक साल में 27 से बढ़कर 54 हो गई है। एक सौ अमीरों के पास इस देश की 25 प्रतिशत संपत्ति है। जबकि संविधान के नीति निदेशक तत्व चैप्टर के अनुच्छेद 39/ग/में यह कहा गया है कि ‘राज्य ऐसी व्यवस्था करेगा ताकि उत्पादन के साधनों का अहितकारी संकेंद्रण नहीं हो।’

आर्थिक विशेषज्ञ, अखबारों व टी।वी.के टाॅक शो में यह बताते रहते हैं कि महंगाई बढ़ने के लिए किस तरह केंद्र सरकार अधिक और राज्य सरकारें कम जिम्मेदार रही हैं। उधर लोकसभा में महंगाई पर चर्चा होती है तो उस समय सदन में एक सौ सांसद भी उपस्थित नहीं रहते। आखिर उसकी उन्हें जरूरत ही कहां है ? उन्हें तो महंगाई छू भी नहीं गई है। सदन की बैठक के आखिरी दिन बिना बहस के संसद मत्रियों व सांसदों के वेतन भत्ते आये दिन सर्वसम्मति से बढ़ाती रहती है।ं 543 में से 316 सांसद करोड़पति हैं। उन्हें संसद की कैटीन में देश में सबसे सस्ता व स्तरीय खाना उपलब्ध ही है। वे क्यों महंगाई से तनिक भी दुःखी होंगे ?

ऐसा नहीं है कि इस मामले में गैर कांग्रेसी सरकारें व पार्टियां दूध की धुली हुई हैं। आम भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने के मामले में उनका रिकाॅर्ड भी लगभग कांग्रेस जैसा ही है। अब तो लगता है कि नेताओं के लिए भ्रष्टाचार कोई मुददा रहा ही नहीं। पर मुनाफाखोरों के प्रति कांग्रेस अपेक्षाकत अधिक उदार रही है। सरसों तेल की कीमत 1972 में 3 रुपये 95 पैसे प्रति लीटर थी। सन 1979 में वह घट कर 3 रुपये 50 पैसे हो गई। तब जनता पार्टी की सरकार केंद्र में थी। अन्य सामग्री की कीमतों का भी कमोवेश यही हाल था। पर सन 1980 में जब कांग्रेस सत्ता में वापस आ गई तो सरसों तेल की कीमत 1981 में बढ़कर साढ़े छह रुपये प्रति लीटर हो गई। मूंग दाल की कीमत सन 1972 में ढाई रुपये और 79 में सवा तीन रुपये थी, पर 81 में साढ़े छह रुपये हो गई। याद रहे कि यहां जो कीमतें दी जा रही हैं, उनमें से कई मद थोक कीमतों के हैं तो कुछ खुदरा के।कई साल के अखबारों की फाइलें देखने से यह लगता है कि 1999 से 2004 तक जिस रफतार से कीमतें बढ़ीं, उसकी अपेक्षा काफी अधिक गति से 2004 और 2009 के बीच में बढ़ी। मौजूदा केंद्र सरकार को इसका वाजिब जवाब देना चाहिए। क्या उसके पास जवाब है भी ? यदि नहीं है तो वह यह बात भी अच्छी तरह समझ ले कि इस मूल्य वद्धि की सर्वाधिक मार देश की 84 करोड़ आबादी पर पड़ रही है। माओवादियांे के खिलाफ किसी तरह के आपरेशन का कोई नतीजा सामने नहीं आएगा, यदि मूल्य वद्धि इसी तरह होती रहेगी।

मूल्य वद्धि की रफ्तार
(दर प्रति किलो रुपये में)

