बुधवार, 10 सितंबर 2014

जल्दबाजी होगी कांगेेस के विलुप्त होने की भविष्यवाणी


 इस देश के कुछ भाजपाई चिंतक इन दिनों उत्सहित हैं। वे कांग्रेस की दुर्दशा देखकर खुश हैं। वे उसके विलुप्त होने की भी भविष्यवाणी करने लगे हैं। कांग्रेस के लोकसभा में मात्र 44 सीटों पर सिमट जाने के बाद उनकी ऐसी भविष्यवाणी स्वाभाविक ही है।

  पर समकालीन इतिहास बताता है कि वे खुशफहमी में लगते हैं। अब तक कांग्रेस की विफलताओं का लाभ प्रतिपक्ष और प्रतिपक्ष की विफलताओं का चुनावी लाभ कांग्रेस उठाती रही है। अगली बार भी ऐसा नहीं होगा, यह नहीं कहा जा सकता।

   निष्पक्ष राजनीतिक प्रेक्षकों के अनुसार कांग्रेस का विलुप्त होना इस बात पर निर्भर करेगा कि नरेंद्र मोदी सरकार अगले छह महीने में कुल मिलाकर कैसा काम करती है। सिर्फ सौ दिनों में किसी सरकार के बारे में किसी नतीजे पर नहीं पहुंचा जा सकता है।

  छह महीने में मोदी की विफलता कांग्रेस की सफलता की राह तैयार करेगी। पर मोदी की सफलता कांग्रेस के लिए घातक साबित हो सकती है।

  1967 में देश के नौ राज्यों में गैर कांग्रेसी दलों की सरकारें बन गई थीं। सात राज्यों में चुनाव के जरिए और अन्य दो राज्यों में दल-बदल के जरिए। तब की गैर कांग्रेसी सरकारों के शिल्पी थे समाजवादी नेता व चिंतक डाॅ. राम मनोहर लोहिया। उन्होंने कम्युनिस्ट और जनसंघ को न्यूनत्तम कार्यक्रम के आधार पर  एक साथ ला दिया था। यदि तब प्रतिपक्षी दलों में पूर्ण चुनावी एकता हो गई होती तो उसी समय केंद्र की सत्ता से कांग्रेस का एकाधिकार खत्म हो चुका होता।

  चुनाव के तत्काल बाद अपनी राज्य सरकारों से डाॅ. लोहिया ने कहा था कि छह महीने के भीतर जनहित में कुछ ऐसे चैंकाने वाले काम करो जिनसे जनता को तुम लोगों और कांग्रेस के बीच साफ -साफ अंतर दिख जाए। और वह कांग्रेेस को भूल जाए। यदि तुम ऐसा नहीं कर पाओगे तो कांग्रेस दुबारा सत्ता में आ जाएगी क्योंकि वह एक माहिर पार्टी है।

   डाॅ. लोहिया की भविष्यवाणी सही साबित हुई। कांग्रेस वापस आ गई। क्योंकि मिलीजुली सरकारें अपेक्षाकृत ईमानदार होते हुए भी बेमतलब आपसी कलह में उलझकर बारी- बारी से जल्दी ही समाप्त हो गई।क्यों कि उनमें से अनेक  गैर कांग्रेसी नेताओं में  आलस्य,व्यक्तिगत कुंठा और सत्तालोलुपता  हावी हो गई थी।

    कांग्रेस को विलुप्त करना है तो नरेंद्र मोदी सरकार और भाजपा को डाॅ. लोहिया की वह भविष्यवाणी याद रखनी पड़ेगी। मोदी सरकार को छह महीने के भीतर ठोस नतीजे देने होंगे। लोगबाग कांग्रेस को तभी भूलेंगे जब मोदी सरकार जनहित के चैंकाने वाले कामों से लोगों को प्रभावित कर दे।

 मोदी सरकार के प्रारंभिक काम तो अधिकतर लोगों को अभी अच्छे लग रहे हैं। अच्छे कामों से अधिक उसकी अच्छी मंशा की सराहना हो रही है। खास कर भ्रष्टाचार व राजनीति के अपराधीकरण के मामले में मोदी सरकार के फैसले व घोषणाएं ठीक मानी जा रही हैं। सांप्रदायिक मामलों में अभी मोदी सरकार की निर्णायक परीक्षा होनी बाकी है।

 पर इसके अलावा भाजपा व सहयोगी दलों का जिस तरह का तानाबाना, कार्यशैली, जीवन शैली तथा राजनीतिक शैली रही है, उनसे कई तरह के अपशकुन भी हो रहे हैं।

 सवाल यह उठ रहा है कि क्या मोदी सरकार का यह प्रारंभिक टेम्पो बना रह सकेगा ?

 अगले छह महीने में कुछ अन्य बातें देखी जाएंगी। उस आधार पर मोदी सरकार को कसौटी पर कसा जाएगा। उसके बाद ही यह कहा जा सकेगा कि कांग्रेस विलुप्त होने की दिशा में आगे बढ़ेगी या दुबारा कमबैक करेगी।

    आपातकाल की पृष्ठभूमि में हुए 1977 के चुनाव में जब कांग्रेस उत्तर भारत से लगभग साफ हो गई थी तब भी कुछ लोग कांग्रेस के बारे में ऐसी ही भविष्यवाणी करने लगे थे। पर वह गलत साबित हुई। क्योंकि कांग्रेस विरोधी दलों की विफलता ने कांग्रेस को अगले चुनाव में चुनावी सफलता दिला दी।

   1977 के चुनाव के बाद बनी मोरारजी देसाई सरकार अच्छा काम कर रही थी। महंगाई और भ्रष्टाचार पर बहुत हद तक काबू था। अधिकतर जनता भी सरकार से खुश थी। पर जनता पार्टी के आंतरिक झगड़े और कुछ बड़े जनता नेताओं की पदाकांक्षा ने कांग्रेस की सत्ता में वापसी का रास्ता बना दिया।

 इसके लिए कांग्रेस की अच्छाई नहीं बल्कि जनता पार्टी सरकार की बुराई जिम्मेदार रही। तीन ही साल में इंदिरा गांधी फिर प्रधानमंत्री बन गई। ऐसा नहीं था कि सत्ता में आने से पहले इंदिरा गांधी ने अपनी कार्यशैली बदल ली थी।

  यदि मोदी सरकार ने मोरारजी सरकार वाली गलती की तो इस बार भी  कांग्रेस ‘विलुप्त’ होने से साफ बच जाएगी! इसके लिए सोनिया गांधी और राहुल गांधी को अपनी कार्यशैली भी बदलने की जरूरत नहीं पड़ेगी। वे बदल भी नहीं सकते। बदलने की उनकी क्षमता सीमित है।

     देश का लोकतांत्रिक इतिहास बताता है कि केंद्र और राज्य स्तर पर  कांग्रेस में घट -घटकर बढ़ जाने की अजीब सी ताकत मौजूद है। यह ताकत वह आम तौर कांग्रेसविरोधी दलों से ही हासिल करती रही है।