1947 --1972---1979 - 1981---1999--2004--2009
------------------------------------
गेहूं - 0.30 --1.25---1.80--- 2.20---7.50--8.00--17.50
मूंग दाल- 0.25 --2.50 --3.25 ---6.50-- 24.00--24.00--95.00
सरसों तेल-1.75--5.50---9.00----16.00- अनुपब्ध-33.00--91.00
चीनी--- 0.72 -3.95--3.50---- 6.50 -- 15.00--16.65--40.00
( इनमें से कुछ जिंसों का भाव थोक का है और कुछ का खुदरा का।)
------------------------------------------
इन आंकड़ों को देखने से यह साफ है कि किसके शासन काल में कीमतों के बढ़ने का अनुपात अधिक था और किसके शासन काल में कम।शरद पवार से पहले शायद ही किसी कषि मंत्री ने यह आधिकारिक घोषणा की थी कि अगले तीन महीने तक कीमतें बढ़ेंगी ही।इससे पहले संबंधित मंत्री यह कहते थे कि सरकार कीमतों पर काबू पाने की कोशिश व उपाय कर रही है।दोनों बयानों के मतलब व संदेश जाहिर है कि मुनाफाखारों के लिए अलग अलग हैं। भला लगातार चुनाव जीतते जाने वाले नेता क्यों इसकी चिता करंेगे कि उनके बयानों का क्या अर्थ लगेगा !

(साभार प्रभात खबर: 22 दिसंबर 2009)

शनिवार, 7 नवंबर 2009

एक ऋषितुल्य संपादक की विदाई

यदि कोई संपादक अपने किसी मामूली संवाददाता के लेखन की स्वतंत्रता की रक्षा के लिए भी अपनी खुद की नौकरी दांव पर लगा दे तो उसे आप क्या कहेंगे ? यदि वही संपादक अपने पुत्र के कैरियर को नुकसान पहुंचा कर भी अपने सहकर्मी पत्रकार की स्वतंत्रता की रक्षा करे तो आप क्या कहेंगे ?

आपको जो कहना है, वह कह लें, पर मैं तो कहूंगा कि वह यशस्वी संपादक प्रभाष जोशी एक पत्रकार और किसी प्राचीनकालीन ऋषि के बीच के प्राणी थे। गत 26 साल के उनसे संपर्क का मेरा तो यही अनुभव है। उपर्युक्त दोनों घटनाओं का मैं खुद पात्र रहा हूं। ऐसा अनुभव संभवतः मेरा अकेला का नहीं रहा होगा। इस देश में अनेक लोग हैं जो प्रभाष जी से खुद को सर्वाधिक करीबी मानते रहे क्योंकि प्रभाष जी ने उन्हें कुछ न कुछ दिया ही है जिस तरह उन्होंने अत्यंत विपरीत परिस्थितियों में भी मुझे लिखने की स्वतंत्रता दी।

मैं सन् 1983 से सन् 2001 तक जनसत्ता का पटना संवाददाता रहा। इन 18 वर्षों में से करीब 12 साल की कालावधि में मुझे प्रभाष जी के संपादकीय व प्रशासनिक नेतृत्व में काम करने का अवसर मिला। बाद के संपादक क्रमशः राहुल देव, अच्युतानंद मिश्र और ओम थानवी का व्यवहार भी मेरे साथ जनसत्ता की परंपरा के अनुकूल ही था जिस परंपरा की नींव प्रभाष जी ने डाली थी। पर प्रभाष जोशी के संपादकत्व का काल भारी राजनीतिक उथल-पुथल का काल था। ऐसा काल जिसमें संपादकों व संवाददाताओं की पहचान हो जाती है। जनसत्ता व उसके यशस्वी संपादक उस झंझावात में खरा उतरे।

मेरा व्यक्तिगत अनुभव यह रहा कि ‘जनसत्ता’ अपने शुरुआती काल से ही न तो किसी राजनीति व प्रशासनिक ताकत के दबाव में आया और न ही सरकारी विज्ञापन के मायामोह में फंसा। एक्सप्रेस समूह के मालिक राम नाथ गोयनका की परंपरा का यह असर था। एक्सप्रेस समूह द्वारा जनसत्ता का जब प्रकाशन शुरू हुआ, उस समय बिहार के मुख्यमंत्री पद पर बैठे थे चंद्र शेखर सिंह। वे खुद तो ठीकठाक व्यक्ति थे। कायदे से काम करने में विश्वास करते थे, पर उनकी सरकार भ्रष्ट थी। जनसत्ता का कर्तव्य था कि उनकी सरकार के बारे में पाठकों तक खबरें पहुंचाई जाएं। चंद्र शेखर सिंह खबरों के प्रति काफी संवेदनशील नेता थे।