     वैसे भी कांग्रेस एक अखिल भारतीय पार्टी है। अखिल भारतीय होने से उसे विशेष ताकत मिलती है। भाजपा अभी उस प्रक्रिया में है। उसके पास नेहरु-इंदिरा परिवार के रूप में अवलंब लेने के लिए एक खंभा उपलब्ध है। वह खम्भा अपने केंद्र की ओर कांग्रेसी नेताओं व कार्यकर्ताओं को खींचता है।

     वैसे भाजपा के पास भी ऐसा खम्भा नागपुर में है। अन्य अधिकतर मध्यमार्गी दल तो परिवारवादी हैं। विचारधारा के आधार पर इस देश में जब राजनीति होती थी उस समय डाॅ. राम मनोहर लोहिया कभी समाजवादियों के लिए ऐसे ही खम्भा थे। अब तो समाजवादियोंे को पहचानना भी मुश्किल है।

     कुल मिलाकर आज स्थिति यह है कि भाजपा व मोदी सरकार कांग्रेस की चिंता करने के बदले अपने खुद के कामों की चिंता करें। यह भाजपा सरकारों पर निर्भर है कि वह एक पर एक जनहित में अपने चैंकाने वाले  कामों से लोगों को मजबूर करती है कि वे कांग्रेस को भूल जाएं या फिर अपने गलत कदमों के जरिए लोगों को बाध्य कर देती है कि वे कांग्रेस को वापस सत्ता में बुला लें।

      इस देश में अब तक तो यही हुआ कि अधिकतर लोगों ने कांग्रेस की गलतियों को नजरअंदाज भी किया है, पर गैर कांग्रेसी सरकारों के छोटे भटकावों को भी माफ नहीं किया है। क्योंकि लोग गैर कांग्रेसी दलों से कुछ अधिक ही उम्मीद रखते हैं।

(8 सितंबर 2014 के दैनिक जनसत्ता,नई दिल्ली में प्रकाशित)

बुधवार, 6 अगस्त 2014

अपने ‘शहजादे’ हों तो दूसरों पर अंगुली कैसे उठाएंगे मोदी

 (30 जुलाई 2014 के जनसत्ता में प्रकाशित)  

गत लोकसभा चुनाव के प्रचार के दौरान नरेंद्र मोदी ने राहुल गांधी को लगातार ‘शहजादा’ कहा था। उसका भी मतदाताओं पर असर पड़ा था।

क्योंकि राहुल गांधी के कामकाज से अनेक लोग नाराज थे। वे मानते थे कि सिर्फ किसी परिवार में जन्म ले लेने के कारण ही किसी व्यक्ति को कोई महत्वपूर्ण जिम्मेदारी नहीं दी जानी चाहिए। बल्कि योग्यता हो तभी वैसी जिम्मेदारी मिलनी चाहिए जैसी राहुल गांधी को मिली थी।  

   पर, खबर है कि अगले माह होने वाले बिहार विधानसभा के उपचुनाव में कुछ भाजपा सांसदों ने अपनी छोड़ी हुई सीटों पर अपने परिजनों को खड़ा करने की जिद कर दी है। यदि भाजपा नेतृत्व ने उनकी जिद पूरी कर दी तो क्या अगले किसी चुनाव में नरेंद्र मोदी राहुल गांधी को ‘शहजादा’ कह पाएंगे ?

    जब अपनी ही पार्टी मेंे ढेर सारे शहजादे हों तो कोई नेता किसी दूसरे दल पर इस आधार अंगुली कैसे उठा पाएगा ? वैसे भी आखिर अब और कितने अधिक ‘शहजादे’ खुद भाजपा की शोभा बढ़ाएंगे ? पहले से ही अनेक हैं।

  गत लोकसभा चुनाव में भाजपा ने अनेक बड़े नेताओं के रिश्तेदारों को पहली बार या दूसरी बार टिकट देकर उन्हें लोकसभा में पहुंचाया।

  जब उन्हें टिकट मिल सकता था तो बिहार के ही सांसदों के साथ भेदभाव क्यों होना चाहिए? यह सवाल स्वाभाविक है।

  परिवारवादी नेताओं के इस तर्क का भाजपा नेतृत्व के पास आखिर क्या जवाब होगा? पर इस बीच नरेंद्र मोदी ने परिवारवाद पर चोट की है।

   प्रधानमंत्री मोदी ने अपने मंत्रियों के साथ पहली ही मुलाकात में उन्हें कड़ाई से यह कह दिया कि वे अपने स्टाफ में अपने रिश्तेदारों को नहीं रखें। मोदी की इस कड़ाई का अच्छा संदेश गया।

   पर क्या यही मापदंड वे बिहार में विधानसभा के टिकट देने में भी लागू करेंगे? यह सवाल उनसे ही है क्योंकि आज मोदी जी की सरकार के साथ- साथ पार्टी में भी तूती बोल रही है। उनके कुछ प्रारंभिक अच्छे कामों की सराहना भी है। इसलिए भी परिवारवाद की बुराई को अब और आगे नहीं बढ़ने देने की उनसे लोगबाग उम्मीद भी कर सकते हैं। 

  बिहार विधानसभा के जिन दस क्षेत्रों में उपचुनाव होने वाले हैं, उनमंे से चार सीटें भाजपा विधायकों के इस्तीफे से खाली हुई हैं।

  इस देश में इन दिनों चुनाव क्षेत्रों को निजी जागीर समझने वाले नेताओं की भरमार हो गई है। खुद भाजपा ने गत लोकसभा चुनाव में कई बड़े नेताओं के लोकसभा क्षेत्रों को उनकी जागीर मानकर उनके परिवार के सदस्यों को टिकट देकर उन्हें लोकसभा में पहुंचाया है।

  पर, तब यह माना जा रहा था कि नरेंद्र मोदी अपनी पार्टी की इतनी बड़ी जीत के प्रति आश्वस्त नहीं थे। वैसे में वे तब अपने दल के किसी बड़े नेता के परिजन को टिकट देने से इनकार करके भीतरघात का खतरा मोल लेने को तैयार नहीं थे।

  पर लोकसभा चुनाव नतीजों से यह साफ लगा कि आम लोग नरेंद्र मोदी से कुछ बेहतर की उम्मीद कर रहे हैं। क्योंकि उन्होंने बेहतरी का वादा भी किया है। उनकी जीत में भाजपा कार्यकर्ताओं का बड़ा योगदान रहा है। क्या उन कार्यकर्ताओं के टिकट काटकर अब भी नेता पुत्रों को टिकट दिया जाएगा ? भाजपा कार्यकर्ता दबे स्वर में यह पूछ रहे हैं। फिर इस मामले में कांग्र्रेस और भाजपा के बीच कितना फर्क बचेगा ?

  वैसे भी मौजूदा लोकसभा में 135 ऐसे सदस्य हैं जो किसी न किसी प्रधानमंत्री, केंद्रीय मंत्री, मुख्यमंत्री, सांसद या फिर विधायक के परिवार से आते हैं।

यदि विभिन्न दलों द्वारा जन प्रतिनिधियों के रिश्तेदारों को टिकट देने का सिलसिला इसी तरह बढ़ता रहा तो वह दिन दूर नहीं जब लोकसभा की आधी से अधिक सीटें उन्हीं परिवारवादियों से भर जाएगी। विधानसभाओं का भी यही हाल होगा। फिर किसी आलोचक को समाजवादी पार्टी को  ‘समस्त परिवार’ पार्टी’ कहने का हक कैसे रहेगा ? राहुल गांधी को शाहजादा कैसे कहा जा सकेगा ?

    वैसे भी जातीय वोट बैंक वाले क्षेत्रीय दलों की बात कुछ और है। इनमें से कुछ दलों के तो गांव के गांव कार्यकर्ता हैं। बाकी कार्यकर्ताओं की कमी सांसद व विधायक फंड के ठेकेदार पूरी कर देते हैं। वैसे भी जब अधिकतर सीटों को जब देर-सवेर परिवारवाद के आधार पर ही भरना है तो वास्तविक राजनीतिक कार्यकर्ताओं के लिए जगह कहां बच जाएगी ?

पर यह सब जब काॅडर आधारित दल भाजपा में भी होने लगे तो लोकतंत्रवादी मिजाज वाले उन लोगों के लिए चिंतित व उदास होना स्वाभाविक है जिन लोगों ने बड़ी उम्मीद से भाजपा व नरेंद्र मोदी को वोट दिए हैं।

   बिहार के उन टिकटार्थी नेता पुत्रों का तर्क है कि वे काफी समय से राजनीति में सक्रिय हैं। इसलिए उनका दावा बनता है। पर उनसे सवाल पूछा जा रहा है कि यदि सक्रियता ही मापदंड है तो बिहार भाजपा में ऐसे लोगांे की कोई कमी नहीं है जो उन नवनिर्वाचित सांसदों से भी अधिक वरिष्ठ हैं जो अपने परिजनों के लिए टिकट की जिद कर रहे हैं।


 (30 जुलाई 2014 के जनसत्ता में प्रकाशित)  

अच्छे नेताओं को भले लोगों के समर्थन की जरूरत


राजनीति में नैतिकता के पतन की इससे बड़ी कहानी और भला क्या हो सकती है? तमिलनाडु के एक पूर्व मुख्यमंत्री को 2001 में भ्रष्टाचार के आरोप में पुलिस ने गिरफ्तार किया था। लोअर कोर्ट के जज एस. अशोक कुमार ने उन्हें जमानत दे दी थी।

  उस जज पर भ्रष्टाचार के अनेक गंभीर आरोप थे। इसके बावजूद उस पूर्व मुख्यमंत्री के दल ने 2007 मेें केंद्र सरकार पर दबाव डालकर एस.अशोक कुमार को मद्रास हाईकोर्ट का स्थायी जज बनवा दिया।

  इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट के रिटायर जज मार्कंडेय काटजू ने हाल में रहस्योद्घाटन किया। तत्कालीन केंद्रीय कानून मंत्री हंसराज भारद्वाज ने काटजू के रहस्योद्घाटन की एक हद तक पुष्टि की।

  यानी राजनीतिक प्रदूषण ने एक हद तक न्यायपालिका को भी प्रदूषित कर दिया। याद रहे कि सुप्रीम कोर्ट के कई मुख्य न्यायाधीशों ने समय -समय पर न्यायपालिका में बढ़ते भ्रष्टाचार पर चिंता जाहिर की है।

एक मुख्य न्यायाधीश ने तो यह भी कहा था कि न्यापालिका में व्याप्त भ्रष्टाचार पर सख्ती से काबू पाने के लिए हम सरकार व संसद से कानूनी अधिकार मांग रहे हैं, पर वह अधिकार हमें मिल ही नहीं रहे हैं।

  इस प्रकरण से यह साबित होता है कि राजनीति के बीच के भ्रष्ट तत्व समाज के अन्य हिस्सों के साथ -साथ न्यायपालिका को भी प्रदूषित करने का काम करते रहते हैं।

यहां यह कह देना जरूरी है कि न तो राजनीति में सारे लोग भ्रष्ट हैं और न ही न्यायपालिका में।

  पर जब राजनीति के बीच के अनेक ईमानदार लोग भी सत्तालोलुपता में आकर भ्रष्ट नेताओं के दबाव में आ जाएं तब भ्रष्ट लोग हावी नजर आते हैं।
अब भला बताइए कि एक दिन जब न्यायपालिका मेंे भी बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार को बढ़ावा दिया जाने लगेगा तो आम लोगों को न्याय कौन देगा?
दरअसल हर क्षेत्र के भ्रष्ट तत्वों को पकड़कर अदालत के सामने खड़ा कर देने की जिम्मेदारी शासन की होती है। पर यदि अदालत ईमानदार नहीं होगी तो किसी भी क्षेत्र के भ्रष्टों को सजा कैसे हो पाएगी ?

   शुक्र है कि अभी अदालतों की हालत अधिक नहीं बिगड़ी है। बल्कि भ्रष्टाचार के समुद्र में अपवादों को छोड़कर अदालत ही अब भी ईमानदारी का टापू नजर आती है। हाल के वर्षों में यदि विभिन्न मामलों में अदालतों ने कड़ा रुख नहीं अपनाया होता तो अनेक बड़े -बड़े घोटालेबाज भी जेल जाने से बच जाते।

 पर यदि न्यायपालिका की साख को कहीं से सर्वाधिक खतरा है तो वह राजनीतिक कार्यपालिका से ही। इससे पहले 1993 में भी तत्कालीन केंद्र सरकार ने सुप्रीम के जज वी. रामास्वामी को महाभियोग से बचा लिया था। जबकि सुप्रीम कोर्ट की जांच कमेटी ने रामास्वामी के खिलाफ भ्रष्टाचार के कई सबूत संसद के कटघरे में पेश कर दिए थे।

   राजनीति में गिरावट इस देश में कोई नई बात नहीं है। आजादी के तत्काल बाद से ही उसके लक्षण प्रकट होने लगे थे। तब के कई सत्ताधारी नेताओं ने खुद ईमानदार होने के बावजूद भ्रष्टाचार को नजरअंदाज किया। इस कारण समय के साथ भ्रष्ट नेताओं का मनोबल बढ़ता चला गया।
विचारधारा का महत्व धीरे-धीरे घटने लगा। त्याग, तपस्या और ईमानदारी शब्द मुख्यधारा की राजनीति से गायब होने लगे।

  अब तो गिरावट इस कदर व्याप्त हो चुकी है कि अपवादांे को छोड़कर राजनीति का एक ही मंत्र रह गया है --किसी तरह सत्ता व पद प्राप्त कर लो चाहे इसके लिए किसी तरह के समझौते क्यों न करने पड़े।

पैसे से सत्ता और सत्ता से फिर पैसा--यही रणनीति बन चुकी है।

  इसीलिए राजनीति के भीतर के थोड़े से ईमानदार लोगों का दम घुट रहा है क्योंकि वे निर्णायक स्थिति में नहीं है। जो निर्णायक स्थिति में हैं, वे भी लाचार हैं क्योंकि सिस्टम को पूरी तरह भ्रष्ट बना दिया गया है। एक ईमानदार मुख्यमंत्री ने कई साल पहले इन पंक्तियों के लेखक से कहा था कि ‘मैं इस लोकतांत्रिक सिस्टम को बचाने की कोशिश तो कर रहा हूं, पर लगता है कि यह बच नहीं पाएगा।’ सत्ता व राजनीति को भीतर से देखने से उन्हें साफ लग रहा था कि विभिन्न क्षेत्रों के भ्रष्ट लोग अपने स्वार्थ में एक दिन इस लोकतंत्र को ही खत्म कर देंगे।