चूंकि जनसत्ता दिल्ली से निकलता है और कांग्रेस हाईकमान दिल्ली में बसता है, इसलिए किसी कांग्रेसी मुख्यमंत्री के लिए दिल्ली के अखबार में छपने वाली खबर का काफी महत्व होता है। वैेसे भी चंद्रशेखर सिंह के खिलाफ कांग्रेस का विक्षुब्ध गुट काफी सक्रिय था और वह हाईकमान को उकसाता रहता था।

जनसत्ता में उनके तथा उनकी सरकार के बारे में छप रही खबरों से मुख्यमंत्री परेशान रहा करते थे। स्टेटसमैन के पटना स्थित तत्कालीन संवाददाता और मेरे मित्र मोहन सहाय, चंद्र शेखर सिंह की शालीनता व उनके काम काज के तरीके के प्रशंसक थे। वे मुझसे अक्सर यह कहा करते थे कि ‘आप एक अच्छे मुख्यमंत्री के साथ न्याय नहीं कर रहे हैं। आपकी खबर पढ़कर एक बार चंद्र शेखर सिंह की आंखों में दुःख के आंसू मेैंने देखे थे।’ मेरी गलती कहिए या सही, मैं चंद्रशेखरसिंह से मिलता नहीं था। मुझे डर था कि सत्ताधारी नेताओं से मेलजोल बढ़ाने से कहीं मेरे मन में उनके प्रति मोह पैदा न हो जाए और मैं अपने कर्तव्य से डिग न जाऊं। हार कर मुख्यमंत्री ने जन संपर्क विभाग के एक अफसर को प्रभाष जोशी से मिलने के लिए दिल्ली भेजा। उस अफसर के हाथ में एक पेज का सरकारी विज्ञापन भी था।

उस अफसर की प्रभाष जोशी से क्या बातचीत हुई, उसका विवरण बाद में मेरे एक सहयोगी ने बताया। अफसर ने जोशी जी से कहा कि आपके संवाददाता मुख्यमंत्री से नहीं मिलते और एकतरफा लेखन करते हैं।

जोशी जी ने उनसे कहा कि एकतरफा लेखन करते होंगे, पर क्या वे गलत भी लिखते हैं ? अफसर ने कहा कि गलत तो नहीं लिखते, पर पुरानी -पुरानी बातें लिखते हैं। जोशी जी ने कहा कि जिस पार्टी की प्रधानमंत्री यह कहती हंै कि एनटी रामा राव सरकार की बर्खास्तगी की खबर मैंेने टेलीप्रिंटर पर पढ़ी, उस दल के मुख्यमंत्री का बचाव करने आप आए हैं ? यह सुन कर बेचारे अफसर अपने एक पेजी विज्ञापन को समेटते हुए जोशी जी के कमरे से निकल गये।

चंद्र शेखर सिंह के कार्यकाल के बाद बिंदेश्वरी दुबे मुख्य मंत्री बने। वे स्थितप्रज्ञ व्यक्ति थे और अखबारों को अधिक महत्व नहीं देते थे। उन्हें जनसत्ता की परवाह करने की जरूरत भी नहीं थी क्योंकि कांग्रेस हाईकमान पर उनका असर अधिक था। पर भागवत झा आजाद का मुख्य मंत्रित्वकाल कई मामलों में तूफानी काल रहा। जनसत्ता ने भागवत झा आजाद के समय में एक सर्वेक्षण आयोजित किया था। कुछ चुनाव क्षेत्रों को नमूना बना कर हजारों लोगों से यह पूछा गया था कि आप किस नेता को मुख्यमंत्री के रूप में देखना चाहते हैं। बिहार के सर्वेक्षण का भार जाहिर है कि मुझ पर था। उस सर्वेक्षण में बिहार के करीब 75 प्रतिशत लोगों ने यह कहा था कि वे अगले चुनाव के बाद भी भागवत झा आजाद को ही मुख्यमंत्री के रूप में देखना चाहेंगे। जनसत्ता ने इस विवरण को भी छापा था।