  यदि आज कोई नेता अपने निजी फायदे के लिए किसी भी दल में बेहिचक चला जा रहा है और कोई भी दल किसी अन्य दल से तुरंत समझौता कर ले रहा है तो इसका एक ही कारण है कि राजनीति में नीति -सिद्धांत, त्याग-तपस्या व जनसेवा का स्थान किन्हीं अन्य तत्वों ने ले लिया है।



    इस पृष्ठभूमि में देश के विभिन्न क्षेत्रों की कुछ ईमानदार हस्तियों ने  समय -समय पर जो टिप्पणियां व्यक्त की है, उन्हें एक बार फिर याद कर लेना मौजूं होगा।

  पूर्व सी.ए.जी. विनोद राय ने गत मई में कहा कि ‘ मैं राजनीति में कभी नहीं आऊंगा।’

उससे पहले 2003 में तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त जे.एम. लिंगदोह ने कहा था कि ‘राजनीति में प्रवेश से बेहतर है कि आत्महत्या कर ली जाएं।’

  भले मनमोहन सिंह स्वेच्छा से विवादास्पद सरकार का नेतृत्व करते रहे, पर वे खुद रुपए-पैसे के मामले में बेईमान नहीं माने जाते। उन्होंने 1996 में एक अखबार से भेंट में कहा था कि ‘इस देश की पूरी व्यवस्था सड़ गई है।’ 

समाजवादी नेता मधुलिमये ने 1988 में ही कह दिया था कि ‘मुल्क के शक्तिशाली लोग देश बेचकर खा रहे हैं।’

ज्योति बसु ने भी कहा था कि इस व्यवस्था को देख मुझे शर्म आती है।

  सुप्रीम कोर्ट ने 2007 में कहा था कि ‘भ्रष्टाचारियों के लिए फांसी की सजा का प्रावधान होना चाहिए।’

अन्ना हजारे से जब चुनाव लड़ने के लिए कहा गया तो उन्होंने जवाब दिया कि जहां सौ-सौ रुपए में वोट बिकते हैं, वहां मैं चुनाव जीत ही नहीं पाऊंगा।

 इन सब टिप्पणियों का क्या किया जाए ? 

अनेक लोग कहते हैं कि लोकतांत्रिक व्यवस्था सबसे अच्छी शासन व्यवस्था है। इस व्यवस्था मेंं गरीब अपनी आवाज उठा सकता है। पर जब राजनीति के भीतर के अच्छे लोगों को ताकत मिलेगी तभी तो गरीबों की आवाज सुनी जाएगी। अच्छे लोग कब निर्णायक स्थिति में आएंगे ? तभी आ पाएंगे जब जनता के बीच के अच्छे लोग राजनीति के अच्छे लोगों को ताकत पहुंचाएंगे। यह सब कब तक होगा? पता नहीं। 


(दैनिक भास्कर के पटना संस्करण में 29 जुलाई 2014 को प्रकाशित)    
      
  

मंगलवार, 15 जुलाई 2014

नीतीश को मिली अच्छे कामों की सजा ?

(इस लेख का संपादित अंश 19 मई 2014 के जनसत्ता में प्रकाशित)



बुरे कामों की सजा तो मतदाता देर-सवेर जरूर देते हैं, पर इस बार बिहार में नीतीश कुमार को उनके कुछ अच्छे कामों की भी सजा मिल गयी।

  बिहार के अधिकतर सवर्ण मतदाताओं ने नीतीश को ऐसी गलती के लिए सजा दी जो उन्होंने की ही नहीं थी। अधिकतर सवर्ण मतदातागण नीतीश कुमार से इन दिनों नाराज चल रहे हैं। पर यहां यह कहना जरूरी है कि नरेंद्र मोदी फैक्टर का भी चुनाव में जबर्दस्त असर था।

हालांकि मोदी की लहर नहीं होती तोभी बिहार के अधिकतर सवर्ण मतदाता  नीतीश कुमार के गठबंधन को वोट नहीं देते।

उन लोगों ने इस लोकसभा चुनाव 2014 मंे जदयू को वोट नहीं दिया जबकि नीतीश कुमार की सरकार ने सन 2005 में सत्ता में आने के बाद सर्वाधिक राहत सवर्णों को ही पहुंचाई। नीतीश कुमार को सत्ता में लाने में खुद सवर्णों ने भी कभी बड़ी भूमिका निभाई थी। वे लालू के जंगल राज से ऊब चुके थे। पर बाद में स्थिति बदल गई।

  लालू -राबड़ी के कथित ‘जंगल राज’ से व्यवसायियों के बाद सवर्ण ही सर्वाधिक परेशान थे। वे लालू-राबड़ी राज से मुक्ति चाहते थे। नीतीश ने मुक्ति दिलाई।

जो सवर्ण किसान गांवों में नक्सलियों, अपराधियों व सरकारी संरक्षणप्राप्त दबंगों के डर से खेती तक नहीं कर पा रहे थे, उन्हें नीतीश की सरकार ने भारी राहत दिलाई। कानून -व्यवस्था ठीक करके नीतीश सरकार ने ऐसा किया।

   नीतीश राज आने पर वर्षों बाद राज्य के अनेक गांवों में फिर से खेती-बाड़ी शुरू हो गई। खेती-बाड़ी बंद होने से अनेक गांवों मंे शादी-विवाह भी बंद थे। सब चालू हो गए। इसके अलावा भी कई तरह की राहतें नीतीश सरकार ने पहुंचाई।

पर आखिर नीतीश कुमार व उनकी सरकार ने उनका बाद में क्या बिगाड़ा कि वे उनके खिलाफ हो गये ?

उनका तो कुछ नहीं बिगाड़ा। बल्कि कई तरह के उपायों से अन्य लोगों के साथ -साथ उनका भी भरसक बनाया ही। नीतीश सुशासन व न्याय के साथ विकास की नीति पर चल रहे थे। न्याय के साथ विकास का मतलब है गरीबों का भी विकास। राज्य के विभिन्न हिस्सों से मिल रही सूचनाओं के अनुसार दरअसल कमजोर वर्ग के लोगों का सरकार द्वारा भला किए जाने के कारण अधिकतर सवर्ण नीतीश से खफा हो गये।

ठीक ही कहा गया है कि कुछ लोग अपने दुःख से नहींे बल्कि पड़ोसियोंे के सुख से अधिक दुःखी हो जाते हैं। 

आम सवर्णों के प्रति भी नीतीश कुमार का सदा मधुर व्यवहार रहा है। लंबे समय से मुख्य सचिव व डी.जी.पी. सवर्ण ही हैं। एक कांग्रेसी स्वतंत्रता सेनानी के पुत्र होने के कारण नीतीश कुमार को ऐसा संस्कार मिला जिसके तहत सामाजिक मामलों में उनका संतुलित दृष्टिकोण रहता है। 

 कुछ ही साल पहले नीतीश कुमार जब ‘थ्री इडिएट’ फिल्म देखने पटना के एक सिनेमा हाॅल गये थे तो उनके साथ उनके चार गहरे दोस्त थे। चारों सवर्ण ही थे। यह कोई संयोग नहीं था। जानकार लोग बताते हैं कि दरअसल नीतीश कुमार ने जातीय भावना से कभी कोई काम नहीं किया। इसी तरह की अन्य कई बातें हैं। 

लालू-राबड़ी राज में बुरी तरह बिगड़ी कानून -व्यवस्था को ठीक करने में नीतीश सरकार ने महत्वपूर्ण काम किया। विकास के काम भी काफी तेज  हुए। उससे भी समाज के अन्य लागों के साथ -साथ सवर्णों को भी काफी लाभ हुआ। सरकारी पदों पर लाखों बहालियों से सवर्णों को भी लाभ मिला।

 लालू -राबड़ी राज में सरकारी पद खाली रहने के बावजूद बहालियां लगभग बंद थीं। राजनीतिक प्रेक्षकों के अनुसार इस चुनाव में सवर्णों के वोट से वंचित नीतीश कुमार को यदि राजनीतिक मजबूरी में कभी राजद के साथ जाना पड़ेगा तो इसके लिए आखिर कौन जिम्मेदार माना जाएगा ? जाहिर है कि वे सवर्ण ही अधिक जिम्मेदार होंगे जिन्होंने नीतीश कुमार को बीच मझधार में छोड़ दिया। हालांकि राजद के साथ जदयू की कभी सरकार बनेगी तो उससे सवर्णों का कितना भला होगा ?

     यह बिहारी समाज के लिए विडंबना ही है कि नीतीश कुमार से  सवर्णों की नाराजगी का एक बड़ा कारण यह रहा कि नीतीश सरकार ने कमजोर वर्ग के लिए बड़े पैमाने पर कल्याण व विकास के काम किये। उन लाभान्वित लोगों में अधिकतर खेतिहर मजदूर हैं। जब नीतीश के कारण उनका आर्थिक सशक्तीकरण हुआ तो वे भूमिपतियों से मजदूरी को लेकर सौदेबाजी की स्थिति में आ गये। वे कभी -कभी आराम भी करने लगे। यदा कदा अब वे काम पर जाने से मना कर देते हैं। भूमिपतियों में सवर्ण ही अधिक हैं। यह सौदेबाजी व मजदूरों की ‘आराम तलबी’ उन्हें मंजूर नहीं है। उन्हें खेती के लिए अपनी पुरानी यानी सस्ती शर्तों पर मजदूर मिलने में दिक्कत होने लगी है। कमजोर वर्ग के लोग अब आम तौर पर उनसे दबते नहीं हैं। 

   गांवों के कई सवर्ण भूमिपतियों ने चुनाव से पहले इन पंक्तियों के लेखक को बताया था कि लालू प्रसाद तो पिछड़ों के लिए सिर्फ बड़ी -बड़ी बातें ही अधिक करते थे, पर नीतीश कुमार ने तो आर्थिक सशक्तीकरण करके उनका मनोबल वास्तव में बहुत बढ़ा दिया है। अब हमलोगों के लिए खेती करना कठिन हो गया है। इस बार हम नीतीश को हरा देंगे।
  यही हुआ भी।

 सन 2009 के लोकसभा चुनाव में जदयू को बिहार में 24.04 प्रतिशत वोट मिले थे, पर इस बार जदयू 15.80 प्रतिशत सिमट गया।

   उधर एक बात और है। भाजपा के पक्ष में लगभग देशव्यापी लहर से बिहार भला अछूता कैसे रह पाता ? इसलिए बिहार में भाजपा की भारी सफलता राज्य की राजनीति के लिए उतनी महत्वपूर्ण बात नहीं है जितनी सत्ताधारी नीतीश कुमार के दल की भारी विफलता और इस विफलता से उपजी राजनीतिक अनिश्चितता। जदयू इस चुनाव में तीसरे स्थान पर रहा। कहते हैं कि होम करते नीतीश के हाथ जले। दूसरा स्थान राजद गठबंधन को मिला। यानी सवर्णों के अलावा भी कुछ दूसरे लोगों ने भी नीतीश को वोट नहीं दिये। तीसरे स्थान पर जाने का भी दुःख जदयू को है।

  जबकि नीतीश सरकार ने बिहार को लगभग हर मोर्चे पर विकसित किया। अब भी विकास के काम धुआंधार जारी हैं। उन्होंने पिछड़ों, दलितों व अल्पसंख्यकों के बीच के उस हिस्से के लिए विशेष काम किये जिन्हें उसकी सर्वाधिक जरूरत थी।

  विकास के करीब -करीब हर संकेतक में बिहार का प्रदर्शन शानदार रहा। कानून व्यवस्था बेहतर होने के कारण लोगबाग अपने- अपने छोटे -बड़े रोजगार में निर्भीकतापूर्वक लगे हुए हैं। पहले आतंक के माहौल में व्यापार कठिन था। तब व्यापारी राज्य के बाहर भाग रहे थे।

   इसके साथ ही कई अन्य सकारात्मक बातें भी हो रही हैं। इसके बावजूद यदि नीतीश कुमार को मतदाता अस्वीकार कर दे तो उस नेता के लिए हतोत्साहित होना स्वाभाविक ही है। राजनीतिक प्रेक्षकों के अनुसार मतदाताओं के एक हिस्से ने नीतीश कुमार को ठुकराकर नीतीश से अधिक खुद का यानी बिहार का अधिक नुकसान किया है। क्योंकि शासन की दृष्टि से बिहार जैसे एक बीहड़ प्रदेश को पटरी पर लाने का काम करने की कूबत नीतीश कुमार के अलावा अन्य किस नेता में है, इस सवाल का जवाब अभी कई लोगों को नहीं मिल रहा है।

  जदयू और खासकर नीतीश कुमार का इसलिए भी दुखी व उदास होना स्वाभाविक है कि ममता बनर्जी, नवीन पटनायक और जयललिता ने जनता की मदद से तो मोदी की लहर को रोक ही लिया है। यह काम बिहार में क्या नहीं हो सकता था ? जबकि बिहार में मुख्यमंत्री के रुप में नीतीश कुमार ने बहुत मेहनत की थी और जनता से वे अपनी मेहनत की मजदूरी मांग रहे थे। वह मजदूरी उन्हें नहीं मिली।

  राजनीतिक प्रेक्षकों के अनुसार नीतीश जैसे ईमानदार, मेहनती, कल्पनाशील व संवेदनशील नेता के इस्तीफे के पीछे यह पीड़ा साफ झलकती है। 

(इस लेख का संपादित अंश 19 मई 2014 के जनसत्ता में प्रकाशित)

रविवार, 13 जुलाई 2014

मीडिया ने पिछड़ा उभार को सकारात्मक नजरिये से नहीं देखा

(प्रभात खबर, पटना में 7 अप्रैल 2001 को प्रकाशित)


 पत्रकार सुरेंद्र किशोर से प्रभात खबर के लिए 
अनीश अंकुर और अविनाश की बातचीत 

प्रश्न-पिछले दस वर्षों के दौरान पिछड़ा उभार या सशक्तीकरण का बिहार के समाज पर जो असर पड़ा, मीडिया ने उसको किस रूप में रेखांकित किया ?