कहा गया कि कांग्रेस चूंकि किसी मुख्यमंत्री को किसी राज्य में लोकप्रिय होना देखना नहीं चाहती, इसलिए आजाद जी को हटा दिया गया। आजाद ने कई चैंकाने वाले काम करके बिहार के निहितस्वार्थियों के हितों पर चोट पहुंचाई थी। इससे आम जनता आजाद से खुश थी, पर कांग्रेस के अनेक नेता उनसे नाराज थे। भागवत झा आजाद के खिलाफ नाराजगी को बल इसलिए भी मिलता था क्योंकि मुख्यमंत्री बनने के बाद वे अपने वैसे कुछ खास समर्थकों के प्रति भी नरम थे जो गलत कामों मंें संलग्न थे। भागलपुर के पापड़ी बोस अपहरण कांड के अभियुक्त के प्रति नरमी दिखाने का आजाद जी पर आरोप था। ऐसे में जनसत्ता जैसे अखबार से वे कैसे बच सकते थे! क्योंकि यह आजाद साहब को दोहरा मापदंड था। ऐसा नहीं था कि आजाद साहब के कुछ अच्छे कामों की तारीफ में जनसत्ता के पटना संवाददाता ने नहीं लिखा था।

पर अधिकतर सत्ताधारी नेता तो यही चाहते हंै कि अखबार उनके अच्छे कामों की तारीफ में तो लिखे ही, पर साथ ही उनके गलत कामों को नजरअंदाज भी करता जाए। नेता जब सत्ता में होता है तो वह जनसंपर्क विभाग के प्रकाशन और किसी पेशेवर अखबार के बीच फर्क नहीं कर पाता। वह यह भी समझने लगता है कि पत्रकार या तो मेरा दोस्त हो सकता है या फिर दुश्मन। बीच की कोई स्थिति वह स्वीकार ही नहीं कर पाता। यही हुआ और भागवत झा आजाद जनसत्ता पर नाराज हो गये। दिल्ली के एक चर्चित पत्रकार के घर पर प्रभाष जोशी से आजाद साहब की भेंट हुई। उन्होंने जोशी जी से मेरी शिकायत की। आजाद साहब को उम्मीद थी कि जोशी जी वहीं से फोन उठाएंगे और सुरेंद्र किशोर को कहेंगे कि तुम क्यों आजाद साहब के खिलाफ लिख रहे हो ? पर जोशी जी ने ऐसा कुछ नहीं किया। उन्होंने आजाद साहब से कह दिया कि ‘यह बात तो वहीं हो सकती है जहां सुरेंद्र किशोर भी रहें।’

जोशी जी ने यह बात इस बात के बावजूद कही कि कीर्ति आजाद दिल्ली क्रिकेट क्लब के अध्यक्ष थे और जोशी जी के पुत्र वहां खेलने जाते थे। यानी उनके पुत्र का कैरियर कीर्ति आजाद के रुख पर निर्भर करता था।

कई महीने बाद जब हमारे सहकर्मी कुमार आनंद पटना आए तो उन्होंने आजाद जी से जोशी की मुलाकात का यह प्रकरण मुझे सुनाया। मैंने समझा कि शायद संकोचवश जोशी जी मुझे कोई निदेश नहीं दे रहे हैं। इसलिए मुझे ही पहल करके उनसे पूछना चाहिए कि अपने लेखन में भागवत झा आजाद के प्रति कैसा रुख अपनाऊं। मैंने जोशी जी को फोन किया और पूछा कि मुझे क्या करना चाहिए। प्रभाष जी ने छूटते ही कहा कि ‘यह तो आपको खुद तय करना है। आप स्थल पर हैं। आपको तय करना है कि क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए। आई कान्ट लेट डाउन माइ्र्र रिपोर्टर फाॅर माई फ्रंेड।’

उन्होंने बड़ी आसानी से यह बात कह दी, पर इसका कुपरिणाम हुआ उनके पुत्र के क्रिकेट कैरियर पर जिसे कीर्ति आजाद ने आगे नहीं बढ़ाया। कीर्ति आजाद ने राजनीति के लिए पिता धर्म निभाया। पर प्रभाष जोशी ने पत्रकारिता की खातिर पुत्र धर्म नहीं निभाया। क्या किसी अन्य संपादक पिता ने अपने पुत्र के कैरियर को अपने ही हाथों अपने पत्रकारिता धर्म के पालन के लिए नुकसान पहुंचाया होगा ? मुझे तो कोई दूसरा उदाहरण नहीं मालूम।