उत्तर- कुछ अपवादों को छोड़कर मीडिया ने पिछड़ा उभार या सशक्तीकरण को सकारात्मक नजरिए से नहीं देखा। इसके कई कारण हैं। इस सवाल का जवाब मीडिया के लोगों की सामाजिक पृष्ठभूमि में भी ढूंढ़ा जा सकता है। पिछड़ा उभार और सशक्तीकरण के आंदोलन के नेतागण भी इसके लिए जिम्मेदार रहे हैं। सवर्ण बहुल मीडिया से यह उम्मीद करना ज्यादती होगी कि वह सशक्तीकरण के नाम पर पिछड़ों के बीच की कुछ खास जातियों को उन्मादी और नव सवर्ण रूप में स्वीकार कर ले। सशक्तीकरण को व्यापक और समरूप बनाने की जरूरत है। दूसरी ओर मीडिया की सामाजिक बुनावट में यदि परिवर्तन नहीं हुआ, तो खुद मीडिया के सामने विश्वास का संकट और भी गहराएगा। 

प्रश्न - लोग कहते हैं कि पिछड़े वर्गों के सशक्तीकरण ने बिहार के आर्थिक विकास की अवस्था को पीछे धकेलने का काम किया। इसकी क्या वजह हो सकती है?

उत्तर - इसके लिए सशक्तीकरण के नेता जिम्मेवार हैं। सशक्तीकरण से पहले भी बिहार विकास के मामले में पीछे ही जा रहा था। पर पिछले दस वर्षों से सत्ता जिसके हाथों में रही, उन्हें जातिवाद, भ्रष्टाचार व अराजकता के बदले विकास को अपना मूलमं़ बनाना चाहिए था। ऐसा नहीं हुआ। इस कारण एक तरह राजनीतिक संरक्षण प्राप्त गुंडा गिरोह बड़े पैमाने परपनपे और दूसरी ओर नक्सली।

प्रश्न - हिंदी प्रदेशों में वामपंथ का सबसे मजबूत गढ़ बिहार माना जाता रहा है। पर आज उसमें एक ठहराव-सा दिखता है। बिहार में ही वामपंथ के ज्यादा आगे बढ़ने के क्या कारण रहे तथा आज जो ठहराव व गतिरोध की स्थिति है उसे कैसे तोड़ा जा सकता है?

उत्तर- बिहार एक अद्र्धसामंती समाज है। वामपंथियों के गढ़ बंगाल से यह सटा हुआ प्रदेश है। बिहार में पहले से ही राजनीतिक जागरूकता अधिक रही है। इस तरह के कारणों से वामपंथी दल यहां मजबूत हुए। पर, यहां भी वामपंथी नेताओं ने कार्यकर्ताओं व समर्थकों को छला। पहले के नेता अपने निजी जीवन की सादगी व निष्ठा के जरिए युवकों व छात्रों को प्रेरित व प्रभावित करते थे। अब वैसी बात नहीं है। कम्युनिस्ट-सोशलिस्ट पार्टियों के उत्तराधिकारी संगठनों के कार्यकर्ता आज आम तौर पर अभिकर्ता (ठेकेदार) बन चुके हैं। अपवादों की बात अलग है। इस गतिरोध को कैसे तोड़ा जाए, इस सवाल का जवाब आसान नहीं है।

प्रश्न- बिहार में लोहिया के तमाम लोहार आज त्रिशूल बना रहे हैं। किसी भद्र पुरुष के इस कथन को आप किस तरह देखेंगे?

उत्तर - लगता है कि लोहियावाद अब किताबों में सिमट कर रह गया है। किशन पटनायक जैसे थोड़े से लोग उसे जहां-तहां चला रहे हैं। बिहार के संदर्भ में देखें तो आज के अधिकतर नेता अपने-अपने कबीले के सरदार जैसे लगते है। कोई यादवों का नेता है, तो कोई कुर्मियों का। कोई कोइरी का नेता है, तो कोई राजपूतों का। कोई पासवान नेता है, तो कोई चमार नेता है। ऐसा कहे जाने पर  भी उन्हें कोई असुविधा नहीं होती। पूरे समाज का कोई नेता नहीं नजर आता। इन ‘कबीलाई सरदारों’ के रहन-सहन, हाव भाव और क्रियाकलाप मध्ययुगीन राजाओं से मिलते-जुलते हैं। पिछड़े नेताओं ने सामाजिक न्याय का उसी तरह कचूमर निकाला, जिस तरह कांग्रेसियों ने गांधीवाद का।

प्रश्न - बिहार हिंदुस्तान भर में जातीय हिंसा से सर्वाधिक त्रस्त राज्यों में रहा है। बिहार के साथ जातिवाद जैसे समानार्थक हो गया है। आप क्या कहते हैं?

उत्तर- सवाल है कि जातिवाद को मापने का क्या पैमाना बने। बिहार बदनाम अधिक है। दूसरी जगहों में जातिवाद ज्यादा या इतना ही रहा है। दरअसल जातिवाद की जकड़न को तोड़ने के लिए बिहार में अधिक कोशिशें हुई हैं। उसका शोर अधिक हुआ। इसलिए कि जकड़न टूटी। जिन लोगों को जकड़न टूटने से नुकसान हुआ, उन्होंने जातिवाद का शोर अधिक मचाया। आज सन 1950-60 की तरह सत्ता सिर्फ दो सवर्ण जातियों के हाथों में नहीं है। पर बंगाल में सत्ता अब भी दो सवर्ण जातियों के हाथों में है। यदि वहां भी इस लाइन पर आंदोलन हुआ होता, तो वहां भी जातिवाद को शोर मचा होता। 

     यह भी आरोप लगाया जाता है कि केंद्र की 1952-57 की सरकार जितनी जातिवादी थी, उतनी जातिवादी लालू-मुलायम की सरकारें भी नहीं रही हैं। आंकड़े तो यही बताते हैं। मेरिट केक नाम पर एक खास जाति के लोगों को बड़ी संख्या में पद दिये गये। इन कथित मेरिट वालों ने आजादी के बाद देश को ऐसे चलाया कि हम भारी विदेशी कर्जे में डूब गये। आज हमें उन कर्जों के सिर्फ सूद के रूप में हर साल करीब एक लाख करोड़ रुपये देने पड़ते हैं।

प्रश्न-बिल्कुल इधर ‘गांव बचाओ देश बचाओ’ रैली में लालू यादव ने कहा कि अब बैकवर्ड-फारवर्ड की लड़ाई मैं बंद करता हूं। पहले देश बचाना जरूरी है। जब देश बचेगा, तो लड़ाई फिर कभी हो जाएगी। लालू यादव में इस परिवर्तन के राजनीतिक अर्थ क्या हो सकते हैं?

उत्तर - लालू यादव पहले भी यह बात कह चुके हैं। जब-जब वे राजनीतिक जरूरत महसूस करते हैं, ऐसी बातें कहते हैं। यदि लालू यादव इस समस्या के प्रति गंभीर होते तो वे पहले पता लगाते कि ऐसी नौबत क्यों आई कि देश एक बार फिर आर्थिक गुलामी की ओर बढ़ रहा है। इस समस्या को विकट बनाने में खुद उनकी बिहार सरकार का पिछले दस साल में कितना बड़ा योगदान रहा है? फिर उस कमी को दूर करने की वे कोशिश करते तो गांव बचाने में मदद मिलती।

रैली में करोड़ों रुपये फूंक देने से तो देश और जल्दी गुलाम होगा! सब जानते हैं कि ऐसी रैलियों के लिए पैसे कहां से आते हैं।

मान लीजिए कि बिहार सरकार ने विश्व बैंक से भारी कर्ज लेकर राज्य में बड़ी निर्माण योजानाएं शुरू कीं। ंयोजना के पैसों की बंदरबांट कर ली गई। योजना से कोई रिटर्न नहंीं आया। कर्ज और सूद बढ़ता गया। सरकार महाजन के पैसे वापस करने की स्थिति में नहीं है। अब सरकार को महाजन के निर्देश पर काम करना पड़ेगा। उसी तरह के महाजनों के दबाव पर इस देश की केंद्रीय सरकार उदारीकरण के खिलाफ देश बचाओ गांव बचाओ रैली की जा रही है। क्या लालू यादव ने यह पता लगाया कि विदेशी कर्जे से शुरू हुई कितनी विकास योजनाएं बिहार के प्रशासनिक भ्रष्टाचार की बलिवेदी पर चढ़ गयी?

भ्रष्टाचारियों पर कौन सी कार्रवाई हुई? किसी ने ठीक ही कहा है कि भ्रष्ट सरकार अपने देश की स्वतंत्रता कायम नहीं रख सकती।

प्रश्न- पचास साल बाद बिहार की तस्वीर आपको कैसी नजर आती है ?

उत्तर-विभिन्न क्षेत्रों में पूरे देश में गिरावट की जो रफ्तार है, उसके अनुसार तो अगले दस साल में ही पूरे देश की हालत गड़बड़ होने वाली है। भूमंडलीकरण व उदारीकरण के दुष्परिणाम सामने आने लगेंगे तो आशावादी लोगों के होश उड़ जाएंगे। मैं तो निराशावादी बन गया हूंं। पानी की कमी व पर्यावरण असंतुलन की जो भीषण समस्या अगले दस पंद्रह साल में ही जो सामने आने वाली है, उसकी कल्पना करके डर लगता है। इस बीच केंद्र सरकार देश में एक सवा लाख करोड़ रुपये खर्च करके सुपर हाईवे बनवा रही है जबकि तत्काल लाखों तालाब बनवाने की जरूरत है। ताकि भूमिगत जल का स्तर और नीचे नहीं जाए।

वर्षा का पानी तालाबों में इकट्ठा होता है। अटल बिहारी वाजपेयी शाहजहां की तरह ताजमहल बनवा रहे हैं जबकि उन्हें शेरशाह की तरह सड़क बनवा कर वृक्ष लगवाने चाहिए थे। आज तालाबों की उतनी ही जरुरत है जितनी शेरशाह के जमाने में सड़क की थी।

प्रश्न-बिहार में इन दिनों हो रही पत्रकारिता का विश्लेषण आप कैसे करेंगे? पिछले दशक में बिहार की पत्रकारिता में किन लोगों के योगदान को आप महत्वपूर्ण मानते हैं?

उत्तर-अखबार जनता के कुछ अधिक करीब गये हैं। पिछले दशक में कई पत्रकारों ने अच्छा काम किया है। खासकर बिहार के अनेकानेक घोटालों की खबरें पूरी की पूरी जनता तक गई हैं।

पत्रकारिता में सुधार की गुंजाइश तो हमेशा ही रहती है। पर्यावरण, जल प्रबंधन और उदारीकरण के खतरों की ओर बहुत कम अखबार ध्यान दे रहे हैं। इन दिनों अखबारों में व्याकरण गलतियों में भारी वृद्धि हुई है। अधिक पन्ने, चिकने कागज और रंगीन छपाई पर तो ध्यान दिया जा रहा है, पर इस बात पर गौर नहीं किया जा रहा है कि छात्रों की भाषा बिगड़ती जा रही है। पहले अंग्रेजी और हिंदी अखबारों से भी छात्र भाषा सीखते थे।

          --अनीश अंकुर एवं विनाश। 
(प्रभात खबर, पटना में 7 अप्रैल 2001 को प्रकाशित)

बुधवार, 7 मई 2014

चुनाव में मनी पावर यानी एक नया वोट बैंक

चुनावों में ‘मनी पावर’ एक नये ढंग के वोट बैंक के रूप में तेजी से उभर रहा है। यह तत्व भी मतदान को एक हद तक प्रभावित करने लगा है।
 जिन चुनाव क्षेत्रों में थोड़े मतों से हार-जीत का फैसला होता है, वहां मनी पावर निर्णायक साबित होता दिख रहा है।

 यह मनी पावर यानी नया वोट बैंक, परंपरागत जातीय व सांपद्रायिक वोट बैंक को जहां -तहां काफी ताकत पहुंचा रहा है। तीनों तत्व मिलकर कहीं -कहीं निर्णायक साबित हो रहे हैं।

 मिल रही सूचनाओं के अनुसार मनी पावर अभी किसी जातीय वोट बैंक से अधिक ताकतवर नहीं बना है, पर यह उस रास्ते पर जरूर है।

   मौजूदा चुनाव में आयकर दस्तों ने देश भर में 273 करोड़ रुपये नकदी और करीब दो करोड़ लीटर शराब जब्त की है। यह आंकड़ा गत एक मई तक का है। बिहार सहित देश भर में ऐसी जब्तियां अब भी जारी हैं। जब्तियों की यह मात्रा अभूतपूर्व है।

  जितने पैसे व शराब पकड़े गये हैं, वे उन अपार धन व सामग्री के बहुत छोटा हिस्सा हंै जो पकड़े नहीं जा सके। वे मतदाताओं के एक हिस्से के बीच वितरित कर दिये गये।

 एक ताजा अध्ययन के अनुसार देश के नेतागण इस पूरे चुनाव में कुल करीब तीस हजार करोड़ रुपये खर्च करेंगे। इनमें वैध व अवैध खर्च शामिल हैं।

   गत साल जून में भाजपा नेता गोपी नाथ मुंडे ने सार्वजनिक रुप से यह स्वीकार किया था कि उन्होंने 2009 के लोकसभा के चुनाव में अपने क्षेत्र में 8 करोड़ रुपये खर्च किये थे।

 गत दिनों चुनाव आयुक्त एच.एस. ब्रह्मा ने एक रहस्योद्घाटन किया । श्री ब्रहमा ने कहा कि मैंने सुना है कि आंध्र प्रदेश के एक संभावित लोकसभा उम्मीदवार अपने चुनाव क्षेत्र में एक सौ करोड़ रुपये खर्च करने वाला है। एक अन्य उम्मीदवार ने व्यक्तिगत बातचीत में श्री ब्रह्मा को बताया था कि अपने चुनाव क्षेत्र में वह 35 करोड़ रुपये खर्च करने वाला है।

  इन आंकड़ों व सूचनाओं को देखकर क्या ऐसा नहीं ंलगता कि ‘मनी पावर’ एक नया वोट बैंक बनता जा रहा है। वह  जातीय व सांप्रदायिक वोट बैंक से कम खतरनाक नहीं है !