शायद आम लोग नहीं जानते कि एक संपादक के लिए अपने अच्छे बुरे कामों के लिए अपने किसी संवाददाता को अनुशासित कर लेना कितना आसान है ? कोई संवाददाता, अपने संपादक की इच्छा के विपरीत एक रपट भी नहीं लिख सकता है। पर जोशी जी ने मुझे हर कदम पर लेखन की मेरी स्वतंत्रता की रक्षा की। क्योंकि वे जानते थे कि मेरा सुरंेद्र किशोर गलती कर सकता है, पर बेईमानी नहीं कर सकता।

यही बात जोशी जी ने देवीलाल से हरियाणा भवन में अस्सी के दशक में कही थी जब लालू प्रसाद मेरे खिलाफ देवीलाल को उकसा रहे थे। प्रभाष जोशी ने देवीलाल जी से कहा था कि ‘आपका लालू यादव गलत हो सकता है, पर मेरा सुरेंद्र किशोर गलत नहीं हो सकता है।’ यह तब की बात है जब एक्सप्रेस अखबार समूह राजीव गांधी की सरकार से कठिन संघर्ष कर रहा था। राजीव सरकार पत्रकारिता की स्वतंत्रता के प्रतीक एक्सप्रेस समूह को ही बर्बाद कर देने पर तुली हुई थी। उस कठिन लड़ाई में देवीलाल और आर।के हेडगे जैसे मुख्यमंत्री एक्सप्रेस समूह के बचाव में थे।

इसी पष्ठभूमि में एक दिन प्रभाष जोशी हरियाणा भवन देवीलाल से मिलने गये थे। तभी बिहार विधान सभा में प्रतिपक्ष के नेता लालू प्रसाद भी वहां पहुंच गये। उसी दिन लालू प्रसाद के बारे में जनसत्ता में मेरी एक खबर छपी थी। उस खबर से लालू प्रसाद मुझ पर सख्त नाराज थे। खबर यह थी कि लोकदल विधायक दल के नेता पद से लालू प्रसाद को हटाने के लिए अधिकतर विधायकों ने एक स्मारपत्र पर दस्तखत कर दिया है जिसे लोकदल हाईकमान को सौंपा जाना है। ऐसी खबरंे नेताओं के बारे में छपती रहती हंै। कई मामलों में ऐसी खबर अपुष्ट तथ्यों के आधार पर भी होती है और बाद में गलत साबित होती है। पर कई बार सही भी रहती है। ऐसी किसी खबर को लेकर आम तौर पर कोई नेता किसी अखबार या फिर संवाददाता पर उतना नाराज नहीं होता जितना लालू प्रसाद नाराज थे।

उन्होंने देवीलाल से कहा कि ‘बाबू जी, जोशी जी आपके पास यहां आकर तो बात करते रहते हैं, पर उनके अखबार में मेरे बारे में गलत -सलत खबर छपती रहती हैं। इन्हें रोकिए। अपने खास समर्थक को गुस्से में देखकर देवीलाल भी आपे से बाहर हो गये। उन्होंने भी नहले से दहला मारते हुए कहा कि हां, भाई यह तो हमारे खिलाफ भी लिखता रहता है। जरा मंगाओ इसकी फाइल। एक व्यक्ति ने जनसत्ता की कटिंगें लाकर रख दी। देवीलाल जनसत्ता के गपशप कालम की खबरों से खास तौर से नाराज थे।

उन्होंने अपनी नाराजगी अपने खास हरियाणवी लहजे में जाहिर की। सब जानते हैं कि उनका लहजा कैसा होता था। जोशी जी एक्सप्रेस ग्रूप से देवीलाल की करीबी भी जानते थे। फिर भी उन्होंने जनसत्ता का बचाव करते हुए कहा कि मेरा संबंध आपसे अलग है और जनसत्ता में जो कुछ आपलोगों के बारे में छपता है, उसका इस संबंध से कोई मतलब नहीं है। वह सब गुणदोष के आधार पर छपता है और छपेगा। उसे मैं नहीं रोक सकता। यह सब कह कर जोशी जी हरियाणा भवन से निकल गये।

इस तरह जोशी जी ने अखबार की स्वतंत्रता की रक्षा की। इस बात के बावजूद जोशी जी ने देवीलाल को खुश नहीं किया कि उस समय देवीलाल एक्सप्रेस ग्रूप के बचाव में चट्टान की तरह खड़े थे। इस प्रकरण में एक और आशंका थी। देवीलाल-प्रभाष जोशी संवाद की सूचना मिलने पर रामनाथ गोयनका नाराज भी हो सकते थे। पर उसकी भी परवाह जोशी जी ने नहीं की। हरियाणा भवन के इस संवाद का विवरण बाद में सुनने के बाद जनसत्ता में काम करने का एक बार फिर मुझे गर्व हुआ।

आज मैं पत्रकारिता में जो कुछ भी हूं, उसमें जनसत्ता, एक्सप्रेस समूह और प्रभाष जोशी का सबसे बड़ा योगदान है। ऐसा महसूस करने वाले जनसत्ता के अनेक अन्य स्टाफ भी हैं।

बिहार में लालू प्रसाद और राबड़ी देवी के मुख्यमंत्रित्व काल के दौरान जनसत्ता और उसके संपादक प्रभाष जोशी की एक अन्य तरह की उदारता भी देखने को मिली। ऐसा नहीं कि मैंने लालू प्रसाद के पक्ष में कभी नहीं लिखा। जब तक लालू प्रसाद बिहार के आरक्षणविरोधियों से लड़ते रहे, मैं लगातार उनके पक्ष को पाठकों तक पहुंचाता रहा। मैं आरक्षण समर्थक रहा हूं। पर मुझे लालू समर्थक मान लिया गया। पर जब लालू -राबड़ी सरकार के घोटाले एक-एक करके बाहर आने लगे तो मैंने जनसत्ता में अपनी पुरानी भूमिका निभाई।

दूसरी ओर लालू प्रसाद धर्मनिरपेक्षता के नाम पर भाजपा और संघ परिवार के खिलाफ कुछ अधिक ही अभियान चलाते रहे हैं। प्रभाष जोशी उनके इस पक्ष के समर्थक रहे हैं। जोशी जी को लगता था कि देश की एकता-अखंडता के लिए भाजपा के खिलाफ देश भर में सक्रिय शक्तियों को उनका समर्थन मिलना चाहिए। पर जनसत्ता का संपादक रहते हुए जोशी जी ने मुझसे कभी नहीं कहा कि तुम लालू प्रसाद के खिलाफ इतना क्यों लिखते हो। कोई संपादक अपने संवाददाता को इतनी स्वतंत्रता देता हो, यह संभवतः जनसत्ता में ही संभव रहा है।

ऐसे अखबार से इस्तीफा देने का निर्णय मेरे लिए दुःखद निर्णय था। दरअसल मैं जनसत्ता में रहता तो 2005 में ही रिटायर हो जाता। तब तक मेरी एक भी पारिवारिक जिम्मेदारी पूरी नहीं हो पाई थी। मैंने मनमसोस कर अजय उपाध्याय का दैनिक हिंदुस्तान ज्वाइन करने का आॅफर स्वीकार कर लिया। यह 2001 की बात है। अजय उपाध्याय तब हिंदुस्तान के प्रधान संपादक थे। मैंने जब हिंदुस्तान ज्वाइन किया तो प्रमोद जोशी ने एक बात कही। उन्होंने कहा कि अरे सुरेंद्र जी, अजय जी ने आप पर कौन सा जादू कर दिया कि जनसत्ता छुड़वाने का जो काम राजेंद्र माथुर आपसे नहीं करा सके, वह काम हमारे संपादक ने कर दिया। उनसे मैं क्या कहता कि मेरी पारिवारिक जिम्मेदारियों ने ही मुझे यहां खींच लाया है। मेरा दिल अब भी जनसत्ता में ही बसता है। राजेंद्र माथुर ने कई बार कोशिश की थी कि मैं नभाटा ज्वाइन करूं। तब प्रमोद जी नभाटा में ही थे। वे इस बात को जानते थे।

आखिर जनसत्ता में ऐसा क्या रहा है कि कोई व्यक्ति कम पैसे में भी उसकी नौकरी स्वीकार करे ? इसका जवाब जनसत्ता व प्रभाष जोशी तथा उसके परिवर्ती संपादकों के व्यक्तित्व में खोजना होगा। हालांकि जनसत्ता और उसके पूरे परिवार का व्यक्तित्व गढ़ने में प्रभाष जोशी का ही तो हाथ रहा है।

(प्रभात खबर: 7 नवंबर 2009: से साभार)