  यह संयोग नहीं है कि इस देश की संसद व विधायिकाओं में करोड़पतियों व अरबपतियों की संख्या तेजी से बढ़ रही है।

 चुनाव आयोग की कड़ाई के कारण चुनाव में बाहुबल का इस्तेमाल पहले की अपेक्षा थोड़ा कम हुआ है। पर, कई क्षेत्रों में मनी पावर, अब बाहुबल का विकल्प बन कर उभरा है।

  बूथ कैप्चर की जगह भारी पैसे के बल पर मतदाताओं के एक हिस्से को अपने प्रभाव में लाया जा रहा है। मतदाताओं का जो हिस्सा पैसे स्वीकार कर रहा है,उनमें से अधिकतर लोगों के दिलों -दिमाग में यह भाव उभर रहा है कि जब सत्ता में आने के बाद किसी भी दल को आम जन की भलाई के लिए काम नहीं ही करना है, खुद की भलाई के लिए ही बहुत करना है, तो क्यों नहींं आज जो कुछ उनसे मिल रहा है, उसे ही स्वीकार करके संतोष कर लिया जाए।

राजनीतिक प्रेक्षकों के अनुसार वैसे मतदाता इस बात की परवाह नहीं कर रहे हैं कि पैसे के बल पर चुनाव जीतने वाले नेतागण  और भी कितना अधिक निर्भीक होकर इस देश को लूटंेगे।

 हालांकि यह बात भी सही है कि इसी देश में  कुछ दल व नेता ऐसे भी हैं जो चुनावों में मनी पावर के खेल में शामिल नहीं हैं।  


(साभार -दैनिक भास्कर ,पटना संस्करण- 6 मई 2014)

होली की गालियां या गब्बर सिंह के डायलाॅग ?


गत बिहार विधानसभा चुनाव में भी प्रतिस्पर्धी नेताओेंं के बीच तीखे आरोपों -प्रत्यारोपों के दौर चले थे। तब एक बड़े नेता ने कहा था कि चुनाव के दौरान की गई आलोचनाएं होली की गालियां जैसी होती हैं। उन गालियों को होली बीतने के बाद भुला दिया जाता है।

   पर क्या इस बार की तीखी व अभूतपूर्व गालियां भी होलियाना ही हैं ? ऐसा तो नहीं लगता। इन गालियों व तीखे संवादों के सामने तो शोले फिल्म के गब्बर सिंह के डायलाॅग भी फीके हो गये हैं।

क्या नेताओं के जहर बुझे बयानों से लगे घाव चुनाव के बाद भी जल्दी भर पाएंगे ? उम्मीद की जानी चाहिए कि वे घाव जल्द ही भर जाएं और तनावमुक्त ढंग से लोकतंत्र की गाड़ी फिर से चलने लगे।

   पर, ऐसा होने मेंे  कई लोगों को अभी संदेह है। उनका मानना है कि इसका असर चुनाव के बाद भी कुछ दिनों तक रहेगा। कई लोगों को इस बात पर आश्चर्य हो रहा है कि क्यों चुनाव आयोग  कसूर के अनुपात में तौलकर उन नेताओं को  सजा नहीं दे रहा है जो नेतागण खुलेआम चुनाव आचार संहिता का घोर उल्लंघन कर रहे हैं। साथ ही जो वोट के लिए समाज में विद्वेष फैलाने के साथ- साथ लोकतंत्र की गरिमा भी गिरा रहे हैं। राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि यदि आचार संहिता के सवाल पर एक -दो चुनाव क्षेत्रों के चुनाव स्थगित कर दिए गए होते तो बेलगाम नेताओं की बोलती बंद हो गई होती।

   चुनाव के कुछ फेज अब भी बाकी हैं। अब यह मतदाताओंं पर ही निर्भर है कि एक दूसरे के खिलाफ बयानों के ऐसे जहर बुझे तीर चलाने वालों को वे वोट देंगे या नहीं। क्या मतदातागण ऐसे ही लोगों के हाथों संसदीय जनतंत्र की कमान सौंपेंगे जिनकी जुबान इतनी बेलगाम व जहरीली हैं ? जो वोट के लिए किसी भी हद तक जाकर जातीय व सांप्रदायिक भावनाएं उभार सकते हैं ? जो किसी की भी प्रतिष्ठा का ख्याल रखे बिना किसी भी तरह के अपुष्ट व उल्टे सीधे आरोप लगा सकते हैं ?

  इतने गंदे, अश्लील, दिलों को भेदने वाले तथा समाज में द्वेष फैलाने वाले आरोप-प्रत्यारोप इससे पहले किसी चुनाव में नहीं लगाये गये थे। जब जुबान पर हिंसा हो तो सरजमीन पर भी उसका असर देखा ही जा सकता है। चुनाव से संबंधित हिंसक घटनाओं की खबरें आने भी लगी हैं।

  इसके साथ ही जितनी अधिक मात्रा में काला धन का इस्तेमाल मौजूदा चुनाव में हो रहा है,उतना इससे पहले कभी नहीं हुआ था।

  लगातार पकड़े जा रहे भारी मात्रा में काला धन से इस बात की पुष्टि होती है। याद रहे कि जुबान ही नहीं बल्कि काला धन भी मतदाताओं के एक हिस्से को प्रभावित करते हैं। इस देश के लोकतंत्र में तेजी से घर कर रही इन गंभीर बीमारियों का इलाज सिर्फ मतदाताओं के पास है। उनसे उम्मीद की जा रही है कि नफरत व चुनावी गंदगी फैलाने वाले नेताओं को इस चुनाव में नकार दें।

   अन्यथा जहर उगलने वाले नेतागण अपने राजनीतिक लाभ के लिए आने वाली पीढि़यों के दिलो -दिमाग में भी जहर ही घोलेंगे।   

अब जरा कुछ नेताओं की बदजुबानियों के कुछ नमूने पढि़ए।

 एक नेता ने अपने प्रतिद्वंद्वी नेता के बारे में कहा कि वह घमंडी और लुटेरा है। दूसरे ने कहा  कि वह कसाई है। तीसरे की टिप्पणी थी कि उसे देख कर तो कसाई भी शर्मा जाते हैं।

  जब तक वे एक दूसरे को पप्पू और फेंकू कह रहे थे, तब तक वह सहनीय था। क्योंकि उसमें मनोरंजन का भी पुट था। पर अब तो आरोप-प्रत्यारोपों में खांटी दुश्मनी के भाव दिख रहे हैं। जीजाजी शब्द के उच्चारण से राजनीति की गरिमा गिरी। नपुंसक व गुंडे शब्द ने लोकतंत्र को शर्मा दिया। इनके अलावा भी कुछ ऐसे डायलाॅग बोले गये जिन्हें सुन कर गब्बर सिंह के डायलाॅग भी फीके लगने लगे।

वैसे अभी चुनाव प्रक्रिया पूरी नहीं हुई है। अब भी न जाने कितने विषैले तीर हमारे नेताओं के पास बचे हुए हैं। हालांकि यह कहना भी सही नहीं होगा कि सारे नेता ऐसे ही हैं। इस तनावपूर्ण चुनाव में भी कुछ नेताओं की जुबान पर अब भी शालीनता विराजमान है।


(30 अप्रैल 2014 के दैनिक भास्कर के पटना संस्करण में प्रकाशित)